राजस्थान में बारानी खेती की प्रगति

Submitted by Hindi on Sun, 05/01/2016 - 15:02
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योजना, जून 1994

राजस्थान के गाँवों का कठिन जीवन वहाँ के लोगों में अजीब आत्म विश्वास भी भर देता है। चीताखेड़ा में आया बदलाव भी गाँव वालों की शक्ति से जुड़ा है। हालाँकि केन्द्र सरकार ने वाटरशेड योजना को जनभागेदारी वाला बनाया है पर बहुत से राज्यों में ऐसी स्थिति नहीं है जो राजस्थान में है।

पिछले चार दशक से अधिक समय के योजनाबद्ध विकास ने आज हमें खाद्यान्नों के मोर्चे पर आत्मनिर्भर बना दिया है। ऐसा न हो सका होता तो शायद इतनी भारी भरकम आबादी का पेट भरने के लिये हमें कितने ही उपाय करने होते। लेकिन आबादी जिस रफ्तार से बढ़ रही है उस रफ्तार से हमारे खेतों की उपज नहीं बढ़ रही है। ऐसे में स्वाभाविक तौर पर जरूरी हो जाता है कि वर्षा सिंचित इलाकों में भूमि प्रबंध को पुख्ता करने के साथ अन्य मोर्चों पर ढंग से काम हो। अभी तक फसल उत्पादन में मुख्य फोकस सिंचित इलाकों पर ही रहा है। ऐसे में वर्षा सिंचित इलाके, सिंचित इलाकों को दी गयी साधन सुविधाओं के नाते जरूरत से ज्यादा पिछड़ गये। लेकिन भारत ने सही समय पर बारानी खेती की ओर सम्यक जोर देना शुरू किया है।

वास्तव में दलहनी और तिलहनी फसलों ने उत्पादन में मामूली वृद्धि, चारा ईंधन तथा अनाज के उत्पादनों में असंतुलन और बारानी क्षेत्र के सामाजिक ढाँचे की उपेक्षा के नाते राष्ट्रीय जल ग्रहण क्षेत्र विकास परियोजनाएँ काफी जरूरी हो गयी थीं। इस पर भारत सरकार जिस ढंग से जोर दे रही है और जनभागेदारी की जो स्थिति दिख रही है उससे लगता है कि आगामी एक दशक में बारानी खेती वाले इलाकों के सामाजिक आर्थिक ढाँचे में जोरदार बदलाव आएगा और सिंचित इलाकों की तुलना में यहाँ जो घोर असमानताएँ हैं वे कम होंगी। जलग्रहण क्षेत्र विकास का खाका इतने व्यवस्थित ढंग से बनाया गया है कि यह परियोजना गाँव के लोगों को अपनी सम्पत्ति जैसी लगती है।

कम से कम राजस्थान जैसे जटिल भौगोलिक संरचना और विचित्र सामाजिक समस्याओं वाले राज्य में तो कुछ ऐसा ही लगता है। राजस्थान के अजमेर, भीलवाड़ा और उदयपुर आदि जिलों में जलग्रहण परियोजनाओं की स्थिति को देखने के बाद ऐसा अनुभव हुआ कि जिस भावना के साथ यहाँ काम चल रहा है यह भावना बनी रही तो आगामी एक दशक में यहाँ का नक्शा ही बदल जाएगा। पर भावना बनी भी रहेगी क्योंकि यहाँ के लोग पानी की एक-एक बूँद की कीमत जानते हैं। और बार-बार के अकाल से यहाँ आदमी और पशुओं, दोनों में एक अजीब सी जिजीविषा पैदा की है।

बारानी इलाके में किसान को खेती के लिये पूरी तरह बरसात पर ही निर्भर रहना होता है। समय पर बरसात न होने या अपर्याप्त होने से भूमि नमी के लिहाज से प्यासी ही रहती है। ऐसे में फसलें सूखे की चपेट में आ जाती हैं और तीसरे साल अकाल को देखते हुए किसान अपनी कमर भी सीधी नहीं कर पाते।

बारानी खेती में सस्ती तकनीक के जरिए उत्पादन बढ़ोतरी के कई तरीके हैं। खेत का पानी खेत में रखने की इस परियोजना में थोड़े से काम से बड़े फायदे हैं। परियोजना क्षेत्र में कृषि वानिकी, शुष्क खेती फलोत्पादन, चारागाह विकास, पशु विकास, किसान नर्सरी जैसे उत्पादनों के अलावा कई ऐसे प्रकल्प हैं जो गाँव की शक्ल बदलने के साथ ग्रामीणों को रोजगार के नये अवसर भी प्रदान करते हैं।

