पर्यावरण : एक मानवाधिकार (Environment : A Human Rights)

Submitted by Hindi on Sat, 07/01/2017 - 09:52
Source
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, भारत, वर्ष 2005

पर्यावरण-प्रदूषण समस्त मानव जाति के लिये गम्भीर खतरा है। इससे मनुष्य के मूलभूत अधिकार अर्थात जीवन के अधिकार का हनन होता है। प्रकृति के असन्तुलित और अविवेकपूर्ण दोहन से पर्यावरण को गम्भीर क्षति पहुँची है जिसका सीधा परिणाम है- वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, मृदा प्रदूषण और ध्वनि प्रदूषण। यह अनेक बीमारियों की जड़ है तथा शारीरिक एवं मानसिक विकृतियों का कारण भी। इस भूमंडल में स्वस्थ जीवन जीना व्यक्ति का सर्वोच्च मानवाधिकार है। पर्यावरण-प्रदूषण के कारण हो रहे इस अधिकार-हनन को रोका जाना अत्यंत आवश्यक है। इस दिशा में राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर कई प्रयास भी हुए हैं। भारतीय चिंतन-परम्परा में स्वच्छ पर्यावरण की बात हमेशा से की जाती रही है। आज जरूरत इस बात की है कि इस प्राणघातक प्रदूषण को नियंत्रित करने और उससे निपटने लिये पुरजोर प्रयास किये जाएँ वरना हमें ही नहीं बल्कि आगे आने वाली पीढ़ियों को भी निगल जायेगा। मानवाधिकार का सम्बन्ध उन परिस्थितियों से है जो मनुष्य को उसकी स्वाभाविक नियति तक पहुँचने के लिये अनिवार्य हैं तथा जिनमें उसके व्यक्तित्व के सभी आयाम अपने पूर्ण रूप में विकसित होते हैं। मानवाधिकार का केंद्र बिंदु मनुष्य है, अत: सर्वोत्कृष्ट मानवाधिकार व्यक्ति की प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता है। जीवन मानव का मूलभूत अधिकार है परन्तु जीवन का तात्पर्य केवल पशु स्तर का अस्तित्व नहीं है। अमेरिका के न्यायमूर्ति फील्ड ने कहा था कि जीवन शब्द में मात्र पशु स्तर के अस्तित्व से कुछ अधिक निहित है। इसमें मुनष्य के सभी अंग और शारीरिक-मानसिक क्षमताएँ भी शामिल हैं, जिनसे जीवन का सुख भोगा जाता है। भारतीय न्यायपालिका ने संविधान के अनुच्छेद 21 की व्याख्या करते हुए जीवन के अधिकार में परम्परा, संस्कृति और विरासत, शिक्षा के अधिकार, आजीविका के अधिकार, प्रदूषण रहित जल एवं वायु के अधिकार तथा सन्तुलित पर्यावरण के अधिकार को भी सम्मिलित माना है।

पहले यह बात विचित्र सी लग सकती थी कि पर्यावरण-प्रदूषण मानवाधिकार हनन से सम्बन्धित हो सकता है किन्तु अब अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर पर्यावरण प्रदूषण को मानव जीवन के लिये गम्भीर माना जा चुका है और वैश्विक स्तर पर इससे उबरने के प्रयास किये जा रहे हैं। इसलिये जब पर्यावरण-विसंगति मानव जीवन के लिये ही घातक है तो उसे मानवाधिकार-हनन से सम्बन्धित मानने में कोई सन्देह नहीं रह जाता क्योंकि जीवन का अधिकार सर्वोच्च मानवाधिकार है।

पर्यावरण-प्रदूषण


पर्यावरण की संकल्पना अत्यंत व्यापक है। साधारण तौर पर हम इसे अपने आस-पास के परिवेश एवं वातावरण से सम्बन्धित समझते हैं, किन्तु वस्तुत: पर्यावरण में वह सम्पूर्ण भौतिक एवं जैविक व्यवस्था सन्निहित है जिसके अवयव स्थल मंडल, जल मंडल, वायु मंडल तथा जीव मंडल हैं तथा जिसके अन्तर्गत जीवधारियों का स्वाभाविक विकास होता है। पर्यावरण में सामाजिक परिवेश का भी समावेश है किन्तु ‘पारिस्थितकी’ के अन्तर्गत वे परिस्थितियाँ आती हैं जिनसे पर्यावरण का भौतिक एवं जैविक सन्तुलन प्रभावित होता है, अत: यहाँ पर्यावरण से तात्पर्य उपर्युक्त भौतिक तथा जैविक मंडल से ही है।

