रजनीगंधा की लाभप्रद खेती

Submitted by Hindi on Thu, 11/03/2016 - 16:11
Source
विज्ञान गंगा, जुलाई-अगस्त, 2015

रजनीगंधा की खेती से एक अच्छा लाभ कमाया जा सकता है। इस दिशा में वनस्पति उद्यान सी.एस.आई.आर.-राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान, लखनऊ ने शोधकार्य किये हैं तथा इसकी तकनीकों, आर्थिक पहलुओं में प्रकाश डाला जा चुका है। भारतीय कृषकों के लिये यह एक उत्तम फसल है

रजनीगंधा या ट्यूब रोज (Polianthus tuberosa Linn.) एक सजावटी व सगंध कंदीय पौधा है, जिसका उद्भव स्थान मैक्सिकों या दक्षिण अमेरिका है। भारत में पुष्प कृषि उद्योग में इसका एक उच्च स्थान है। इकहरे या दुहरे पुष्प वाले रजनीगंधा की श्वेत रंग की पुष्पीय शूकियां मनमोहक सुगंध के कारण वातावरण को सुवासित बना देती हैं।

रजनीगंधा की खेती भारतवर्ष में फूल एवं सुगन्ध उद्योग के लिये बड़े पैमाने पर की जाती है। यह उष्ण तथा उपोषण जलवायु में फूलने वाला कंदीय पौधा है। पादप वर्गीकरण के अनुसार इसे “एमेरालिडेसी” कुल में रखा गया है (बेकर 1888, हुकर एवं जैक्सन 1895), परन्तु हचिन्सन (1960) ने इसे “एगेवेसी” कुल में रखा है। रजनीगंधा के क्षेत्र एवं भाषा पर आधारित कई नाम हैं- जैसे सुगंधराज (तमिल एवं कन्नड़), रजनीगंधा (संस्कृत एवं बंगाली), गुलचेरी (हिन्दी), नेलासम्पेना या वेरूसम्पेन्गा (तेलगू) आदि। इसके साथ ही इनके फूलों की पुष्प सज्जा तथा उपहार निर्मित गुलदस्तों की महानगरों जैसे बंगलुरु, चेन्नई, दिल्ली व मुम्बई आदि में अत्यधिक माँग है। इकहरे पुष्पों वाली रजनीगंधा के फूल लम्बी अवधि तक ताजे बने रहते हैं।

पुष्प व्यवसाय में रजनीगंधा का अपना महत्त्व है क्योंकि इसकी इकहरी तथा दुहरी फूल वाली किस्मों को समान रूप से प्रयोग किया जाता है तथा पुष्प सज्जा, पुष्प विन्यास तथा उपहार स्वरूप देने के लिये इसकी माँग निरन्तर बनी रहती है। रजनीगंधा की पुष्प शूकियाँ वर्ष भर उपलब्ध रहती हैं और गुणवत्ता, मौसम तथा उपलब्धता के अनुसार रु. 15/- प्रति स्पाइक की दर से विक्रेताओं द्वारा बेची जाती हैं। कांक्रीट (पेट्रोलियम ईथर निष्कर्ष) से प्राप्त होने वाला रजनीगंधा का शुद्ध ऑब्सल्यूट अत्यन्त मूल्यवान प्राकृतिक पुष्पीय तेल है जो आधुनिक सुगंधकों द्वारा प्रयोग में लाया जाता है। दोनों प्रकार के उत्पाद, शुद्ध ऑब्सल्यूट और ऑब्सल्यूट सुगंध उद्योग में प्रयुक्त किये जाते हैं तथा इनसे उच्चकोटि के सौन्दर्य प्रसाधन तथा इत्र तैयार किये जाते हैं।

पुष्पों में पंखुड़ियों के व्यवस्थित होने के आधार पर रजनीगंधा को तीन किस्मों में वर्गीकृत किया गया है-

