उपजाऊ भूमियों पर बंजरीकरण का खतरा

Submitted by Hindi on Fri, 08/10/2012 - 14:29
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चौथी दुनिया, 11 जुलाई 2012
देश के उपजाऊ भूमि पर बंजर होने का खतरा बढ़ता जा रहा है। दुनिया में मात्र 11 प्रतिशत जमीन ही उपजाऊ जमीन है। गोबी रेगिस्तान से लेकर अपने थार रेगिस्तान तक मरुस्थलीकरण का क्षेत्रफल बढ़ता जा रहा है। भारत के कुल 32 करोड़ 90 लाख हेक्टेयर जमीन में से 12 करोड़ 95 लाख 70 हजार हेक्टेयर भूमि बंजर है। अगर इस बढ़ते हुए बंजर जमीन को रोका नहीं गया तो भारत में आने वाले समय में अनाज का संकट पैदा हो जाएगा। उपजाऊ भूमि के बंजर होते जमीन के बारे में बता रही हैं फिरदौस खान।

कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक, बंजर जमीन वह भूमि है, जिसमें लवणों, खासकर सोडियम की अधिकता हो। ऐसी जमीन में खेती नहीं होती। अगर होती भी है तो उत्पादन बहुत कम होता है। ऐसी जमीन को अकार्बनिक यानी जिप्सम, पायराइट, फास्फोजिप्सम, गंधक का अम्ल, कार्बनिक पदार्थ जैसे प्रेसमड, ऊसर तोड़ खाद, शीरा, धान का पुआल, धान की भूसी, बालू, जलकुंभी, गोबर और पुआल, गोबर और कम्पोस्ट की खाद, वर्मी कम्पोस्ट, सत्यानाशी खरपतवार और जैविक पदार्थों के जरिए सुधारा जा सकता है।

उपजाऊ शक्ति के लगातार क्षरण से भूमि के बंजर होने की समस्या ने आज विश्व के सामने एक बड़ी चुनौती पैदा कर दी है। सूखा, बाढ़, लवणीयता, कीटनाशकों के अंधाधुंध इस्तेमाल और अत्यधिक दोहन के कारण भूजल स्तर में गिरावट आने से सोना उगलने वाली उपजाऊ धरती मरुस्थल का रूप धारण करती जा रही है। इस वक्त दुनिया की आबादी तकरीबन सात अरब है, जो 2050 तक नौ अरब हो जाएगी। जाहिर है, अगले चार दशकों में धरती पर दो अरब लोग बढ़ जाएंगे, लेकिन भूमि सीमित होने की वजह से लोगों को उतना अनाज नहीं मिल पाएगा, जितने की उन्हें जरूरत होगी। ऐसे में खाद्यान्न संकट पैदा होगा। दुनिया की कुल जमीन का सिर्फ 11 फीसदी हिस्सा ही उपजाऊ है। संयुक्त राष्ट्र ने भी बढ़ते मरुस्थलीकरण पर चिंता जाहिर करते हुए कहा है कि अगर रेगिस्तान के फैलते दायरे को रोकने के लिए विशेष कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वक्त में अनाज का संकट पैदा हो जाएगा। इसके मद्देनजर संयुक्त राष्ट्र ने 2010-20 को मरुस्थलीकरण विरोधी दशक के तौर पर मनाने का फैसला किया।

हमारे देश में भी उपजाऊ भूमि लगातार बंजर हो रही है। भारत में दुनिया की कुल आबादी का 16 फीसदी हिस्सा है, जबकि इसकी भूमि विश्व के कुल भौगोलिक क्षेत्र का महज दो फीसद है। जिस तरह मध्य एशिया के गोबी मरुस्थल से उड़ी धूल उत्तर चीन से लेकर कोरिया के उपजाऊ मैदानों को ढंक रही है, उसी तरह थार मरुस्थल की रेत उत्तर भारत के उपजाऊ मैदानों को निगल रही है। अरावली पर्वत काफी हद तक धूल भरी आंधियों को रोकने का काम करता है, लेकिन अंधाधुंध खनन की वजह से इस पर्वतमाला को नुकसान पहुंच रहा है, जिससे यह धूल भरी आंधियों को पूरी तरह नहीं रोक पा रही है। इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन (इसरो) की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि पहले मरुस्थल राजस्थान के थार तक ही सीमित था, लेकिन अब यह देश के सबसे बड़े अनाज उत्पादक राज्यों हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश तक फैलने लगा है। 1996 में थार मरुस्थल का क्षेत्र 1.96 लाख वर्ग किलोमीटर था, जो अब बढ़कर 2.08 लाख वर्ग किलोमीटर हो गया है।

केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय के एक अनुमान के मुताबिक, देश में कुल 32 करोड़ 90 लाख हेक्टेयर जमीन में से 12 करोड़ 95 लाख 70 हजार हेक्टेयर भूमि बंजर है। मध्य प्रदेश में दो करोड़ एक लाख 42 हेक्टेयर जमीन बंजर है, जबकि राजस्थान में एक करोड़ 99 लाख 34 हेक्टेयर जमीन बंजर है। महाराष्ट्र में एक करोड़ 44 लाख हेक्टेयर, आंध्र प्रदेश में एक करोड़ 14 लाख 16 हजार हेक्टेयर, कर्नाटक में 91 लाख 65 हजार हेक्टेयर, उत्तर प्रदेश में 80 लाख 61 हजार हेक्टेयर, गुजरात में 98 लाख 36 हजार हेक्टेयर, उड़ीसा में 63 लाख 84 हजार हेक्टेयर, बिहार में 54 लाख 58 हजार हेक्टेयर, पश्चिम बंगाल में 25 लाख 36 हजार हेक्टेयर, हरियाणा में 24 लाख 78 हजार हेक्टेयर, असम में 17 लाख 30 हजार हेक्टेयर, हिमाचल प्रदेश में 19 लाख 78 हजार हेक्टेयर, जम्मू-कश्मीर में 15 लाख 65 हजार हेक्टेयर, केरल में 12 लाख 79 हजार हेक्टेयर, पंजाब में 12 लाख 30 हजार हेक्टेयर, मणिपुर में 14 लाख 38 हजार हेक्टेयर, मेघालय में 19 लाख 18 हजार हेक्टेयर और नागालैंड में 13 लाख 86 हजार हेक्टेयर भूमि बंजर है। अहमदाबाद स्थित स्पेस एप्लीकेशंस सेंटर (एसएसी) ने 17 अन्य राष्ट्रीय एजेंसियों के साथ मिलकर मरुस्थलीकरण और भूमि की गुणवत्ता के गिरते स्तर पर देश का पहला एटलस बनाया है। इसके मुताबिक, देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का तकरीबन 25 फीसदी हिस्सा मरुस्थल में तब्दील हो चुका है, जबकि 32 फीसदी भूमि की गुणवत्ता कम हुई है। इसके अलावा देश के 69 फीसदी हिस्से को शुष्क क्षेत्र के तौर पर वर्गीकृत किया गया है।

गौरतलब है कि देश में हर साल 600 करोड़ टन मिट्टी कटाव की वजह से बह जाती है, जबकि अच्छी पैदावार योग्य भूमि की एक सेंटीमीटर मोटी परत बनने में तकरीबन तीन सौ साल लगते हैं। उपजाऊ मिट्टी की बर्बादी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि हर साल 84 लाख टन पोषक तत्व बाढ़ आदि की वजह से बह जाते हैं। इसके अलावा कीटनाशकों की वजह से हर साल एक करोड़ चार लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र की उपजाऊ शक्ति खत्म हो रही है। बाढ़, लवणीयता और क्षारपन आदि की वजह से हर साल 270 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र का बंजर होना भी निश्चित ही गंभीर चिंता का विषय है। अत्यधिक दोहन की वजह से भूजल स्तर में गिरावट आने से भी बंजर भूमि के क्षेत्र में बढ़ोतरी हो रही है। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले पांच दशकों में भूजल के इस्तेमाल में 125 गुना वृद्धि हुई है। पहले एक तिहाई खेतों की सिंचाई भूजल से होती थी, लेकिन अब तकरीबन आधी कृषि भूमि की सिंचाई के लिए किसान भूजल स्तर पर ही निर्भर हैं। 1947 में देश में एक हजार ट्यूबवेल थे, जो 1960 में बढ़कर एक लाख हो गए। वक्त के साथ इनकी तादाद में लगातार इजाफा होता गया। अब इनकी तादाद दो करोड़ दस लाख है, जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है।

