स्वामी सानंद : नौकरियाँ छोड़ी, पर दायित्वबोध नहीं

Submitted by RuralWater on Sun, 05/08/2016 - 15:54

स्वामी सानंद गंगा संकल्प संवाद - 17वाँ कथन आपके समक्ष पठन, पाठन और प्रतिक्रिया के लिये प्रस्तुत है:

.(बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी और रुड़की यूनिवर्सिटी में छात्र गुरुदत्त अग्रवाल के विद्रोही तेवर की दास्तान ने स्वामी सानंद के निजी अतीत में मेरी दिलचस्पी बढ़ा दी थी। इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद आगे की नौकरी और अनुभवों के बारे में जानने की मेरी जिज्ञासा देख, स्वामी जी ने उस हिस्से की परतें भी खोली। मुझे उनकी याददाश्त पर आज भी ताज्जुब है। मैंने उन्हें तथ्यों और घटनाक्रमों को कुछ यूँ बयाँ करते पाया, जैसे एक चलचित्र। सबसे अनुकूल यह रहा कि उन्होंने मेरे किसी प्रश्न का उत्तर देने में ना-नुकुर नहीं की।- प्रस्तोता)

 

पहली नौकरी : सिंचाई विभाग


तिवारी जी, आगे की कुछ ऐसी रही कि इंजीनियरिंग के आखिर में मुझसे पूछा गया कि बिल्डिंग में जाओगे कि इरीगेशन में जाओगे। मैं सिंचाई विभाग में चला गया। मुझे, आने-जाने वालों को बताने का काम सौंपा गया। तभी बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी का एक ग्रुप आया। मैंने स्टुडेंट्स को सब बताया। उस ग्रुप में जो टीचर थे, उन्होंने मुझसे कहा- “आपने जितने अच्छे से समझाया है, उससे लगता है कि आप एक अच्छे टीचर बन सकते हो।’’ यह बात मेरे दिमाग में बैठ गई। जगह निकली, तो मैंने आईआईटी, कानपुर में नौकरी के लिये अप्लाई कर दिया; सेलेक्ट भी हो गया।

 

दूसरा ठिकाना : आईआईटी, कानपुर


मैंने सिंचाई विभाग की नौकरी की, तो रिहन्द बाँध पर ही की। मुझे 335 रुपए पर रखा गया। 75 रुपए प्रोजेक्ट भत्ता वगैरह अलग थे। मकान-फर्नीचर था ही। फिर यमुना के लिये हुआ, तो कई भत्ते बन्द हो गए। 25 रुपए का मकान लेना पड़ा। आने-जाने वालों के खर्च; दो छोटे भाइयों की पढ़ाई का खर्च.. कुल मिलाकर कम पड़ रहा था। आईआईटी, कानपुर में तनख्वाह भी बेहतर थी। सो, वहाँ चला गया।

 

विद्रोही तेवर ने दिलाया इस्तीफा


आईआईटी, कानपुर का क्या बताऊँ; इमरजेंसी का वक्त था। उस वक्त वहाँ के डायरेक्टर थे- डॉक्टर अमिताभ भट्टाचार्य। डॉ. भट्टाचार्य, उस वक्त के शिक्षा मंत्री सिद्धार्थ शंकर राय के निकट थे। सिद्धार्थ शंकर, इन्दिरा गाँधी के निकट थे। इस निकटता को कुछ ऐसा नशा था कि अमिताभ भट्टाचार्य स्वयं को इन्दिरा गाँधी ही मानते थे। मेरा क्या था कि मैं डॉक्टर शुक्ला व दूसरे सभी जो जेल में बन्द थे, उनसे जेल में मिलने जाता था। उनके परिवारों का ख्याल रखता था। बस, इसी को लेकर अमिताभ भट्टाचार्य, मुझे अपना दुश्मन मानने लगे। जब चुनाव के नतीजे आए, तो ढोल लेकर उनके निकट खूब नारे लगे- ‘भट्टाचार्य को बतला दो, इन्दिरा गाँधी हार गई है।’

अब डायरेक्टर भट्टाचार्य की कलाबाजी देखिए। मोरार जी सरकार में पी.सी. चुंदर शिक्षा मंत्री बने। वह भी बंगाल के ही थे। तो भट्टाचार्य ने पी.सी. चुंदर से भी दोस्ती बना ली। इसके बाद वह हमें बुलाकर कहते थे- ‘बोलो, क्या कर सकते हो?’