सिंगल


स्पाइक पर लगे फ्लोरेट में दलपुंजों का एक ही चक्र होता है।

सेमी डबल


फ्लोरेट में दलपुंजों के 2-3 चक्र होते हैं।

डबल


करोला या दलपुंजों के 3 से अधिक चक्र होते हैं।

रजनीगंधा की खेती


उपोष्णकटिबंधीय जलवायु की दशाओं में जो उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों में उपलब्ध है, रजनीगंधा की संतोषजनक खेती करने के लिये निम्न विधियों को उपयोग में लाना चाहिए-

रजनीगंधा की सिंगल तथा डबल प्रजातियों के संकरण तथा म्यूटेशन द्वारा कई किस्में (कल्टीवर) बनायी गई हैं, जिनको सारणी-1 में दर्शाया गया है।

जलवायु एवं मृदा


रजनीगंधा धूप वाली खुली हुई जगह में भली प्रकार से वृद्धि करता है। यह जगह वृक्षों तथा भवनों की छाया से दूर होनी चाहिए। मुख्यत: वृक्षों की छाया में, लगाये गये पौधे भली प्रकार से वृद्धि नहीं करते हैं। रजनीगंधा में मार्च से लेकर दिसम्बर तक फूल आते हैं लेकिन अगस्त से सितम्बर के मध्य में बहुतायत से फूल खिलते हैं। पुष्पन क्रिया समाप्त हो जाने के पश्चात कंद सुसुप्तावस्था में चले जाते हैं। रजनीगंधा की कृषि विभिन्न प्रकार की मृदाओं में, यहाँ तक कि लवणीय व क्षारीय भूमि में भी सफलतापूर्वक की जा सकती है। फिर भी, 6.5-7.5 पी.एच. मान की अच्छे जल निकास वाली दोमट भूमि इसकी कृषि के लिये आदर्श मानी जाती है। आन्तरिक सज्जा के लिये इनके पौधों को 25 सेमी. आकार वाले गमलों में भी सफलतापूर्वक लगाया जा सकता है इसके लिये बलुई दोमट मिट्टी, पत्ती की खाद तथा भली प्रकार से सड़ी हुई गोबर की खाद को 3:2:1 के अनुपात में मिलाकर मिश्रण तैयार किया जाता है जिसे गमलों में भरा जाता है।

खेत की तैयारी


खेत की भूमि को 30-40 सेमी. की गहराई तक भली प्रकार से जोतना या खोदना चाहिए तथा मृदा को लगभग 15 दिन के लिये खुली धूप में छोड़ देना चाहिए जिससे उसमें मौजूद सभी प्रकार के हानिकारक खरपतवार तथा कीट आदि नष्ट हो जायें। खरपतवारों को निकालने के पश्चात भूमि को पुन: जोतना या खोदना चाहिए। तत्पश्चात भूमि की सतह को समतल कर लेना चाहिए। अलंकारिक बागवानी करने के लिये इच्छा और सौन्दर्य के अनुरूप क्यारियों को आकार और आकृति निर्धारित की जाती है। इसमें क्यारियों के मध्य एक मीटर चौड़ी पट्टी का निर्माण किया जाता है जिससे आवागमन में सुविधा रहे और क्यारियों की भली-भाँति देखभाल की जा सके।

खाद


रजनीगंधा अधिक खुराक ग्रहण करने वाला पौधा है। इसमें कार्बनिक तथा अकार्बनिक खादों को प्रयुक्त करने पर व्यापक प्रभाव पड़ता है। भली-भाँति सड़ी गोबर की खाद को 10 किग्रा. प्रति वर्ग मी. की दर से क्यारियों की मिट्टी में मिलाया जाता है। इसी के साथ आधारभूत खुराक के रूप में 80 ग्राम प्रति वर्ग मी. की दर से सिंगल सुपर फास्फेट तथा म्यूरेट ऑफ पोटाश को भी मिलाया जाता है। यह सभी खादें कंद रोपण से 10-15 दिन पूर्व मिट्टी में मिला दी जाती है। क्यारियों की सिंचाई की जाती है जिससे मिट्टी भली प्रकार से बैठ जाये। इसके उपरान्त कंद रोपण से पूर्व क्यारियों की सतह को समतल कर लिया जाता है। लवणीय भूमि की अवस्था में पौधे की अच्छी वृद्धि के लिये 77 किग्रा. नत्रजन, 51 किग्रा. फास्फोरस तथा 36 किग्रा. पोटाश प्रति हेक्टर की दर से उपयोग में लाना लाभकारी सिद्ध हुआ है। इसी भाँति 25 सेमी. के गमलों में रजनीगंधा के स्वस्थ पौधे तैयार करने के लिये 5 ग्राम प्रत्येक सिंगल सुपर फास्फेट तथा म्यूरेट ऑफ पोटाश को मिट्टी के मिश्रण में कंद रोपण से पूर्व मिलाना चाहिए।

