वैज्ञानिक विधि की सीमाएं

Submitted by Hindi on Sat, 06/04/2011 - 12:32
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मासानोबू फुकूओका पर लिखी गई पुस्तक 'द वन स्ट्रा रेवोल्यूशन'

पुआल फैलाने, मेथी उगाने तथा सारे जैव अवशेष धरती को वापस लौटाने से धरती में वे सारे पोषक तत्व आ जाते हैं, जो चावल तथा जाड़े की फसलें, एक ही खेत में साल-दर-साल उगाने के लिए आवश्यक होते हैं। प्राकृतिक खेती के द्वारा उन खेतों को भी फिर से उपजाऊ बनाया जा सकता है, जिनको परिष्कार कर या कृषि रसायनों के उपयोग के कारण क्षति पहुंची है।

अनुसंधानकर्ताओं को अनुसंधानकर्ता बनने से पहले दार्शनिक बनना चाहिए। उन्हें इस बात पर विचार करना चाहिए, कि मानव का लक्ष्य क्या है? तथा मानवता को किस चीज का सृजन करना चाहिए। डॉक्टरों को बुनियादी तौर पर पहले यही तय करना चाहिए, कि वह कौन सी चीज है जिस पर मानव जिंदा रहने के लिए निर्भर करता है। खेती पर अपने सिद्धांतों को लागू करते हुए मैं अपनी फसलें कई विभिन्न तरीकों से उगाने के प्रयोग करता रहा हूं मगर मेरा उद्देश्य हमेशा एक ऐसी विधि खोजने का रहा है जो प्रकृति से बहुत करीब हो। बहुत सी गैर-जरूरी कृषि प्रथाओं को त्याग कर मैं ऐसा कर पाया हूं। लेकिन आधुनिक वैज्ञानिक कृषि के पास ऐसी कोई दृष्टि नहीं है। अनुसंधान कार्य दिशाहीन हो यहां-वहां भटकता रहता है। हर अनुसंधानकर्ता को उन असीम प्राकृतिक तत्वों का मात्रा एक छोटा सा अंश ही नजर आता है जो फसल पैदावारों को प्रभावित करता है। इतना ही नहीं, ये प्राकृतिक कारक या घटक हर वर्ष तथा स्थान-स्थान के साथ बदलते रहते हैं।

जमीन तो वही होती है लेकिन किसान को हर वर्ष मौसम, कीड़ों की आबादी, मिट्टी की स्थिति तथा कई अन्य प्राकृतिक कारकों के बदलावों को ध्यान में रखते हुए अलग-अलग फसलें उगाना चाहिए। हर जगह प्रकृति निरंतर गतिशील रहती है। किन्हीं भी दो वर्षों में हालात ठीक एक जैसे कभी नहीं रहते। आधुनिक विज्ञान प्रकृति को छोटे-छोटे टुकड़ों में बांटकर जो परीक्षण करता है उनसे न तो प्रकृति के नियमों की पुष्टि होती है, न व्यावहारिक अनुभवों की। इनके नतीजे अनुसंधान की सुविधा के हिसाब से व्यवस्थित किए जाते हैं, न कि किसान की जरूरतों के मुताबिक। यह सोचना बहुत बड़ी भूल होगी कि इन निष्कर्षों को किसान के खेतों में आजमाने से हमेशा सफलता प्राप्त होगी।

