सूखे बुंदेल में कृषि की एक संभावना “सन”

Submitted by Hindi on Tue, 04/09/2013 - 11:14
Source
गोरखपुर एनवायरन्मेंटल एक्शन ग्रुप, 2011
सूखा क्षेत्र के रूप में जाने वाले बुंदेलखंड में किसानों ने यहां की जलवायु, मिट्टी के अनुसार स्थानीय ज्ञान को विकसित करते हुए बहु आयामी फसल ‘सन’ को प्रोत्साहित किया है।

परिचय


बुंदेलखंड सदियों से ही सूखा क्षेत्र रहा है, यही कारण है कि यहां के किसानों, कृषक मज़दूरों, कृषक शिल्पकारों ने यहां की परिस्थितियों के अनुरूप पद्धतियां और तकनीक विकसित कर जीवनशैली इजाद कर ली थी। ये फसलें लोगों को आजीविका और रोज़गार तो देती ही थीं, कम पानी में पैदावार भी देती थीं और खेती की उर्वराशक्ति भी बढ़ाती थी।

किसानों ने यहां की जलवायु और मिट्टी के स्वभाव के अनुसार फसलचक्र, उसी के अनुरूप मिश्रित खेती, जरूरत और स्थानीय ज्ञान के अनुसार ही नगदी फ़सलों के बीजों का भी विकास कर लिया था। उन्हीं में से एक बहुआयामी नगदी फसल “सन” भी है।

उपयोगिता


“सन” का उपयोग भोजन के रूप में कभी भी किसी भी प्रकार से नहीं होता रहा है, पर यह बहुउपयोगी है। एक तरह से देखा जाए तो बिना सन के बुंदेलखंड में खेती करना यदि असंभव नहीं तो बहुत कठिन अवश्य है। यहां रस्सी और सुतली के रूप में सन के रेशों का उपयोग किया जाता है। चारपाई, मचिया आदि की बुनाई में भी सन की बटी हुई रस्सी का ही उपयोग होता है। बैलगाड़ी में नटबोल्ट की जगह इसी रस्सी का उपयोग किया जाता है। घरों में खपरैल छानी और छप्पर छाने के लिए सन से रेशे अलग कर लेने के बाद बचे हुए डण्ठल, जिन्हें स्थानीय बोलचाल की भाषा में “सेल्हा” कहते हैं, का उपयोग किया जाता है। सेल्हों के द्वारा बनाए गए छानी छप्पर तीन से पांच साल तक बरसात झेल ले जाते हैं। सन् की मुलायम टहनियां, अधपके फल और फूल श्रम करने वाले पशुओं के लिए टॉनिक का काम करते हैं। इन मुलायम टहनियों को किसान चारा कतरने वाली मशीन से कतर कर भूसे में मिला कर बैलों को खिलाते हैं, जिससे बैल हर समय जुताई, बुवाई के लिए तत्पर रहते हैं। जाड़े के समय सन के बीजों को पानी में भिगो कर दाने के रुप में खिलाने से बूढ़े बैलों में भी ताकत आ जाती है।

सन की जड़ों और पत्तियों में जितनी अधिक नाइट्रोजन मिलती है उतनी शायद ही किसी अन्य फसल की जड़ों और पत्तियों में मिलती हो। पैलानी डेरा के 93 वर्षीय गयादीन निषाद बताते हैं कि जिस खेत में एक बार सन बो दिया जाता है, उस खेत में अगले दो साल तक किसी प्रकार की खाद आदि डालने की जरूरत नहीं पड़ती, बावजूद इसके फसल बहुत ही अच्छी होती है।

भूमि और समय


“सन” कम वर्षा की सम्भावना पर दोमट तथा पंडुवा में, लेकिन सामान्य बारिश के समय राकड़ भूमि में अच्छी उपज देती है। यदि बहुत कम वर्षा की सम्भावना है और खेत में जलभराव की सम्भावना नहीं है तो सन दोयम दर्जे की मार मिट्टी में भी बोई जा सकती है और अच्छी पैदावार होती है।

बीज


“सन” बुंदेलखंड में खरीफ की फसल है, जो बरसात के मौसम की पहली बारिश या पंद्रह दिन के बाद ही बोई जाती है। यहां इसकी मुख्य रूप से दो ही प्रजातियाँ प्रचलित हैं। एक तो यहां की देशी बीज और दूसरे को लोग विलायती कहते हैं।

बुआई


खेत की एक सामान्य जुताई के बाद खेत में सन के बीज छींट कर एक बार पुनः जुताई कर दी जाती है। यदि खेत में पर्याप्त नमी हो, तो सन के बीजों का अंकुरण चौबीस घंटे बाद ही दिखाई पड़ने लगता है।

निराई-गुड़ाई


सन तेजी से बढ़ने वाली बहुत ही घनी फसल है इसलिए इसमें निराई, गुड़ाई और सिंचाई की कोई जरूरत नहीं होती। चूंकि जानवर इसे बहुत चाव से खाते हैं, इसलिए इसकी रखवाली जरूर मशक्कत का काम है।

तैयार होने की अवधि


देशी बीज की बुआई जून, जुलाई के महीने में की जाती है, और कटाई नवंबर के महीने में जबकि विलायती बीज की बुआई भी जून के ही महीने में की जाती है परंतु यह सितंबर अंत तक कटने के लिए तैयार हो जाती है। इसलिए यदि समय से एक पानी मिल गया तो इसी खेत में गेहूं की फसल आसानी से बोई जा सकती है।

