सूखा एवं खाद्य सुरक्षा

Submitted by RuralWater on Sun, 07/31/2016 - 15:43
Source
विज्ञान प्रगति, जुलाई 2016

.हम सभी ने सूखा व अकाल के बारे में सुना है लेकिन ये सूखा या अकाल क्या है, इस लेख के माध्यम से समझाने का प्रयास किया जा रहा है। आँकड़ों के आधार पर सामान्य से कम वर्षा, जो कि एक मौसम में विशेष रूप से लम्बे समय की अवधि के लिये मानव गतिविधियों को पूरा करने में अपर्याप्त होती है, सूखे का कारण बनती है जिसे आम भाषा में ‘अकाल’ भी कहा जाता है।

अकाल यानी बुरा काल या बुरा समय। यह एक जटिल एवं प्रछन्न प्राकृतिक आपदा है जो लगभग दुनिया के सभी क्षेत्रों की जलवायु का एक सामान्य हिस्सा है और जो जलवायु की विशेष परिस्थिति द्वारा बार-बार उत्पन्न होती रहती है। सूखे की घटना विकसित एवं विकासशील देशों के आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय अवयवों को मुख्य रूप से प्रभावित करती है।

तूफान, बाढ़ आदि विध्वंसकारी आपदाओं को भी सूखे से नीचे रखा गया है क्योंकि इसका परिणाम दूरगामी होता है एवं यह हमारे सामाजिक एवं आर्थिक पहलुओं को गम्भीर रूप से प्रभावित करता है। सूखे का दूरगामी एवं प्रतिकूल प्रभाव सभी सजीवों जैसे- मानव जाति, पशु-पक्षी, जीव-जन्तु, वनस्पति जगत एवं उनसे जुड़े औद्योगिक क्षेत्रों पर भी पड़ता है।

अधिक सूखे की स्थिति में यह प्रभाव लम्बे समय तक चलता रहता है। सूखे का प्रभाव वृहत भौगोलिक क्षेत्र में फैला होता है और यह इस मामले में दूसरी प्राकृतिक आपदाओं से भिन्न है। एक सूखा दूसरे सूखे से तीन आवश्यक विशेषताओं से भिन्न होता है- तीव्रता, अवधि एवं स्थानिक फैलाव। इसके अलावा सूखे के कई अनुशासनात्मक दृष्टिकोण मौजूद हैं।

हमारे देश में बार-बार आने वाला सूखा मुख्य रूप से दक्षिणी-पश्चिमी मानसून के दौरान सामान्य से कम वर्षापात (25 प्रतिशत से अधिक कम वर्षा) का परिणाम होता है। इसके फलस्वरूप कृषि उत्पादों में इतनी कमी हो जाती है कि अकाल जैसी त्रासदी का सामना करना पड़ता है।

हमारे देश को वर्ष 1871 और 2002 के बीच 22 प्रमुख सूखों का सामना करना पड़ा है। वर्ष 1987 का सूखा पिछली सदी का शायद सबसे गम्भीर सूखा था, जिसने लगभग 60 प्रतिशत फसल क्षेत्र और 85 लाख लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित किया।

नवम्बर 2009 में जारी खाद्यान्न उत्पादन के लिये सरकार के पहले अग्रिम अनुमान के अनुसार 21वीं सदी में वर्ष 2002 और 2009 सूखे के हिसाब से गम्भीर वर्ष रहे। वर्ष 2009 का सूखा, पिछले 35 वर्षों में सबसे भयंकर सूखा था जिसने 40 करोड़ लोगों को प्रभावित किया। यह स्वतंत्र भारत में पहली बार हुआ कि सरकार ने मानसून के रहते सूखा घोषित किया। मानसून की बारिश 22 प्रतिशत कम हुई।

खरीफ का उत्पादन लगभग 69.45 लाख टन था जोकि पिछले सत्र की तुलना में 15 लाख टन कम था। खाद्यान्न की कमी ने मुद्रा स्फीति की दर को 17 से 20 प्रतिशत तक बढ़ा दिया जोकि हाल ही के दिनों में सबसे ज्यादा थी।