यह योजना राष्ट्रीय वाटरशैड (पनधारा) कार्यक्रम के नाम से 1986-87 में शुरू की गयी थी। 1987 में इसके ढाँचे में तब्दीली लायी गयी। राजस्थान में इस परियोजना का नाम ‘राष्ट्रीय जलग्रहण क्षेत्र विकास’ नाम दिया गया है। 1989 में योजना आयोग द्वारा बनाये गये एक कार्यदल द्वारा दोबारा समीक्षा की गयी तो पाया गया कि सातवीं योजना में राज्य सरकारों द्वारा समान अंश न देने की वजह से कृषि योग्य तथा कृषि भूमि के उपचार की धीमी गति रही। परियोजना के 5 प्रमुख उपादन तय किए गये:-

1. भूजल, पौधे, पशु, जन संसाधनों के सुव्यवस्थित समन्वित संरक्षण, उन्नयन और उपयोग। विविधता पूर्ण भूमि उपयोग के माध्यम से मानव और पशुओं की संख्या की बढ़ती हुई मांग को पूरी करने के लिये ईंधन, इमारती लकड़ी, चारा और बायोमास की उपलब्धता बनाना।

2. पिछड़े वर्षा सिंचित इलाकों में रोजगार के मौके बढ़ाने और परियोजना पूरी होने के बाद सतत रोजगार का प्रबंध करना ताकि गरीब ग्रामीणों का जीवन-यापन आसानी से हो सके।

3. भू-तथा वर्षा जल के वैज्ञानिक प्रबंध से उत्पादन का माहौल बनाना और नकदी फसलों का प्रसार, पेयजल प्रबंध।

4. सिंचित तथा असिंचित इलाकों में विषमता घटाना। ऐसी स्थिति लाना कि ग्रामीण इलाकों से शहरों में पलायन कम हो।

5. भोजन, ईंधन, चारे के अलावा आकस्मिक रोजगार में वृद्धि, डेरी उत्पादों का विकास।

इस योजना के लिये आठवीं योजनावधि में 800 करोड़ रुपये खर्च होंगे। देश के 127 कृषि जलवायु इलाकों में से 115 में परियोजना क्रियान्वित हो रही है और अनुसंधान की दृष्टि से यह काफी उपयोगी है। कुल 107 मॉडल वाटररोड योजना को भारत सरकार ने तकनीकी अनुमोदन दे दिया है। इन्हीं के आधार पर सम्बन्धित राज्यों द्वारा तैयार 1707 परियोजनाओं को भी राज्यस्तरीय अनुमोदन मिल चुका है। परियोजना का वास्तविक लक्ष्य इसे सरकारी योजना से जल आंदोलन बनाना है। राजस्थान में यह कार्यक्रम बढ़ते रेगिस्तान को रोकने में भी मददगार साबित हो रहा है। राजस्थान की परियोजनाएँ देश के लिये एक माॅडल है।

इलाका विशाल पर जमीनें बेकार


कृषि मंत्रालय के सचिव जी.सी. पंत राजस्थान के नतीजों को काफी उत्साहजनक बताते हैं। एक बातचीत में उन्होंने कहा कि जहाँ कुछ नहीं है वहाँ अगर कुछ इलाज कर हम उत्पादन बढ़ाने का काम कर सकें तो बहुत अच्छी बात है। अगर जनभागीदारी ऐसी ही बनी रही तो आगे अच्छे नतीजे आएँगे ही।

यों देश में कुल फसल क्षेत्र का तीन चौथाई भाग वर्षा पर निर्भर है। लेकिन यह सूखा क्षेत्र आर्थिक दृष्टि से बेहद अहमियत रखता है क्योंकि देश के कुल अनाज उत्पादन का 42 प्रतिशत इन्हीं इलाकों से आता है। राजस्थान में स्थितियाँ अन्य राज्यों से थोड़ी अलग हैं। राजस्थान के साथ यह दुर्भाग्य जुड़ा है कि यहाँ का 96 प्रतिशत (खेती लायक) पूरी तरह बरसात पर निर्भर है। ऐसे में एक-एक बूँद पानी बचाना यहाँ जरूरी है। राजस्थान के 342.37 लाख हेक्टेयर जमीन में 133 लाख हेक्टेयर पर खेती, 20.27 पर वन, 138 लाख हेक्टेयर पर पानी और बेकार जमीन है। कुल 30 लाख हेक्टेयर जमीन पर खेती के लिये सिंचाई का प्रबंध है पर इनमें भी दो तिहाई खेत कुँओं से सींचे जाते हैं जिसमें पानी होना बरसात पर निर्भर है। इन्हीं के निदान के लिये राजस्थान में आठवीं योजना में दो परियोजनाएँ चल रही हैं।

