फ्लोराइड मुक्त हुआ निल्दा गांव

Submitted by admin on Tue, 02/04/2014 - 13:46
उमरबन विकासखंड की अधिकतर आबादी आदिवासी ही है। ग्राम निल्दा भी शत-प्रतिशत रूप से आदिवासी आबादी वाला है। ऐसे में यहाँ पर निरक्षरता व अशिक्षा अपने आप में एक परेशानी है। ऐसे में फ्लोराइड की समस्या के निदान की बात करना और उसके बारे में जागरूकता का स्तर बढ़ाना चुनौती का काम है। आज भी इस ग्राम के कई लोग फ्लोराइड की समस्या के बारे में कम जानकारी रखते है फिर भी अब वह दिन नहीं रहें जबकि लोग स्वच्छ पानी के बारे में जानकारी नहीं रखते हैं।धार जिले के उमरबन विकासखंड के ग्राम निल्दा में फ्लोराइड की समस्या से मुक्ति की बहुत ही अजीब कहानी है। इसकी वजह यह है कि नदी किनारे के इस ग्राम को सूखे के हालात से गुजरना होता है। जिले की खुज नदी इसी ग्राम से होकर गुजरती है। इसके बावजूद यहाँ पर सूखे के जैसे हालात रहते हैं।

अन्य ग्रामों में यदि फ्लोराइड की समस्या हो तो वह समझ में आता है किंतु सूखे से जूझने वाले इस ग्राम में पानी के चंद साधनों में भी यदि फ्लोराइड की मात्रा अधिक हो तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि वहाँ क्या हालात होंगे। इस हालात को बदलने में वाटर एड ने जो योगदान दिया है वह निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है।

ग्राम पंचायत सुराणी का ग्राम निल्दा की आबादी के पास में उपलब्ध संसाधनों की पहले ही कमी है। जो दो हैंडपंप स्थापित है, वे पीने के पानी के लिहाज से असुरक्षित है। इसलिए 47 परिवार के 253 लोगों के लिए यहाँ पर पहले तो पीने का पानी चुनौती है और उसके बाद सुरक्षित पानी भी उपलब्ध होना बड़ी चुनौती है।

इस ग्राम में पीने के पानी में फ्लोराइड की मात्रा बहुत अधिक पाई गई। यहाँ पर फ्लोराइड की मात्रा 2.6 पीपीएम तक पाई गई जो कि मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। इस ग्राम का अध्ययन करें तो मालूम होता है कि पहाड़ी होने के साथ-साथ पथरीले स्थान होने के कारण यहाँ पर पानी की उपलब्धता को लेकर हमेशा चिंताजनक स्थिति रहती है।

ऐसे में जब मालूम हुआ कि यहाँ पर पीने के पानी खराब है और उसके कारण लोगों को फ्लोरोसिस की परेशानी से जूझना पड़ रहा है तो सभी के लिए यह चुनौती बन गया है कि किस तरह से काम किया जाए। अभी तक यह होता आया था कि पानी तो उपलब्ध है किंतु उसे स्वच्छ करना भर है। इस ग्राम की परिस्थिति यह थी कि बहुत ही अल्प मात्रा में जो पानी उपलब्ध है उसे कैसे शुद्ध बनाया जाए। वसुधा विकास संस्थान व वाटर एड ने मिलकर यहाँ पर प्रयास शुरू किए। इन प्रयासों का ही नतीजा था कि यहाँ पर एक नई कवायद हुई।

यहाँ सीताराम भाई ने निभाई भूमिका


इस ग्रामीण क्षेत्र में सबसे पहले यह देखा गया कि जिस स्थान पर पीने के पानी के लिए सुरक्षित कुआं बन सकता है, इसके लिए कोशिशें की गई। कुआ बनाना आसान नहीं था क्योंकि पथरीली जमीन पर काम करना था। ऐसे में निल्दा ग्राम में पुराना कुआं ही उपयोग में लाया गया। ग्राम कालीकराय के पर्वतभाई की ही तर्ज पर ग्राम के सीताराम भाई ने अपना पुराना कुआ दान दे दिया। ग्रामीण आजीविकी परियोजना की सहायता से यहाँ पर पानी के कुएँ का गहरीकरण किया गया।

चट्टानों को फोड़कर पानी निकालना था इसलिए गहरी खुदाई करने के लिए यहाँ बलास्टिंग की गई। इसके बाद में जब सेनेटरी वेल तैयार किया गया। इसमें परियोजना के ग्राम कोष के माध्यम से 20 हजार रुपए खर्च किए गए। इस सेनेटरी वेल को बनाने के लिए वाटर एड संस्था ने करीब 2 लाख 10 हजार रुपए स्वीकृत किए। इस निर्माण को करवाने में वसुधा विकास संस्था ने तुरंत ही काम किया।

इस पर हैंडपंप भी स्थापित किया गया। साथ ही विद्युत संचालित मोटर भी लगाई गई जिससे कि बिजली नहीं होने पर ग्रामीण हैंडपंप से स्वच्छ पानी ले सके। कुएँ में पानी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हुआ और उसी का नतीजा है कि यहाँ पर अब लोग अपने घरों के नजदीक ही पीने का पानी प्राप्त कर लेते हैं।

टंकी व स्टैंड स्थापना


यहाँ पर जो परिस्थितियाँ थी वह बहुत ही विचित्र थी। ऐसे में ग्राम निल्दा में सुरक्षित स्थानों पर तीन पानी की टंकिया व स्टैंड स्थापित किए गए। साथ ही एक पुरानी टंकी को भी जीवित किया गया। इन टंकियों की बदौलत अब ग्राम निल्दा के लोग स्वच्छ पानी पी रहे हैं। जिससे कि वहाँ पर बच्चों व अन्य लोगों में फ्लोरोसिस की समस्या समाप्त हो गई है।

