रासायनिक खेती: पैरों से व्हीलचेयर तक का सफर

Submitted by Hindi on Fri, 04/22/2011 - 13:22
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सर्वोदय प्रेस सर्विस

‘लोक लहर फाउन्डेशन’ ने गांवों के बच्चों को चण्डीगढ़ प्रेस क्लब के सामने प्रस्तुत किया था। यह बच्चे रासायनिक खेती के प्रभाव से अनेक बीमारियों से ग्रसित थे। इन बच्चों की मांग थी कि उन्हें खिलौने नहीं व्हीलचेयर चाहिए, ताकि वे चल सकें।

जापान में आये भूकम्प, सुनामी और परमाणु विकिरण के खतरे ने पूरी दुनिया को रक्षात्मक मुद्रा में ला खड़ा कर दिया है। जापान ने विकिरण प्रभावित क्षेत्र में भोजन सामग्री और पीने के पानी के सेवन पर तत्काल प्रतिबंध लगा दिया था। अब भारत सहित विश्व के अनेक देशों ने जापान से आयातित खाद्य सामग्री पर प्रतिबंध लगा दिया है। विश्व सहित भारत में भी इस विषय पर बहस शुरु हो गयी है कि परमाणु योजनाओं की स्वतंत्र और विश्वसनीय जांच हो। रूस में गहरे समुद्र में किये गये प्रयोगों से सिद्ध हुआ है कि रेडियो-एक्टिव पदार्थ क्लेंकटन, शैवाल और बहुत से समुद्री प्राणियों से पुनः मनुष्य के पास पहुंच जाते हैं। चूंकि एक जीव दूसरे जीव का भोजन है, अतः हवा, पानी और वनस्पति सभी प्राणियों को प्रभावित करते हैं। इस विकिरण का प्रभाव अनन्तकाल तक चलता रहता है।

ई.एफ. शुमाखर के अनुसार ‘‘आधुनिक मनुष्य अपने को प्रकृति का अंग नहीं अनुभव करता।’’ प्रकृति से संघर्ष में वह भूल जाता है कि इस संघर्ष में वह जीत भी जाये तो भी नुकसान उसी का होगा।’’ आधुनिक कृषि प्रकृति पर आधिपत्य स्थापित करने का सबसे बड़ा क्षेत्र बन गई है। हमें समय रहते रासायनिक कृषि उत्पादन से जुड़े खतरों की भी चिंता करना होगी। बड़े पैमाने पर उत्पादन और मार्केटिंग की आधुनिक सभ्यता पर होने वाले विध्वंस और संहार ही मनुष्य को चिंतित करते हैं। कृषि क्षेत्र देश के कोने-कोने तक फैला हुआ है। अतः दूर के क्षेत्रों में हुई दुर्घटना के प्रति लोगों की संवेदना घनीभूत नहीं हो पाती है। हम किस कम्पनी का जूता और कपड़ा पहनते हैं यह तो हम जानते हैं पर किस किसान का पैदा किया गया अनाज खाते हैं यह समझ नहीं पाते हैं।

राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार वर्ष 1997 से 2008 के बीच 1,99,132 किसानों ने आत्महत्या की है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन के अनुसार देश के 40 प्रतिशत किसान खेती छोड़कर शहरों की शरण में जाना चाहते हैं। सरकारें किसानों की अपेक्षाओं का ध्यान नहीं रखती हैं, क्योंकि सरकारों को कृषि के सवालों पर जनता के विरोध का भय नहीं रहता है।

भारत दुनिया में कृषि रसायनों का चौथा सबसे बड़ा उत्पादक देश है। यहां रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों से जमीन की गुणवत्ता और उर्वरता घट रही है। इनके दुष्प्रभावों से मनुष्य, पशु-पक्षी, पानी और पर्यावरणीय जीवन असुरक्षित हो रहा है । इन कीटनाशकों से खेती के लिए फायदेमंद जीव-जंतुओं के नष्ट हो जाने और मानव स्वास्थ्य को नुकसान की घटनाएं आम हो गयी हैं।

यूनियन कार्बाइड भोपाल में 2-3 दिसम्बर 1984 की मध्यरात्रि को घटी गैस त्रासदी भी एक ऐसी घटना भी जिसका संबंध कृषि उत्पादन से था। इस त्रासदी से हमने कोई सबक नहीं सीखा, क्योंकि सारी बहस मुआवजा राशि और वारेन एंडरसन की गिरफ्तारी पर केन्द्रित थी।

यूरोप में प्रथम विश्व युद्ध के दौरान वायुमण्डल स्थित नाइट्रोजन से कुछ विस्फोटक पदार्थ तैयार करने में लगी फैक्ट्रियों को युद्ध बंद हो जाने के बाद किसानों के लिए नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटेशियम की खाद बनाने में लगा दिया गया था। इसके पीछे यह कल्पना काम कर रही थी कि भूमि की संरचना तत्वों में आयी कमी को रासायनिक पदार्थों से पूरा किया जा सकता है। प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक सर अलबर्ट हॉवर्ट के अनुसार आने वाले वर्षों में रासायनिक खाद औद्योगिक युग की सबसे बड़ी विफलताओं में गिनी जाएगी।