मानव जीवन पारिस्थतिक सन्तुलन तथा पर्यावरण के गुण स्तर पर निर्भर करता है। पारिस्थितिक सन्तुलन सभी जीवधारियों की उत्तरजीविता के लिये अनिवार्य है। अत: जीवन का अधिकार पर्यावरण सन्तुलन के अधिकार का स्वरूप ग्रहण कर लेता है। यदि किसी परिस्थिति या क्रिया-कलाप से पर्यावरण का प्राकृतिक-सन्तुलन प्रभावित होता है तो वह मानव जाति के विरुद्ध जीवन के अधिकार का हनन है और उसे मानवाधिकार-हनन के रूप में लिया जाना चाहिए। मानव-विकास का इतिहास प्रकृति के नियंत्रण और दोहन में समाहित है। प्राकृतिक संसाधनों का सन्तुलित तथा विवेकपूर्ण दोहन एवं उपयोग मानव जाति की प्रगति का पर्याय है तो असन्तुलित तथा अविवेकपूर्ण दोहन विनाश का कारण बन सकता है। पर्यावरण का प्राकृतिक स्वरूप प्रकृति है। प्रकृति में प्राकृतिक व्यवस्था के अन्तर्गत परिवर्तन से पर्यावरण के भौतिक और प्राकृतिक तत्वों के प्रभाव तथा उपयोग से मनुष्य के आर्थिक एवं सामाजिक पर्यावरण निर्मित होते हैं। जैव विकास के सिद्धांत की दृष्टि से देखें तो मनुष्य सहित सम्पूर्ण जीव-जगत पर्यावरण की ही उपज है तथा उनका वर्तमान और भविष्य भी पर्यावरण पर निर्भर रहता है। अन्य प्राणियों की तुलना में पर्यावरण के सन्दर्भ में मनुष्य की भूमिका विशिष्ट है क्योंकि एक ओर तो वह दूसरे प्राणियों की भाँति पर्यावरण की उपज है तो दूसरी ओर पर्यावरण का नियंत्रक या संचालक भी। वह पर्यावरण को समृद्ध करने की बौद्धिक क्षमता तो रखता ही है, जाने-अनजाने उसके विनाश के उपाय भी करता रहता है, भले ही वैसा करना उसके लिये आत्मघाती हो।

पर्यावरण के अवयवों का आपस में अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है। प्रकृति-दोहन की मानवीय क्रियाओं से पर्यावरण के कारकों में असन्तुलित परिवर्तन हो रहा है जिसका स्वाभाविक रूप से समायोजन या परिमार्जन सम्भव नहीं है। फलत: पर्यावरण में हानिकारक अवशिष्ट उत्पन्न होते हैं जिससे पृथ्वी, जल, वायु आदि दूषित हो जाते हैं। इस प्रकार पर्यावरण प्रदूषित होता जाता है और प्राणि मात्र को घातक ढंग से प्रभावित करता है। प्रदूषणों को उत्पन्न करने वाले तत्वों को प्रदूषक कहते हैं। प्रदूषक प्राकृतिक या मानव निर्मित हो सकते हैं। प्राय: प्राकृतिक प्रदूषकों के कुप्रभावों का प्रबन्ध प्रकृति स्वयं कर लेती है परन्तु मानव-निर्मित प्रदूषकों को निष्क्रिय करने की क्षमता उसमें कम होती है। अत: प्रदूषण मुख्य रूप से मनुष्य के कृत्यों से उत्पन्न होता है। पर्यावरण के प्रदूषकों का माध्यम विशेष रूप से वायु, जल या स्थल होता है।

वायु प्रदूषण में वायु के संघटक तत्वों की गुणवत्ता में ह्रास हो जाता है। ओजोन परत की अल्पता, हरित गैसों की सान्द्रता का बढ़ जाना आदि इसके मुख्य उदाहरण हैं। जल प्रदूषण में सागरीय जल, नदियों तथा तालाबों का जल एवं भूमिगत जल का प्रदूषण आता है।

मरुस्थलीकरण, मृदा-प्रदूषण तथा लवणीकरण स्थलीय प्रदूषण के मुख्य उदाहरण हैं। प्रदूषण के मानवीय कारणों के मुख्य स्रोत हैं- औद्योगिक स्रोत तथा जनसंख्या स्रोत। औद्योगिक स्रोत से गैसीय प्रदूषक, ठोस प्रदूषक, हानिकारक रासायनिक प्रदूषक, रसायन मिश्रित अपशिष्ट जल तथा ऊष्मा प्रदूषक नि:सृत होते हैं। असन्तुलित तथा प्राकृतिक संसाधनों का बेतहाशा दोहन, खनन एवं वनों की कटाई भी पर्यावरण असन्तुलन का एक मुख्य कारण है। कृषि प्रदूषकों में कीटनाशी, शाकनाशी एवं रोगनाशी रसायन, रसायनिक खाद, मशीन तथा यंत्र, रेडियोएक्टिव तत्व तथा कूड़ा-कचरा आदि प्रमुख हैं। जनसंख्या स्रोत से सीवेज-जल, गन्दगी, कूड़ा, वाहनों से नि:सृत गैस मुख्य रूप से कार्बनडाइऑक्सीइड तथा कार्बन मोनोऑक्साइ और मशीनों, वातानुकूलित यंत्रों से नि:सृत गैसें तथा ध्वनि प्रदूषक उत्पन्न होते हैं। जल, वायु, भू तथा ध्वनि-प्रदूषण से होने वाले नुकसानों से हम सभी परिचित हैं।