मैंने आईआईटी, कानपुर की नौकरी से इस्तीफा देने का निर्णय लिया। कोई और नौकरी हाथ में नहीं थी; फिर भी मैंने इस्तीफा दे दिया। मैं जानता था कि घर जाऊँगा, तो सबसे ज्यादा खुश मेरे बाबा ही होंगे। यही हुआ।

 

दो साल खेती-बाड़ी


मैंने अपने एक 30 एकड़ के बाग का मैनेजमेंट सम्भाला। छोटे भाई के साथ मेरी ज्यादा निकटता थी। मैं खेत पर ही रहता था; वहीं पहली मंजिल पर। मैं ट्रैक्टर चला लेता था। इस तरह ढाई साल खेती की। हाँ, वहाँ बैठे-बिठाए कंसलटेंसी आ जाती थी, तो कर लेता था। तभी मैंने वर्ल्ड बैंक की कंसलटेंसी भी की। कलकत्ता शहर के सीवेज की डिजाइन बनाई। हालांकि उस डिजाइन का उपयोग नहीं हुआ, लेकिन वह समय की बात थी।

 

तीसरी नौकरी : केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड


डॉ. निलय चौधरी- यादवपुर यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर थे। वह मुझसे परिचित थे। वह मुझे बुलाते रहते थे। सीपीसीबी (केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड) के चेयरमैन हुए तो उन्होंने मुझसे कहा कि सीपीसीबी के मेम्बर सेक्रेटरी होकर आ जाओ। मैंने कहा कि मैं अब नौकरी नहीं करना चाहता। नौकरी के मेरे अनुभव अच्छे नहीं है।

उन्होंने कहा - ‘अनुभव भूल जाओ। आ जाओ। तुम्हारी जरूरत है।’

मैंने कहा कि मैं अप्लाई नहीं करुँगा। उन्होंने जो किया हो। सीआई इंक्वायरी घर आई। मैंने ज्वाइन किया। वहाँ भी वही हुआ।

 

एक अनुभव : प्राइवेट बनाम पब्लिक


एक डॉ. मोहन्ती थे। डॉ. मोहन्ती व सरकार चाहती थी कि प्रदूषण के प्रावधानों का प्राइवेट सेक्टर पर तो कड़ाई से पालन हो, पर पब्लिक सेक्टर पर नरमी बरती जाये। इस पर मेरा मतभेद हुआ। मैंने कहा- ‘पॉल्युशन इज पॉल्युशन; तो फिर पारर्शियल्टी क्यों?’

‘नेशनल टैक्सटाइल कारपोरेशन’ पब्लिक सेक्टर की कम्पनी है और ‘एंग्लो टैक्सटाइल्स’ प्राइवेट सेक्टर की। मैंने दोनों को नोटिस दिया था। वे नहीं आये। मैंने फिर लिखा कि मेरा उद्देश्य यह है कि चर्चा करके ट्रीटमेंट प्लांट लगाएँ। दोनों ही नहीं आये, तो मैंने दोनों के खिलाफ केस दायर कर दिया। केस दायर होने पर ‘एंग्लो टैक्सटाइल्स’ वाले आये। बातचीत के बाद वे ट्रीटमेंट प्लांट लगाने का तैयार हो गए। उन्होंने इस सन्दर्भ में एक एफीडेविट (शपथपत्र) भी दिया। अतः मैंने उनके खिलाफ केस वापस ले लिया। एनटीसी के खिलाफ केस चलता रहा। कोर्ट ने मिल को बन्द करा दिया। अब एनटीसी वालों ने क्या किया कि भारत सरकार के टैक्सटाइल सेक्रेटरी को पकड़ा। उन्हें कुछ समझाया होगा। हमारे टी एन खोसू साहब थे। उन्होंने मुझे बुलाया। मैंने उन्हें स्थिति बताई। मैं एनटीसी वालों के पास भी गया। एनटीसी वालों का रुख यह था कि जब पैसा होगा, तब बनाएँगे। अभी नहीं बनाएँगे।

