प्राकृतिक खाद्यों के बेचने की समस्या

Submitted by Hindi on Sat, 06/11/2011 - 10:21
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मासानोबू फुकूओका पर लिखी गई पुस्तक 'द वन स्ट्रा रेवोल्यूशन'

जब मुझे पता चला कि वह व्यापारी उन्हें बहुत मंहगे दामों पर बेच रहा है, तो मुझे बहुत गुस्सा आया। मैंने सोचा कि जो व्यापारी अपने ग्राहकों से इस तरह नाजायज फायदा उठा रहा है, वह जरूर मेरे चावलों में अन्य चावलों की मिलावट करके ग्राहकों को गलत दामों पर बेचेगा। मैंने तत्काल उस स्टोर को माल भेजना बंद कर दिया।

पिछले कई बरसों से मैं देश के विभिन्न भागों में स्थित प्राकृतिक खाद्यों के स्टोरों को 250 से 300 किलो चावल भेजता रहा हूं। मैंने मेंडेरिन संतरों के 15 किलो के 400 बक्से भी ट्रकों में भरकर टोकियो के सुगीनामी जिले की सहकारी समिति को भेजे हैं। इस समिति में अध्यक्ष, चूंकि प्रदूषण-मुक्त उत्पाद बेचना चाहते थे। यह व्यवस्था हम दोनों के बीच हुई। पहले साल तो काफी ठीक धंधा चला, लेकिन कुछ शिकायतें भी मिलीं। फलों के आकारों में बहुत ज्यादा अंतर था, उनका बाहरी रूप-रंग भी देखने में बहुत अच्छा नहीं था, और छिलके पर झुर्रियां पड़ी हुई थी आदि। मैंने फलों को सादे बक्सों में भरकर ही भेजा था, इससे कुछ लोगों को लगा कि वे फल सेकंड क्वालिटी (दूसरे-दर्जे) के थे। अब मैं फलों को उन बक्सों में रखकर भेजता हूं, जिन पर लिखा होता है ‘प्राकृतिक मेंडेरिन’।

चूंकि प्राकृतिक खाद्य कम-से-कम खर्च और मेहनत से उगाए जाते हैं, मेरा तर्क यह था कि वे न्यूनतम कीमत पर बेचे जाने चाहिए। गत वर्ष टोकियो के इलाके में मेरे फल सबसे कम कीमत पर बेचे गए। कुछ दुकानदारों के अनुसार स्वाद व खुशबू में तो वे सबसे बढ़िया थे। इससे भी अच्छा यह हो सकता है, कि फलों को स्थानीय रूप से बेचा जाए ताकि, उनकी ढुलाई के खर्च और समय दोनों की बचत हो सके। फिर भी उक्त फलों की कीमत भी वाजिब थी, उनमें कोई रसायन नहीं थे और उनका स्वाद भी अच्छा था। इस वर्ष मुझ से कहा गया कि मैं गत-वर्ष से दो-तीन गुना ज्यादा माल भेजूं।

यहां यह सवाल खड़ा होता है कि प्राकृतिक खाद्य का सीधी बिक्री को किस सीमा तक बढ़ाया जा सकता है। इस मामले में मुझे एक बात से कुछ उम्मीद बंधती है। इधर कुछ समय से रासायनिक फल बेचने वाले आर्थिक कठिनाईयाँ महसूस कर रहे हैं। उनके लाभ का मार्जिन घटा है, उनके लिए प्राकृतिक खाद्य उगाना पहले से ज्यादा आकर्षक हो गया है, औसत किसान रसायन, रंग, पॉलिश आदि पर कितनी ही मेहनत क्यों न करे, उसे अपने फल जिस कीमत पर बेचने पड़ते हैं, उससे बड़ी मुश्किल से लागत भर वसूल हो पाती है। इस वर्ष हालत यह हुई है कि बहुत ही बढ़िया फल देने वाले फार्म पर भी प्रति किलो बहुत मुश्किल 2-3 रुपए ही मुनाफा होने की उम्मीद की जा रही है। थोड़ी सी भी घटिया क्वालिटी के फल उगाने वाले किसान को तो शायद कोई मुनाफा नहीं हो पाएगा।