प्रदूषण के कारण, कारक, स्रोत, परिणाम, प्रकार या उपचार में से प्रत्येक का विषय-क्षेत्र काफी विस्तृत है तथा प्रत्येक अपने आप में शोध का विषय हो सकता है। यहाँ हम उनसे सम्बन्धित मुख्य बिंदुओं का उल्लेख कर सकते हैं।

जल जीवन का आधार है। जल के बिना जीवन की कल्पना ही सम्भव नहीं है। विश्वस्तर पर वर्तमान काल में जल प्रदूषण की भीषण समस्या है। घरेलू गन्दगी तथा बहिस्राव वाहित मल, सीवर लाइनें, डिटर्जेंट के अपशिष्ट, औद्योगिक अपशिष्ट, उर्वरक रसायन, कीटनाशक जैसे कृषि अपशिष्ट, औद्योगिक संयंत्रों को ठंडा करने के लिये जल का उपयोग करने से तापीय प्रदूषण, खनिज तैलीय प्रदूषण तथा रेडियोधर्मी अपशिष्ट जल प्रदूषण के मुख्य स्रोत है। प्रदूषित जल जैव-जगत के लिये अत्यंत हानिकारक है। प्राणी मात्र की जैविक वृद्धि में प्रदूषित जल अवरोध उत्पन्न करता है। अतिसार, तपेदिक, लकवा, चर्मरोग, अन्धापन तथा पीलिया जैसी बामीरियों का कारण जल-प्रदूषण हो सकता है। पानी में फ्लोराइड की अधिकता के कारण रीढ़ की हड्डी तथा अन्य हड्डियाँ भी टेढ़ी एवं कमजोर हो सकती हैं। भारत सहित अन्य विकासशील देश इन समस्याओं से सर्वाधिक ग्रसित हैं जहाँ आबादी के एक बड़े भाग को शुद्ध पेयजल उपलब्ध नहीं है।

वायु भी एक जीवनी-तत्व है किन्तु औदियोगिक, वैज्ञानिक एवं तकनीकी गतिविधियों के क्रम में नि:सृत अपशिष्ट पदार्थों ने वायु को प्रदूषित कर दिया है। घरेलू तापन, ईंधन, पेट्रोलियम पदार्थों के जलने से निकली गैसें, मशीन तथा कारखानों, यानो से नि:सृत गैसें, खदानों से निकलने वाले कणिकीय प्रदूषक तथा नाभिकीय रेडियों एक्टिव तत्व मुख्य वायु प्रदूषक हैं। वायु प्रदूषण का दृश्यता, सूर्य की तपन, वर्षा की मात्रा तथा अम्ल वर्षा पर प्रभाव पड़ता है, जो मौसम ओजोन परत, ग्रीन हाउस गैस तथा जीव-जन्तुओं में जैविक क्रियाओं, वनस्पति एवं मानव स्वास्थ्य को कुप्रभावित करता है। वायु प्रदूषण आर्थिक विकास तथा औद्योगिक एवं नगरीय विस्तार की उपज है। भू-प्रदूषण का मुख्य कारण-नगरीय, औद्योगिक, कृषि, खनन तथा घरेलू अपशिष्ट हैं। नगरीय तथा घरेलू अपशिष्ट में कूड़ा-कर्कट, मल-मूत्र, डिटर्जेंट, सड़े-गले वानस्पतिक पदार्थ, मृत जानवर तथा अन्य प्रकार के कचरे होते हैं जिनके उचित ढंग से निस्तारण न होने के कारण कई प्रकार की बीमारियों के जीवाणु/विषाणु उत्पन्न होते हैं तथा मिट्टी की उर्वरता पर भी बुरा प्रभाव डालते हैं। कृषि अपशिष्ट भी सुरक्षित निस्तारण के अभाव में ऐसी ही समस्या को जन्म देते हैं। औद्योगिक तथा खनन अपशिष्ट के रूप में विषैले, अम्लीय तथा क्षारीय रसायन भूमि की उर्वरा शक्ति को क्षीण या समाप्त कर देते हैं।

भूमि से खनिजों का खनन भी कई प्रकार से पर्यावरण को प्रभावित करता है। खानों में सबसे बड़ा प्रदूषक धूल होती है जो श्वास के माध्यम से खानों में काम करने वाले श्रमिकों को तो क्षति पहुँचाती ही है। खनन क्षेत्र के आस-पास के नागरिकों को भी बुरी तरह प्रभावित करती है। खानों में धूल के कणों की सांद्रता 7000 कण प्रति घन से.मी. तक पाई जाती है। खानों से विषाक्त गैसों का स्राव भी होता है जिससे श्वास के माध्यम से स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

