रियो+20 : संकीर्ण स्वार्थों के जलसाघर

Submitted by Hindi on Tue, 06/19/2012 - 11:45
Source
दैनिक भास्कर ईपेपर, 19 जून 2012
भारत जैसे देश में रियो+20 का मतलब कितने प्रतिशत लोग समझते हैं, यह तो नहीं मालूम; लेकिन इतना ज़रूर है कि 1992 में आयोजित पृथ्वी शिखर सम्मेलन के 20 साल बाद हो रहे रियो+20 सम्मेलन से जो कुछ निकलेगा, उसका प्रभाव भारत ही नहीं पूरी दुनिया के लोगों और तमाम प्राणिमात्र पर पड़ेगा। आशा और आशंका के बीच ब्राजील के रियो दी-जानीरो शहर में संयुक्तराष्ट्र का रियो+20 सम्मेलन 13 से 22 जून तक होने जा रहा है, हालांकि राष्ट्राध्यक्षों और प्रधानमंत्रियों की मुख्य बैठक 20 से 22 जून तक होगी।

दुनियाभर के राजनेताओं ने वैश्विक कल्पनाशीलता और दूरदृष्टि के सख्त अभाव के गुण का परिचय दिया है। वे सभी अपने निजी राजनीतिक चश्मों से देखने को लगभग अभिशप्त हैं। कहना ही होगा कि रियो+20 मीटिंग जैसे भव्य आयोजन इतनी गंभीर समस्याओं के समाधान के लिए उपयुक्त मंच नहीं हो सकते, क्योंकि वहां कई लोग कई तरह की बातें कहेंगे और ग्रीन इकोनॉमी के स्वरूप पर परस्पर विरोधी विचारों का टकराव होगा। आज हमें विवादों की नहीं, समाधान और सर्वसम्मति की जरूरत है।

दुनिया के 130 से अधिक नेताओं और 50 हजार समर्थकों की भीड़ ब्राजील की 'कार्निवल कैपिटल' रियो द जेनेरो की ओर उमड़ रही है। आयोजन है कथित रूप से दुनिया का सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन रियो+20 मीटिंग, जो 20 जून से शुरू होकर 22 जून तक चलेगा। संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की मून ने इस आयोजन को 'एक अद्वितीय अवसर' बताया है। शायद वे दुनिया की अर्थव्यवस्था के बारे में सोच रहे होंगे, लेकिन लगता नहीं कि वे हमारी पृथ्वी की दुखद वास्तविकताओं से भी वाकिफ हैं। वर्ष 1992 में हुई अर्थ समिट की दो दहाई पूरी होने पर इसे रियो+20 नाम दिया गया है। यदि इसे ग्रीन समिट कहकर पुकारा जाए तो शायद यह ज्यादा लोकप्रिय साबित हो सकती है, क्योंकि वास्तव में इस सम्मेलन की ओर दुनियाभर के लोगों का ध्यान आकृष्ट करना जरूरी है। रियो ग्रीन समिट मनुष्यता के समक्ष मुंह बाए खड़े कुछ सबसे चुनौतीपूर्ण मसलों पर केंद्रित है, जिनमें पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन, खाद्यान्न, पेयजल और ऊर्जा प्रदाय शामिल हैं।

आज हमारी पृथ्वी संकट की स्थिति से गुजर रही है। 90 करोड़ लोगों को भरपेट भोजन नहीं मिल पा रहा है, लगभग एक अरब लोग स्वच्छ पेयजल से वंचित हैं, 2.6 अरब लोग अस्वच्छ परिवेश में जी रहे हैं और 1.6 अरब लोग बिजली जैसी बुनियादी सुविधा को भी मोहताज हैं। दुनिया के 500 सबसे अमीर लोगों की आय दुनिया के सबसे गरीब 41 करोड़ लोगों के बराबर है। आर्थिक विषमता के ये आंकड़े भयावह हैं। लोभी सरकारें और उनके सहयोगी सशक्त कॉर्पोरेट्स दुनिया के बेशकीमती संसाधनों को नोंच-खसोट रहे हैं। द वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड 2012 लिविंग प्लैनेट रिपोर्ट कहती है कि दुनिया के संसाधन 50 गुना अधिक तेजी से समाप्त हो रहे हैं। जलसुरक्षा पर केंद्रित एक अमेरिकी आकलन में बताया गया है कि वर्ष 2030 तक मौजूदा जलप्रदाय व्यवस्था की तुलना में पानी की मांग 40 प्रतिशत अधिक होगी।