कृषि मंत्रालय की राष्ट्रीय परियोजना से राजस्थान को 8वीं योजना में 136 करोड़ रुपये मिलेंगे। इसी तरह अजमेर, भीलवाड़ा, उदयपुर और जोधपुर में विश्व बैंक की मदद से 74 करोड़ रुपये की परियोजना चल रही है। परियोजना को राजस्थान सरकार ने व्यापक अहमियत देते हुए 1991 में जलग्रहण विकास और भू-संरक्षण के नाम से एक नया विभाग बना दिया है। परियोजना मुख्यतया इन्हीं अंचलों में चल रही है जहाँ 30 प्रतिशत से कम सिंचित इलाके हैं। राजस्थान में ऐसे इलाकों की कमी नहीं है। विभाग ने तीन कार्यक्रमों के तहत 5.72 लाख हेक्टेयर जमीन को उपचारित करने का काम 1991-92 में अपने हाथ में लिया था। तब विभाग को 2147 लाख रुपये की धनराशि मिली थी और 53,856 हेक्टेयर जमीन उपचारित की गयी। 1992-93 में 1,37,116 हेक्टेयर और दिसम्बर 1993 तक (1993-94 में) 102788 हेक्टेयर जमीन का उपचार किया गया। विभाग के पास 63 फील्ड इकाई, 17 डिवीजन और 2 जोन में 1875 लोग लगे हैं यहाँ कुल 195 जल संग्रहण परियोजनाएँ चल रही है।

परियोजनाओं का प्रभाव:


अजमेर से 45 कि.मी. दूर और जयपुर से करीब 115 कि.मी. दूर बसे गाँव चीताखेड़ा, रामनेरढाणी और मोहनपुरा गाँव में 21 मई, 1991 को यह परियोजना आयी। अब तक की अवधि में इस गाँव का नक्शा ऐसा बदल चुका है और बंजर मानी जाने वाली जमीनों में ऐसी फसलें लहलहा रही हैं कि देखकर आश्चर्य ही होता है। शुरू में गाँव के लोगों को लगता था कि सरकारी टीम उनकी जमीनों को अपने कब्जे में लेने आयी है। इस गाँव में भ्रमण के बाद गाँव के लोगों ने जिस गर्मजोशी से हमसे बातचीत की और परियोजना के बारे में जो राय व्यक्त की वह आमतौर पर सरकारी परियोजनाओं के बारे में व्यक्त नहीं की जाती।

सच्चाई है कि अगर आप साल पहले अजमेर जिले के इस 1800 की आबादी वाले गाँव में आये हों तो अब जाने पर आपको आश्चर्य होगा और उन जमीनों पर फसल लहलहाते देखकर तो और भी आश्चर्य होगा जिसके बारे में यह धारणा बन चुकी थी कि इन कंटीली जमीनों पर घास का एक तिनका भी नहीं उगेगा। तिनका था भी नहीं वहाँ लेकिन चीताखेड़ा गाँव के लोगों की लगन, मेहनत और वाटरशेड ने मिलकर जादू सा किया लगता है। चीताखेड़ा जलग्रहण क्षेत्र में 3 गाँव आते हैं और इस इलाके का केवल 14 प्रतिशत हिस्सा ही सिंचित है। वाटरशेड में चयन पूर्व किए गये गाँव में पाया गया था कि यहाँ की 417 हेक्टेयर सरकारी और गैर सरकारी जमीन में किसी तरह की कोई वनस्पति नहीं थी। नालों से भूमि का कटाव बढ़ रहा था और भूमि में बरसाती पानी के सोखने की क्षमता खत्म हो चुकी थी। बरसात में जो पानी खेतों में इकट्ठा होता वह वानस्पतिक अवरोध आदि के अभाव में मिट्टी को काटता हुआ बाहर निकल जाता था। खेती में नाममात्र की उपज हो रही थी और अकाल में गाँववालों के असली सहारा जानवरों के लिये चारे का इंतजाम तक नहीं हो पाता था। पानी की समस्या तो यहाँ पुरानी थी। बरसात में यहाँ गाँव के लोगों को रूपनगढ़ नदी को तैर कर गाँव जाना पड़ता था क्योंकि सम्पर्क सेतु नहीं था। अधिकतर परिवार गरीबी की रेखा से नीचे बसर कर रहे थे। परियोजना की 3 साल की अवधि में उनका जीवन स्तर एकदम तो नहीं सुधर गया है लेकिन वह सुधरने की प्रक्रिया में है और गाँव वालों को ढंग से गुजारे की एक राह दिखी है।

