पंजाब में कृषि का अभिशाप

Submitted by Hindi on Thu, 08/25/2011 - 10:24
Source
खेत-खलिहान

2500 लोगों की मृत्यु के बाद बिसरा की जांच की गई जिसमें डी.डी.टी. ईंधन और इंडोसल्फान रसायन मिले हैं। 10 वर्ष से कम और 10-35 वर्ष के बच्चों में कैंसर पाया गया। बच्चे बचपन में बुढ़ा हो गए हैं। जोड़ों का दर्द, गठिया, और कंकाल फ्लोरोसिस के मरीज बढ़े हैं। त्वचा व फेफड़ों का कैंसर भी बढ़ा है। कुल मिलाकर पंजाब की खेती अभिशाप बनते जा रही है।

1970 की हरित क्रान्ति ने पंजाब को भारत का अनाज भंडार दिया था। हमारे पूरे देश की भूख मिटाने के लिए पंजाब की कृषि भूमि का इतना दोहन किया गया जिसकी कीमत आज पंजाब के किसान अपने जीवन से दे रहे हैं। गुरूनानक जी ने कहा था कुदरत के सब वंदे किन्तु पंजाब ने अपनी जमीन को रसायनों से इतना पाट दिया है कि आज कुदरत अपना बदला लेने को मजबूर हो कई है। कुदरत या प्रकृति को जो अपना गुलाम बनाने की भूल करता है उसका स्वयं का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाता है। विश्व की कोई भी शक्ति प्रकृति से जीत नहीं सकती है। हम प्रकृति से हैं प्रकृति हमसे नहीं है। आइए पंजाब को समझें इसके उत्तर में जम्मू कश्‍मीर राज्य, दक्षिण में हरियाणा और राजस्थान, पूर्व में हिमाचल प्रदेश और पश्चिम में पाकिस्तान है। भारत के कुल भूभाग का पंजाब 1.5 प्रतिशत मात्र है। देश का डेढ़ प्रतिशत भूभाग वाला पंजाब देश के कुल गेहूं उत्पादन का 22 प्रतिशत, चावल का 12 प्रतिशत, कपास का 12 प्रतिशत पैदा करता है। फसल की गहनता 186 प्रतिशत है। प्रति हेक्टेयर खाद का उपयोग 177 किलोग्राम है जबकि इसका राष्ट्रीय औसत 99 किलोग्राम है।

राज्य का भैगोलिक क्षेत्रफल 50.36 लाख हेक्टेयर है जिसमें से 42.90 लाख हेक्टेयर पर खेती होती है अर्थात अधिकांश भूमि पर खेती होती है केवल 7-8 लाख हेक्टेयर भूमि पर शहर, गांव, कारखाने, सड़कें आदि हैं। पंजाब के कुल क्षेत्र के 33.88 पर नहरों से सिंचाई होती है। सन् 1970 में पंजाब में 1.2 लाख ट्यूबवेल थे जो सन् 2009 में बढ़कर 12.32 लाख हो गए यानी बारह जिलों के पंजाब में हर जिले में एक लाख से अधिक ट्यूबवेल हैं। 1980 में 739 एमएम औसत वर्षा होती थी जो सन 2006 तक घटकर 418.3 एमएम रह गई है। पंजाब के 40 ब्लॉक में भूमिगत जल 50 फुट और नीचे चला गया है। एक अनुमान के अनुसार सन् 2023 तक 66 प्रतिशत क्षेत्र का पानी वर्तमान स्तर से 50 फुट नीचे और पंजाब के 34 प्रतिशत क्षेत्र का जलस्तर वर्तमान स्तर से 70 फुट नीचे चला जाएगा। पानी के नीचे जाने का मतलब भूमि का रेगिस्तान में बदल जाना है। आज भी पानी का इतना संकट है कि 10 जून के पूर्व धान की खेती की सरकार से अनुमति नही है। कुएँ और तालाब सूख गए हैं हैंडपम्प की स्थिति पूछिए मत।