पर्ण पोषण


रजनीगंधा एक कंदीय पौधा है जिसमें बहुत अधिक पत्तियाँ होती हैं, अत: मृदा में उर्वरक देने के अतिरिक्त पत्तियों पर भी उर्वरकों का छिड़काव करने से लाभ होता है। पौधों में वानस्पतिक वृद्धि शुरू हो जाने के उपरान्त प्रत्येक पखवाड़े में एक बार तथा कुल 16 बार पत्तियों पर उर्वरकों का छिड़काव करके पर्ण पोषण का कार्य किया जाता है। एक एकड़ भूमि के लिये 400 लीटर जल में यूरिया (0.783 किग्रा.), डाइअमोनियम हाइड्रोजन आरथोफास्फेट (1.500 किग्रा.) तथा पोटैशियम नाइट्रेट (0.875 किग्रा.) के साथ एक स्प्रेडर (टी पॉल) को 0.1 प्रतिशत की दर से उपयोग करना चाहिए। इस प्रकार पर्ण पोषण करने से वानस्पतिक वृद्धि को लाभ पहुँचता है तथा फूलों की शूकियाँ लम्बी तथा सुदृढ़ होती हैं। प्रत्येक पुंज में अधिक संख्या में कंद तथा कंदिकाएँ बनती हैं। पुष्पन क्रिया अच्छी होती है और गुणात्मक तथा संख्यात्मक रूप से अच्छे फूल आते हैं।

 

क्र.सं.

कल्‍टीवर

दलपुंजों की स्थिति

शोध स्‍थान

गुण

1.

रजता रेखा

सिंगल

एनबीआरआई, लखनउ गामा किरणों के उपचार द्वारा सिंगल किस्‍म में विकसित

पत्तियों के मध्‍य में सफेद रेखा (वेरीगेटेड पत्‍ती) पुष्‍पण सामान्‍य सिंगल किस्‍म की तुलना में कम गृह सज्‍जा में विशेष उपयोगी।

2.

स्‍वर्ण रेखा

डबल

एनबीआरआई, लखनउ डबल किस्‍म को गामा किरणों से उपचारित करके विकसित

पत्तियों के दोनों किनारों पर पीली रेखा, पुष्‍पण में कमी प्राय: शीर्षस्‍थ पुष्‍प नहीं खिलते-वेरीगेटेड पत्‍ती, सजावट विशेष रूप से गृहसज्‍जा में उपयोगी।

3.

शृंगार

सिंगल

आईआईएचआर, बंगलुरु, मैक्सिकन सिंगल तथा डबल के संकरण द्वारा विकसित

फूल का आकार सिंगल किस्म के फूल से बड़ा, पुष्प कलिका पर हल्का गुलाबी रंग होने से अधिक आकर्षक (सिंगल फूल की कलिका पर हल्का हरा रंग होता है), फूल की पैदावार (1500 किलो प्रति हे. प्रतिवर्ष) सिंगल किस्म से 40 प्रतिशत अधिक कंक्रीट सिंगल किस्म के बराबर (0.3 प्रतिशत) परंतु अधिक पुष्प पैदावार के कारण किसानों द्वारा अपनायी गई।

4.

सुवासिनी

डबल

आईआईएचआर, बंगलुरु, मैक्सिकन सिंगल तथा डबल के संकरण द्वारा विकसित

सफेद फूल, मूल डबल किस्म की तुलना में फूले बड़े एवं अधिक खिलते हैं तथा 25 प्रतिशत अधिक उत्पादन देते हैं।

5.