राजस्थान के गाँवों का कठिन जीवन वहाँ के लोगों में अजीब आत्म विश्वास भी भर देता है। चीताखेड़ा में आया बदलाव भी गाँव वालों की शक्ति से जुड़ा है। हालाँकि केन्द्र सरकार ने वाटरशेड योजना को जनभागेदारी वाला बनाया है पर बहुत से राज्यों में ऐसी स्थिति नहीं है जो राजस्थान में है। जनभागीदारी का पक्ष राजस्थान में सबसे मजबूत है और जटिल भौगोलिक संरचना के बावजूद यहाँ के नतीजे काफी प्रेरक हैं। ऐसा भारत के कृषि सचिव जे.सी. पंत भी मानते हैं। परियोजना में 1365 हेक्टेयर जमीन है। इसमें 948 हेक्टेयर गाँव वालों की है। लोगों ने परियोजना में ढंग से उत्साह दिखाया उसकी झलक गाँव की सरहद पर ही मिल जाती है। चार लाख रुपये की लागत से बने चेकडैम और सम्पर्क मार्ग में गाँव के लोगों ने 66,000 रुपये का श्रमदान करके एक मिसाल कायम कर दी। हर घर से एक आदमी 15 दिन तक मुफ्त में काम करता रहा। गाँव में 250 घर हैं।

चीताखेड़ा का कायाकल्प वास्तव में खेत का पानी खेत में ही रोकने से हुआ। बारानी खेती का उत्पादन बढ़ाने और भूजल संरक्षण कामों के तहत बेकार जमीन पर कंटूर लाइन पर खस और मूंज को वानस्पतिक आवरोध लगाने, चेकडैम बनाने, ट्रेनज लाइन ट्रीटमेंट आदि के महत्त्व को पहले किसानों को बताया गया। साथ में शहर खेती वृक्षारोपण तथा पशु विकास के कार्यक्रम किसानों को उनकी अपनी पसंद को देखते हुए शुरू किए गये थे। इनका ऐसा फर्क पड़ा कि अब तक केवल बरसात और मोटे अनाज पर खड़ा गाँव आबाद हो गया। वानस्पतिक अवरोध ने यहाँ गाँव में मिट्टी में नमी पैदा की और भूमिगत पानी 10 से 20 फुट तक ऊपर आया फलस्वरूप 10 साल से सूखे पड़े और बेकार मान लिये गये कुएँ भी अब पानी देने लगे। गाँव के बाहर बारानी चेतना केन्द्र बना है। वह भी एक माॅडल है। इसके इर्द-गिर्द खासी सजावट है। गाँव में अब एक प्राइमरी स्कूल, स्वास्थ्य केन्द्र, गाँव के ही लोगों द्वारा तैयार नर्सरी चल रही है गाँव में लगे पेड़ों की देखभाल पंचायत के जिम्मे है। पेड़ों की रक्षा पर काफी जोर है और परिसर में पशुओं के जाने पर पाबंदी है। वाटरशेड ने गाँव के लोगों को पर्याप्त रोजगार भी दिया है।

चीताखेड़ा वाटरशेड की लागत 47 लाख रुपये है और परियोजना पर 2084 रुपये खर्च आ रहा है। राजस्थान के जलग्रहण विकास विभाग के संयुक्त निदेशक एस.पी. सांगी ने कहा कि ‘सरल सस्ती तकनीक और ग्रामीणों की भागीदारी ने यहाँ लोगों को जीने की एक नई राह दिखायी है। ग्रामीण महिलाओं को भी नर्सरी में काम मिला है। वे कहते हैं जनसहयोग ऐसा ही रहा तो गाँव एक नया मॉडल बन जाएगा। परियोजना से 400 किसान सीधे लाभान्वित हो रहे हैं। गाँव के लोगों ने वानस्पतिक अवरोध के साथ बूँद-बूँद पानी को खोलने की नकल शुरू कर दी है। अभी गाँव की सरकारी जमीन पर जो वानस्पतिक अवरोध और पेड़-पौधे लग रहे हैं वे कुछ समय की हिफाजत के बाद गाँव वालों को नियमित चारागाह के रूप में मिलेंगे और उससे चारे के साथ जलाऊ लकड़ी मिलेगी। यह गाँव वालों की अपनी सम्पत्ति होगी। इसकी देखरेख उपयोगकर्ताओं की एक समिति कर रही है।

चीताखेड़ा गाँव को एक मॉडल मानकर आप देख सकते हैं कि अगले एक दशक में ऐसे गाँवों की तकदीर जाग सकती है। अभी वानस्पतिक अवरोध के सहारे जिन अनुपयोगी और एकदम बेकार पड़ी जमीनों का उपचार हो रहा है कुछ समय बाद वे खेती के काम आ सकती है। रेगिस्तानी हालात में यह बहुत बड़ा काम है।