सूखा अचानक नहीं बल्कि धीरे-धीरे उत्पन्न होने वाली आपदा है और इसकी तीव्रता भी अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग होती है। इसका प्रबन्धन इसकी तीव्रता के आधार पर ही निर्भर करता है। कम सूखे की स्थिति में वैकल्पिक व्यवस्था द्वारा ही इससे निपटा जा सकता है, परन्तु यदि किसी स्थान विशेष पर सूखे की तीव्रता अधिक एवं बार-बार हो तो इसके लिये स्थायी योजना की आवश्यकता होती है।देश के कुछ हिस्से जैसे-दक्षिण एवं पूर्वी भाग, उत्तरी कर्नाटक, उत्तरी आन्ध्र प्रदेश, ओड़िशा, गुजरात एवं राजस्थान में तो बार-बार सूखा आता रहा है। वर्तमान दशक के मानसून में बदलाव, वर्षा की मात्रा एवं वितरण में आई विसंगति के फलस्वरूप कई अन्य क्षेत्रों जैसे छत्तीसगढ़ एवं मध्य प्रदेश जैसे राज्य भी इससे प्रभावित होने लगे हैं।

मोटे तौर पर, भारत में सूखा प्रभावित क्षेत्रों को दो इलाकों में विभाजित किया जा सकता है। रेगिस्तान और अर्द्ध शुष्क क्षेत्रों को मिलाकर पहले इलाके में 0.6 मिलियन वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र शामिल है। इस क्षेत्र में वर्षा 750 मिलीमीटर से कम है और कुछ स्थानों पर यह 400 मिलीमीटर से भी कम है। दूसरे इलाके में तट से लगभग 300 किलोमीटर की दूरी तक पश्चिमी घाट के पूर्वी क्षेत्र शामिल हैं।

पश्चिमी घाट को ‘बारिश छाया क्षेत्र’ के रूप में जाना जाता है, इस क्षेत्र में वर्षा 750 मिलीमीटर से कम होती है और अत्यधिक अनिश्चित है। इस क्षेत्र में घनी आबादी है और समय-समय पर सूखे के कारण काफी दुख और संकट का सामना करना पड़ता है। सूखे के प्रभावों का आकलन इसके आने के समय, तीव्रता, अवधि एवं अन्तराल आदि के सन्दर्भ में किया जाता है।

सूखे का वर्गीकरण


मौसम जनित सूखा : मौसम जनित सूखा सामान्य या औसत वर्षापात की तुलना में सूखेपन की डिग्री पर आधारित है। यह लम्बी अवधि तक सामान्य से कम वर्षापात की स्थिति में उत्पन्न होता है।

जल-जनित सूखा : जल-जनित सूखा वर्षापात कमी की अवधि एवं सतही तथा उपसतही जल की आपूर्ति के बीच का सम्बन्ध है, न कि सिर्फ वर्षापात में कमी का। इस प्रकार यह वर्षापात में कमी के फलस्वरूप सतही एवं अन्तः सतही जल संसाधन (नदी, जलाशय एवं भूजल) में कमी है। जल-जनित सूखा आमतौर पर मौसम जनित और कृषि जनित सूखे के बाद की स्थिति है, क्योंकि जलाशय एवं भूजल में कमी का पता एक निश्चित अन्तराल के बाद ही पता चलता है। जल जनित सूखे से विद्युत उत्पादन, सिंचाई, पेयजल, औद्योगिक गतिविधि आदि पर गहरा प्रभाव पड़ता है।

कृषि जनित सूखा : कृषि जनित सूखा वर्षापात में कमी, असामान्य तापमान एवं वाष्पोत्सर्जन, भूमि में नमी की कमी आदि के फलस्वरूप फसल उत्पादन में कमी है। यह सूखा तब होता है जब कम वर्षापात एवं मिट्टी में नमी की कमी के कारण फसलों को उनकी आवश्यकता के अनुरूप पानी नहीं मिल पाता है एवं फसल अपनी बढ़वार की किसी भी अवस्था में पानी की कमी के फलस्वरूप सूख जाती है।

यह मुख्य रूप से मानसून के आगमन, मिट्टी के भौतिक गुण, बीजों के प्रजातिय गुण, जल की कमी की तीव्रता की अवधि तथा फसल की अवस्था आदि पर निर्भर करता है। कभी-कभी मिट्टी में कम नमी की स्थिति में भूमि में उपस्थित पोषक तत्व फसलों को सूखा देते हैं।

