रबी फसलों में उचित जल प्रबंधन

Submitted by Hindi on Tue, 02/02/2016 - 14:54
Source
जल चेतना तकनीकी पत्रिका, जनवरी, 2014

जल ही जीवन है, यह अटल सत्य है, क्योंकि जल मानव, पेड़-पौधों, जीव-जन्तुओं के जीवन-यापन का एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण एवं आवश्यक अंग है। जल कृषि बागवानी के उत्पादन में वृद्धि का एक महत्त्वपूर्ण आदान है, जन जीवों की कोशिकाओं में जल 70-90 प्रतिशत तक पाया जाता है। जल पादपों के अन्दर होने वाली समस्त चयापचय क्रियाओं के सुचारु रूप से संचालन में अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। यह प्रकाश-संश्लेषण प्रक्रिया, जोकि समस्त ब्रह्माण्ड की अकेली प्रतिक्रिया है, हेतु माध्यम का कार्य करता है। इसके अतिरिक्त जल औद्योगिक उत्पादन, ऊर्जा स्रोत एवं यातायात में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

परम्परागत भारतीय सिंचाई पद्धति ढेंकली सभी स्रोतों को मिलाकर विश्व में कुल 1384 मिलियन कि.मी3 जल उपलब्ध है। उक्त जल का लगभग 97.16 प्रतिशत भाग समुद्र के लवणीय जल के रूप में पाया जाता है, जोकि सिंचाई के लिये अनुपयुक्त है। केवल 2.84 प्रतिशत जल सिंचाई के लिये उपयुक्त है। विश्व के शुद्ध स्रोतों का भी मात्र 0.52 प्रतिशत भाग सतही स्रोतों के रूप में पाया जाता है और सिंचाई के रूप में फसलों के उत्पादन हेतु उपयोग किया जा सकता है। भूमिगत जल स्रोत, जोकि 8.062 मिलियन कि.मी3 है, का भी मात्र 9.86 प्रतिशत भाग ही उपयोग किया जा सकता है। इन आँकड़ों से यह निष्कर्ष निकलता है कि मानव एवं उसके सहायक जीवों का जीवन-यापन इस सीमित जल भण्डार पर ही निर्भर करता है।

फसलोत्पादन हेतु भूमि में जल के समुचित ढँग से उपयोग करने की कला को उचित जल प्रबंधन की संज्ञा दी जाती है। जल प्रबंधन के अंतर्गत सिंचाई एवं जलनिकास को सम्मिलित किया जाता है।

पौधों के जीवन काल में जल का महत्त्वपूर्ण स्थान है। संरचना की दृष्टि से 84-99 प्रतिशत तक पौधों में जल पाया जाता है। पौधों की विभिन्न शारीरिक क्रियाओं को जल प्रभावित करता है। फसलों की वृद्धि एवं विकास हेतु भूमि में नमी का होना नितान्त आवश्यक है। यदि वर्षा हो जाती है, तो भूमि को नमी प्राप्त हो जाती है, अन्यथा वर्षा के अभाव में फसल की वृद्धि एवं विकास दोनों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। फसल की अधिकतम एवं उच्च कोटि की उपज प्राप्त करने हेतु उचित मात्रा एवं उचित अंतराल पर सिंचाई करनी पड़ती है, जो सिंचाई की सुनिश्चित व्यवस्था से ही सम्भव है, वर्षा से नहीं। अतः पौधों की वृद्धि एवं विकास के लिये सिंचाई की आवश्यकता होती है।