दिलचस्प बात यह भी है कि सरकारी आंकड़ों में बंजर भूमि लगातार कम होती जा रही है। ग्रामीण विकास मंत्रालय के भूमि संसाधन विभाग (डीओएलआर) के मुताबिक, 1986 से 2000 के बीच पांच चरणों में चलाई गई परियोजना के जरिए देश में 6.38 करोड़ हेक्टेयर बंजर जमीन आंकलित की गई थी। 2003 में किए गए आंकलन के मुताबिक, देश में बंजर जमीन घटकर 82 लाख हेक्टेयर कम हो गई। इसके बाद 2005-06 में उपग्रह मैपिंग के जरिए तैयार की गई रिपोर्ट में बंजर जमीन 84 लाख हेक्टेयर और घटकर 4.72 करोड़ हेक्टेयर रह गई। अधिकारियों का मानना है कि बंजर जमीन के क्षेत्रफल में इस कमी की सबसे बड़ी वजह यह है कि हमारे पास तीनों मौसमों में जमीन के उपजाऊपन के तुलनात्मक आंकड़े मौजूद नहीं हैं। जमीन का कोई टुकड़ा जो गर्मियों में अनुपजाऊ दिखता है, वही मानसून में हरा दिखाई देता है, जबकि सर्दी के मौसम में इसी जमीन का रंग अलग नजर आता है।

ग्रामीण विकास मंत्रालय के मुताबिक, देश की मौजूदा बंजर जमीन में 50 फीसदी भूमि ऐसी है, जिसे समुचित रूप से विकसित कर उपजाऊ बनाया जा सकता है। यह असुरक्षित गैर-वनेतर भूमि है, जो अत्यधिक दबाव की वजह से प्रभावित हुई है। बंजर भूमि के उन्मूलन के लिए केंद्र सरकार ने 1992 में ग्रामीण विकास मंत्रालय के तहत बंजर भूमि विकास विभाग का गठन किया था। बाद में इसका पुनर्गठन कर इसका नाम बदल कर भूमि संसाधन विभाग रखा गया। इसके बाद जमीन के अतिक्रमण की समस्या को हल करने और ईंधन लकड़ी एवं चारे की लगातार बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के तहत 1985 में राष्ट्रीय बंजर भूमि विकास बोर्ड का गठन किया गया। सातवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान राष्ट्रीय बंजर भूमि विकास बोर्ड द्वारा अपनाई गई कार्य नीति में बंजर भूमि के विकास के लिए सामुदायिक भागीदारी की बजाय पौधारोपण पर ज्यादा जोर दिया गया। इसके बाद 1992 में ग्रामीण विकास मंत्रालय (तत्कालीन ग्रामीण क्षेत्र एवं रोजगार मंत्रालय) के तहत एक नए विभाग का गठन किया गया और राष्ट्रीय बंजर भूमि विकास बोर्ड को उसके अधीन रखा गया। अगस्त, 1992 में बोर्ड का पुनर्गठन किया गया और विकास के हर स्तर पर स्थानीय लोगों को शामिल करके वनेतर क्षेत्रों में मुख्यत: बंजर भूमि को समग्र रूप में विकसित करने की जिम्मेदारी सौंपी गई। इसका मकसद एक ऐसा परिदृश्य सृजित करना है, जिसमें सरकार सुविधा मुहैया कराने वाले के रूप में और लोग जमीनी स्तर पर कार्यक्रम के वास्तविक संचालक के तौर काम कर सकें। गरीबी, पिछड़ापन एवं स्त्री-पुरुष असमानता आदि के मद्देनजर बंजर और अतिक्रमित भूमि की उत्पादकता में सुधार लाने के लिए कार्यान्वित किए गए समेकित बंजर भूमि विकास कार्यक्रम के वे नतीजे सामने नहीं आ पा रहे हैं, जो आने चाहिए।