वर्षा आधारित खेतों में सूखे का मौसम के अनुरूप वर्गीकृत किया गया है। जैसे :

शुरुआती सूखा : मानसून का विलम्ब से आना एवं शुरुआती अवधि में सामान्य से कम वर्षापात।

मध्यावधि सूखा : मानसून के महीनों के मध्य में सामान्य से कम वर्षापात।

अन्त सूखा : मानसून महीनों के अन्तिम अवधि में सामान्य से कम वर्षापात।

प्रत्यक्ष सूखा : जब वर्षापात एवं मिट्टी में नमी किसी एक फसल के लिये पर्याप्त तथा दूसरों के लिये अपर्याप्त हो तो उसे ‘प्रत्यक्ष सूखा’ कहते हैं, ऐसी स्थिति में फसलों का चुनाव एवं बुआई के समय में बदलाव कर सूखे के प्रभाव से बचा जा सकता है।

स्थायी सूखा : जब किसी क्षेत्र में बार-बार सूखा हो, तो उसे सामान्य फसल के लिये उपयोग में नहीं लाया जाता है। ऐसे क्षेत्रोंं में वैकल्पिक व्यवस्था अपनाई जाती है तथा उद्यान, वानिकी या अन्य फसल उपयोग में लाई जाती हैं।

भारत के वर्षा आधारित क्षेत्र औसतन हर तीन साल में एक बार सूखे से पीड़ित रहे हैं। अक्सर सूखे का असर तीन से छः साल के लिये बना रहता है। सूखे के कारण जल उपलब्धता की कमी फसल और चारा उत्पादन को प्रभावित करती है। सूखा कृषि उत्पादन पर प्रत्यक्ष और नकारात्मक प्रभाव डालता है। वर्षा आधारित क्षेत्रों में गम्भीर सूखे ने 20 से 40 प्रतिशत तक कृषि उत्पादन को कम किया है। इसलिये यह कोई आश्चर्य का विषय नहीं है कि वर्षा आधारित क्षेत्रों में किसान आजीविका के स्रोत के रूप में खेती को छोड़ रहे हैं।

सूखे के प्रभाव का आकलन


सूखे के प्रभाव को मुख्य रूप से तीन वर्गों में बाँटा गया हैः

1. आर्थिक प्रभाव यह मुख्य रूप से कृषि एवं इससे सम्बन्धित क्षेत्र जैसे वानिकी मत्स्य पालन, पशु पालन आदि से सम्बन्धित होता है एवं कृषि के अलावा जल आपूर्ति भी इससे जुड़ी हुई है। कृषि एवं पशुधन से प्राप्त होने वाले उत्पादन में कमी के अलावा इन क्षेत्रों में रोग एवं बीमारियों की प्रकोप से होने वाली क्षति भी आर्थिक व्यवस्था को प्रभावित करती है। दूसरे आर्थिक प्रभावों में बढ़ी रोजगारी और राज्य तथा संघीय सरकार को राजस्व की हानि आदि शामिल हैं।

2. पर्यावरणीय प्रभाव- सूखे के इस प्रभाव के अन्तर्गत पौधों एवं जन्तुओं की प्रजातियों में कमी, जंगली जानवरों का ह्रास, जल एवं हवा की गुणवत्ता को नुकसान, जंगलों में आग द्वारा हानि, भूमि के गुणों में प्रतिकूल बदलाव आदि आते हैं। ऐसे नुकसान की सांख्यिकीय गणना मुश्किल होती है।

3. सामाजिक प्रभाव - इसके तहत आम नागरिक के जन-जीवन से जुड़ी हुई समस्याओं में वृद्धि जैसे स्वास्थ्य में गिरावट, खाद्यान्न एवं जल में कमी से मारामारी, सुरक्षा एवं जीवन मूल्यों में कमी आदि आते हैं। कुल मिलाकर यह आर्थिक एवं पर्यावरणीय प्रभाव का प्रतिफल है।