प्रज्‍जवल

सिंगल

आईआईएचआर, बंगलुरु, शृंगार एवं मैक्सिकन सिंगल के संकरण द्वारा विकसित

‘‘शृंगार’’ से 22 प्रतिशत अधिक पुष्प उत्पादन, स्पाइक लम्बी 37 प्रतिशत, वजनी पुष्पी 17 प्रतिशत

6.

वैभव

डबल

आईआईएचआर, बंगलुरु, सुवासिनी एवं मैक्सिकन डबल के संकरण द्वारा विकसित

श्वेत पुष्प, सुवासिनी से 50 प्रतिशत अधिक स्पाइक उत्पादन, पुष्प कलिका हरी (सुवासिनी में गुलाबी), स्पाइक की लंबाई मध्यम आकर की (प्रज्जवल से कम)

 

 

रोपण


रजनीगंधा की अच्छी फसल लेने के लिये यह आवश्यक है कि रोपण के लिये कंदों का चयन भली प्रकार किया जाए। स्पिन्डिल (तकली) की आकृति वाले भली प्रकार से विकसित, 1.5 सेमी. या उससे अधिक व्यास वाले कंद जो पौधों के पुंजों की परिधि पर बनते हैं, कंद रोपण के लिये अच्छा समझा जाता है। यद्यपि 2.0-3.5 सेमी. व्यास वाले कंदों को एक समय पर रोपण कराकर अधिक समय तक अच्छी श्रेणी के फूल लिये जा सकते हैं। उपोष्णकटिबंधीय भागों में भली प्रकार से तैयार की गई क्यारियों में कंदों को मार्च-अप्रैल में लगाया जाता है। कंदों को 20-30 सेमी. की दूरी पर इस प्रकार लगाया जाता है कि उनका ऊपरी वृद्धि भाग की सतह पर रहे। अलंकारिक बागवानी करने के लिये कंदों को औपचारिक क्यारियों में 30 सेमी. की परस्पर दूरियों पर लगाया जाता है जिससे क्यारियों का आकर्षण बना रहे।

यह देखा गया कि पौधों के पुंजों का रोपण करने से वानस्पतिक वृद्धि अधिक होती है जबकि फूलों की उत्तम गुणों वाली शूकियाँ प्राप्त नहीं हो पाती हैं। अत: इस प्रकार के रोपण से बचना चाहिए। जब रजनीगंधा को गमलों में लगाया जाता है तब कंदों को गमले के केन्द्र में अकेले ही लगाना चाहिए।

कंद रोपण के तत्काल पश्चात ही क्यारियों की भली प्रकार से सिंचाई की जाती है जिससे कि कंद क्यारियों में भली प्रकार से स्थापित हो जायें। क्यारियों की सिंचाई इस प्रकार करनी चाहिए कि क्यारियों में नमी बनी रहे। इसके पश्चात मौसम को ध्यान में रखते हुए क्यारियों की सिंचाई करनी चाहिए। ग्रीष्मकाल में क्यारियों की सिंचाई प्रत्येक सप्ताह या कम अवधि में करनी चाहिए तथा शीतकाल में 10 दिन के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए। बार-बार सिंचाई करने की अपेक्षा एक बार भारी सिंचाई करना अच्छा रहता है। पौधों की पत्तियाँ जब पीली पड़ कर सूखने लगे तो सिंचाई कम कर देना चाहिए इससे कंदों को परिपक्व होने में सुविधा रहती है।

अंत: सस्‍य कार्य


खेतों तथा क्यारियों की नियमित निराई करके साफ रखना चाहिए। यह कार्य माह में एक बार किया जा सकता है। खेतों को साफ-सुथरा रखने से पौधे स्वस्थ रहते हैं और प्रति इकाई क्षेत्र से अधिक आर्थिक लाभ प्राप्त होता है।