बढ़ती आबादी की रिहायशी और अन्य जरूरतों को पूरा करने के लिए पिछले पांच दशकों में हरित वनीय क्षेत्र और पेड़-पौधों को काफी नुकसान पहुंचाया गया है। वन्य इलाकों में वृक्षों को काटकर वहां बस्तियां बसा ली गईं। फर्नीचर और ईंधन आदि के लिए हरे-भरे वृक्षों को काट डाला गया। आदिवासी इलाके छोटे गांवों और गांव शहरों में तब्दील होने लगे। शहर महानगर बन रहे हैं। ऐसे में इंसान की बढ़ती जरूरतों को पूरा करने के लिए प्रकृति का अत्यधिक दोहन किया गया। नतीजतन, प्राकृतिक चीजें, मिट्टी, पानी और हवा प्रदूषित होने लगीं। इसका सीधा असर इंसान की सेहत पर भी पड़ा है। बहरहाल, धरती के मरुस्थलीकरण और मिट्टी की ऊपरी परत के क्षरण को रोकने के कई तरीके हैं, जैसे पौधारोपण और बेहतर जल प्रबंधन। पौधारोपण के जरिए मिट्टी के कटाव को रोका जा सकता है, वहीं बेहतर जल प्रबंधन करके अत्यधिक भू-जल दोहन पर रोक लगाई जा सकती है। इसके अलावा यह कोशिश भी करनी चाहिए कि कृषि योग्य भूमि को किसी अन्य काम में इस्तेमाल न किया जाए। देखने में आ रहा है कि कृषि योग्य भूमि पर कॉलोनियां बसाई जा रही हैं, उद्योग लगाए जा रहे हैं।

किसान क्या करें


कृषि योग्य भूमि के बंजर होने से उत्पादन पर भी असर पड़ा है। एक तरफ जहां कीटनाशकों, रसायनों और उर्वरकों की वजह से लागत ज्यादा हो गई है, वहीं उत्पादन कम होने से किसान लगातार घाटे में जा रहे हैं। जिन किसानों के पास कृषि भूमि कम है, उनका तो और भी बुरा हाल है। कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक, बंजर जमीन वह भूमि है, जिसमें लवणों, खासकर सोडियम की अधिकता हो। ऐसी जमीन में खेती नहीं होती। अगर होती भी है तो उत्पादन बहुत कम होता है। ऐसी जमीन को अकार्बनिक यानी जिप्सम, पायराइट, फास्फोजिप्सम, गंधक का अम्ल, कार्बनिक पदार्थ जैसे प्रेसमड, ऊसर तोड़ खाद, शीरा, धान का पुआल, धान की भूसी, बालू, जलकुंभी, गोबर और पुआल, गोबर और कम्पोस्ट की खाद, वर्मी कम्पोस्ट, सत्यानाशी खरपतवार और जैविक पदार्थों के जरिए सुधारा जा सकता है। किसानों को मेड़बंदी करनी चाहिए।

यह काम बरसात या सितंबर-अक्टूबर में जब भूमि नम रहती है, तब शुरू कर देना चाहिए। मेड़ के धरातल की चौड़ाई 90 सेंटीमीटर, ऊंचाई 30 सेंटीमीटर और मेड़ की ऊपरी सतह की चौड़ाई 30 सेंटीमीटर होनी चाहिए। मेड़बंदी करते वक्त सिंचाई नाली और खेत जल निकास नाली का निर्माण दो खेतों की मेड़ों के बीच कर देना चाहिए। भूमि की जुताई बरसात या सितंबर-अक्टूबर या फरवरी में करके छोड़ दें, जिससे लवण भूमि की सतह पर इकट्ठे न हों। भूमि की जुताई दो-तीन बार 14-20 सेंटीमीटर गहरी करें। खेत को कम चौड़ी और लंबी-लंबी क्यारियों में बांटकर क्यारियों का समतलीकरण करना चाहिए। जल निकास नाली की तरफ बहुत हल्की-सी ढाल देनी चाहिए, ताकि खेत का फालतू पानी जल निकास नाली द्वारा बहाया जा सके। मिट्टी की जांच करा लें, जिससे जरूरी 50 फीसदी जिप्सम की मात्रा का पता चल जाता है। खेत की ढाल और नलकूप की जगह को ध्यान में रखते हुए सिंचाई तथा खेत नाली का निर्माण करना चाहिए। सिंचाई नाली भूमि की सतह से ऊपर बनाई जाए, जो आधार पर 30 सेंटीमीटर और शीर्ष पर 120 सेंटीमीटर गहरी हो। खेत नाली भूमि की सतह से 30 सेंटीमीटर गहरी बनाई जाए, जो आधार पर 30 सेंटीमीटर और शीर्ष पर 75-90 सेंटीमीटर गहरी हो।

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