कृषि मंत्री शरद पवार ने राज्यसभा में यह स्वीकार किया है कि 67 कीटनाशक जो पूरी दुनिया में प्रतिबंधित और नियंत्रित हैं, भारत में मुक्त रूप से उपयोग किये जा रहे हैं। एक प्रश्न के उत्तर में कृषि मंत्री ने बताया कि एन्डोसल्फान सहित 13 कीटनाशकों को नियंत्रित आयात की अनुमति दी गयी है।

केरल में एन्डोसल्फान के इस्तेमाल से किसानों का स्वास्थ्य खराब हो गया था, इसलिए केरल सरकार ने इसके उपयोग और बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया है। केरल में जो मजदूर कीटनाशक छिड़काव का काम करते हैं उन्हें छिड़काव के कारण होने वाली बीमारी पर प्रतिदिन की मजदूरी का लगभग एक-चैथाई व्यय करना पड़ता है।

अनाज का कटोरा कहे जाने वाले राज्यों में रासायनिक खेती से जो तस्वीर बन रही है वह बड़ी भयावह है। दक्षिण पंजाब में अबोहर से बीकानेर चलने वाली ट्रेन नंबर 339 को लोगों ने ‘कैंसर-एक्सप्रेस’ नाम दे दिया है। इस टेशन से प्रतिदिन लगभग 100 कैंसर मरीज इलाज के लिए पंजाब से बीकानेर जाते हैं। फिरोजपुर में काम करने वाले एक गैर सरकारी संगठन ‘लोक लहर फाउन्डेशन’ ने गांवों के बच्चों को चण्डीगढ़ प्रेस क्लब के सामने प्रस्तुत किया था। यह बच्चे रासायनिक खेती के प्रभाव से अनेक बीमारियों से ग्रसित थे। इन बच्चों की मांग थी कि उन्हें खिलौने नहीं व्हीलचेयर चाहिए, ताकि वे चल सकें। पाकिस्तान की सीमा से लगे फिरोजपुर जिले के रासायनिक खेती जनित कई बीमारियों से पीडि़त ग्रामीणों की मांग है कि यदि हिन्दुस्तान में हमारी चिंता करने वाला कोई नहीं है तो हमें पाकिस्तान को सौंप दो।

पंजाब के स्वास्थ्य मंत्री ने विधानसभा में स्वीकार किया है कि ग्रामीण क्षेत्रों में 2001 से 2009 के मध्य 23,427 लोग कैंसर से पीडि़त पाये गये थे, जिनमें से 16,730 लोगों की मृत्यु हो चुकी है। पंजाब के मुख्यमंत्री के रिलीफ फण्ड के साथ स्कूल हेल्थ स्कीम से 69 लाख रुपये पीडि़तों में वितरित किये गये थे, जिससे स्पष्ट होता है कि कैंसर पीडि़तों में बड़ी संख्या में स्कूली बच्चे भी थे।

अन्तर्राष्ट्रीय फूड वर्कर यूनियन ने भी भारत में एन्डोसल्फान पर प्रतिबंध लगाने की मांग की है। उसका कहना है कि विश्व भर में अकेले भारत में सर्वाधिक कृषि मजदूर, कृषि एवं बागान में कार्यरत हैं। रासायनिक खेती का सबसे अधिक नकारात्मक और बुरा प्रभाव कृषि मजदूरों पर ही पड़ता है। प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक एम.एस. स्वामीनाथन के अनुसार सरकार रसायन उर्वरक उद्योगों को कई लाख करोड़ की आर्थिक सहायता देती है। इस कारण कृषि में आवश्यकता से अधिक रासायनिक उर्वरकों का उपयोग होता है।

अन्तर्राष्ट्रीय धान अनुसंधान संस्थान ने हाल ही में यह स्वीकार किया है कि धान पर कीटनाशकों का इस्तेमाल करना धन और समय की बर्बादी है। इस बात को फिलीपींस, वियतनाम और बांग्लादेश के किसानों ने बिना कीटनाशकों के पहले से अधिक उत्पादन प्राप्त कर सिद्ध किया है। आन्धप्रदेश के 18 जिलों में भी किसान बिना कीटनाशक के फसल उगा रहे हैं। इससे पैदावर में कोई कमी नहीं आयी है।

मध्यप्रदेश के आदिवासी जिले झाबुआ में तो ग्रामीण रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का उपयोग छः से आठ गुना तक अधिक मात्रा में कर रहे हैं। विश्व प्रसिद्ध अर्थशास्त्री लार्ड कीन्ज़ का विचार है कि ‘‘आने वाले समय में कम से कम सौ साल तक हमें अपने आपको और प्रत्येक व्यक्ति को इस भुलावे में रखना होगा कि जो उचित है, वह गलत है और जो गलत है वह उचित है, क्योंकि जो गलत है, वह उपयोगी है-जो उचित है वह नहीं।’’

डां. कश्मीर उप्पल शासकीय महाविद्यालय, इटारसी में वाणिज्य के प्राध्यापक रहे हैं।

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