चूंकि पिछले कुछ बरसों में कीमतें गिरी हैं, कृषि सहकारी-समितियां तथा छंटाई केंद्र बहुत ही सख्त हो गए हैं और वे केवल वही फल पसंद कर रहे हैं, जिनकी क्वालिटी सर्वश्रेष्ठ होती है। जरा भी घटिया फल छंटाई केंद्रों को नहीं बेचे जा सकते। मेंडेरिन संतरों की फसल काटने से पहले खेत में दिन भर का श्रम फिर उन्हें बक्सों में भरना और छंटाई केंद्रों तक ले जाना आदि के लिए किसान को रात 11-12 बजे तक काम से भिड़े रहना पड़ता है। उसे एक-एक कर अच्छे, बड़े आकार के फल छांट कर अलग रखने पड़ते हैं (नापसंद किए गए फल आधी कीमत पर उनका रस निकालने के लिए एक निजी कंपनी को बेच दिए जाते हैं।) कई बार कुल फसल में से केवल 25 से 50 प्रतिशत फल ही ‘अच्छे’ निकल पाते हैं और इनमें से भी कुछ को सहकारी समिति खारिज कर देती है। इसके बाद यदि मुनाफा प्रति किलो एक-दो रुपए हो जाता है तो किसान उसे काफी ठीक मानता है।

बेचारा, संतरे उगाने वाला किसान - इन दिनों मेहनत तो खूब कर रहा है मगर इसके बावजूद उसकी लागत भी मुश्किल से निकल पाती है। चूंकि, बगैर रसायन या उर्वरक इस्तेमाल किए, या बिना मिट्टी को संवारे फल उगाने से खर्चा कम बैठता है, किसान को शुद्ध मुनाफा ज्यादा होता है। मैं जो फल बाजार में भेजता हूं उन्हें लगभग बिल्कुल नहीं छांटा जाता है। मैं बस फलों को बक्से में भरता हूं, बक्से बाजार में रवाना करता हूं और रात को जल्दी से सोने चला जाता हूं। मेरे आस-पड़ोस के किसान यह महसूस कर रहे हैं कि वे मेहनत तो खूब कर रहे हैं, लेकिन उनकी जेबों में बचत कुछ भी नहीं है। यह भावना बल पकड़ रही है कि प्राकृतिक खाद्य को स्थानीय स्तर पर बेचने की व्यवस्था नहीं की जाती, सामान्य किसान तो इस चिंता से मुक्त नहीं हो पाएंगे कि वे अपनी पैदावार आखिर कहां बेचें। जहां तक उपभोक्ता का सवाल है, यह धारणा आम रही है कि प्राकृतिक खाद्य मंहगा होता है, यदि वह मंहगा नहीं होता तो लोगों को शंका होने लगती है कि वह प्राकृतिक है भी या नहीं। एक खुदरा व्यापारी ने मुझे बताया कि प्राकृतिक पैदावार जब तक मंहगी न बेची जाए उसे कोई नहीं खरीदता।

मैं अब भी मानता हूं कि प्राकृतिक खाद्यों को अन्य की अपेक्षा सस्ता बेचा जाना चाहिए। कई वर्ष पहले टोक्यो के एक प्राकृतिक खाद्य बेचने वाले स्टोर ने मुझसे संतरों के बगानों से एकत्र किया शहद तथा पहाड़ी मुर्गियों द्वारा दिए अंडे भेजने को कहा था। जब मुझे पता चला कि वह व्यापारी उन्हें बहुत मंहगे दामों पर बेच रहा है, तो मुझे बहुत गुस्सा आया। मैंने सोचा कि जो व्यापारी अपने ग्राहकों से इस तरह नाजायज फायदा उठा रहा है, वह जरूर मेरे चावलों में अन्य चावलों की मिलावट करके ग्राहकों को गलत दामों पर बेचेगा। मैंने तत्काल उस स्टोर को माल भेजना बंद कर दिया। यदि प्राकृतिक खाद्यों को व्यापक रूप से लोकप्रिय बनाना है तो उन्हें वाजिब भाव पर स्थानिक रूप से उपलब्ध करवाना होगा। यदि उपभोक्ता सिर्फ इस विचार को गले उतार लें कि - कम कीमत का अर्थ यह नहीं कि वे खाद्य प्राकृतिक नहीं है, तो सभी लोग सही दिशा में सोचना शुरू कर देंगे।

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