टी एन खोसू साहब, मुझे टैक्सटाइल सेक्रेटरी के पास ले गए। सेक्रेटरी महोदय खड़े तक नहीं हुए; बोले कि बैठिए। हम बैठे तो बोले - ‘क्या पियोगे?’

मैंने कहा- ‘कुछ भी।’
उन्होंने कॉफी के लिये घंटी बजाई। फिर बोले - ‘यह क्या किया आपने? नोटिस विद्ड्रा कर लीजिए।’

खोसू साहब ने उन्हें समझाने की कोशिश की। खोसू साहब ने कहा कि यदि एनटीसी साल भर में ट्रीटमेंट प्लांट लगाने का एफीडेविट दे दे, तो केस विद्ड्रा कर लेंगे। खोसू साहब ने उन्हें डेढ़ साल तक वक्त देने की बात कही।

टैक्सटाइल सेक्रेटरी ने कहा कि लिखकर नहीं दे सकते। खोसू साहब ने कहा - ‘तो फिर क्या बात हो सकती है?’ इसके बाद खोसू साहब खड़े हो गए। हम बाहर आ गए। बाद में खोसू साहब पर क्या दबाव पड़े, लेकिन मैं पीछे नहीं हटा।

एक तो यह घटना घटी। दूसरी घटना, यमुना जी को लेकर थी।

 

एक अनुभव : प्रदूषण बोर्ड


हम यमुना सफाई को लेकर सारा अध्ययन कर चुके थे। दिल्ली के सीवेज ट्रीटमेंट क्षमता कम थी और सीवेज ज्यादा था। यह 1983 की बात है। सोनिया विहार का 100 एमजीडी का वाटर प्लांट सेंक्शन होने को था। नियम था कि जब तक उद्योग का एसटीपी चालू नहीं हो जाता, कोई उद्योग चालू नहीं किया जा सकता। मैं तो वाटर ट्रीटमेंट प्लांट को भी एक उद्योग ही मानता हूँ।

मैं कह रहा था कि जब तक 90 एमजीडी का सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट नहीं लग जाता, सोनिया विहार वाटर ट्रीटमेंट प्लांट सेंक्शन न हो। उस वक्त दिल्ली जल बोर्ड नहीं था; ‘दिल्ली सीवेज एंड वाटर अंडरटेकिंग’ था। काशीनाथ जैन, उसके सुपरिटेंडिंग इंजीनियर थे। मैं उनसे मिला। उनके सामने अपनी बात रखी। उन्होंने कहा- ‘90 एमजीडी के एसटीपी में तो बहुत पैसा लगता है। सरकार पैसा देगी, तब होगा। आप ऐसा करो कि हमारे खिलाफ कोर्ट में केस कर दो। कोर्ट का ऑर्डर होगा, तो हम सरकार से पैसा माँग लेंगे।’

मैंने यह बात अपने चेयरमैन डॉ. निलय चौधरी के सामने रखी। वह मान गए। उन्होने मंजूरी दे दी। मैंने कागज तैयार किये। बोर्ड से मंजूरी के लिये भेजा। बोर्ड की मीटिंग में चार-पाँच आइटम थे। निलय चौधरी, पहले चार आइटम तक तो रहे। पाँचवें यानी यमुना वाले मामले का नम्बर आया, तो मिनिस्ट्री जाना आवश्यक बताकर चले गए...।

अगले सप्ताह दिनांक 17 मई, 2016 दिन रविवार को पढ़िए स्वामी सानंद गंगा संकल्प संवाद शृंखला का 18वाँ कथन

 

प्रस्तोता सम्पर्क:


ईमेल : amethiarun@gmail.com
फोन : 9868793799

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