टंकी को बाँधने की पहल


जैसा कि मालूम है इस ग्राम की परिस्थिति विचित्र है, यह ग्राम खुज नदी के किनारे स्थित है। बारिश के दिनों में यहाँ पर नदी में पानी की आवक ज्यादा हो जाती है और बाढ़ जैसे हालात बन जाते हैं। ऐसे में स्टैंड व टंकी के बह जाने का खतरा रहता है।

ग्रामीण इस बात को समझ चुके थे कि स्वच्छ पानी के लिए इन दोनों को ही सुरक्षित रखना जरूरी है। इसलिए उन्होंने खुद ही एक जुगत लगाई। इसी के चलते इन्होंने इन टंकियों को रस्सी से इस प्रकार बाँधा कि अधिक पानी का बहाल होने पर वे बहकर अन्यत्र नहीं चले जाए।

इससे यह समझ में आता है कि ग्रामीण स्वच्छ पानी पीने के लिए जो गैर सरकारी संस्थाओं ने साधन उपलब्ध कराए है उसको सुरक्षित रखने के प्रति कितना जागरूक है। ग्राम पंचायत द्वारा भी समय-समय पर अहम भूमिका निभाई जाती है। कुआ निर्माण के मामले में पंचायत ने भी सहयोग किया।

जल सेवा समिति


वाटर एड व वसुधा विकास संस्थान ने अपने स्तर पर अपनी जिम्मेदारी निभाई किंतु इन दोनों ही संस्थाओं का इस बात का ज्ञान था कि जब तक स्थानीय लोगों की भागीदारी नहीं होगी तब तक लंबे समय तक सफलता नहीं मिल पाएगी। यही वजह है कि परियोजना पर लंबे समय बाद भी यदि सफलता मिल रही है तो वह जल सेवा समिति का ही योगदान है। इस ग्राम में जलसेवा समिति बनाई गई और उसे सक्रिय किया गया। साथ ही यह भी कोशिश की गई कि यह समिति वित्तीय रूप से भी मजबूत हो जिससे कि किसी भी तरह से परेशानी का सामना नहीं करना पड़े।

जागरूकता भी चुनौती


धार जिला आदिवासी बहुल क्षेत्र है। उमरबन विकासखंड की अधिकतर आबादी आदिवासी ही है। ग्राम निल्दा भी शत-प्रतिशत रूप से आदिवासी आबादी वाला है। ऐसे में यहाँ पर निरक्षरता व अशिक्षा अपने आप में एक परेशानी है। ऐसे में फ्लोराइड की समस्या के निदान की बात करना और उसके बारे में जागरूकता का स्तर बढ़ाना चुनौती का काम है। आज भी इस ग्राम के कई लोग फ्लोराइड की समस्या के बारे में कम जानकारी रखते है फिर भी अब वह दिन नहीं रहें जबकि लोग स्वच्छ पानी के बारे में जानकारी नहीं रखते हैं।

स्वच्छ पानी का महत्व समझने लगे हैं। इसकी वजह यह है कि वाटर एड के सहयोग से वसुधा विकास संस्थान ने यहाँ पर जागरूकता के लिए भी काम किया है। सत्त लोगों को इस बात की समझाइश दी कि किस तरह से स्वच्छ पानी उनकी स्वास्थ्य की सुरक्षा करेगा। बच्चों के दाँत खराब नहीं होंगे और हड्डिया भी टेढ़ी-मेढ़ी नहीं होंगी। समझाइश के लिए कई बार पब्लिक मीटिंग हुई। इस मीटिंग में यह समझाया गया कि स्कूल के बच्चों से लेकर अन्य लोगों के स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ सकता है।

फ्लोराइड के अलावा भी बैक्टीरिया के कारण पानी से होने वाले रोगों के बारे में भी बताया गया। अभी भी इस ग्राम में सत्त संपर्क जारी है। इसी कारण से सूखे से प्रभावित रहने वाले इस क्षेत्र में भी पानी के प्रति लोगों में जागरूकता आई है।

समिति होगी मजबूत


दरअसल इस तरह के प्रयास से समिति मजबूत हुई है। ग्राम निल्दा बहुत ही छोटा ग्राम है। इस छोटे से ग्राम में यदि समुदाय आधारित पेयजल वितरण व्यवस्था चल रही है तो वह अपने आप में एक आश्चर्य का विषय है। इसकी वजह यह है कि बहुत ही कम देर के लिए बिजली उपलब्ध होती है। ऐसे में विद्युत मोटर से सेनेटरी वेल के माध्यम से पूरे ग्राम के लोगों को पानी उपलब्ध कराने की जो कोशिश की जाती है वह तारीफे काबिल है।

समय-समय पर कई चुनौतियाँ भी सामने आती है। मसलन यदि बिजली की मोटर खराब हो जाती है तो उसे सुधरवाने के लिए दूर शहर जाना होता है जो कि बहुत ही खर्चीला होने के साथ-साथ मशक्कत भरा भी होता है। इन सबके बावजूद पीने के पानी के लिए कुछ लोग इस तरह की मेहनत से भी पीछे नहीं हटते। हालाँकि यह कहना अतिश्य¨क्ति होगा कि ग्राम का हर व्यक्ति जागरूक है किंतु इस ग्राम के विलेज मोटीवेटर व क्रियान्वयन एजेंसी के प्रयासों का नतीजा है कि न केवल समुदाय मजबुत हुआ है बल्कि जल समिति भी धीरे-धीरे मजबुत होती जा रही है।

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