रजनीगंधा के कंद अपेक्षाकृत अधिक सहिष्णु होते हैं और सामान्य रूप से ही भण्डारित किये जा सकते हैं। उत्तर भारत के मैदानों में जहाँ उपोष्णकटिबंधीय जलवायु पाई जाती है, रजनीगंधा के पौधों की पत्तियाँ जब सूखकर पीली पड़ने लगती हैं और पौधों की वृद्धि अवरुद्ध हो जाती है तब इनके पौधों के पुंजों की खुर्पी की सहायता से खोद लिया जाता है। पौधों के पुंजों में लगी हुई मिट्टी को भली प्रकार से साफ करके सूखी पत्तियों को हाथ की सहायता से पृथक कर दिया जाता है। सभी पुंजों को खेत के तापमान पर शुष्क छायादार स्थान पर फैला दिया जाता है। पुंजों को कभी भी ढेर लगाकर भण्डारित नहीं किया जाता है क्योंकि ऐसा करने से कम वायु संचार के कारण कंद सड़ने लगते हैं।

गमलों में लगे हुए पौधों को निकालने के लिये गमलों को उलट दिया जाता है और पौधों को निकाल लिया जाता है। इसके पश्चात मिट्टी के मिश्रण में से रजनीगंधा के पुंजों को मिट्टी साफ करके अलग कर लिया जाता है। तत्पश्चात उपरोक्त विधि से पुंजों को भण्डारित कर लिया जाता है। पौधों के पुंजों में से सभी कंदों को अलग करके उन्हें आकार और परिपक्वता के आधार पर परिपक्व (1.5 सेमी. व्यास से ऊपर) तथा अपरिपक्व (1.5 सेमी. व्यास से कम) की श्रेणियों में विभक्त कर लिया जाता है।

उष्ण तथा समुद्र तटीय जलवायु की दशाओं के विपरीत, उत्तर भारत के मैदानी भागों की उपोष्णकटिबंधीय जलवायु में रजनीगंधा के पौधों की शीतकाल में कोई वृद्धि नहीं होती है और जनवरी के मध्य तक पौधे सुसुप्तावस्था में चले जाते हैं। यह पौधों की पत्तियों के पीला पड़ने से प्रतीत होता है। अत्यधिक शीत होने पर पौधे की सभी पत्तियाँ समाप्त हो जाती हैं। पुन: कंद रोपण के लिये इन कंदों को खोदने का यह सबसे अच्छा समय है। रजनीगंधा की रटून फसल भी ली जाती है। इसके पौधों को खोदने के बजाये खेत में ही पड़े रहने दिया जाता है। शेष अन्त: सस्य क्रियायें आदि नियमित रूप से की जाती हैं। लेकिन शूकियों की लम्बाई, फूलों की संख्या तथा ताजे फूलों का भार घट जाता है। अत: कटफ्लावर व्यापार की दृष्टि से तीसरे वर्ष में नया कंद ही रोपण करना चाहिए। रटून फसल से प्राप्त फूलों को सुगंध तेल के निष्कर्ष के लिये प्रयोग करना चाहिए व छुट्टे फूलों को पुष्पसज्जा के उद्देश्य से बेचना चाहिए। रटून फसल लेने के बाद कंद इतने घने हो जाते हैं कि उनको निकालकर दुबारा रोपने के अलावा अन्य कोई विकल्प नहीं रह जाता है जिससे अच्छी फसल ली जा सके।

सक्रिय करना


उपोष्णकटिबंधीय जलवायु की दशा में खेतों में सुसुप्तावस्था में लगे रजनीगंधा के पुंजों को सक्रिय अवस्था में लाने के लिये उत्प्रेरित करने की आवश्यकता होती है जिससे इच्छानुसार रटून फसल प्राप्त की जा सके। इससे पुष्पों की शूकी को जल्दी खिलने में सहायता होती है जबकि खेतों में लगे पौधों में साधारणतया देर से पुष्प आते हैं। यह देखा गया है कि आंशिक रूप से सुसुप्तावस्था में पहुँचे रजनीगंधा के कंदों में जनवरी माह में खाद डालकर सिंचाई करने से पौधे जागृत हो जाते हैं।

पोषण जन्‍य विसंगतियां


रजनीगंधा की फसल पर उर्वरकों का अच्छा व व्यापक असर पड़ता है लेकिन फसल में आवश्यकता से अधिक नाइट्रोजन खाद का उपयोग करने से फूलों की शूकी अपेक्षाकृत अधिक लम्बी व कोमल हो जाती है जो हवा के प्रवाह से आसानी से टूट जाती है। साथ ही पौधे रोग तथा कीड़ों से अधिक प्रभावित होते हैं। फूलों के गुणों पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है।

