सूखे से निबटने को चाहिए ठोस रणनीति

Submitted by admin on Mon, 08/04/2014 - 10:06
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पंचायतनामा, 28 जुलाई - 3 अगस्त, 2014, पटना
बिहार राज्य बाढ़ व सूखे से प्रभावित रहता है। पिछले 14 सालों में बिहार में पांच बार सूख पड़ा है। इस साल छठी बार यह परिस्थिति बन रही है। इस साल अब तक के वर्षापात के औसत के आधार पर राज्य में सूखे की स्थिति उत्पन्न हो रही है। राज्य सरकार के अनुसार अगर जुलाई माह के अंत तक राज्य में सामान्य वर्षा औसत से 19 प्रतिशत कम वर्षा होती है तो राज्य में सूखे जैसी स्थिति हो जाएगी। विभाग के अनुसार 38 जिलों में से 22 जिलों में सूखे जैसे हालात हैं। क्योंकि इन जिलों में वर्षा कम हुई है। सूखा सामान्य तौर पर तीन प्रकार के होते हैं - मौसम विज्ञान संबंधी, जल विज्ञान संबंधी और कृषि संबंधी। सूखे के संकेतक में वर्षापात के अलावा सिंचाई सुविधा, वाष्प उत्सर्जन, उच्च तापमान, मिट्टी की उर्वरता क्षमता आदि पर भी निर्भर करता है। देश में सूखा भौतिक और मौसम के बदलाव पर भी निर्भर करता है। जिसकी वजह से कृषि पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है।

सूखा प्रकृति का एक घातक खतरा है। इसकी कोई एक परिभाषा नहीं है। इसकी वजह से सूखा निवारण के लिए नीति बनाने और योजना बनाने वालों को योजना बनाने में कठिनाई होती है। यह कठिनाई यह तय करने में होती है कि कब से जल संरक्षण व सूखा निवारण के कार्यक्रम चलाये जाएं।

बिहार की कृषि वर्षा पर निर्भर है। मॉनसून का समय से न आना, वर्षा कम होना, सही समय व अंतराल पर वर्षा का न होना आदि कारणों से खेती प्रभावित होती है। बिहार की विडंबना है कि यह जल स्रोतों में धनी है, फिर भी राज्य हमेशा सूखे से प्रभावित होता रहता है। राज्य की औसतन वर्षापात 1120 मिमी है, लेकिन विविधता के कारण पूर्वी और उत्तरी क्षेत्र में 20000 मिमी वर्षापात है, और पश्चिमी व दक्षिण पश्चिमी क्षेत्र में औसतन 10000 मिमी बारिश होती है।

इसकी वजह से राज्य के 33 प्रतिशत हिस्से में 7500 मिमी से कम वर्षा होती है और दक्षिणी क्षेत्र हमेशा से सूखा के लिए अति संवेदनशील है। 35 प्रतिशत उत्तरी-पूर्वी क्षेत्र में भी 11200 मिमी से कम बारिश होती है, जहां वर्षा की कमी के कारण सूखे की संभावना बनी रहती है। गया, नवादा, लखीसराय, जमुई, नालंदा जिले अति सूखा प्रभावित जिले हैं, जबकि बक्सर, भोजपुर, कैमूर, रोहतास, बांका मध्यम सूखा प्रभावित वाले जिले हैं और औरंगाबाद, अरवल, जहानाबाद कम सूखा प्रभावित वाले जिले हैं।

बिहार राज्य बाढ़ व सूखे से प्रभावित रहता है। पिछले 14 सालों में बिहार में पांच बार सूख पड़ा है। इस साल छठी बार यह परिस्थिति बन रही है। इस साल अब तक के वर्षापात के औसत के आधार पर राज्य में सूखे की स्थिति उत्पन्न हो रही है। राज्य सरकार के अनुसार अगर जुलाई माह के अंत तक राज्य में सामान्य वर्षा औसत से 19 प्रतिशत कम वर्षा होती है तो राज्य में सूखे जैसी स्थिति हो जाएगी। विभाग के अनुसार 38 जिलों में से 22 जिलों में सूखे जैसे हालात हैं। क्योंकि इन जिलों में वर्षा कम हुई है। इन 22 जिलों में इस सप्ताह तक 21 से 73 प्रतिशत कम वर्षा हुई है।

