सॉयल हेल्थ कार्ड से खूब बढ़ रही किसानों की आमदनी

Submitted by RuralWater on Tue, 02/18/2020 - 10:42
Source
दैनिक जागरण, 18 फरवरी, 2020

मृदा स्वास्थ्य कार्ड मृदा स्वास्थ्य कार्डसरकार की महत्वाकांक्षी योजना सॉयल हेल्थ कार्ड के प्रभावों पर रिपोर्ट सोमवार को जारी कर दी गई। रिपोर्ट का दावा है कि इस योजना की वजह से देश के किसानों की आय में 30 हजार रुपए प्रति एकड़ तक का इलाफा हुआ है। रिपोर्ट का लब्बोलुआब यह है कि योजना से खेती की लागत घटी है और उत्पादन बढ़ा है। लेकिन कृषि वैज्ञानिकों, किसान संगठनों व विशेषज्ञों ने इस रिपोर्ट को लेकर कई गम्भीर सवाल उठा दिए हैं। जानकार कह रहे हैं कि लागत घटने व उत्पादन बढ़ने के जो आंकड़े हैं उससे आमदनी में 30 हजार रुपए तक की वृद्धि सम्भव नहीं हैं।

नेशनल प्रॉडक्विविटी काउंसिल (एनपीसी) की यह रिपोर्ट देश के 19 राज्यों में 76 जिलों के 170 सॉयल हेल्थ टेस्टिंग लैंब और 1,700 किसानों से पूछे सवालों के जवाब के आधार पर तैयार की गई है। देश के लगभग 12 करोड़ किसानों को सॉयल हेल्थ कार्ड वितरित किए जा चुके हैं। एनपीसी ने यह रिपोर्ट फरवरी, 2017 में सरकार के समकक्ष पेश कर दी थी, जिसे कृषि मंत्रालय की ओर से दो साल बाद अब जाकर सोमवार को जारी की गई है। किसान जागृति मंच के अध्यक्ष डॉक्टर सुधीर पंवार ने रिपोर्ट को खारिज करते हुए कहा कि जमीनी हकीकत से इसका कोई वास्ता नहीं है। एक एकड़ की खेती में बमुश्किल चार से पांच हजार रुपए की खाद लगती है। रिपोर्ट के मुताबिक 10 किलो यूरिया प्रति हेक्टेयर घट जाए और उत्पादन 30 फीसद बढ़ भी जाए तो भी आमदनी में 30 हजार रुपए तक की वृद्धि नहीं हो सकती है।

 मृदा स्वास्थ्य कार्ड के साथ किसान मृदा स्वास्थ्य कार्ड के साथ किसान

एनपीसी रिपोर्ट के मुताबिक खाद की बचत और उत्पादन बढ़ने किसानों की आमदनी में वृद्धि दर्ज की गई है। नजीर के तौर पर दलहनी फसलों में अरहर की प्रति एकड़ खेती में 25 से 30 हजार रुपए की आमदनी हुई है। जबकि सूरजमुखी में 25 हजार रुपए, मूंगफली की खेती में 10 हजार और कपास में 12 हजार रुपए प्रति एकड़ की अतिरिक्त आमदनी होने का आकलन किया गया है। हालांकि रिपोर्ट में धान की खेती में 4,500 रुपए और आलू में 3,000 रुपए प्रति एकड़ तक की ही वृद्धि होने का अनुमान लगाया गया है।

खेती में बचत के तौर पर नाइट्रोजन वाली काद यूरिया की खपत में कमी आई है। धान की खेती की लागत में नाइट्रोजन की बचत से 16 से 25 फीसदी की बचत का अनुमान लगाया गया है। इससे प्रति एकड़ 20 किलो यूरिया की बचत हुई है। जबकि दलहनी फसलों की खेती में 15 फीसद कम खाद यानी 10 किलो यूरिया की कम खपत हुई है। तिलहनी फसलों में 10 से 15 फीसद कम यूरिया का प्रयोग किया गया, जिससे प्रति एकड़ नौ फीसद कम यूरिया का प्रयोग हुआ। रिपोर्ट के मुताबिक मूंगफली की खेती में 23 किलो और अरंडी खेती में 30 किलो यूरिया प्रति एकड़ कम लगी।

सॉयल हेल्थ कार्ड के चलते धान, गेहूं और ज्वार की खेती में खाद के उचित प्रयोग से उनके उत्पादन में 10 से 15 फीसद तक की वृद्धि दर्ज की गई है। इसी वजह से दलहनी फसलों में 30 फीसद तक और तिलहनी फसलों में 40 फीसद तक की वृद्धि का आकलन किया गया है। चौधरी पुष्पेंद्र का कहना है कि एक एकड़ की खेती में इतनी अतिरिक्त आमदनी को होना वास्तविकता से परे है। इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चर रिसर्च के पूर्व महानिदेशक डॉ. मंगला राय ने कृषि अनुसंधान व विकास पर घटते निवेश पर गम्भीर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि वर्ष 2008-09 में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 0.84 फीसद खर्च होता था, जो घटकर 0.53 फीसद हो गया है।

गांव व कृषि क्षेत्र पर इकोनॉमी की मजबूती का दारोमदारः तोमर

कृषि व किसान कल्याण मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने गांव और कृषि जैसे क्षेत्र की महत्ता गिनाते हुए कहा कि इन्हीं क्षेत्रों पर देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का दायित्व है। इसलिए इनके तानेबाने को और सुदृढ़ करने की जरूरत है, जिससे देश की अर्थव्यवस्था को झटकों से उबरने में मदद मिल सके।

नेशनल सीड कांग्रेस के समारोह के दौरान कृषि क्षेत्र की हालात को बेहतर करार देते हुए तोमर ने कहा कि अभी भी इसे लम्बी यात्रा तय करनी है, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों की चुनौतियों से निपटा जा सकता है। किसानों की मेहनत और वैज्ञानिकों के अनुसंधान का नतीजा है कि देश खाद्यान्न क्षेत्र में आत्मनिर्भर ही नहीं बल्कि निर्यातक हो गया है। इसमें बीज तैयार करने वाले निजी निवेशकों की भूमिका भी अहम रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की वर्ष 2022 तक किसानों की आमदनी को बढ़ाकर दोगुनी करने की मंशा का जिक्र करते हुए तोमर ने कहा कि इसके लिए बीजों की महत्ता सबसे अधिक है। कृषि क्षेत्र की बुनियादी जरूरतों में शामिल मिट्टी व सिंचाई के साथ बीजों की भूमिका बहुत अधिक है। इसमें वैज्ञानिकों के अनुसंधान और बीजों के उत्पादन में निजी क्षेत्र उल्लेखनीय प्रदर्शन कर रहा है। बीजों के आयात व निर्यात में पारदर्शिता, ईमानदारी और गुणवत्ता पर जोर देते हुए तोमर ने कहा कि इसमें अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरा उतरने की जरूरत है।

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