रसायनों को त्याग करने की शर्तें

Submitted by Hindi on Fri, 06/03/2011 - 12:33
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मासानोबू फुकूओका पर लिखी गई पुस्तक 'द वन स्ट्रा रेवोल्यूशन'

एक खेत में तो डंठलों में छेद करने वाले कीड़ों पर कीटनाशक छिड़के गए और दूसरे खेत को वैसा ही रहने दिया गया। जब दोनों खेतों की पैदावार का हिसाब लगाया गया तो बिना दवा छिड़के और मुरझाए पौधे वाले खेत की पैदावार अधिक पाई गई। शुरू में तो खुद मुझे ही इस पर विश्वास नहीं हुआ, और मुझे लगा कि कहीं परीक्षण में कुछ भूल हो गई होगी, लेकिन जब आंकड़े सही पाए गए तो मैंने और आगे जांच-पड़ताल की।

आज जापान में चावल की खेती एक निर्णायक दौर से गुजर रही है। किसान और विशेषज्ञ दोनों भ्रमित हैं कि कौन सा रास्ता अपनाएं - धान के रोपे लगाना जारी रखें या सीधे बीज बोने का तरीका अपनाएं और यदि यह बाद वाला रास्ता चुनें तो खेतों को जोतें या बिना हल चलाए खेती करें। मैं बीस साल से कह रहा हूं कि अंततः सीधे बीज बोकर बिना-जोते खेती ही सर्वश्रेष्ठ तरीका साबित होगा। जिस तरह आकायामा जिले में सीधे बुआई का तरीका तेजी से लोकप्रिय होता जा रहा है उससे लोगों की आंखें खुल जानी चाहिए। लेकिन ऐसे लोग भी हैं जो बिना रसायनों का प्रयोग किए खेती करते हुए देश की खाद्यान्न जरूरतों को पूरा करने की बात सोच भी नहीं सकते। उनकी दलील है कि बगैर रासायनिक उपचार के चावल को लगने वाली तीन बड़ी बीमारियाँ - तनों का सड़ना, घुन लगना तथा पत्तियों को कीड़ा लगने – को नियंत्रित किया ही नहीं जा सकता। लेकिन यदि किसान बीजों की कमजोर ‘सुधरी हुई’ किस्मों का उपयोग बंद कर दें, मिट्टी में जरूरत से ज्यादा नाईट्रोजन न मिलाएं, और बहुत ज्यादा सिंचाई न कर जड़ों को पुष्ट हो विकसित होने दें तो ये तीनों बीमारियाँ गायब हो जाएंगी और रासायनिक छिड़काव की जरूरत नहीं रहेगी।

शुरू में मेरे खेतों की लाल चिकनी मिट्टी कमजोर और चावल उगाने के लिए अनउपयुक्त थी। कत्थई चकते पड़ जाने की बीमारी अक्सर पौधों को लग जाया करती थी। मगर ज्यों-ज्यों खेतों की उर्वरता बढ़ती गई, त्यों-त्यों यह बीमारी कम होती गई। इधर कुछ समय से तो यह बीमारी फैली ही नहीं है। यही स्थिति कीटों से होने वाले नुकसान के बारे में भी है। सबसे अहम बात तो यह है कि प्राकृतिक कीट-भक्षियों को न मारा जाए। कीड़ों की समस्या खेतों में लगातार पानी भरे रखने या प्रदूषित या थमे हुए पानी से सिंचाई करने से भी बढ़ती है। सबसे ज्यादा नुकसानदेह कीड़े यानी गर्मियों तथा पतझड़ में होने वाले टिड्डों को काबू में रखने का एक ही तरीका है कि, पानी को खेतों से दूर रखा जाए। जाड़ों के मौसम में खरपतवारों में रहने वाले चावल के हरे टिड्डे, विषाणुओं की मेजबानी करते हैं। यदि ऐसा होने दिया जाता है तो चावल को घुन लगने से दस से बीस प्रतिशत फसल का नुकसान हो सकता है। यदि रासायनिक छिड़काव न किया जाए तो खेतों में इतनी मकड़ियाँ तो रहेंगी ही कि आप आमतौर से उन पर इनसे निपटने का काम छोड़ सकते हैं। लेकिन ये मकड़ियाँ इंसानों की जरा सी भी छेड़-छाड़ पसंद नहीं करती और इस मामले में सावधान रहना जरूरी है।