देश में अभी चीताखेड़ा की तरह 1750 लाख हेक्टेयर भूमि बेकार पड़ी है जो जल और वायु मृदाक्षरण की चपेट में है तथा खेती लायक नहीं है। अगर किसी तरह हम 1200 हेक्टेयर में भूमि सुधार में सफल रहे तो इसी सदी के अंत तक न केवल प्राप्त अनाज पैदा होगा बल्कि हम 6 करोड़ परिवारों को रोजगार दे सकेंगे।

गाँव वालों ने परियोजना प्रदर्शनों से सबक लेकर खेती के तौर तरीके बदले हैं। यहाँ 143 हेक्टेयर इलाकों में हुए प्रदर्शन में 32.20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर मक्के और 9.25 क्विंटल मूंग की उपज हुई। परम्परागत खेती से यह उपज क्रमशः 11.75 और 3.41 क्विंटल होती है।

राजस्थान में बालू के टीलों की संख्या में बढ़ोत्तरी हो रही है और कई इलाकों में आदिवासी अन्यत्र पलायन कर रहे हैं। सुदूर संवेदन तकनीक से पता चला है कि अरावली पर्वतमाला के क्षेत्र में ऐसी 12 दरारें हैं जहाँ घासपात का नामोनिशान तक नहीं है। जयपुर के आस-पास ऐसे वन कटे हैं कि जबरदस्त पर्यावरण संकट पैदा होने वाला है। राजस्थान में यों भी देश के कुल वन भाग 3.75 है। राज्य की आबादी और क्षेत्रफल के लिहाज से यह अत्यन्त कम है। राजस्थान की अर्थव्यवस्था खेती पर निर्भर है राज्य के अधिकांश भागों में चंबल के अलावा कोई सतत प्रवाहित होने वाली नदी के नहीं होने की वजह से सब कुछ बरसात के भरोसे रहता है। राज्य का दो तिहाई भू-भाग मरुस्थल है वहाँ बुनियादी सुविधाएँ जुटानी भी मुश्किल हैं। ऐसे में इन परियोजनाओं की अपनी अहमियत कई कारणों से है।

भीलवाड़ा के प्रयोग: भीलवाड़ा राजस्थान के सबसे पिछड़े जिलों में है जहाँ 4 प्रतिशत से ज्यादा जमीनें खेती लायक नहीं हैं। जमीन की ऊपरी सतह पर यूने की परत है और ऐसी विषैली जमीन है कि कहीं हरीतिमा का नाम निशान नहीं। लेकिन ऐसी ही जमीनों पर हरियाली अब नजर आनी शुरू हो गयी है। इस काम का श्रेय विश्व बैंक की सहायता से चल रही समन्वित जल ग्रहण विकास परियोजना को जाता है। यहाँ भी गाँव वालों में काफी आत्म-उत्साह है। परियोजना शुरू होने का तीसरी साल है। और काफी उत्साहजनक नतीजे दिखने लगे हैं।

भीलवाड़ा में काटडी, शाहपुरा और सुवांणा पंचायत में 3 साल पहले काम शुरू हुआ। परियोजना 1997 तक चलनी है और इसका काम 42 हजार हेक्टेयर जमीन का उपचार करना है। यह परियोजना उन जगहों को परम्परागत खेती लायक 10 सालों में बना देगी जहाँ गाँव वाले मान बैठे थे कि कुछ नहीं उगेगा।

