परिवार व यूनिवर्सिटी ने मिलकर गढ़ा गंगा व्यक्तित्व

Submitted by RuralWater on Sun, 04/24/2016 - 09:58


स्वामी सानंद गंगा संकल्प संवाद - 15वाँ कथन आपके समक्ष पठन, पाठन और प्रतिक्रिया के लिये प्रस्तुत है :
.सन 1932 में प्रोग्रेसिव सोच के जमींदार परिवार में मेरा जन्म हुआ। उत्तर प्रदेश, जिला मुजफ्फरनगर, तहसील कांधला के एक खेतिहर परिवार में मैं जन्मा। मेरे बाबा श्री बुधसिंह जी आर्यसमाजी थे। उनके ससुर डिप्टी कलक्टर और ससुर के छोटे भाई बैरिस्टर थे। सो, मेरे बाबाजी भी इंग्लैण्ड जाकर बैरिस्टर बनना चाहते थे। उन्होंने घर से पैसा निकाल लिया। जहाज का टिकट लेकर इंग्लैण्ड रवाना हो गए।

परिवार के लोग यह नहीं चाहते थे कि वह इंग्लैण्ड जाएँ। लिहाजा, उनके ससुर को कम्पलेन्ट की कि वह चोरी करके गए हैं।परिणाम यह हुआ कि उन्हें जहाज में ही गिरफ्तार कर लिया गया। इस बीच एक अंग्रेज से उनकी दोस्ती हो गई। उसने कहा- “तुम्हारे पास तो खेती है। तुम तो राजा हो।’’ यह बात उनके मन को लग गई। वह वापस लौटे और तय किया वह खुद खेती करेंगे। पड़दादा भी बड़े जमींदार थे। बाबा ने करीब 400 एकड़ भूमि, दूसरों को दे दी थी। जितनी खुद कर सकते थे, उतनी ही अपने पास रखी; यही कोई 100 एकड़। यह उनकी प्रोग्रेसिव सोच थी। हमारे यहाँ ब्रह्मचर्य का भी पालन होता था।

 

10 साल की उम्र तक घर में ही पढ़े


मेरी माँ अधिकारी परिवार से थी। वह मुझे अधिकारी बनाना चाहते थे। बाबा चाहते थे कि मैं खेती करुँ। 10 साल की आयु तक मुझे स्कूल नहीं भेजा गया। 10 साल की उम्र तक मैंने घर पर रहकर ही संस्कृत व शास्त्र पढ़ा। सात साल का था, तो मुझे घर पर ही गणित-भूगोल पढ़ाना शुरू कर दिया था। 10 साल का होने के बाद सीधे छठी क्लास में मेरा एडमीशन हुआ। कुछ महीने बाद ही परीक्षा हुई। मैंने टॉप किया। मेरा विश्वास है कि संस्कृत पढ़ें, तो मस्तिष्क का विकास होता है।

 

अच्छा वैज्ञानिक बनाने में प्राइवेट ट्युटर की भूमिका 95 प्रतिशत


1946 में मैंने कांधला से ही हाईस्कूल किया। मेरे एक प्राइवेट ट्युटर थे - बनारसी दास वैश्य। आज यदि मैं अच्छा वैज्ञानिक बन पाया हूँ, तो उसमें 95 प्रतिशत भूमिका बनारसी दास जी की है। हमारे समय में अंग्रेजी, गणित, हिन्दी कम्पलसरी विषय थे। संस्कृत ऑपशनल थी। इतिहास और भूगोल में एक चुनना था। मैंने भूगोल चुना।

मैंने हाईस्कूल में भूगोल की परीक्षा इंग्लिश मीडियम से दी। मुझे भरोसा था। ननिहाल में मेरे मामा इंजीनियर थे। वे चाहते थे कि मैं भी इंजीनियर बनूँ। इंटर में मैंने विज्ञान पढ़ना शुरू किया। मैंने पहले कभी विज्ञान नहीं पढ़ा था, लेकिन विज्ञान पढ़ने में मुझे कोई कठिनाई नहीं हुई। रसायन विज्ञान में तो मैं अपनी क्लास में सबसे अच्छा माना जाता था।

 

बीएचयू का आकर्षण : पार्टीशन की सीख


मेरे मन में एक इच्छा थी कि मैं बीएचयू (बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी) में पढ़ूँ। मालवीय जी के प्रति आकर्षण था। मन में कहीं राष्ट्रभक्ति भी थी। 1948 में बी.एससी. पढ़ने बीएचयू चला गया। हॉस्टल में रहता था। यूनिवर्सिटी के उन दिनों में मैंने खूब पिक्चरें देखीं; खूब ताश खेला। उसी दौर में पार्टीशन हुआ। आजादी, पार्टीशन, शरणार्थी और पंजाबी परिवारों के दर्द कहानियाँ उस वक्त सुनते थे। आज मैं मानता हूँ कि यदि अब इण्डिया में मुसलमानों को रहना है, तो बराबरी से रहना होगा।

 