उच्च तीव्रता वाली ध्वनि मनुष्य तथा अन्य प्राणियों के लिये जब अवांछनीय एवं कष्टकारी हो जाती है तो वह ध्वनि-प्रदूषण की श्रेणी में आ जाती है। सामान्य बातचीत में ध्वनि की माप लगभग 60 डेसिबेल रहती है। 30 डेसिबेल की ध्वनि फुसफुसाहट में होती है। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि 30 डेसिबेल तक मनुष्य सो सकता है। उसके बाद उसकी नींद में व्यवधान का खतरा है। मोटर वाहन की ध्वनि लगभग 90 डेसिबेल होती है। मनुष्य औसतन 75 डेसिबेल तक की ध्वनि सहन कर सकता है। इससे अधिक को शोर की श्रेणी में रखा जा सकता है। 90-95 डेसिबेल वाली ध्वनि से मनुष्य का नाड़ी तंत्र प्रभावित होने लगता है और इससे उच्चतर तीव्रता घातक होती जाती है। शहरों में अधिक यातायात वाले मार्गों पर ध्वनि स्तर 90 डेसिबेल से 100 डेसिबेल रहता है। ध्वनि- प्रदूषण का सामान्य कुप्रभाव चिड़चिड़ापन तथा अनिंद्रा हो सकता है, परन्तु 100 डेसिबेल से अधिक तीव्रता होने पर श्रवण-शक्ति का ह्रास और 150 डेसिबेल से अधिक तीव्रता पर ध्वनि प्रदूषण प्राणघातक हो सकता है। ध्वनि प्रदूषण के परिणामस्वरूप मनोवैज्ञानिक, तंत्रिका-तंत्र सम्बन्धी, हारमोनल-असन्तुलन, माँस-पेशियों में खिंचाव, ह्रदय रोग, उच्च रक्तचाप, आँतों के रोग शिर-मूल, अस्थिरता तथा गर्भवती महिलाओं में चिंता और उनके गर्भस्थ शिशुओं में जन्मजात विकृतियाँ आदि प्रभाव भी हो सकते हैं।

पर्यावरण प्रदूषण के उपरोक्त दृष्टांत बहुत स्थूल उदाहरण हैं। इनके अतिरिक्त अनेक ऐसी दशाएँ या परिस्थितियाँ हो सकती हैं जिनसे पर्यावरण के संघटक तत्वों का सन्तुलन अवांछनीय रूप से परिवर्तित होकर हानिकारक हो जाये। भारत के पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 की धारा 2 (ख) के अनुसार पर्यावरण प्रदूषण से अभिप्राय ऐसे ठोस, द्रव्य या गैसीय पदार्थों से है जो ऐसी सान्द्रता में विद्यमान है जो पर्यावरण के लिये क्षतिकर हो सकता है या जिसका क्षतिकर होना सम्भाव्य है। इसी अधिनियम की धारा 2 (क) में पर्यावरण को परिभाषित करते हुए कहा गया है कि पर्यावरण के अन्तर्गत जल, वायु और भूमि है और वह अन्तर सम्बन्ध है जो जलवायु और भूमि, मानवों, अन्य जीवित प्राणियों, पदार्थों और सूक्ष्म जीव तथा सम्पत्ति के बीच विद्यमान है। इस प्रकार पर्यावरण में जल, वायु और भूमि तथा पर्यावरण के संघटकों के प्राणि जगत एवं वनस्पति जगत से अन्तर-सम्बन्धों का समावेश है। अत: कोई भी ऐसी परिस्थिति जो इन संघटकों या जैव-जगत से उनके अन्तर-सम्बन्ध को अवांछनीय ढंग से परिवर्तित करती है तो उसे पर्यावरण-प्रदूषण माना जायेगा।

जैसा कि पूर्व में कहा गया है कि मानव-विकास का सम्पूर्ण इतिहास प्रकृति के दोहन और उपयोग की कहानी है। तद्नुरूप मानव-जाति सभ्यता के विकास के साथ-साथ प्रकृति के अधिकाधिक दोहन की तरकीबों की खोज करती रही। वैज्ञानिक-आविष्कार औद्योगीकरण, नगरीकरण और उपभोक्तावादी संस्कृति इसके परिणाम हुए। मनुष्य आदि काल से ही प्रकृति के महत्त्व से परिचित था, किन्तु प्रकृति को हानि पहुँचाने के कुपरिणामों की चेतना उसे बहुत बाद में आई। प्रदूषण की विभीषिका के रूप में बाढ़, सूखा, भूस्खलन, रेगिस्तानों का विस्तार, भूमि की उर्वरता में कमी, जल एवं वायु प्रदूषण, ओजोन की परत का क्षरण, वर्षा का असन्तुलन और प्रदूषण से उत्पन्न होने वाली जानलेवा बीमारियों से स्वयं पर्यावरण की विसंगतियों की चेतानवी दे दी है। आज पर्यावरण-प्रदूषण सम्पूर्ण मानव-जाति के लिये खतरा बन गया है।