ऑर्गेनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक कोऑपरेशन एंड डेवलपमेंट, जो कि अमीर औद्योगिक मुल्कों का क्लब है, ने पिछले महीने कहा कि मौजूदा हालात के मद्देनजर वर्ष 2050 तक चार अरब लोग पानी की तंगी से ग्रस्त इलाकों में रह रहे होंगे, दुनिया आज की तुलना में 80 फीसदी अधिक ऊर्जा का उपयोग कर रही होगी, जिसका अधिकांश हिस्सा जैविक ईंधनों पर आधारित होगा, ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन 50 फीसदी तक बढ़ जाएगा और सदी के अंत तक औसत वैश्विक तापमान में छह डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी हो जाएगी। वह एक बेहद ऊष्ण ग्रीनहाउस दुनिया होगी। 'नेचर' नामक जर्नल में तीन महाद्वीपों के वैज्ञानिकों के एक समूह ने पुष्टि की कि दुनिया वास्तव में एक खतरनाक दौर से गुजर रही है। जैव विविधता पर घातक प्रभाव पड़ने वाले हैं और कृषि, वन, पेयजल और मत्स्य जैसे अनिवार्य प्राकृतिक घटक डेंजर जोन में हैं।

निश्चित ही इस तरह के पूर्वकथन 'शायद,' 'संभवत:', 'कदाचित' जैसे शब्दों से भरे होते हैं और चूंकि संकट का कोई निश्चित कैलेंडर नहीं है, इसलिए न्यस्त स्वार्थ बड़ी आसानी से इनकी अनदेखी कर दुनिया के संसाधनों के दोहन में मुब्तिला रहते हैं। क्या ग्रीन ग्रोथ इसका जवाब हो सकता है? पर्यावरण सम्मत आर्थिक नीतियों के हिमायतियों की बातें अब केवल सरसरी बातें ही नहीं रह गई हैं। यूनाइटेड नेशंस एनवायरनमेंट प्रोग्राम और ओईसीडी दोनों ने ही ऐसी रिपोर्टें प्रकाशित की हैं, जिनमें अनुमान लगाए गए हैं कि ग्रीन निवेश का रोजगार की स्थिति के साथ ही संसाधनों और पर्यावरण पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। लेकिन फिलवक्त तो ये हाल हैं कि तमाम चेतावनियों और अंदेशों के बावजूद जलसाघर जारी हैं। हाइनरिख ब्योल फाउंडेशन की अध्यक्ष बारबरा अनम्यूसिंग ने इसी माह लिखा : 'न तो सरकार और न ही उद्योग इस सीधे से तथ्य को स्वीकार कर पाते हैं कि संसाधन सीमित मात्रा में हैं और जलवायु परिवर्तन तेजी से हो रहा है।'

रियो+20 का आयोजन एक विचित्र समय में हो रहा है। यूरोजोन का प्रयोग नाकाम साबित हुआ है कि उसके सदस्य देश आपस में ही लड़-भिड़ रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा का पूरा ध्यान अपने ही सियासी भविष्य पर टिका है। चीन सहित अन्य महत्वपूर्ण देशों में राजनीतिक नेतृत्व परिवर्तन होने को है। सीरिया के नरसंहार से लेकर वित्तीय नैराश्य तक हर जगह की अपनी-अपनी बुरी खबरें हैं। दुनियाभर के राजनेताओं ने वैश्विक कल्पनाशीलता और दूरदृष्टि के सख्त अभाव के गुण का परिचय दिया है। वे सभी अपने निजी राजनीतिक चश्मों से देखने को लगभग अभिशप्त हैं। कहना ही होगा कि रियो+20 मीटिंग जैसे भव्य आयोजन इतनी गंभीर समस्याओं के समाधान के लिए उपयुक्त मंच नहीं हो सकते, क्योंकि वहां कई लोग कई तरह की बातें कहेंगे और ग्रीन इकोनॉमी के स्वरूप पर परस्पर विरोधी विचारों का टकराव होगा। आज हमें विवादों की नहीं, समाधान और सर्वसम्मति की जरूरत है।

समय कम है। 1992 की ऐतिहासिक रियो समिट के पांच साल बाद क्योटो प्रोटोकॉल बना था, जिसे प्रारंभ में ही मुश्किल स्थितियों से जूझना पड़ा था। उसके बाद कोपेनहेगन और डरबन के शिखर सम्मेलनों से भी बात नहीं बनी। तो क्या हमारी धरती के बहुमूल्य संसाधनों का इसी तरह दोहन होता रहेगा? यह एक ऐसा समय है, जब आशावादी होना कठिन है। उम्मीद किसी ऐसे राजनेता से ही की जा सकती है, जो अपने देश में बाकायदा ग्रीन ग्रोथ का एक कार्यक्रम प्रारंभ करवाए, अपने क्षेत्र में कार्बन उत्सर्जन को न्यूनतम करने का प्रयास करे और एक वैश्विक दृष्टिकोण के साथ पर्यावरण सम्मत तकनीकों का व्यापक अनुप्रयोग सुनिश्चित करे। शुरुआत बांग्लादेश जैसे किसी गरीब देश से लेकर जापान जैसे किसी विकसित देश तक से की जा सकती है। या हांगकांग जैसा आधुनिक महानगर ग्रीन रिवोल्यूशन की प्रयोगस्थली हो सकता है। शर्त एक ही है : हमारे आदरणीय राजनेता अपने न्यस्त स्वार्थों से परे देखना शुरू करें।

लेखक विश्वबैंक के पूर्व मैनेजिंग एडिटर व प्लेनवर्ड्स मीडिया के एडिटर इन चीफ हैं।

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