संवांणा पंचायत के गाँव साकरिया खेड़ा में उस जमीन पर हरियाली नजर आने लगी है जहाँ परियोजना आने के समय हो रहे कामों पर गाँव वाले हँसते थे। मिट्टी में बेहद लवणता की वजह से यहाँ पौधे लगाना मुश्किल था। जुलाई के बाद इलाके में बरसात नहीं होने से पौधों के विकास में जरूर दिक्कत आयी। पौधे लगाने के पूर्व गड्ढों का रासायनिक उपचार पहले 100 एकड़ में किया गया। यकीन नहीं होता पर गाँववालों को इसी जमीन पर घास, ढाक, बबूल, इमली और कई तरह के पेड़-पौधों को देखकर हैरत होती है। यहाँ लगे 32 हजार पौधे जीवित हैं।गाँव के किसान भंवरलाल बातचीत में कहते हैं, पहले लगता था कि सरकार हमारी जमीन हड़प लेना चाह रही थी तो डर लगता था अब तो हमें इसमें काफी राह दिखने लगी है। हमें यहाँ काम भी मिला और जानवरों को घास चारा भी मिल गया। यहाँ की मिट्टी में लवणता है और नीचे इस कदर पत्थर कि गेंती तक टूट जाते हैं। वहाँ प्राकृतिक अवरोध से खेतों में पानी रोकने में सफलता मिली है। कोई 100 एकड़ इलाके में यहाँ 111 चेकडैम बने हैं और लगाये गये पौधों में 90 प्रतिशत जीवित हैं। पड़ोस के ही सरेणी गाँव में भी लोगों की पेरणा इससे बढ़ी है और लोगों का मानना है कि कुछ समय में गाँवों में चारे का इंतजाम होने पर बकरियों और जानवरों की संख्या बढ़ेगी। इस गाँव में एक साल पहले काम शुरू न हो सका। बाद में परियोजना के नतीजे देख गाँव वालों ने खुद परियोजना उनके गाँव में शुरू करने में दबाव डाला। अब तो इस गाँव में एक नर्सरी भी तैयार हो गयी है। यहाँ मक्का, उड़द, मूंग की उपज बढ़ी है और जीरे की खेती हो रही है। गाँव वालों को लगने लगा है कि फालतू जमीन से चारे की समस्या हल हो जाएगी तो उनकी अपनी जमीनों से बोझ घटेगा।

समन्वित विकास की पहली परियोेजना भीलवाड़ा के देवरिया गाँव में शुरू हुई तो काफी मुश्किलें आयीं। परियोजना क्षेत्र की जमीनों पर कोई खाद शोध भी नहीं हुआ था। बाद में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के वैज्ञानिकों ने पड़ताल कर पाया कि यहाँ की जमीन में डेढ़ मीटर तक ऐसी लवणता है कि पौधे पनप ही नहीं सकते। भीलवाड़ा परियोजना के निदेशक पंकज कुमार मिश्र ने कहा कि उपचार में जिप्सम डालने से स्थिति और बिगड़ जाती। ऐसे में प्रायोगिक तौर पर 3 रासायनिक उपचार में सबसे उम्दा नतीजा सल्फ़्यूरिक एसिड (98 प्रतिशत शुद्ध) को गड्ढों में डालने से मिला। 504 हेक्टेयर जमीन में इसी से उपचार किया गया और 85 प्रतिशत पौधे जीवित हैं एक गड्ढे के रासायनिक उपचार में 20 पैसे का खर्च आता है। रसायन डालने में थोड़ी सावधानी बरतनी पड़ती है। लेकिन जहाँ एक पौधे से भेड़ों के चारा काटने में सामान्य आदमी को 15-20 रुपये में एक पेड़ खरीदना पड़ता है। वहीं 20 हजार पौधे अगर अगले 8 साल में चारा काटने लायक तैयार हो गये तो यह निवेश कोई मायने नहीं रखता।

भीलवाड़ा में परियोजना पर सालाना डेढ़ करोड़ रुपये खर्च हो रहे हैं। परियोजना कामों में 65 कर्मचारी लगे हैं, पर असली काम गाँव वाले कर रहे हैं। परियोजना क्षेत्र में गाँवों की आबादी 10 हजार से ज्यादा है और इनमें भी एक हेक्टेयर से कम जोत वाले किसानों का प्रतिशत 50 प्रतिशत से ज्यादा है। तिस पर ऐसी जमीनें हैं जो हजर उगल रही हैं। परियोजना क्षेत्र में पशुओं का विकास भी हो रहा है और इसमें 25 प्रशिक्षित गोपालों के अलावा पशुपालन विभाग काम कर रहा है।

गाँव वालों ने परियोजना प्रदर्शनों से सबक लेकर खेती के तौर तरीके बदले हैं। यहाँ 143 हेक्टेयर इलाकों में हुए प्रदर्शन में 32.20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर मक्के और 9.25 क्विंटल मूंग की उपज हुई। परम्परागत खेती से यह उपज क्रमशः 11.75 और 3.41 क्विंटल होती है।

विश्व बैंक की मदद से राजस्थान में ऐसे 45 वाटरशेड चल रहे हैं इनके नतीजे समग्र रूप से उत्साहजनक हैं। इनके नतीजों को विश्व बैंक के प्रतिनिधियों और कृषि मंत्रालयों के लोगों ने भी सराहा है।