अन्तरराष्ट्रीय प्रयास


1948 में संयुक्त राष्ट्र ने प्रकृति संरक्षण के अन्तरराष्ट्रीय संघ (आई.यू.सी.एन.) की स्थापना की जिसे अब प्रकृति और प्राकृतिक साधनों के संरक्षण का अन्तरराष्ट्रीय संघ कहते हैं। पर्यावरण सम्बन्धी नीति निर्धारण और प्रशासन इसका कार्यक्षेत्र है। इस संघ ने विश्व स्वास्थ्य संगठन, खाद्य और कृषि संगठन तथा वैज्ञानिक संघों की अन्तरराष्ट्रीय परिषद के सहयोग से 1968 में पेरिस में जीवमंडल सम्मेलन आयोजित किया। सम्मेलन में जो नीतियाँ तय हुई थी उन पर 1972 में स्टॉकहोम में आयोजित ‘मानव पर्यावरण सम्मेलन’ में विचार किया गया। स्टॉकहोम सम्मेलन में 113 देशों के प्रतिनिधियों तथा 400 गैर-सरकारी संस्थानों ने भाग लिया था। यह निश्चय किया गया कि पर्यावरण संरक्षण के लिये अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर प्रयास किये जाने चाहिए। इस अवसर पर पर्यावरण संरक्षण की विश्व-नीति भी बनाई गई एवं राष्ट्रीय सरकारों और अन्तरराष्ट्रीय संगठनों के लिये 109 सूत्री सिफारिशें तथा 26 सिद्धांत अंगीकृत किये गए। इस सम्मेलन की खास बात यह थी कि पहली बार यह महसूस किया गया कि आर्थिक विकास पर्यावरण ह्रास के रूप में प्रतिफलित हो रहा है। सम्मेलन के बाद सरकारों ने ‘संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम’ (यु.एन.ई.पी.) की स्थापना की जो आज भी विश्व स्तर पर पर्यावरण संरक्षण के उत्प्रेरक के रूप में कार्यरत है।

1983 में संयुक्त राष्ट्र ने जब ‘पर्यावरण और विकास के विश्व आयोग’ (डब्ल्यू.सी.ई.डी.) की स्थापना की तब यह महसूस किया गया कि पर्यावरणीय ह्रास जिसे औद्योगिक विकास का सीमित नुकसान वाला दुष्प्रभाव माना जा रहा था। वह विकासशील देशों के अस्तित्व पर खतरा बन गया है। अत: आयोग ने विकास की वैकल्पिक पद्धति के रूप में ‘चिरजीवी-विकास’ की अवधारणा प्रस्तुत की। चिरजीवी विकास पद्धति का तात्पर्य था कि हम अपनी आवश्यकताएँ इस ढंग से पूरी करें जिससे आने वाली पीढ़ियों की आवश्यकता पूर्ति सम्बन्धी क्षमता एवं अधिकार का हनन न हो। संयुक्त राष्ट्र ने आयोग के प्रतिवेदन पर विचारोपरांत ‘पर्यावरण एवं विकास’ विषय पर शिखर सम्मेलन कराने का निर्णय लिया। यहाँ पर मैं रस्किन की वे पंक्तियाँ उद्धृत करना समीचीन समझता हूँ जिनमें उन्होनें कहा था कि “ईश्वर ने हमें यह धरती उधार दी है। यह धरती जितनी हमारी है उतनी ही उनकी भी, जो हमारे बाद इस पर आने वाले हैं। यह हमारा कर्तव्य है कि हम अपने कार्यों द्वारा आगामी पीढ़ियों को इसके लाभों से वंचित न होने दें।”