हाल ही में एहाईम विश्वविद्यालय के प्रोफेसर त्सूनों ने एक बड़ी किताब चावल की पैदावार के साथ पौधों की आंतरिक प्रक्रियाओं (मेटाबोलिज्म) के संबंधों के बारे में लिखी। यह प्राध्यापक महोदय अक्सर मेरे खेत पर आते हैं, मिट्टी को जांचने के लिए कुछ फुट तक जमीन को खोदते हैं, अपने साथ छात्रों को लाते हैं जो धूप के कोण को नापते हैं तथा और भी न जाने क्या-क्या करते हैं, और पौधों के नमूने अपने साथ प्रयोगशालाओं में जांचने के लिए ले जाते हैं। मैं उनसे अक्सर पूछता हूँ, ‘क्या वापस जाकर आप जुताई बिना, सीधे बीज बोने की यह विधि अपनाने वाले हैं?’ तो वे हंसते हुए जवाब देते हैं, ‘इन्हें व्यवहार में लाने का काम तो मैं आप पर छोड़ता हूं। मैं तो सिर्फ अनुसंधान से ही जुड़ा रहना चाहता हूं।’ तो ऐसी स्थिति है। आप पौधों की आंतरिक प्रक्रिया (मेटाबोलिज्म) का तथा मिट्टी से उसकी पोषणग्रहण करने की क्षमता का अध्ययन करते हैं, किताब लिखते हैं, कृषि विज्ञान की डॉक्टरेट प्राप्त करते हैं, लेकिन खुद से यह सवाल नहीं पूछते कि आपके सिद्धांतों का पैदावार के साथ कोई संबंध बनता है या नहीं।

यदि आप यह समझाने में सफल हो भी जाते हैं कि औसत 84 डिग्री फैरिनहाईट के तापमान पर होने वाले मेटाबोलिज्म का पौधे की फुनगी पर की पत्तियों की उत्पादकता पर क्या असर होगा, तो भी कुछ ऐसी जगहें हो सकती हैं, जहां तापमान 84 डिग्री फैरिनहाईट नहीं हो सकता। और फिर एहाइम में इस वर्ष 84 डिग्री तापमान है तो, हो सकता है अगले वर्ष 75 डिग्री ही रहे। अतः यह कहना कि सिर्फ आंतरिक प्रक्रिया (मेटाबोलिज्म) बढ़ा देने से स्टार्च का निर्माण अधिक होने लगेगा और पैदावार बढ़ जाएगी, गलत ही है। जमीन का भूगोल तथा भू-रचना, मिट्टी की स्थिति, उसकी संरचना, उसकी बुनावट, जल-निकास, कीटों के परस्पर संबंध, धूप कितनी आती है, उपयोग किए गए बीजों की किस्म, खेती का तरीका, आदि असंख्य बातें हैं जिन पर विचार करना पड़ेगा। कोई भी ऐसी वैज्ञानिक विधि असंभव है जो इन सारे तत्वों का समावेश कर उन पर विचार करती हो।

इन दिनों आप ‘हरित क्रांति’ तथा ‘अच्छा चावल आंदोलन’ की बातें बहुत सुनते हैं। चूंकि ये विधियां कमजोर ‘सुधरे हुए’ बीजों का उपयोग करती हैं, किसानों के लिए यह बहुत जरूरी हो जाता है कि एक ही फसल-मौसम के दौरान वे आठ-दस बार रसायनों और कीटनाशकों का उपयोग करें। ऐसा करने पर बहुत ही छोटे समय में धरती के सूक्ष्मजीवाणु तथा जैव-तत्व जल कर राख हो जाते हैं। मिट्टी में कोई जान नहीं रह जाती तथा फसलें रासायनिक उर्वरकों के रूप में बाहर से डाले जाने वाले पोषक तत्वों पर निर्भर हो जाती हैं। ऐसा सिर्फ लगता है कि किसान यदि ‘वैज्ञानिक तकनीके’ अपनाए तो नतीजे बेहतर रहते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं होता, कि चूंकि प्राकृतिक उर्वरता अपने आप में अपर्याप्त है, विज्ञान को उसकी मदद में आना चाहिए। इसका मतलब यह है, कि यह राहत कार्य इसलिए जरूरी हुआ, कि प्राकृतिक उर्वरता को पहले नष्ट कर दिया गया। पुआल फैलाने, मेथी उगाने तथा सारे जैव अवशेष धरती को वापस लौटाने से धरती में वे सारे पोषक तत्व आ जाते हैं, जो चावल तथा जाड़े की फसलें, एक ही खेत में साल-दर-साल उगाने के लिए आवश्यक होते हैं। प्राकृतिक खेती के द्वारा उन खेतों को भी फिर से उपजाऊ बनाया जा सकता है, जिनको परिष्कार कर या कृषि रसायनों के उपयोग के कारण क्षति पहुंची है।

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