सिंचाई


कंदों के बुआई के उपरान्त हल्की सिंचाई कर देना चाहिए। सात से दस दिन में कंदों से कल्लों का अंकुरण प्रारम्भ हो जाता है। इस समय एक हल्की सिंचाई की आवश्यकता होती है। अन्य सिंचाइयाँ मौसम के अनुसार 10 से 20 दिन के अन्तराल पर आवश्यकतानुसार करनी चाहिए।

पुष्प‍ कटाई


पुष्पों का आगमन कंदों के रोपण से 60-90 दिनों बाद प्रारम्भ हो जाता है तथा जाड़े तक चलता रहता है। स्पाइक को तेज चाकू या ब्लेड से काटकर 100-100 के बन्डल बनाकर पुष्प बाजार में विक्रय हेतु भेजा जाता है।

रोग एवं निवारण


रजनीगंधा के पौधों में रोग का प्रकोप नहीं के बराबर होता है। अच्छी रोगमुक्त फसल हेतु कंदों के रोपण से पूर्व इसे 0.25 प्रतिशत कैप्टान (फफूंदीनाशक) के घोल में डुबोकर लगाने से कवकजनित रोग उत्पन्न नहीं होते हैं। रजनीगंधा अधिक पानी पसंद नहीं करता, अत: क्यारियों में पानी का अधिक भराव नहीं होना चाहिए अन्यथा कंद सड़ जाने की सम्भावना रहती है। रजनीगंधा में हल्की सिंचाई वांछित है।

रजनीगंधा में माहू आदि का आक्रमण होता है। विशेष रूप से लम्बे समय तक आकाश में बादल आदि छाये रहने पर या समुचित धूप न मिलने पर इसके निवारण हेतु 0.25 प्रतिशत मैलाथियान के घोल का छिड़काव करना चाहिए। टिड्डे नई पत्तियों एवं फूलों को प्रभावित करते हैं। 5 प्रतिशत कान्फीड्योर का छिड़काव करके इसे रोका जा सकता है। लाल चीटियाँ अत्यन्त सूक्ष्म जीव हैं जो पत्तियों की निचली सतह पर मिलते हैं। यह पौधों का रस चूसकर पत्तियों को पीला या सफेद, भूरा बना देती है। 0.2 प्रतिशत केलथेन या मोनोक्रोटोफास के छिड़काव द्वारा इन्हें नियंत्रित किया जा सकता है।

कुपोषण का प्रभाव


खेत में अधिक नाइट्रोजन होने से स्पाइक लम्बी व कोमल हो जाती है जो तेज हवा में टूट सकती है। अत: उन खेतों में जिसमें दलहनी फसलों के बाद रजनीगंधा की खेती की जा रही है, नाइट्रोजन की मात्रा कम कर दें (लगभग 1/3), नाइट्रोजन की कमी से स्पाइक की संख्या तथा स्पाइक पर फ्लोरेट की संख्या में कमी आ जाती है। फास्फोरस की कमी के कारण पौधों की ऊपरी पत्तियाँ गहरे हरे रंग की तथा नीचे की पत्तियों पर बैंगनी रंग के धब्बे आने लगते हैं। कैल्शियम की कमी से स्पाइक फटने लगती है। मैग्नीशियम की कमी से पुरानी पत्तियों की शिराओं में क्लोरोसिस हो जाती है तथा आयरन की कमी के कारण नई पत्तियों में क्लोरोसिस होती है।

रजनीगंधा की खेती से एक अच्छा लाभ कमाया जा सकता है। इस दिशा में वनस्पति उद्यान सी.एस.आई.आर.-राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान, लखनऊ ने शोधकार्य किये हैं तथा इसकी तकनीकों, आर्थिक पहलुओं में प्रकाश डाला जा चुका है। भारतीय कृषकों के लिये यह एक उत्तम फसल है एवं इसकी खेती कर फूलों एवं बल्ब से रु. 1.35 लाख प्रति हेक्टेयर का लाभ अर्जित किया जा सकता है।

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