1972 के प्रथम भूमंडलीय पर्यावरण सम्मेलन, स्टॉकहोम के बीस साल बाद जून 1992 में ब्राजील की राजधानी रियो-डि-जेनेरो में संयुक्त राष्ट्र ने पर्यावरण और विकास सम्मेलन आयोजित किया जिसे ‘पृथ्वी शिखर सम्मेलन’ के नाम से जाना जाता है। इन बीस वर्षों में पर्यावरण की स्थिति में काफी गिरावट आई। वायु प्रदूषण स्तर कई गुना बढ़ गया था। ताप बढ़ाने वाली गैसों के उत्सर्जन से वायुमंडलीय परिवर्तन हो रहे थे। इन सबके सम्मिलित प्रभाव से ओजोन परत क्षीण हुई और सूर्य की पराबैगनी किरणों से जीव-जन्तु प्रभावित होने लगे। इस दौरान पृथ्वी से लगभग 50 करोड़ एकड़ वन क्षेत्र का सफाया हो गया तथा लगभग 50 करोड़ टन उपजाऊ कृषि-मृदा का क्षरण हुआ। समुद्री तथा धरातलीय जल का औद्योगिक कचरे से भीषण हुआ जिसके परिणामस्वरूप अनेक वनस्पतियों एवं जंतुओं की प्रजातियाँ विलुप्त हो गईं। 1992 का यह सम्मेलन कई मायनों में अभूतपूर्व था। इस सम्मेलन में 178 से अधिक राष्ट्राध्यक्षों तथा शासनाध्यक्षों के अतिरिक्त बड़ी संख्या में वैज्ञानिकों, पर्यावरणविदों और कलाकारों ने भी भाग लिया। सम्मेलन का मूल सन्देश था कि हमारी मनोवृत्ति में परिवर्तन के बिना पर्यावरण सुधार सम्भव नहीं है। इस सन्देश में विकसित और विकासशील देशों की समस्याओं का अन्तर सन्निहित था। विकसित देश पर्यावरण के गुणस्तर गिरने से चिंतित तो थे परन्तु अपने औद्योगिक विकास को कम करने को तैयार न थे जिसका कुपरिणाम पूरी मानव-जाति को भोगना पड़ रहा है। विकासशील देश चाहते थे कि विकसित देशों के असन्तुलित शोषण से पर्यावरण प्रदूषित हुआ है, अत: प्रदूषण दूर करने और पर्यावरण सन्तुलित करने का खर्च उन्हीं को उठाना चाहिए। तथापि पर्यावरण-प्रदूषण को मानवता के लिये गम्भीर खतरा मानते हुए रियो सम्मेलन में विकास की परम्परागत प्रक्रिया में परिवर्तन को लक्ष्य में रखकर तीन मुख्य अभिलेख अंगीकृत किये गए। प्रथमत: अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर चिरस्थायी विकास का क्रियान्वयन कार्यक्रम एजेंडा-21 तैयार किया गया। द्वितीय, पर्यावरण एवं विकास पर रियो घोषणा-पत्र जारी किया गया जिसमें राष्ट्रों के अधिकार और कर्तव्यों का विवेचन करने वाले कई सिद्धांत सन्निहित हैं। तृतीय, वनों के चिरस्थायी प्रबन्धन के सिद्धांत प्रकाशित किये गए। इसके अतिरिक्त विधिक रूप से बाध्यकारी दस्तावेज के रूप में जैविक विविधता तथा ‘जलवायु’ पर दो संधियों के प्रारूप हस्ताक्षर के लिये रखे गए।

रियो घोषणा-पत्र की भूमिका इस सन्दर्भ में सुस्पष्ट एवं महत्त्वपूर्ण है जिसमें वैश्विक स्तर पर न्यायपूर्ण भागीदारी और सहयोग के आधार पर विकास तंत्र और पर्यावरण के संरक्षण का लक्ष्य रखा गया। रियो घोषणा-पत्र इस धारणा पर आधारित है कि पृथ्वी का प्रत्येक खण्ड उसका अक्षुण्ण हिस्सा है तथा उनमें पारस्परिक निर्भरता का तत्व विद्यमान है। इस क्रम में अगली कड़ी सितंबर, 2002 की चिरस्थायी विकास पर जोहान्सबर्ग घोषणा है जिसमें वैश्विक पर्यावरण एवं प्रदूषण पर प्रकाश डाला गया। इसके अतिरिक्त भी अनेक समझौते, संधियाँ तथा प्रसंविदाएँ हैं जो पर्यावरण संरक्षण और सुधार को समर्पित हैं। इन अन्तरराष्ट्रीय संध्यों और समझौतों की सफलता विवादास्पद हो सकती है, किन्तु इतना निर्विवाद सत्य है कि पर्यावरण प्रदूषण को अब अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर जानलेवा मान लिया गया है और हर राष्ट्र में इसके निराकरण की दिशा में कुछ न कुछ कार्य किये जा रहे हैं।

भारतीय दृष्टिकोण


इस ज्वलंत विषय पर भारतीय दृष्टिकोण और भूमिका पर प्रकाश डालना भी जरूरी है। इस दृष्टि से वेदों में प्रकृति को देवता के रूप में मान्यता देना और पर्यावरण की महत्ता को स्वीकार किया जाना महत्त्वपूर्ण है। यजुर्वेद के.... ‘अग्निर्देवता, वातो देवता, सूर्यो देवता, चन्द्रमा देवता, वसवो देवता, बृहस्पतिर्देवता, रुद्र देवता आदित्यामरुतो देवता विश्व-देवा देवता, बृहस्पतिर्वेवतेन्द्र देवता, वरुणो देवता’ से लेकर शुक्ल यजुर्वेद के.... ओम द्यौ: शान्तिर्विश्वेदेवा: शान्तिर्ब्रहम शान्ति: सर्वम् शान्ति: शान्तिरेव शान्ति: साम सा शान्ति रेधि तक में पृथ्वी तथा उसके घटकों के सन्तुलन में ही मानव कल्याण तथा सुख शान्ति की हमारे मनीषियों ने कल्पना की है।

“आदित्यो ह वै प्राण:” (प्रश्नोपनिषद) “वीयु है वै प्राणो भूत्वा शरीरमाविशत” (प्रश्नोपनिषद) “शुद्धा न आपस्तन्वे क्षरन्तु” (अथर्ववेद) “माता भूमि पुत्रोSहम् पृथिव्या:” (अथर्ववेद)

