राजस्थान की परम्परागत तकनीक

Submitted by RuralWater on Sat, 03/31/2018 - 14:21
Source
ग्राविस, जोधपुर, 2006


राजस्थान की परम्परागत जल संरक्षण प्रणाली टांकाराजस्थान की परम्परागत जल संरक्षण प्रणाली टांकाराजस्थान विविधताओं से परिपूर्ण एक ऐसा राज्य है, जहाँ एक तरफ रेगिस्तान है तो दूसरी तरफ ऊँचे-ऊँचे पहाड़ और घने जंगल हैं। यहाँ पर गरीबी अपनी चरम सीमा पर है तो महंगे शहर भी देखने को मिलते हैं। यहाँ विभिन्न प्रकार की भूमि जैसे चारागाह, गोचर, औरण, अभयारण्य आदि भी विद्यमान है। हमारी लोक संस्कृति हमारी ग्रामीण और जनजातीय संस्कृति का प्रतिनिधित्व करती है।

जनजातीय और ग्रामीण लोग चाहे गाँव में निवास करते हों या जंगल में, या फिर वर्ष भर एक जगह से दूसरी जगह पर घूमते रहते हों, उनके पास प्रतिभा की कोई कमी नहीं होती। उनके लिये तो कला भी जिन्दगी का एक आम हिस्सा है। अपनी निपुणता और रचनात्मकता के सहारे ही वे अपने साधारण से जीवन को बहुरंगी और सजीव बनाने में सफल रहते हैं।

थार रेगिस्तान 0.60 मिलियन वर्ग किलोमीटर मे फैला हुआ, संसार का सबसे अधिक सघन, अद्वितीय एवं रुक्ष प्राकृतवास है। कर्क रेखा के समानान्तर, भारतवर्ष के चार प्रदेशों में फैले थार क्षेत्र का 68.8 प्रतिशत भाग राजस्थान में स्थित है। थार के करीब 60 प्रतिशत हिस्से पर कम या ज्यादा खेती की जाती है और करीब 30 प्रतिशत हिस्से पर वनस्पतियाँ है, जो मुख्यतः चारागाह के रूप में ही काम में आती हैं।

वर्षा की अनियमितता इस तथ्य से प्रतीत होती है कि कुछ इलाकों में वर्षा की मात्रा औसतन 120 मिमी. से भी कम है। हर दस वर्ष में चार वर्ष सूखे गुजरते हैं। इससे खेती प्रायः मुश्किल हो जाती है। अधिकांश हिस्से में 4 से 5 महीनों तक तेज हवाएँ चलती हैं और गर्मियों में रेतीले तुफान बहुत आम बात है। पर इस इलाके में मौजूद हरियाली भले ही वह कितनी भी कम क्यों न हों, विविधता भरी है। यहाँ करीब 700 किस्म के पेड़ पौधे पाये जाते हैं, जिनमें से 107 किस्म की घास होती है, इनमें प्रतिकूल जलवायु में भी जीवित रहने की क्षमता रहती है।

यहाँ की ज्यादातर पैदावार पौष्टिकता और लवणों से भरी है। इसके साथ ही थार क्षेत्र में सबसे उन्नत किस्म के पशु मिलते हैं, उत्तर भारत में श्रेष्ठ किस्म के बैल यहीं से जाते हैं और देश की 50 प्रतिशत ऊन का उत्पादन यहीं होता है। थार क्षेत्र की खेती एवं जमीन का उपयोग पूर्णतः वर्षा पर ही निर्भर है। वर्षा अच्छी हुई तो फसल एवं चारा पर्याप्त मात्रा में मिल जाता है तथा वर्षाजल को नाड़ियों (तालाब), बेरियों, कुंडियों या टांकों मे संचित कर लिया जाता है।

राजस्थान में पानी की कमी का वृत्तान्त धार्मिक आख्यान के साथ पुराने लोकाख्यानों में भी उपलब्ध है। राजस्थान के सुप्रसिद्ध लोक काव्य ‘ढोला मारु रा दूहा’ में मारवाड़ निन्दा प्रकरण के अन्तर्गत मालवणी अपने पिता को सम्बोधित करती हुई कहती है –

बाबा न देइसी मारुवाँ वर, कुँआरी रहेसी।
हाथि कचोजउ सिर घड़उ, सीचति य मरेसि।।


हे पिता। मुझे मारु देश (राजस्थान) में मत ब्याहना, चाहे कुँआरी रह जाऊँ। वहाँ हाथों में कटोरा (जिससे घड़े में पानी भरी जाता है) और सिर पर घड़ा रखकर पानी ढोते-ढोते ही मर जाऊँगी। यह काव्यांश बतलाता है कि पानी की घोर कमी और इसकी पूर्ति हेतु कठिन परिश्रम राजस्थान की जनता की दारुण नियति थी। यहाँ नायिका उससे बचने के लिये कुँवारी ही मरने को तैयार है, पर उसे राजस्थान जैसे जल की कमी वाले क्षेत्र में जीवन व्यतीत करना गवारा नहीं। वस्तुतः यह तथ्य भी है कि हमारे यहाँ पानी बहुत गहरे में पाया जाता है।