सूखा और खाद्य सुरक्षा


सूखा और खाद्य सुरक्षा दोनों आपस में जुड़े हुए हैं। हमारे देश में सूखा प्रभावित जिलों की संख्या कृषि योग्य भूमि का 42 प्रतिशत है। वर्षा सिंचित कृषि, विशेष रूप से इन क्षेत्रों में, भारत की अर्थव्यवस्था में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। राष्ट्रीय वर्षा सिंचित क्षेत्र प्राधिकरण (National Rainfed Authority of India) के अनुसार, वर्षा आधारित फसलों में खाद्य फसलों के अन्तर्गत कुल क्षेत्रफल का 48 प्रतिशत और गैर-खाद्य फसलों के अन्तर्गत 68 प्रतिशत क्षेत्र आता है। किसानों की संख्या का लगभग 50 फीसदी हिस्सा इन क्षेत्रों में केन्द्रित है।

भारत के वर्षा आधारित क्षेत्र औसतन हर तीन साल में एक बार सूखे से पीड़ित रहे हैं। अक्सर सूखे का असर तीन से छः साल के लिये बना रहता है। सूखे के कारण जल उपलब्धता की कमी फसल और चारा उत्पादन को प्रभावित करती है। सूखा कृषि उत्पादन पर प्रत्यक्ष और नकारात्मक प्रभाव डालता है। वर्षा आधारित क्षेत्रों में गम्भीर सूखे ने 20 से 40 प्रतिशत तक कृषि उत्पादन को कम किया है। इसलिये यह कोई आश्चर्य का विषय नहीं है कि वर्षा आधारित क्षेत्रों में किसान आजीविका के स्रोत के रूप में खेती को छोड़ रहे हैं।

राजस्थान जैसे राज्य में, जो मुख्य रूप से वर्षा आधारित कृषि क्षेत्र रहा है, कृषि रोगजार से गैर-कृषि रोजगार के रूप में एक नाटकीय बदलाव देखा गया है।

सूखा अचानक नहीं बल्कि धीरे-धीरे उत्पन्न होने वाली आपदा है एवं इसकी तीव्रता भी अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग होती है। इसका प्रबन्धन इसकी तीव्रता के आधार पर ही निर्भर करता है। कम सूखे की स्थिति में वैकल्पिक व्यवस्था द्वारा ही इससे निपटा जा सकता है, परन्तु यदि किसी स्थान विशेष पर सूखे की तीव्रता अधिक एवं बार-बार हो तो इसके लिये स्थायी योजना की आवश्यकता होती है। वर्षा आधारित क्षेत्रों में सूखा छोटे और सीमान्त किसानों को सबसे ज्यादा प्रभावित करता है और उनके भोजन और आजीविका सुरक्षा पर प्रभाव डालता है। सबसे छोटे किसान ऐसे क्षेत्रों में रहते हैं जहाँ मानसून बारिश ही सिंचाई का एक मात्र स्रोत होती है और उनकी जीविका केवल एक ही फसल की खेती पर निर्भर करती है।

सूखा और अनियमित मानसून की खेती में जोखिम लेने की प्रवृत्ति को कम करता है। लगभग 78 प्रतिशत किसान, जिन्होंने पिछले एक दशक में आत्महत्या की, वे लघु एवं छोटे किसान थे और उनमें से 76 प्रतिशत आधारित कृषि पर निर्भर थे।

सूखा प्रबन्धन


सूखा अचानक नहीं बल्कि धीरे-धीरे उत्पन्न होने वाली आपदा है एवं इसकी तीव्रता भी अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग होती है। इसका प्रबन्धन इसकी तीव्रता के आधार पर ही निर्भर करता है। कम सूखे की स्थिति में वैकल्पिक व्यवस्था द्वारा ही इससे निपटा जा सकता है, परन्तु यदि किसी स्थान विशेष पर सूखे की तीव्रता अधिक एवं बार-बार हो तो इसके लिये स्थायी योजना की आवश्यकता होती है। दोनों ही स्थितियों में सूखे से निपटने हेतु प्रयासों का कार्यान्वयन कई स्तरों द्वारा सम्भव है, जैसे :

सरकारी व्यवस्था


1. जिला, क्षेत्रीय एवं राज्य स्तर पर नीति निर्माण
2. ग्रामीण विकास हेतु संरचना
3. सामग्रियों की आपूर्ति, वितरण एवं कृषि परामर्श सेवा

गैर-सरकारी क्षेत्रों का सहयोग


1. स्वयंसेवी संस्थान
2. ग्रामीण संस्थान
3. निजी इकाइयाँ
4. स्थानीय निकाएँ

सूखे से निपटने के उपाय


सूखाग्रस्त क्षेत्रों में इसके दुष्प्रभाव से निपटने हेतु निम्नलिखित उपायों को प्रभावी ढंग से शुरू करने की आवश्यकता होती है, जैसे :