उपर्युक्त में सृष्टि के अवयव सूर्य (अग्नि), वायु जल तथा क्षिति की कृपा की याचना की गई है। वृक्षों का मानव जाति पर उपकार का स्मरण दिलाते हुए उनकी वंदना करते हुए कहा गया है –

धन्ते भरं कुसुम पक्षफलावलीनां धर्मव्यथां
वहहि शीत भवा रुपजश्च, यो देहमपर्यति


चान्य सुरवस्य हेतोस्तस्मै वदन्य गुरवे तरवे नमोस्तु। - (भामिनी विलास) तथा पुत्र से बढ़कर वृक्ष का महत्व दिया गया है-

दशकूप समावापी, दशवापी समोह्रद:
दश ह्रद सम: पुत्रो, दश पुत्र समो द्रुम:। (मत्स्य पुराण)


छान्दोग्य उपनिषद में पृथ्वी, जल, औषध, वायु तथा पुरुष (चेतना) को प्रकृति को घटक कहा गया है और उनकी शुद्धता तथा सन्तुलन से रस (आनंद) की उपलब्धि बताई गई है-

एष्मं भूतानार पृथिवी रस:।
पृथिव्या आपो रस:।
अपामोषध्यो रस:।
औषधीनां पुरुषो रस:।


उच्च पर्यावरण संधारण के साथ-साथ भारतीय मनीषी प्रदूषण के प्रति भी सतर्क हैं और उसकी वर्जना करते हैं –

नाप्सु मूत्रं पुरीषं वाष्टोवनं समुत्सृजेत।
अमेध्यलिप्तमन्यद्वा लोहितां वा विषाणि वा। (मनु स्मृति 4-)


अर्थात जल में मल, मूल, थूक अथवा दूषित पदार्थ रक्त या विष का विसर्जन नहीं करना चाहिए।

ऐतिहासिक काल में वनस्पतियों, वृक्षों तथा विभिन्न प्राणियों की पूजा के प्रमाण सिंधु सभ्यता के समय से ही प्राप्त हुये हैं। चन्द्रगुप्त मौर्य के शासन काल में अभ्यारणों की स्थापना और उनके संरक्षण का प्रावधान था तथा वन की क्षति या प्राणियों की हत्या करने पर दंड दिया जाता था। सम्राट अशोक ने पशु-पक्षियों को न मारने के सम्बन्ध में नियमों का शिलालेख पर उल्लेख कराया। परवर्ती शासन व्यवस्था में ऐसी परम्परा का आग्रह रहा किन्तु ढृढ़तापूर्वक उसका पालन न हो सका। उस युग में मशीनरी का प्रचलन तो न था इसलिये प्रदूषण की उतनी गम्भीर समस्या उत्पन्न नहीं हुई किन्तु जंगलों की कटाई तथा पशु-पक्षियों का वध होता रहा। अंग्रेजों के आने के बाद जंगलों की बेतहाशा कटाई हुई तथा वन्य जीवों का शिकार बेरोक-टोक हुआ। जब वन्य जीव और वनों को काफी क्षति हो चुकी तब 1855 में चार्टर आॅफ इंडिया एक्ट के रूप में वन संरक्षण नीति बनाई गई। 1864 में डिट्रिच ब्रौडिस को भारत का पहला ‘इन्स्पेक्टर जनरल अॉफ फॉरेस्ट’ बनाया गया। वे 1881 तक अपने पद पर रहे। अपने कार्यकाल में उन्होंने भारत में वन विभाग का विकास किया, अत: उन्हें भारतीय वन विभाग का जन्मदाता कहा जाता है। सन 1878 में पहला वन अधिनियम बना जिसमें आरक्षित वन में पशु-वध पर रोक लगाई गई। इसके बाद वन तथा वन्य प्राणियों की सुरक्षा हेतु और भी छिटपुट उपाय किये गए किन्तु उनमें लुप्तप्राय जीवों और अभ्यारण्यों के संरक्षण की भावना ही थी न कि पर्यावरण संरक्षण की।

स्वतंत्रता-प्राप्ति के उपरांत हमारे देश में पर्यावरण संरक्षण की चेतना का उदय 1972 के स्टॉकहोम सम्मेलन के बाद हुआ। उसी के बाद सरकारी स्तर पर पर्यावरण संरक्षण कार्यक्रम चलाये गए। केंद्र सरकार ने पर्यावरण नियोजन एवं समन्वय कार्यक्रम की स्थापना की जो बाद में पर्यावरण मंत्रालय के रूप में विकसित हुआ। 1976 में 42वें संविधान संशोधन के माध्यम से नीति-निदेशक सिद्धांतों में एक नया अनुच्छेद 48 (क) जोड़ा गया जिसके अनुसार ‘राज्य का यह कर्तव्य होगा कि पर्यावरण को बनाए रखे, उसे सुधारे और देश के वनों एवं वन्य जीवन की रक्षा करे।’