उदयपुर के नतीजे: परियोजना क्षेत्र के अवलोकन के दौरान उदयपुर की लोसिंग राष्ट्रीय वाटरशेड परियोजना के नतीजे और जन भागीदारी की स्थिति बेहद प्रेरक लगी। उदयपुर जिला मुख्यालय से 32 कि.मी. दूर बसे इस गाँव के पड़ोस में ही ऐतिहासिक हल्दीघाटी भी है। औसत सालाना बरसात 624 मि.मी. है। इस परियोजना के शोध सम्बन्धी पहलू पर राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय जाँच पड़ताल कर रहा है। इस वाटरशेड के 1362 हेक्टेयर हिस्से से केवल 85 हेक्टेयर पर सिंचाई का प्रबंध है। परियोजना क्षेत्र की आबादी 3202 है जिसमें 44 बड़े किसान हैं बाकी अन्य। आदिवासी भी यहाँ पर्याप्त हैं। 46 लाख रुपये की इस परियोजना में अब तक 19.63 लाख रुपये खर्च हो चुके हैं।

गाँव प्रधान अंबादान ने बातचीत में कहा कि 3 साल में परियोजना से हमारे गाँव की काफी तरक्की हुई। पानी रोकने के इंतजाम से घास बढ़ने लगी है। वे मानते हैं कि गेहूँ, मक्का तथा धान की पैदावार भी बढ़ी है। घास और पैदावार करीब दोगुना हो रही है।

गाँव के लोगों ने परियोजना क्षेत्र को देखने के लिये 11 लोगों की एक कमेटी बनायी है। परियोजना क्षेत्र से गाँव कमेटी ने घास कटवा कर 80 हजार रुपये की घास बेची। इससे गाँव वालों को सस्ता चारा मिल रहा है। बोरानी चेतना केन्द्र का दफ्तर अब बैठकों और सामाजिक कामों में इस्तेमाल होने लगा है। लोगों ने देखा-देखी अब अपने खेतों पर ऊँची मेड़बंदी शुरू की है। कुँओं में पानी की यहाँ समस्या है क्योंकि कुएँ 70 से 90 फुट तक गहरे हैं। कुएँ की सस्ती खुदाई में भी यहाँ 60-70 हजार रुपये लगते हैं, पानी के लिये कुएँ यहाँ तबाही भी लाते हैं। कारण यह कि खर्चीला कुँआ खोदो तो भी पानी निकलने की गारण्टी नहीं। गाँव के मेघा नामक किसान ने चार कुएँ खोदे पर एक में भी पानी नहीं निकला अलबत्ता वह कर्ज के बोझ से दब गये।

यह स्थिति इस गाँव की है जहाँ के आस-पास के इलाके में 200 साल पहले घने जंगल थे। आज एक पेड़ का नाम नहीं। ऐसे में गाँव वालों ने पेड़ और पानी की कीमत जानी है। लेकिन परियोजना ने गाँवों में किसानों के भीतर एक नयी दृृष्टि दी है। गाँव में इस बात पहले से अकाल की पीड़ा नहीं दिख रही है। पेड़ के काटने पर गाँव में निषेध है। छोटा पेड़ काटता भी कोई पाया गया तो 551 रुपये दण्ड देने के साथ लकड़ी की बारामदगी भी पंचायत करती है। यह गाँव की जन भागीदारी की मिसाल है। गाँव प्रधान अंबादान की काफी इज्जत है और उन्होंने लोगों को परियोजना के फायदों को बताने में काफी मेहनत की। ग्रामीणों की भागीदारी की वजह से ही ये नतीजे मिल रहे हैं।

मूल्यांकन: राजस्थान में अभी परियोजना का मूल्यांकन तो नहीं किया जा सकता लेकिन इसकी रफ्तार काफी अच्छी है। जुलाई, 1990 में कृषि मंत्रालय की ओर से 16 राज्यों के 46 मॉडलों पर मूल्यांकन में पाया गया था कि बारानी खेती में परियोजना से उत्पादन 2 से 5 गुणा बढ़ गया। तो भी सिंचित और असिंचित इलाकों में उत्पादन में असंतुलन है।

पशुपालन: यहाँ चरागाह एक बड़ी समस्या है और चराई एक कानून व्यवस्था से जुड़ा सवाल भी। राजस्थान में चरागाह घट भी रहे हैं। राजस्थान जहाँ चारे की कमी वाला राज्य है वहीं अच्छा पशु आहार भी नहीं उपलब्ध है। अभी जानवरों की संख्या का 3 हिस्सा चारा भी नहीं है। इन पहलुओं को भी शामिल कर परियोजना के लिए पृथक सेल बनाया गया है। पशुपालन के लिये गोपालों का चयन तथा उसका प्रशिक्षण भी राजस्थान में बड़ी सावधानी से किया गया है। गोपाल परियोजना में राजस्थान के 10 जिले शामिल किए गए हैं। राजस्थान की भेड़-बकरियों का विकास भी परियोजना में शामिल किया गया है। परियोजनावधि में इस मद में 222 लाख का प्रावधान है। अब तक 194 गोपाल इकाइयाँ चल रही हैं। परियोजना के तहत 8 पशु स्वास्थ्य केन्द्र भी खोले गये हैं। कृत्रिम गर्भाधान और पशु सुधार कार्यक्रमों के नतीजे उत्साहजनक हैं।