1. लोक सूचना और शिक्षा अभियान।
2. आपातकाल संरक्षण कार्यक्रम : अनाज एवं चारे का भण्डारण ताकि लम्बी अवधि तक इसकी आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके।
3. मनुष्यों एवं पशुधन हेतु पेयजल की व्यवस्था।
4. पानी के अनावश्यक उपयोग पर प्रतिबन्ध।
5. विभिन्न सूखाग्रस्त क्षेत्रों में चारे की आपूर्ति, वहाँ की स्थिति एवं पशुधन की संख्या के अनुरूप हो।
6. चारा उत्पादन हेतु किसानों को प्रत्साहित करना ताकि चारे की कमी कम-से-कम हो।
7. वर्षाजल के संचय हेतु संरचना का निर्माण, पुरानी, संरचाओं जैसे-पुराने तालाब, नालों, जलाशयों की मरम्मत एवं नई इकाइयों का निर्माण।
8. कृषि की नई तकनीक, उन्नत किस्मों के बीज, उन्नत कृषि औजार, रोग एवं व्याधि से बचाव हेतु उपयुक्त दवाइयों एवं मौसम आधारित कृषि परामर्श आदि को समय से उपलब्ध कराना।
9. कम दर पर एवं अल्प अवधि हेतु कृषि ऋण की व्यवस्था।
10. भूमि का उसकी श्रेणी के अनुरूप बिल्कुल सही-सही उपयोग हो, उद्यान फसलों को उचित स्थान मिले एवं यथा सम्भव फसलों के अनुरूप स्प्रिंकलर या ड्रिप जैसी सिंचाई व्यवस्था को अपनाएँ।
11. सूखा आने की स्थिति में प्रखण्ड एवं जिलास्तर पर राहत कार्यों का गठन किया जाये ताकि राहत कार्यों का गठन किया जाये ताकि कार्यों को सही एवं प्रभावी रूप से लागू किया जा सके।
12. फसल एवं पशुधन के बीमा की सही से व्यवस्था करना।
13. अधिक सूखाग्रस्त क्षेत्रों में पशुधन को एकत्रित कर चारे की आपूर्ति को सुनिश्चित करना।
14. चयनित वाणिज्यिक उपयोग का निषेध।
15. मौसम की लम्बी अवधि पूर्वानुमान को ज्यादा प्रभावी बनाना ताकि सूखा आने से काफी पहले इसके बारे में जानकारी दी जा सके तथा समय-समय पर आकलन भी किया जा सके।
बारिश न हो तो सूखा झेलना किसानों की नियति हैसारांश में हम कह सकते हैं कि सूखा सारी प्राकृतिक घटनाओं में सबसे जटिल है। यह जलवायु की सामान्य घटना है और इसकी पुनरावृत्ति को रोका नहीं जा सकता। हालांकि, इसकी विशेषताओं के बारे में भ्रम की स्थिति बनी हुई है। यह वही भ्रम है, जिसके चलते शायद, विश्व के अधिकांश हिस्सों में, सूखा प्रबन्धन के सक्रिय प्रयास में कमी है।

सूखे की विशेषताओं एवं इसकी अपरिहार्यता की बेहतर समझ के साथ, वैज्ञानिक, नीति-निर्धारक एवं जनता के द्वारा सूखे के जोखिम को कम किया जा सकता है। यदि हमें सूखे से उत्पन्न व्यक्तिगत कठिनाइयों के साथ-साथ आर्थिक और पर्यावरणीय नुकसान को कम करना है तो इसके लिये पहले से ही तैयारियों की जरूरत है। इसके लिये सभी स्तरों पर नीति निर्माताओं के बीच अन्तः विषय सहयोग के साथ-साथ सहयोगात्मक प्रयास की आवश्यकता होगी।

सम्पर्क सूत्र :


डॉ. राजेश कुमार गोयल एवं डॉ. रंजय कुमार सिंह प्रधान वैज्ञानिक (मृदा एवं जल संरक्षण विशेषज्ञ) प्राकृतिक स्रोत एवं पर्यावरण सम्भाग, केन्द्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान, जोधपुर 342003 (राजस्थान)

[मो. :09414410251]



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