बाबा-दादी-शास्त्री सानिध्य ने गढ़ा व्यक्तित्व


जब बीएचयू गया, तो आरएसएस पर प्रतिबन्ध था। आरएसएस में न रहते हुए भी मुझे उनके प्रति सहानुभूति थी। मेरे बाबा कांग्रेसी थे, किन्तु मेरे मित्रों में कई लोग आरएसएस से जुड़े थे। मेरे बाबा जी कट्टर आर्यसमाजी थे। दादी जी कट्टर सनातनी थी। फिर भी दोनों साथ थे। बाबा जी, हवन संध्या करते थे। पूजा का प्रसाद लेते थे, लेकिन मूर्ति पूजा नहीं करते थे। शायद यही वजह है कि आज मैं दो मतभेद वाले लोगों के बीच भी आसानी से रह लेता हूँ।

मेरा व्यक्तित्व जो कुछ.. जैसा भी बना, वह बाबा जी, दादी जी के सानिध्य से बना। मेरे चाचा जी ने एक शास्त्री जी को लगाया था, उन्हें मैं अलग नहीं करता; इस सब की वजह से बना। मैं जेल तो नहीं गया, लेकिन स्कूल के ऊपर झण्डा लहराने के लिये चार बेंतें जरूर खाई थीं। हमने रात में तिरंगा लहराया था। चौकीदार से जब पूछा गया, तो उसने चार लड़कों के नाम बता दिये। चार-चार बेंतें सभी को मारी गई।

 

गीता लेक्चर सुनना एक उपलब्धि


जब मैंने बीएचयू ज्वाइन की, तो डॉ. राधाकृष्णन वहाँ के वाइस चांसलर थे। वह हर सप्ताह रविवार को गीता लेक्चर देते थे। मेरे ज्वाइन करने के 15 दिन बाद वह रूस के राजदूत बनकर चले गए। हालांकि मैं उनके दो ही गीता लेक्चर सुन सका, लेकिन उसे मैं अपनी उपलब्धि मानता हूँ। उसके बाद अमरनाथ झा वाइस चांसलर बने। फिर वह गीता लेक्चर देते थे।

 

पण्डित मदन मोहन मालवीय जी का न्याय


जब फाइनल में था, तो एक साल तक कोई वाइस चांसलर नहीं था। तब गोविंद मालवीय प्रो वी सी बनाए गए। उस समय एक किस्सा खूब प्रचलित था कि गोविंद जी को किसी सिंधी लड़की से प्रेम हो गया है। वह वीमैन हॉस्टल में रहती थी। गेट के पास ही वीमैन हॉस्टल था। सख्ती इतनी थी कि बाउंडरी के भीतर किसी को मिलने नहीं दिया जाता था। एक दिन गोविंद मालवीय जी वहीं पकड़े गए। तभी किसी ने सुन लिया। वह भागे। गेट की तरफ से जा नहीं सकते थे। जहाँ से गन्दा पानी निकल रहा था, वह उसी तरफ से निकलने की कोशिश कर रहे थे। वहाँ जमादारों के क्वाटर्स थे। उन्होंने पकड़ लिया। पहचाना कि अरे यह तो मालवीय जी के बेटे हैं। वे लोग उन्हें पकड़ मदनमोहन मालवीय जी के पास ले गए। मालवीय जी ने मालूम क्या कहा? उन्होंने कहा - “मेरे प्राणान्त के बाद यह मेरी अर्थी भी न छू पाये।’’ यह कहकर मालवीय जी ने उसी वक्त उन्हें निकाल दिया।

 

ईश्वर ने यूँ कराई गंगा काम की तैयारी


अब वही गोविंद जी जब प्रो वी सी बने, तो हम इसे सहन न कर सके। देखते-ही-देखते इसे लेकर बीएचयू में एक आन्दोलन शुरू हो गया। मैं भी उन आन्दोलनकारियों में शामिल था।

एक और घटना बताता हूँ। बी.एससी. फाइनल की है। बीएचयू में एक नियम था। जिसके कारण धर्म भी एक विषय के तौर पर पढ़ाया जाता था। नियमानुसार डिग्री तब तक नहीं दी जाती थी, जब तक कि विद्यार्थी धर्म विषय का पर्चा पास न कर लें। यह भी नियम था कि धर्म विषय में सबसे ज्यादा अंक हासिल करने वाले को एक सौ रुपए दिये जाते थे। वह मुझे मिले।

1948 में गंगाजी में एक रिकॉर्ड बाढ़ आई थी। महाराज बनारस ने बीएचयू को गंगा इस पार के 16 गाँव दे दिये थे। एक तरह से बीएचयू उन 16 गाँवों का जमींदार हो गया था। सो बाढ़ आई, तो यूनिवर्सिटी में बाढ़ राहत के लिये टीमें बनी। मैं भी उसमें गया। मेरा धर्म विषय को पढ़ना, गंगा बाढ़ राहत के काम में जाना, आन्दोलनकारी होना और अब सन्यास लेना; मैं समझता हूँ कि ईश्वर ने इस सबके जरिए एक तरह से गंगाजी के काम के लिये मेरी तैयारी कराई।

अगले सप्ताह दिनांक 01 मई, 2016 दिन रविवार को पढ़िए, स्वामी सानंद गंगा संकल्प संवाद शृंखला का 16वाँ कथन

इस बातचीत की शृंखला में प्रकाशित कथनों कोे पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें।

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