अब सुनिए देश के कुल कृषि क्षेत्र का 1.5 प्रतिशत पंजाब जबकि देश के कुल कीटनाशकों का 18 प्रतिशत पंजाब की खेती में उपयोग होता है पंजाब मालवा क्षेत्र का कपास बेल्ट पूरे पंजाब का सिर्फ 15 प्रतिशत क्षेत्र है और इसमें पूरे पंजाब का 70 प्रतिशत कीटनाशकों का उपयोग होता है। एक अध्ययन के अनुसार पंजाब का मालवा क्षेत्र देश के कुल भूभाग का 0.5 भाग है जबकि यह पूरे देश के कीटनाशकों का 10 प्रतिशत उपयोग में लाता है। फिरोजपुर, फरीदकोट, मुक्तशसर, भटिंडा, मांसा और संगरूर जिले रसायनों के अत्यधिक प्रयोग वाले जिले हैं। इनकी जमीन रेगिस्तान होती जा रही है। इस क्षेत्र का मलसिंहवाला गांव तो पूरा का पूरा बिकने को तैयार है। रासायनिक खाद और कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से जमीन के पोषक तत्व, सूक्ष्म जीवाणु और केंचुए आदि खत्म हो गए हैं। कृषि भूमि में जरूरी पोषक तत्वों जैसे जिंक, सल्फर, जस्ता, लोहा, जैविक कार्बन आदि बिलकुल नष्ट हो गए हैं।

अनवर जमाल दिल्ली के डायरेक्टर ने एक डॉक्यूमेंटरी फिल्म पंजाब की खेती पर बनाई है। HARVEST OF GRIEF (दुखों की खेती. अधिक जानना चाहते हैं तो 12 अप्रैल 2010 का इंडियन एक्सप्रेस पढ़ें।) इस फिल्म के अनुसार पंजाब में खेती के असफल होने के अनेक कारणों में एक भाखड़ा बांध परियोजना का फैल होना और सिंचाई के पानी की ऊंची लागत होना भी है। प्रफुल्ल किदवई और वंदना शिवा जैस बड़े पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के सम्मुख इस फिल्मो का प्रदर्शन इंडिया इंटरनेशनल सेंटर दिल्ली में किया गया था। पंजाब में किसान उधारी के चक्कर में फँस गया है। आत्महत्याओं की संख्या में बहुत वृद्धि हो रही है। केमिकल पर आधारित खेती, खराब होती जमीन, पानी का दूषित होना और कर्ज के कारण किसान आत्महत्या कर रहे हैं।

पंजाब के 1410 ब्लॉक में से 103 ब्लॉकों में भूमिगत जल खतरे के निशान से भी नीचे चला गया है। सेन्ट्रल ग्राउन्ड्स वाटर बोर्ड के अनुसार पंजाब के 12 ब्लॉक भूमिगत जल के डार्कजोन में आ गए हैं। जालंधर, मोगा और लुधियाना क्षेत्र में पानी का दोहन 200 से 250 गुना और मोगा के निहालसिंगवाला ब्लॉक में 400 गुना पानी का दोहन हुआ है। विशेषकर धान की खेती के लिए जल का दोहन बढ़ा है। 2009 में NASA के वैज्ञानिकों ने भूमिगत जल और खेती के नष्ट होने की चेतावनी दी थी। गतवर्ष नासा ने चेतावनी दी कि उत्तर भारत के कुछ क्षेत्रों में भूमिगत जल सेटेलाइट से दिखना बन्द हो गया है। इसलिए पंजाब में सरकार ने 10 जून से पहले धान की खेती पर प्रतिबंध लगा दिया है। पंजाब में वर्षा का औसत भी कम होते जा रहा है। पानी नहीं गिरने से भूमिगत जल के अत्यधिक दोहन के कारण सरकार भी मुफ्त बिजली की नीति बन्द कर रही है बिजली के बिल भरने में ही अनेक किसान दिवालिया हो जाएंगे। पंजाब में किसान सबमर्सिबल पम्प लगाने लगे हैं। डार्क जोन में 450 फीट पर पानी मिलता है। सबमर्सिबल पम्पों से हुई हानि को बरसात भी पूरा नहीं कर सकती है।