आई.एम.डी. के आंकड़ों के अनुसार सभी 22 जिलों में बक्सर विशेष रूप से सूखा प्रभावित हो सकता है, जहां 72 प्रतिशत औसत से कम बारिश हुई है, सहरसा दूसरे स्थान पर है, यह 70 प्रतिशत की कम वर्षा से प्रभावित है। कैमूर 57 प्रतिशत, रोहतास 53 प्रतिशत और शिवहर में 47 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई है। वैशाली, पश्चिमी चंपारण, पूर्वी चंपारण, सीतामढ़ी, पूर्णिया, मधेपूरा, जहानाबाद, गोपालगंज, अरवल और कटिहार जिले में औसतन 30 प्रतिशत कम वर्षा हुई है।

जबकि पटना और मुजफ्फरपुर में क्रमश: 23 और 27 प्रतिशत कम बारिश हुई है। सूखे की संभावनाएं बिहार राज्य में प्रबल है। मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी के वक्तव्य में स्पष्ट है कि राज्य सरकार सूखे से निपटने के लिए तैयार है। सूखे की आशंकाओं को देखते हुए राज्य सरकार के आपदा प्रबंधन के तहत सूखे से निपटने के लिए शताब्दी अन्नकलश योजना के तहत 10 करोड़ राशि का आवंटन सुरक्षित रखा गया है। इसके अंतर्गत सूखे प्रभावित क्षेत्र के व्यस्क को प्रति सप्ताह 10 किलो अनाज और अव्यस्क को प्रति सप्ताह पांच किलो अनाज उपलब्ध कराया जाएगा। साथ-ही-साथ डीजल अनुदान के लिए प्रति एकड़ भूमि पर तीन बार सिंचाई के लिए 1500 रुपए की अनुदान राशि को सुरक्षित रखा गया है।

सूखे की स्थिति से निपटने के लिए राज्य सरकार स्तर पर तैयारी की जा रही है, फिर भी सूखे की मार से राज्य की गरीब, वंचित व उपेक्षित वर्ग को ज्यादा संकट झेलने पड़ते हैं। पिछले वर्ष 2013 में 38 जिलों में से 33 जिलों को सूखा घोषित किया गया था। इस वर्ष में राज्य सरकार द्वारा सूखे के लिए विशेष पहल की गई थी। कृषि क्षेत्र में डीजल अनुदान, बीज अनुदान, सिंचाई साधन के लिए वैकल्पिक व्यवस्था, फसल बीमा के लिए पहल आदि के लिए पहल की गई।

पीने के पानी के लिए खराब हैंडपंप, ट्यूबवेल की मरम्मत व नए हैंडपंप लगाना, टैंकर से पानी की व्यवस्था करना, पाइप वाटर सप्लाई के लिए बिना अवरोध के बिजली उपलब्ध करना आदि की पहल की गई। खाद्य अनाज क्षेत्र में शताब्दी अन्नकलश योजना का क्रियान्वयन, अनाज की उपलब्धता आदि के लिए पहल किया गया।

पशुधन क्षेत्र में चारा की उपलब्धता, पशुधन के पीने के पानी के लिए वैकल्पिक व्यवस्था, पशुओं के उपचार के लिए आवश्यक दवा की उपलब्धता, चलंत पशु चिकित्सा टीम की व्यवस्था, आदि की पहल की गई। मनरेगा के अंतर्गत जल संवर्धन से संबंधित योजनाओं का विशेष योजना व क्रियान्वयन के लिए पहल की गई। ऊर्जा क्षेत्र में बिना अवरोध के प्रतिदिन आठ घंटे बिजली की उपलब्धता, खराब ट्रांसफार्मर की मरम्मत के लिए विशेष पहल की व्यवस्था की गई।

इसी प्रकार से स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा क्षेत्र में दवा की समुचित व्यवस्था, चलंत मेडिकल टीम की व्यवस्था और समेकित बाल विकास योजना के बेहतर क्रियान्वयन के लिए सूखा ग्रस्त जिलों में विशेष रूप से पहल की गई। इससे यह स्पष्ट है कि राज्य सरकार सूखे के निवारण व राहत के लिए विशेष योजना बनाकर पहल करती है। इसके लिए केंद्र सरकार से भी वित्तीय राशि उपलब्ध की जाती है।

