उत्तर बिहार : अच्छे दिन कब आएँगे

Submitted by RuralWater on Thu, 09/17/2015 - 15:51

विश्व नदी दिवस, 27 सितम्बर 2015 पर विशेष


.उत्तर बिहार में बहुत सी नदियों के किनारे तटबन्ध बने हुए हैं। इन तटबन्धों के बीच बहुत से गाँव बसे हुए है जिनका पुनर्वास होना चाहिए था मगर लोग पुनर्वास स्थलों पर या तो गए ही नहीं या जाकर लौट आये। कारण यह था कि उन्हें खेती की ज़मीन के बदले ज़मीन नहीं दी गई थी और मजबूरन उनकी वापसी हुई।

कोसी के अलावा दूसरी नदियों में या तो घर बनाने के लिये कुछ रुपए दे दिये गए या फिर बागमती में जैसा हुआ कि सिर्फ घर उठा कर पुनर्वास में सामान ले जाने की लिये कुछ रुपये दे दिये गए और हो गया पुनर्वास। कई जगहों पर पुनर्वास स्थलों में जल-जमाव हो गया और लोग अपने पुश्तैनी ज़मीन पर वापस आने के लिये मजबूर हुए।

आमतौर पर उत्तर बिहार की सभी नदियों के साथ यही हुआ। आज कोसी तटबन्धों के बीच 380 गाँव भारत के और 61 गाँव नेपाल के फँसे हुए है और इनकी आबादी अब 15 लाख के आस-पास होगी। यह लोग कभी नहीं चाहते कि नदी का तटबन्ध सलामत रहे। वो नदी के अपने मूल रूप में वापसी की माँग करते हैं।

दूसरी तरह के लोग वो हैं जिनकी ज़मीन और गाँव के ऊपर तटबन्ध बनाया गया, उन्हीं की ज़मीन पर अन्दर फँसे लोगों को पुनर्वास दिया गया और उसी ज़मीन में जल-जमाव भी बढ़ा क्योंकि बरसात में बाहर का जो पानी अपने आप नदी में आ जाता था अब वो तटबन्धों के कारण बाहर ही अटक जाता है। अब वहाँ खेती प्रायः नहीं के बराबर होती है।

जब यह तटबन्ध बने थे तब कहा गया था कि अगर सरकार कोई बेहतरी का टैक्स लगाती है तो वो सिर्फ उन्हीं किसानों पर लगाना चाहिए जिनकी ज़मीन तटबन्ध के बाहर है और तटबन्ध से केवल तीन मील के फासले तक है। आज यही तीन मील वाली ज़मीन खेती के सर्वथा अयोग्य हो गई है। कोसी या किसी भी नदी के तटबन्ध के बाहर की यही ज़मीन जिस पर कभी टैक्स लगाने की बात सोची जाती थी अब समस्या बन गई है। इस जगह रहने वाले लोग भी तटबन्ध से परेशान हैंI

वो तटबन्ध नहीं चाहते मगर वो यह भी नहीं चाहते कि कभी बरसात में तटबन्ध टूटे क्योंकि उस हालत में उनका जो कुछ भी बचा है वो भी चला जाएगा। बिहार सरकार यह स्वीकार करती है कि 1987 से अब तक नदियों के किनारे बने ये तटबन्ध 378 जगह टूटे हैं। कुछ साल पहले कुसहा में कोसी का तटबन्ध टूटने पर यही हुआ थाI अब विपरीत इच्छाओं वाले लोग अगर एक साथ रहेंगें तो गड़बड़ तो होगी और ये लोग बरसात में युयुत्स बन कर हथियारों के साथ आमने-सामने खड़े हो जाते हैंI

मज़े की बात यह है लोग तटबन्ध बनने के पहले एक ही गाँव के बाशिंदे थे, उनका परिवार एक न भी हो तो वह मित्र तो ज़रूर थे। बस तटबन्ध ने उन्हें दूसरे पाले में डाल दिया। यह भी मुमकिन है कि वो एक दूसरे के रिश्तेदार भी हों मगर उनका तात्कालिक स्वार्थ उन्हें अलग करता है। इस तरह की लड़ाइयों और उसके बाद की थाना-पुलिस, 302–307, और मामला-मुकदमें की बहुत सी कहानियाँ उपलब्ध हैंI

तीसरे किस्म के लोग वो हैं जिनके गाँव या घर तक बाढ़ का पानी तटबन्धों के टूटने के वज़ह से पहुँच कर उनकी खेती और घरों को नुकसान पहुँचाता है मगर उनकी जान नहीं लेता। आमतौर पर ये लोग इस घटना को कुदरत का कहर मान कर सन्तोष कर लेते हैं और थोड़ी बहुत सरकार की आलोचना करके अपनी भड़ास निकाल लेते हैं।

चौथे लोग वो हैं जिनके यहाँ नदी की बाढ़ का पानी नहीं पहुँचता है और उनके लिये तटबन्ध रहे या न रहे कोई मायने नहीं रखता। ये लोग ऐसा समझते हैं कि सरकार अगर इनका निर्माण कर रही है तो कुछ भले के लिये ही कर रही होगी, इसलिये तटबन्ध बनाने ही चाहिए। अक्सर ये लोग उनकी वकालत भी करते हैं। और इसमें उनकी कोई गलती भी नहीं है क्योंकि समस्या से उनका कोई वास्ता ही नहीं है। दुर्भाग्यवश ये तीसरे और चौथे किस्म के लोगों की संख्या बाकी पहले दो से ज़्यादा है।

आज महानन्दा में 66 गाँवों के लोग तटबन्धों के अन्दर हैं, बागमती में इनकी संख्या 96 सिर्फ ढेंग से रुन्नि-सैदपुर तक है, कमला में 104, भुतही बलान में 52 है। बाकी नदियों के बारे में जानकारी उपलब्ध नहीं है। मेरा मानना है कि लगभग 1,000 के आस-पास गाँव तटबन्धों के अन्दर ज़रूर होंगें और इतने ही गाँव तटबन्धों की वजह से वो त्रासदी झेलते होंगे जो क्रम -2 में दिये गए हैं। इसमें अगर गंगा का दियारा क्षेत्र भी जोड़ दिया जाये तो गाँवों की संख्या 2,000 को पार कर जाएगी। मुद्दा ये है कि बहस अब बन्द है और समस्या की सुधि कोई लेगा उसके कोई आसार फिलहाल नहीं दिखते।

कुल मिला कर जो स्थिति बनती है वो यह है जो नदी के जितना पास में है परेशान है और जो जितनी दूर है वही योजना का पैरोकार है। जो जितनी दूर है वो नदी का उतना ही बड़ा मालिक है और जिस से नदी का रोज़ का वास्ता है वो कुछ भी नहीं। इसलिये नदी जो फैसले लिये जाते हैं उसमें स्थानीय भागीदारी होती ही नहीं है क्योंकि जिनकी राय ली जानी चाहिए वो सरकारी फाइलों में ले-मैन (मूर्ख) गिने जाते हैं और जिसने नदी को सिर्फ ड्राइंग में देखा है वो एक्सपर्ट बनता है।

कटाव, जल जमाव, खेतों पर बालू पड़ना, सारी बरसात रात भर जागते रहना कि तटबन्ध कहीं टूट न जाये और उनकी दुनिया न तबाह हो जाये, ऐसे लोगों कि बातों को आम लोग भी कहानी समझते हैं जिस पर 'कुछ ऐतबार किया कुछ न ऐतबार किया' लागू होता है। ऐसे में वही सब होता है जो आज हो रहा है और होता रहेगा।

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