पानी की न्यूनता के समाधान का नियोजन यहाँ के निवासियों के द्वारा पहले से ही आँका हुआ था। वर्षा की विफलता तथा निरन्तर सूखा पड़ने का सामना करने के लिये प्रत्येक गाँव में नाड़ियाँ, छोटे-बड़े तालाब बनाए जाते थे। उनसे जलग्रहण क्षेत्र की प्रतिरक्षा की जाती थी। वर्षा से पूर्व नाड़ियों को खोदकर उनकी संग्रहणशीलता को बढ़ाया जाता था।

हमारे गाँवों में खेती के अलग-अलग चरण ऋतुओं में आने वाले बदलावों पर ही आश्रित हैं। खेतों की जुताई, बुवाई, कटाई और अनाज निकालना तथा गोदामों में भरना ये सारे काम एक रस्म और जश्न मय माहौल में किये जाते हैं। इस तरह वार्षिक चक्र के सारे चरण बरसात, शरद, शिशिर, हेमन्त, बसन्त या गर्मी इन सभी ऋतुओं का त्योहार के रूप में स्वागत किया जाता है और उत्सव मनाया जाता है। समय आने पर ये सभी परम्पराएँ और शिल्प एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी के हाथों में चले जाते हैं।

उत्तम खेती जो हरवड़ा (हल चलाने से उत्तम खेती होगी)
मध्यम खेती जो संगराहा (साथ-साथ काम करने से मध्यम खेती)
बीज बुढ़के तिनके ताहा (बीज भी डूब जाएँगे जो तीसरे को काम दिया)
जो पूछे हरवाहा कहा (हल चलाने वाले ने कहा)

परम्परागत ज्ञान सामान्यतया एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक मौखिक रूप से संचारित होता रहा है। इसका उपयोग भी सामान्यतया सीमित क्षेत्र, अंचल विशेष तक ही सीमित रहा है। सही अर्थों में देखा जाये तो यह ज्ञान परिवारों के मध्य मे ही सिमट कर रह गया है। मनुष्य जाति के विकास के साथ-साथ मनुष्य ने भूख-प्यास को शान्त करने के लिये पेड़ों के फल तथा पत्ते खाते-खाते, खेती करना तथा जल को संचय करना सीखा।

कई विफलताओं के बाद उसने इस प्रक्रिया में सफलता हासिल की होगी और अपने बौद्धिक कौशल को आगे बढ़ाया होगा। अनादिकाल से वह अपने बुद्धिबल के सहारे धीरे-धीरे उन्नति कर आज इस अवस्था में पहुँचा है। किन्तु हम आज उस पुराने और पारम्परिक ज्ञान, जो अत्यन्त बहुमूल्य एवं उपयोगी है को बहुत पीछे छोड़कर निरन्तर आगे निकलने की चेष्टा में लगे हैं।

प्राचीन तकनीक किसी भी रूप में वर्तमान से कम नहीं आँकी जा सकती है। जरुरत सिर्फ प्रचार-प्रसार, संरक्षण, संवर्धन, शोध और मार्गदर्शन की है। हमारी समृद्ध लोक परम्पराओं को पुनः जीवित कर उनका संरक्षण एवं विस्तार करने के साथ-साथ आधुनिक पद्धतियों के साथ उनका सामंजस्य स्थापित किया जाये। यह भी सम्भव है कि गुणियों को संगठित कर उनमें आत्मविश्वास जागृत कर इस ज्ञान को संरक्षित करने के प्रयास किये जाएँ।

स्वामी दयानन्द सरस्वती ने कहा था कि यदि लोगों को शक्ति बोध हो तो धरती पर स्वर्ग उतर सकता है। इस सांसारिक ज्ञान और बौद्धिक सम्पदा के खजाने को एक करने की आज अत्यन्त आवश्यकता है। थार में लोगों ने जल की हर बूँद का बहुत ही व्यवस्थित उपयोग करने वाली आस्थाएँ विकसित की और लोक जीवन की इन्हीं मान्यताओं ने इस कठिन प्रदेश में जीवन को चलाया, समृद्ध किया और प्रकृति पर भी जरुरत से ज्यादा दबाव नहीं पड़ा।

आज के परिदृश्य में वर्तमान विद्यालयी पाठ्यक्रम व सीमित पढ़े-लिखे लोग, पारम्परिक प्राकृतिक जल संग्रहण विधि एवं कृषि तकनीकों को पुरानी प्रथा कह भूलने लगे हैं। शासन से अपेक्षा करने लगे कि घर-घर पानी पहुँचाना उसका दायित्व है। यथा बिजली नहीं है तो पानी नहीं है। निष्क्रिय हुए ग्रामवासी सरकार पर दोषारोपण करने लगे और प्राचीन जल प्रबन्धन व्यवस्था को अनुपयोगी मानकर उन्होंने अपने आप को इस सामाजिक आवश्यकता से स्वतंत्र कर लिया। इस कारण पारम्परिक स्रोतों का रख-रखाव प्रायः समाप्त हो गया।
 

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