सिंचाई का महत्त्व


1. पौधों का 80-90 प्रतिशत भाग पानी का बना होता है और रासायनिक रूप में पानी, पौधों का एक अंग होता है।
2. कोशिका द्रव का मुख्य भाग (80-90 प्रतिशत) पानी है। अतः कोशिका विभाजन बिना जल के सम्भव नहीं है। कहने का अभिप्राय यह है कि पौधों की पूर्ण वृद्धि जल पर ही निर्भर है।
3. बीज के अन्दर भ्रूण (Embryo) का अंकुरण बिना जल के नहीं हो सकता है।
4. पौधों में जल वाहक (Carrier) का कार्य भी करता है। जड़ें पोषक तत्वों को घोल के रूप में चूसती हैं व जल के माध्यम से चूसे गये पोषक तत्व ही पौधों के अन्य आवश्यक भागों में पहुँचते हैं।
5. प्रकाश-संश्लेषण की प्रक्रिया में जल एवं कार्बन डाइआॅक्साइड कच्चे पदार्थ के रूप में प्रयोग होते हैं, जो प्रकाश की उपस्थिति में पर्णहरित द्वारा कार्बोहाइड्रेट में परिवर्तित हो जाते हैं अर्थात पौधों के लिये कार्बोहाइड्रेट आवश्यक पदार्थ भी जल की उपस्थिति में ही बनते हैं।
6. पत्तियों में निर्मित होने वाले कार्बोहाइड्रेट का पत्तियों से दूसरे भागों में स्थानान्तरण भी जल द्वारा ही होता है।
7. जल पौधों की कोशिकाओं को फुलाकर रखता है, जिसके फलस्वरूप कोशिकाएँ आकार में वृद्धि करके फसलों के पकने के समय में वृद्धि कर सकती हैं जिसके फलस्वरूप बाजार की मांग के अनुसार फसलें काटी जा सकती हैं।
8. खेत में पानी लगाने से फसलों के हानिकारक कीट जैसे दीमक आदि को नष्ट किया जा सकता है।
9. जल पौधों की जलोत्सर्जन (Transpiration) क्रिया के लिये भी आवश्यक है। इस प्रक्रिया में पौधे अपने आप को वातावरण के अधिक तापमान (लू), कम तापमान (पाला) आदि से सुगमता से बचा सकते हैं।
10. निरन्तर भूमि की सिंचाई करने से मृदा कणों के आकार में कमी होती है, जो फसलों की बढ़वार के लिये उपयुक्त है।
11. भूमि में फसलों की वृद्धि हेतु अनेक लाभदायक सूक्ष्म जीवाणु जैसे राइजोबियम, जीवांश पदार्थ को सड़ाने वाले सूक्ष्म जीवाणु जैसे नाइट्रोसोमोनास, नाइट्रोसो को कम करके अनेक लाभदायक फफूँदियाँ, एलगी, एंजाइम भी मृदा नमी की उपयुक्त अवस्था पर ही पनपते हैं।
12. लवणीय या ऊसर मृदा के सुधार के लिये विषैले प्रभाव के तत्वों का उदीलन (Leaching) सिंचाई द्वारा ही सम्भव है या सिंचाई जल में घोलकर इन विषैले लवणों को खेत से बाहर निकालते हैं।

सिंचाई कब करें ?


रबी फसलों में सिंचाई योजना बनाते समय मिट्टी की किस्म, फसल, फसल की किस्म, वृद्धि काल, मिट्टी में जीवांश पदार्थ की मात्रा और खेत में विगत वर्ष बोई गयी फसल आदि का विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए। जब भूमि में प्राप्य जल की इतनी कमी हो जाए कि पौधों की वृद्धि एवं विकास दोनों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की सम्भावना हो, उस अवस्था में आवश्यकतानुसार सिंचाई कर देनी चाहिए। अधिकतर फसलों की सिंचाई मृदा में 50 प्रतिशत उपलब्ध जल रहने पर करनी चाहिए। सिंचाई के सही समय का पता लगाने हेतु विभिन्न यंत्रों का उपयोग भी किया जाता है जैसे रेपिड मोयस्चर मीटर, टेनशियो मीटर आदि परन्तु कृषक इनके उपयोग से बिल्कुल अनविज्ञ है। इनका उपयोग अनुसंधान संस्थानों, विश्वविद्यालयों द्वारा किया जाता है।

सिंचाई कैसे करें?


रबी फसलों की सिंचाई के लिये जल की क्षमता में वृद्धि हेतु यह नितान्त आवश्यक है कि सिंचाई हेतु उपयुक्त सिंचाई विधि का चयन किया जाए, जो कि भूमि की सतह, भूमि की किस्म, पानी की उपलब्धता, सिंचाई जल में लवणों की मात्रा और सिंचाई जल की वितरण पद्धति पर निर्भर करता है। फसलों की सिंचाई हेतु उपयुक्त सिंचाई विधि का चयन नितान्त आवश्यक है। अतः स्रोत से पानी सीधे खेत में नहीं छोड़ना चाहिए, इसके लिये खेत को लंबाई ढलान की ओर 4-6 मीटर की नालियों का निर्माण कर लेना चाहिए और मेंड के सहारे मुख्य नाली के क्रम से सिंचाई जल छोड़ना चाहिए और भूमि ऊँची-नीची हो तो बौछारी सिंचाई करनी चाहिए। इससे कम जल से अधिक क्षेत्र की सिंचाई की जा सकती है।