अकाल से निजात: इन परियोजनाओं ने गाँव के लोगों को बार-बार के अकाल से लड़ने का भी संबल दिया है। अकाल इस वर्ष भी है पर पहले की भगदड़ नहीं। राजस्थान में 35 हजार गाँवों में से इस साल 22 हजार 586 गाँव प्रभावित हैं। करीब 8 हजार गाँवों में तो 75 प्रतिशत तक खरीफ की फसल नष्ट हो गयी। जबकि 15 हजार गाँवों में 75 से 100 प्रतिशत तक। ढाई करोड़ आबादी पर अकाल का असर है। अकाल राहत में सरकार जून 1994 तक 250 करोड़ रुपये खर्च कर रही है। 800 की जगह कुल 199 मि.मी. बरसात होने की वजह से कुछ परेशानी चारे को लेकर ज्यादा है। पर पहले सा संकट नहीं है।

राजस्थान में जल ग्रहण किसान और भू-संरक्षण विभाग के निदेशक उमेश कुमार ने बताया कि निदेशालय बनाने से कार्यक्रमों की निगरानी में सफलता मिली है। उन्होंने बताया कि हमारा लक्ष्य वर्षा की हर बूँद के पानी का इस्तेमाल का है। चूँकि राजस्थान में बरसात का औसत भी बहुत कम है ऐसे में सिंचाई का प्रबंध सबसे जरूरी कार्यक्रम है। देशी तकनीक को ही गाँव वाले जल्दी ग्रहण कर सकते हैं। विदेशी तकनीकि यों भी बड़ी महंगी है। उन्होंने कहा कि राजस्थान में भू और जल संरक्षण के काम काफी बड़े पैमाने पर चल रहे हैं और इसका बड़ा सामाजिक आर्थिक असर होगा। खासकर चारे की समस्या का बहुत बड़ा निदान होने जा रहा है। उन्होंने कहा कि परियोजना की शक्ल ऐसी है कि गाँव वालों की भागीदारी स्वतः हो रही है। जहाँ कहीं समस्या आ रही है गाँव के लोग ही निपटाते रहे हैं। परियोजना में लोगों का विश्वास बढ़ रहा है। उन्होंने दावा किया कि परियोजना के दूरगामी असर होंगे। हालात से कुछ ऐसा लगता है।

कृषि मंत्रालय के सचिव जी.सी. पंत राजस्थान के नतीजों को काफी उत्साहजनक बताते हैं। एक बातचीत में उन्होंने कहा कि जहाँ कुछ नहीं है वहाँ अगर कुछ इलाज कर हम उत्पादन बढ़ाने का काम कर सकें तो बहुत अच्छी बात है। अगर जनभागीदारी ऐसी ही बनी रही तो आगे अच्छे नतीजे आएँगे ही। उन्होंने राजस्थान की गोपाल परियोजना को भी सराहा। उन्होंने कहा कि हमने परियोजना में स्थानीय हालात के हिसाब से संशोधन की स्वायत्तता भी दी है लेकिन खर्च की सीमा है। उन्होंने कहा कि परियोजना बनाते समय ही जनभागीदारी और कम खर्च तकनीक विचारी गयी थी। पौधशाला से लेकर बहुत सी चीजों का संचालन स्वयं किसान कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि राजस्थान में जनभागीदारी की स्थिति बहुत अच्छी है। उन्होंने बताया कि केन्द्र परियोजनाओं की सम्यक निगरानी कर रहा है। उन्होंने आशा व्यक्त की कि आठवीं योजना में हम 2500 परियोजनाओं से 30 लाख हेक्टेयर जमीन का उपचार कर लेंगे। उन्होंने कहा कि देश में जो ढाई हजार मॉडल बने हैं उनको हम 8वीं योजना में और बड़ा आकार देंगे। उन्होंने कहा कि बारानी खेती से अगले कुछ सालों में हम अगर मोटे अनाजों की उपज 15 से 20 मिलियन टन बढ़ा लें तो आश्चर्य नहीं होगा। लेकिन सरकार को भी मोटे अनाजों की खरीद का प्रबंध करना चाहिए।

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अरविंद कुमार सिंह, वरिष्ठ संवाददाता ‘अमर उजाला’

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