इसी संवैधानिक संशोधन से भारतीय संविधान में जोड़े गए मौलिक कर्तव्यों के अध्याय में सन्निहित किया गया कि प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य होगा कि वह वनों, झीलों, नदियों एवं वन्य जीव सहित समस्त प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा करे तथा उसे बेहतर बनाए और सभी जीवधारियों के प्रति करुणा भाव रखे। सन 1992 के रियो पृथ्वी शिखर सम्मेलन में भारत की महत्त्वपूर्ण भागीदारी रही। इस सम्मेलन के द्वारा कई सरकारी एवं गैर-सरकारी संस्थान पर्यावरण शिक्षा हेतु स्थापित किये गए। विश्वविद्यालयों में पर्यावरण शिक्षा प्रारम्भ की गई और राज्य स्तर पर पर्यावरण प्रकोष्ठ बनाए गए। किन्तु अब भी सामान्य भारतीय जन-मानस में पर्यावरण संरक्षण की चेतना का पर्याप्त संचार नहीं हो सका है और हमारा देश पर्यावरण असन्तुलन की समस्या से जूझ रहा है। अत: पर्यावरण संरक्षण के प्रति और जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता है।

पर्यावरण-प्रदूषण से बचाव तथा उन्मूलन के विश्वस्तरीय प्रयासों के कदम से कदम मिलाते हुये भारतीय विधि-विधान तथा न्यायपालिका ने भी सराहनीय योगदान किया है। लंदन कन्वेन्शन आॅन प्रिजर्वेंशन ऑफ फौना एंड फ्लोरा, 1993 तथा रोम इंटरनेशनल प्लांट प्रोटेक्शन कन्वेन्शन, 1951 की स्वीकृति के परिणामस्वरूप इन विषयों पर विधि निर्मित करना भारतीय विधायिका के लिये आवश्यक था। संविधान के अनुच्छेद 253 के अन्तर्गत संसद को इन विषयों पर कानून बनाने की शक्ति प्रदत्त है।

अब यह निर्विवाद रूप से स्थापित हो चुका है कि पर्यावरण का मानवाधिकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 में परिभाषित जीवन के अधिकार का अभिन्न अंग है। अनुच्छेद 21 के अतिरिक्त पर्यावरण संरक्षण के सम्बन्ध में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 48 (क), 51 (क), 243 (छ) तथा 243 (डब्ल्यू) भारतीय दंड विधान की धारा 268 से 272, 277, 278, 284, 286, से 290 एवं दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 133 तथा 144 में महत्त्वपूर्ण प्रावधान किये गए हैं। पर्यावरण संरक्षण और सन्तुलन स्थापित करने के लिये कई अन्य कानून, अधिनियम एवं नियम निर्मित किये हैं जिनमें पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986, वायु प्रदूषण निरोध एवं नियंत्रण अधिनियम 1981, जल प्रदूषण निरोध एवं नियंत्रण अधिनियम 1975, भारतीय वन अधिनियम 1927, वन संरक्षण अधिनियम 1980, राष्ट्रीय वन नीति 1988, वन्य जीवन संरक्षण अधिनियम 1972, पब्लिक लायबिलिटी इन्श्योरेंस एक्ट 1991, फैक्टरी अधिनियम 1948 तथा इनसे सम्बन्धित नियम विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

इन सबके बावजूद हम प्रतिदिन पर्यावरण प्रदूषण की विभीषिका का सामना कर रहे हैं। पर्यावरण सन्तुलन की दिशा में अभी बहुत कुछ करना शेष है। पर्यावरण प्रदूषण का मुख्य कारण औद्योगीकरण तथा नगरीकरण के अतिरिक्त हमारे देश की सामाजिक आर्थिक परिस्थितियाँ हैं। पर्यावरण सन्तुलन के प्रयासों को और प्रभावी बनाने के लिये जनसाधारण को इसके प्रति जागरूक तथा शिक्षित करने, पर्यावरण संरक्षण के वैज्ञानिक तथा तकनीकी उपाय और वैकल्पिक प्रबन्धन की आवश्यकता है। जब प्रत्येक व्यक्ति पर्यावरण संरक्षण को अपने कर्तव्य के रूप में समझने और पालन करने की स्थिति में होगा तभी पर्यावरण की मानवाधिकार के रूप में पूर्ण उपलब्धि हो सकेगी। तभी यजुर्वेद के ऋषि की यह वाणी चरितार्थ होगी-

हे पृथ्वी। तुम रत्न धन की खान और कृषि कर्म सम्पादन करने वाली हो। मुझे इच्छित ऐश्वर्य दो और मेरी रक्षा करो। हे द्यावा पृथ्वी। तुम विपुल अन्न वाली और प्रभुत गौओं वाली हो और मेरी सुरक्षा करो।...यजुर्वेद 5/9, 16

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