खेतों में रसायनों के प्रयोग और अत्यधिक भूमिगत जल के दोहन के कारण भयंकर बीमारियाँ फैल रही हैं। ये रोग पटियाला और अमृतसर की ओर फैल रहे हैं। हाल ही में विकलांग बच्चों के जन्म की संख्या बढ़ने लगी है। मालवा क्षेत्र के 149 बीमार बच्चों में से 80 प्रतिशत के बालों में यूरेनियम की अत्यधिक मात्रा पाई गई है। कई लोग इसे अफगानिस्तान में अमेरिका द्वारा यूरेनियम के बमों का प्रभाव बताते हैं। एक अध्ययन के अनुसार पंजाब का 80 प्रतिशत पानी मनुष्यों के पीने लायक नहीं रहा है। 2001-09 के बीच अकेले मुक्तसर जिले में 1074 व्यक्तियों की कैंसर से मृत्यु हुई है और 668 गंभीर अवस्था में हैं। मालवा क्षेत्र में कैंसर अस्पताल नहीं होने से लोग बीकानेर इलाज के लिए जाते हैं। फोरेंसिक लैब पटियाला ने 12 जिलों के खून के सैम्पल लिए जिनमें 6 से 13 प्रतिशत पेस्टिसाइड खून में मिला है। डॉ. अम्बेडकर नेशनल इंस्टीट्यूट जालंधर ने 34 गाँवों के पानी के हैंडपम्पों में यूरेनियम पाया है जिनमें मांसा जिले की स्थिति गंभीर है।

भटिंडा जिले में यूरेनियम की सान्द्रता 30 माइक्रोग्राम प्रति लीटर पाई गई जबकि यह 9 से अधिक नहीं होना चाहिए। पंजाब सरकार इन गंभीर क्षेत्रों में 200 आर.ओ. रिवर्स सिस्टम लगा रही है परन्तु वैज्ञानिकों के अनुसार आर.ओ. सिस्ट्म से हेवीमेटल्स जैसे आर्सेनिक, क्रोमियम, लोहा आदि को दूर नहीं किया जा सकता है। ग्रीनपीस ने भटिंडा, फरीदकोट, मांसा, संगरूर, मुक्तसर और मोगा जिलों में स्थिति गम्भीर पाई गई है। भैंस का दूध भी प्रदूषित हो गया है। 2500 लोगों की मृत्यु के बाद बिसरा की जांच की गई जिसमें डी.डी.टी. ईंधन और इंडोसल्फान रसायन मिले हैं। 10 वर्ष से कम और 10-35 वर्ष के बच्चों में कैंसर पाया गया। प्रो. कश्मीर सिंह उप्पल, ‘बच्चे बचपन में बुढ़ा हो गए हैं। जोड़ों का दर्द, गठिया, और कंकाल फ्लोरोसिस के मरीज बढ़े हैं। त्वचा व फेफड़ों का कैंसर भी बढ़ा है। कुल मिलाकर पंजाब की खेती अभिशाप बनते जा रही है।’

प्रो. कश्मीर सिंह उप्पल सेवा निवृत्त प्रोफेसर हैं। वे मध्य प्रदेश के इटारसी नामक कस्बे में रहते हैं। इटारसी से ही प्रकाशित एक साप्ताहिक अखबार नगरकथा में आपका नियमित कॉलम प्रकाशित होता है। यह आलेख उनकी अनुमति से खेत खलियान में प्रकाशित किया जा रहा है। उनसे सीधे सम्पर्क के लिए मो. नं. 09425040457 पर किया जा सकता है। खेत खलियान की ओर से शिवनारायण गौर
 

इस खबर के स्रोत का लिंक:
Disqus Comment