सिंचाई का समय


जब पौधों की वृद्धि एवं विकास में उपलब्ध नमी के कारण महत्त्वपूर्ण कमी आनी शुरू हो जाए, तब ही सिंचाई कर देनी चाहिए। खेत में सिंचाई करने का अनुमान निम्नलिखित तथ्यों के आधार पर भी लगाया जा सकता है:

krishi vikas ki gatha byan karati krantiyanपौधों की बाहरी दशा के आधार पर:
विभिन्न पौधों में सिंचाई की आवश्यकता विभिन्न लक्षणों जैसे पत्तियों का मुरझाना, पत्तियों का रंग बदलना अथवा कम या अधिक गहरा हरे रंग आदि को देखकर लगाया जा सकता है।

मिट्टी के गुण:
मिट्टी के भौतिक गुणों को देखकर सिंचाई के समय का पता लगाया जा सकता है। चिकनी मिट्टी में नमी की कमी के कारण दरारें पड़नी शुरू हो जाती हैं।

मृदा नमी माप कर:
फसल की सिंचाई का सही पता लगाने हेतु रेपिड मोयस्चर और टेनशियोमीटर का उपयोग किया जा सकता है।

पौधों के जीवन में क्रान्तिकारी अवस्थाओं के आधार पर:
समस्त फसलों के पौधों के जीवन काल में कुछ ऐसी क्रान्तिकारी अवस्थाएँ होती हैं जिनमें पौधे भूमि से पानी अधिक मात्रा में चूसते हैं। यदि इन अवस्थाओं में भूमि में पानी की कमी हो जाती है तो पौधों के विकास, बढ़वार एवं उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इन अवस्थाओं को सिंचाई की दृष्टि से क्रान्तिक अवस्थायें (Critical Stages) कहते हैं।

विभिन्न फसलों की क्रान्तिक अवस्थाओं के आधार पर सिंचाई कब और कितनी करें, इसका उल्लेख नीचे किया गया है:

खाद्यान्न फसलें


1. गेहूँ:
सामान्यतः बौने गेहूँ की अधिकतम उपज प्राप्त करने हेतु हल्की भूमि में जल की उपलब्धता के आधार पर सिंचाइयाँ निम्न अवस्थाओं में करनी चाहिए, अन्यथा इन अवस्थाओं में जल की कमी का उत्पादन एवं उसकी गुणवत्ता पर प्रभाव पड़ेगा। सिंचाई सदैव हल्की (6 सें.मी. गहरी) करनी चाहिए।

पहली सिंचाई:
ताज मूल वृद्धि अवस्था (Crown root initiation stage) में करनी चाहिए, यह अवस्था आमतौर पर बीज बोने के 20-25 दिन बाद आ जाती है।

दूसरी सिंचाई:
कल्ले फूटने की अवस्था (Tillering stage) में करनी चाहिए। यह अवस्था आमतौर पर बीज बोने के 40-50 दिन बाद आ जाती है।

तीसरी सिंचाई:
दीर्घ सन्धि अथवा गाँठ निर्माण की अवस्था (Knot formation) में करनी चाहिए। यह अवस्था बीज बोने के 60-65 दिन बाद आ जाती है।चौथी सिंचाई: पुष्पावस्था (Flowering stage) में सिंचाई करनी चाहिए। यह अवस्था बीज बोने के 80-85 दिन बाद आती हैं।

पाँचवी सिंचाई: दुग्धावस्था (Milk Stage) में सिंचाई करनी चाहिए। यह अवस्था बीज बोने के 100-105 दिन बाद आ जाती है।

छठी सिंचाई: दाने भरने की अवस्था में सिंचाई करनी चाहिए। यह अवस्था बीज बोने के 115-120 दिन बाद आ जाती है।

दोमट या भारी दोमट मृदा की निम्न चार अवस्थाओं में सिंचाई करनी चाहिए। इस स्थिति में कुछ गहरी (8 सें.मी. गहरी) सिंचाई करनी चाहिए।

पहली सिंचाई: बीज बोने के 20-25 दिन बाद करें।
दूसरी सिंचाई: पहली सिंचाई के 30 दिन बाद करें।
तीसरी सिंचाई: दूसरी सिंचाई के 30 दिन बाद करें।
चौथी सिंचाई: तीसरी सिंचाई के 21-25 दिन बाद करें।

सीमित जल उपलब्धि की दशा में यदि आपके पास 3 सिंचाईयों के लिये जल उपलब्ध है, तो उस स्थिति में निम्न प्रकार से सिंचाई करें:

पहली सिंचाई: बीज बोने के 21 दिन बाद।
दूसरी सिंचाई: बीज बोने के 60-65 दिन बाद।
तीसरी सिंचाई: बीज बोने के 105-110 दिन बाद।

यदि आपके पास 2 सिंचाईयों के लिये जल उपलब्ध है, तो उस स्थिति में निम्न प्रकार से सिंचाई करें:

पहली सिंचाई: बीज बोने के 21 दिन बाद।
दूसरी सिंचाई: बीज बोने के 80-85 दिन बाद।

2. जौ


पहली सिंचाई: कल्ले फूटने के समय अर्थात बीज बोने के 30-35 दिन बाद।
दूसरी सिंचाई: दुग्धावस्था में सिंचाई करें।

3. सब्जी


आलू
पहली सिंचाई बीज बोने के 3-5 दिन बाद करें। बाद की सिंचाईयाँ भूमि की किस्म के अनुसार 8-15 दिन के अन्तराल पर करें। सिंचाई सदैव हल्की करें, ताकि डौलियाँ पानी में न डूबें।

जलवायु, भूमि की किस्म और आलू की किस्मों के अनुसार आलू की फसल अवधि में 5-10 सिंचाईयों की आवश्यकता होती है।

4. दलहनी फसलें


चना
पहली सिंचाई: बीज बोने के 45-60 दिन बाद, फूल आने से पूर्व करें।
दूसरी सिंचाई: फलियों में दाने बनने के समय करें। यदि जाड़ों में वर्षा हो जाए, तो दूसरी सिंचाई न करें।

नोट: फूल आने पर सिंचाई न करें अन्यथा लाभ के स्थान पर हानि हो जायेगी।

मटर
पहली सिंचाई: फूल आने के समय पर सिंचाई करें।
दूसरी सिंचाई: दाने भरते समय एक सिंचाई करनी चाहिए। ऐसा करने से अधिक उपज मिलती है।

मसूर
पहली सिंचाई: फूल आने के समय सिंचाई करनी चाहिए।
दूसरी सिंचाई: फलियों के निर्माण के समय सिंचाई करनी चाहिए। यदि इस अवस्था में शरद कालीन वर्षा हो जाए तो सिंचाई करने की आवश्यकता नहीं है।

5. तिलहन


राई/सरसों: इन फसलों को फसल अवधि में 25-30 सें.मी. पानी की आवश्यकता होती है और केवल 2-3 सिंचाई पर्याप्त होती है।

पहली सिंचाई: फूल आने की अवस्था में बोने के 40-45 दिन बाद सिंचाई करें।
दूसरी सिंचाई: फली निर्माण की अवस्था में बोने के 80-85 दिन बाद सिंचाई करें।
तीसरी सिंचाई: फलियों में दाने भरने की अवस्था में बोने के 105-110 दिन बाद सिंचाई करें।

ध्यान देने योग्य बातें


1. जलवायु, भूमि एवं फसल मांग के अनुसार ही सिंचाई करनी चाहिए।
2. कम जल मांग वाली उन्नत किस्मों का चयन करना चाहिए।
3. चयनित फसलों में उनकी क्रान्तिक अवस्था में ही सिंचाई करनी चाहिए।
4. फसलों को खरपतवारों से मुक्त रखें।
5. सिंचाई हेतु उपलब्ध जल को अधिक से अधिक क्षेत्र की सिंचाई हेतु उपयोग करें।
6. सिंचाई हेतु जल की उपलब्धता के अनुरूप फसलों का चयन करें, ताकि जल का सदुपयोग करके अधिक उत्पादन प्राप्त हो सके।
7. यदि जल कम मात्रा में उपलब्ध हो तो उसके सदुपयोग हेतु बौछारी या ड्रिप सिंचाई का उपयोग करें।
8. सिंचाई द्वारा दिए गए जल को फसलों के जड़ क्षेत्र में अधिकतम समय तक रखने हेतु नमी संरक्षण के उपाय करें।
9. नहरों से सिंचाई करते समय कुलाबों से उतना ही पानी छोड़ें जितना नाली में सुगमता से बह सके।
10. जल संसाधन से खेत तक जल ले जाने हेतु नालियों की निगरानी रखें।

संपर्क - श्री गंगाशरण सैनी, कृषि-बागवानी सलाहकार, 5.ई-9.बी, बंगला प्लाट, फरीदाबाद-121001 (हरियाणा)

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