कटाई


इसकी कटाई दो तरह से की जाती है। एक तो डांडी और दूसरा साधारण। जिस फसल से अधपके फल काट लिए जाते हैं उसे डांडी और जिस सन से बीज पकने के बाद काटे जाते हैं उसे साधारण कहते हैं। कोई भी किसान अपनी सारी फसल न तो डांडी के रूप में काटता है और न ही साधारण रूप में । घेंटी के अंदर घुंघुरुओं की आवाज कर सन के बीज फसल के पकने का संदेश देते हैं। सन के बीज के पकने का संदेश देते हैं। सन् की कटाई जड़ के दो इंच ऊपर से तथा ऊपर की तरफ शाखाओं के पहले की जाती है। काटने के बाद इसे सूखी जगह पर जहां सीलन आदि ना हो, ऐसी जगह में रखकर छाये में सुखाया जाता है। इसे बरसात के पानी में भीगने से बचाना बहुत आवश्यक है।



सन की तैयारी


फाल्गुन के महीने में सन के बोझ को एक-एक बोझ प्रतिदिन के हिसाब से सड़ाने के लिए गाड़ा जाता है। मौसम की गर्मी के अनुसार सात से दस दिनों में सन सड़ कर धुलाई के लिए तैयार हो जाती है। सन के सड़ जाने के बाद इसकी धुलाई का काम किया जाता है। पानी में फींच फींच कर इसे धोया जाता है, जिससे उसका रेशा (सन) और सेल्हा अलग हो जाता है। ये बहते और ठहरे दोनों ही तरह के पानी में धोया सकता है, लेकिन बहते पानी में धोया गया सन अधिक चमकीला और सुंदर होता है। धोते समय सन के बोझ को छोट-छोटे पूरों में बांट दिया जाता है, जिससे वह आसानी से सुखता भी है और छीलने में भी असानी रहती है। सूखने के बाद जब किसान के पास बरसात के दिनों में फ़ुरसत का समय होता है, तब वह उस सन से सेल्हा अलग करने तथा सन से सुतली कातने काम करता है।

सन आजीविका का मजबूत आधार


बुंदेलखंड के लिए सन केवल एक फसल ही नहीं, वरन् यहां के समाज की अर्थनीति की रीढ़ है, जिसे किसान अपने खेत में फसल के रूप में पैदा करता है। कृषक मज़दूर बटाई पर इसकी धुलाई निछाई करते हैं, जिससे उन्हें फ़ुरसत के समय रोज़गार उपलब्ध होता है। सन से अलग कर लिए गए सेल्हा और सन का आधा हिस्सा फिर किसान के पास लौट कर आ जाता है, जिसे वह सुतली कातने वाले शिल्पकारों को देता है। एक किलो सुतली कातने पर शिल्पकार को ढाई किलो अनाज मिलता है। कती हुई सुतली फिर लौट कर किसान के घर आ जाती है, किसान अपने जानवरों के लिए, कुएं से पानी निकालने के लिए बैलगाड़ी के लिए रस्सी बनाने में माहिर कृषक मज़दूरों को देता है। इस काम के बदले दो से पांच सौ रुपया प्रति परिवार प्रतिदिन कमा लेता है। सन की सुतली से बैलगाड़ी में अनाज ढोने के लिए पाखरी, सर में भूसा ढोने के लिए टपरिया, अन्न भंडारण के लिए बड़े-बड़े बोरे (ठेकी) भी बनाये जाते हैं, जिससे कारीगरों को अच्छी कमाई हो जाती है। लघु और सीमांत किसान सन की धुलाई, सुतली की कताई और रस्सी का निर्माण स्वतः ही कर लेते हैं, जिससे उनकी काफी बचत भी हो जाती। इस प्रकार बुंदेलखंड में सन एक फसल ही नहीं कृषि एवं आजीविका का आधार है।

हालांकि एक एकड़ सन की फसल से होने वाली उपरोक्त आय व लाभ शुद्ध रूप से बाजार आधारित है, लेकिन गांव के पलायन को रोकने के लिए, सबको रोज़गार देने तथा गांव के आपसी रिश्तों को मजबूत रखने के लिए पारस्परिक निर्भता में जो योगदान इस अदना सी फसल का होता है, उसे पैसों में नहीं आंका जा सकता। यह लाभ बाजार की सोच से परे है।

कुछ समस्याएं


सन की खेती के सामने कुछ समस्याएं भी हैं जिस कारण अब इसकी खेती में ग्रहण लगता जा रहा है।

अन्नाप्रथा ग्रामीण सामाजिक व्यवस्था की समझदारी कानून और व्यवस्था के पास शून्य है, इसलिए असरदार लोगों के जानवर फ़सलों को अत्यधिक हानि पहुँचाते हैं।

कृषि विश्वविद्यालयों ने बाजार के लिए लाभकारी फ़सलों को किसानों पर अनावश्यक रूप से थोप कर सन जैसी तमाम फ़सलों को हतोत्साहित किया है।

सरकारी नीतियाँ भी सन की खेती को हतोत्साहित करने में असरकारी भूमिका निभा रही हैं। सरकारी प्रश्रय पाकर बाजार किसानों के खेत और खलिहान तक में अपनी घुसपैठ बनाए हुए हैं, इस कारण भी किसानों को इस खेती का बहुत लाभ नहीं मिल पाता है।



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