सुलगते हुए जंगल

Submitted by admin on Thu, 04/08/2010 - 21:30
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पूरे विश्व में जलते हुए जंगल अपने साथ नई आपदाएं लाते रहे हैं। सरकारों को जंगलों मे लगी आग के कारण कई बार आपातकाल की घोषणाएं भी करनी पड़ती हैं। पिछले वर्ष अमेरिका व ऑस्ट्रेलिया में जंगलों की आग के कारण आपात स्थिति लगी थी। हमारे देश में जंगलों का फायर सीजन फरवरी से जून के बीच का माना जाता है। उत्तराखंड व हिमाचल के जंगलों में भयंकर आग लगती है। उत्तर प्रदेश व कर्नाटक में भी जंगलों में आग लगती है।

ऐसे में, पहले से जंगलों की आग रोकने या कम करने के लिए कार्ययोजना बनाकर उस पर कार्रवाई होनी चाहिए। परंतु भ्रष्टाचार, लापरवाही, इच्छाशक्ति व कर्मचारियों की कमी के कारण ऐसा शायद ही होता है। दुखद तो यह है कि जंगलों की आग के संदर्भ में पिछली गलतियों से सीखने के संकेत भी नहीं मिलते। तो 1या इस बार भी उत्तराखंड के जंगल जलते रहेंगे?

दरअसल, ज्यादातर मामलों में वनों की आग अपने आप बुझती है या फिर स्थानीय लोग अपनी जान जोखिम में डालकर उसे बुझाते हैं। बरसात भी आग बुझा देती हैं। वर्ष २००९ में मई माह में लगी आग चार-पांच दिन बाद हुई बरसात से बुझ गई थी। किंतु जून में चंपावत, अल्मोड़ा, टिहरी व मसूरी में भी भयंकर आग लगी थी। विडंबना यह है कि बारिश से आग के बुझने के बाद सब कुछ भुला दिया जाता है। इस बार भी शायद ही कुछ अलग होगा।

विद्रूप यह है कि आग बुझाने में जनसहयोग पाने के लिए हर साल लाखों रुपये के विज्ञापन उन समाचार पत्र-पत्रिकाओं में दिए जाते हैं, जो शायद ही वन सीमाओं पर बसने वाले पहाड़ी गांवों में पहुंचते हों। फिर ग्रामीणों की ऐसी भी शिकायतें हैं कि कई बार जो लोग जंगल में आग बुझाने गए, उन्हीं पर आग लगाने के आरोप लगा दिए गए, जबकि जंगलों से फैलती आग से अपने खेत-खलिहानों व घरों को बचाने में ग्रामीण महिलाएं भी जल जाती हैं।

वन पंचायत वाले चीड़ के पेड़ के प्रति वन अधिकारियों के विशेष प्रेम को भी आग का मुख्य कारण मानते हैं। चीड़ से तरल लीसा निकलता है, जो बहुत ज्वलनशील होता है। यह व्यावसायिक रूप से उपयोगी होता है। लीसा के लिए चीड़ के पेड़ों पर किए गए खुले धावों से फैलने वाली आग और पिरुल के प्रबंघन की अपनी जवाबदेही से भी वन विभाग नहीं बच सकता है। जहां पहले लीसा दोहन का काम ठेकेदारों से कराया जाता था, वहां अब यह काम पूरी तरह सरकारी विभाग ही करता है। लीसा के नियंत्रित और खुले बाजार के दामों में भी भारी अंतर है। चीड़ के पेड़ों से अवैघ लीसा दोहन का यह एक प्रमुख कारण है।

प्राकृतिक कारणों, जैसे तेज हवा से पेड़ों या बांसों के बीच घर्षण या जंगल में बिजली गिरने से भी आग लगती है, परंतु गांव वाले मानते हैं कि जंगलों की ज्यादातर आग मानवीय कारणों से लगती है। कई बार जंगलों के पास के खेतों को साफ करने के लिए लगाई गई आग के हवा में फैलने से भी जंगलों तक आग पहुंचती है। जाहिर है, जंगल में फैलने वाली आग को रोकने के लिए वन क्षेत्रों में नमी बनाए रखने, जल-स्रोतों, तालाबों आदि के रखरखाव की जरूरत है। यदि वन क्षेत्र में नमी मौजूद रहेगी, तो आग में उग्रता नहीं आएगी। घटते जंगलों के बीच निश्चय ही आग सबके लिए चिंता का विषय है। लेकिन बिना सामुदायिक सहभागिता, पारदरर्शिता, सरकारी इच्छाशक्ति तथा वैज्ञानिक व तकनीकी ज्ञान के इस पर काबू पाना संभव नहीं है। जबकि सच्चाई यह है कि हिमालय के जंगलों को आग से बचाना, विश्व घरोहर व नैसर्गिक विविधता को बचाना है।

(लेखक सामाजिक कार्यकर्ता व पर्यावरण वैज्ञानिक हैं)
 
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