अधिकांश लोग यह सोचते हैं कि रासायनिक उर्वरकों तथा कीटनाशकों का प्रयोग न करने पर कृषि पैदावार वर्तमान स्तर से बहुत कम होगी। कीट-क्षति के विशेषज्ञों का अनुमान है कि, कीटनाशकों का प्रयोग बंद करने के बाद पहले ही वर्ष में फसलों की पांच प्रतिशत की हानि होगी। इतनी ही हानि रासायनिक उर्वरकों को त्यागने से भी हो सकती है। अर्थात, यदि खेतों में पानी का उपयोग घटा दें, तथा कृषि सहकारी समितियों द्वारा प्रोत्साहित रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का उपयोग बंद ही कर दिया जाए तो पहले वर्ष में फसलों की औसत हानि संभवतः दस प्रतिशत तक पहुंच जाएगी। लेकिन प्रकृति में स्वास्थ्य लाभ करने की शक्ति, चूंकि कल्पनातीत होती है, इसलिए मेरा विश्वास है कि पहले साल के नुकसान के बाद पैदावार बढ़ने लगेगी, और अंततः उनके पहले स्तर से आगे निकल जाएगी। जिन दिनों मैं कोची परीक्षण-केंद्र में काम करता था, मैंने तने के घुन की हानि रोकने के बारे में परीक्षण किए थे। ये कीड़े चावल के पौधे के डंठल में प्रवेश कर उसे खाने लगते हैं। नतीजा यह होता है कि तना सफेद पड़कर मुरझाने लगता है। नुकसान का हिसाब लगाने का तरीका सीधा-सा है। सफेद डंठलों या चावलों की गिनती कर लीजिए। सौ पौधों में से दस या बीस प्रतिशत डंठल सफेद हो सकते हैं। ज्यादा गंभीर मामलों में जब ऐसा लगा कि पूरी फसल ही बर्बाद हो गई है, तब भी वास्तविक नुकसान तीस प्रतिशत से ज्यादा नहीं होता।

इस नुकसान को रोकने की कोशिश में एक खेत में तो डंठलों में छेद करने वाले कीड़ों पर कीटनाशक छिड़के गए और दूसरे खेत को वैसा ही रहने दिया गया। जब दोनों खेतों की पैदावार का हिसाब लगाया गया तो बिना दवा छिड़के और मुरझाए पौधे वाले खेत की पैदावार अधिक पाई गई। शुरू में तो खुद मुझे ही इस पर विश्वास नहीं हुआ, और मुझे लगा कि कहीं परीक्षण में कुछ भूल हो गई होगी, लेकिन जब आंकड़े सही पाए गए तो मैंने और आगे जांच-पड़ताल की। हुआ यह था कि कमजोर पौधों को चपेट में लेकर कीड़ों ने जो कुछ पौधों की सघनता कम कर दी थी उससे बाकी पौधों को फैलने के लिए जगह मिल गई। सूर्य की किरणें निचली पत्तियों तक पहुंचीं और इससे यह बाकी पौधे ज्यादा ताकतवर होकर बढ़े। तथा उनमें अनाज देनेवाली शाखाओं की संख्या उससे कहीं ज्यादा बढ़ गई, जितनी की विरलता न रहने पर रही होती। जब शाखाएं बहुत घनी होती हैं तथा कीड़े अतिरिक्त शाखाओं को खाकर विरलता पैदा नहीं करते तो, पौधे देखने में तो बहुत स्वस्थ्य नजर आते हैं, लेकिन कई बार फसल वास्तव में कम होती है।

कई अनुसंधान प्रयोग परीक्षण केंद्रों की रपटों का अवलोकन करने से आपको पता चलेगा कि पाए जानेवाले हर किस्म के रसायनों के छिड़काव के बाद नतीजा क्या रहा, लेकिन आमतौर से लोग यह नहीं समझते, कि इन रपटों में आधे से ज्यादा नतीजों का उल्लेख ही नहीं किया जाता। बेशक, इरादा किसी बात को छिपाने का नहीं होता, लेकिन, जब दवा निर्माता कंपनियां इन नतीजों को प्रकाशित करती हैं (अपने विज्ञापनों आदि में) तो वह ऐसे ही होते हैं जैसे परस्पर-विरोधी आंकड़ों/जानकारियों को छुपा लिया गया हो। वे कम पैदावार बतलाने वाले नतीजों - मसलन डंठल छेदने वाले कीड़ों पर किए गए परीक्षण, को परीक्षण-खामियां कहकर निपटा देते हैं। बेशक, ऐसे प्रकरण भी हैं जहां कीट उन्मूलन से पैदावार बढ़ी भी है, लेकिन साथ ही ऐसे मामले भी हैं, जहां इससे पैदावार घटी है। इन बाद वाले परीक्षणों की रपटें आमतौर पर प्रकाशित नहीं होती हैं।

कृषि रसायनों में शाकनाशी ही वे रसायन हैं, जिनका उपयोग न करने के लिए किसानों को राजी करना सबसे ज्यादा कठिन होता है। पुरातन काल से ही किसान उस बीमारी से ग्रस्त हैं जिसे हम ‘खरपतवारों के खिलापफ जंग’ कह सकते हैं। खेतों को जोतना, कतारों के बीच फसल बोना, खूब चावल के रोपे लगाना, इन सभी अनुष्ठानों का एक ही उद्देश्य है - खरपतवार का नाश करना। शाकनाशियों के आविष्कार के पूर्व किसानों को हर मौसम में पानी भरे खेतों में मीलों चक्कर लगाकर निंदाई-यंत्र या हाथ से भी, निंदाई करनी पड़ती थी। इस मशक्कत को देखते हुए शाकनाशी रसायनों को किसानों ने देवताओं का वरदान ही समझा। लेकिन पुआल और मेथी के उपयोग तथा खेतों के कुछ ही देर के लिए जल प्लावित करने के रूप में मैंने खरपतवार नियंत्रण का एक ऐसा सहज तरीका खोज लिया है, जिसमें न तो कड़ी धूप में निंदाई को कठोर परिश्रम करना पड़ता है, और न ही रसायनों का उपयोग ही।

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