सूखे के दौरान किसानों को बैंक ऋण व अन्य ऋण के लिए भी समय-सीमा में बदलाव होती रहती है व सूखे वर्ष के दौरान ऋण भी माफ कर दिया जाता है, साथ ही साथ कम ब्याज दर पर कृषि ऋण भी उपलब्ध कराया जाता है। निश्चित रूप से सूखे की राहत के लिए सरकार की ओर से राहत की व्यवस्था की जाती है परंतु इन राहतों का मूल्यांकन व इसकी वास्तविक पहुंच का आंकलन की सच्चाई हमें समझने की आवश्यकता है।

क्राइसिस मैनेजमेंट कमेटी में चर्चा भारतीय मौसम विभाग के इनपुट


स्टेट एक्जीक्यूटिव कमेटी और सरकार के प्रतिनिधि राज्य में सूखा की घोषणा करते हैं। पहले ब्लॉक स्तर पर वर्षा का रिकार्ड तैयार किया जाता है और फसल आंकलन किया जाता है। इस प्रक्रिया से राज्य सरकार सूखे की घोषणा करती है। सूखा राहत की योजना एसडीआरएफ/ एनडीआरएफ की गाइड लाइन के आधार पर तैयार की जाती है। फिर योजना की स्वीकृति व क्रियान्वयन के लिए केंद्र सरकार को भेजा जाता है।

राज्य सरकार को सूखे से बचने की पूर्व तैयारी करनी होगी। इसके लिए राज्य सरकार को दीर्घकालीन योजना बनानी होगी। जल संसाधनों व स्रोतों का संरक्षण, संवर्धन व प्रबंधन का क्रियान्वयन प्राथमिकता के आधार पर होना चाहिए। आहर-पइन जैसे पारंपरिक सिंचाई स्रोतोंं को पुर्नजीवित करने की आवश्यकता है। मनरेगा के तहत जल संर्वद्धन, संरक्षण पौधा रोपण, भूमि सरंक्षण, सूखा घोषणा के मानक में तकनीकी मानक के साथ-साथ मानवीय व समावेशोंं मानक को शामिल करने की आवश्यकता है। सूखा को राजनीतिक पहल से नहीं देखना चाहिए।

सूखे की घोषणा की प्रक्रिया


केंद्र और राज्य सरकार के सूचनाओं के आदान-प्रदान व तैयारी के आधार पर सूखे की प्रबंधन की जाती है। सूखा घोषित करने का अधिकार राज्य सरकार के अधीनस्थ है। जबकि केंद्र सरकार सूखे से निपटने के साधन मुहैया कराती है और वित्तीय व संस्थागत प्रक्रियाओं को सुगम करती है। सूखे प्रबंधन चक्र को समझने की जरूरत है।

सूखे की चेतावनी के संकेतक


मॉनसून में देरी : दक्षिण पश्चिमी मॉनसून में देरी दो सप्ताह तक वर्षापात में कमी गंभीर

जल का संकट : जुलाई के मध्य में औसत से 19 प्रतिशत कम वर्षा।

अन्य : वर्षा की कमी लगातार 3-6 सप्ताह तक मिट्टी की आर्द्रता में कमी औसतन से कम भूमि जलस्तर सूखे के आपातकालीन संकेतक फसल बोआई के समय वर्षा में कमी या वर्षा न होना मध्य मौसम में मॉनसून का खत्म हो जाना लगातार चार सप्ताह तक शुष्क दौर या 20-40 प्रतिशत औसतन वर्षापात में कमी पानी की कमी के कारण फसल का सूखना और जुलाई -अगस्त माह में गर्म हवा का बहाव बिहार राज्य में सूखा घोषणा की प्रक्रिया जिला मजिस्ट्रेट द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट जिसमें वर्षा की कमी, खरीफ फसल का नुकसान, विशेष कर धान की बुआई, कम वर्षा के कारण अन्य क्षेत्र में प्रभाव व जमीनी स्तर की सच्चाई सम्मिलित है।

जिला मजिस्ट्रेट द्वारा राज्य सरकार को जिले को सूखा घोषित करने के लिए फसल की स्थिति व वर्षा की कमी के आधार पर अनुमोदन।

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