विकास योजनाएँ तथा आपदा प्रबंधन

Submitted by birendrakrgupta on Sun, 07/12/2015 - 15:32
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योजना, मार्च 2002
भारत में आपदा प्रशमन की दिशा में कतिपय प्रयास विगत पाँच दशकों में अवश्य हुए हैं किंतु आपदाओं के स्थाई समाधान तथा उनके प्रबंधन के क्रम में सुविचारित प्रयास विगत तीन-चार वर्षों से ही शुरू हो पाए हैं। विडंबना यह है कि राज्यों में आपदा-प्रबंधन कार्य किसी एक सरकारी विभाग का दायित्व नहीं है। जब तक यह कार्य किसी एक विभाग या संगठन को नहीं सौपा जाता, तब तक राहत कार्यों में बिखराव बना रहेगा।अनादिकाल से ही मानव एवं अन्य जीव-जंतु प्राकृतिक आपदाओं से जूझते आए हैं। आदिम युग में मानव आसमान में कड़कती बिजली तथा आँधी-तूफान को दैवीय प्रकोप समझ कर कांपता था किंतु आज वह प्राकृतिक आपदाओं का रहस्य काफी कुछ समझ चुका है।

आपदा से तात्पर्य उस विषम स्थिति से है जो मानवीय, भौतिक, पर्यावरणीय तथा सामाजिक कारकों को व्यापक रूप से प्रभावित करती है तथा सामान्य जीवनचर्या में भारी व्यधान डालती है। सामान्यतः आपदा से आशय प्राकृतिक आपदाओं, यथा भूकंप, सूखा, बाढ़, तूफान, भू-स्खलन, बर्फ या चट्टान खिसकना, ज्वालामुखी फटना, ओलावृष्टि, आँधी, महामारी, लू, बिजली गिरना, उल्कापात, पाला, सर्दी तथा समुद्री लहरों के उत्पाद आदि से है। मानव प्रेरित आपदाओं में युद्ध, आतंकवाद, ट्रेन, वायुयान, सड़क दुर्घटना, आगजनी, भगदड़, दंगे, खान दुर्घटना, गैस पाइपलाइन फटना, परमाणु परीक्षण तथा अन्य दुर्घटनाएँ सम्मिलित हैं। यद्यपि प्राकृतिक तथा मानवीय दोनों ही प्रकार की आपदाओं से विकसित एवं विकासशील देश समान रूप से प्रभावित हैं किंतु तुलनात्मक रूप से विकासशील देश अधिक संवेदनशील हैं क्योंकि इन देशों की भौगोलिक स्थिति विषमताओं से ग्रस्त है। दूसरी ओर विकासशील देशों में आपदा-प्रबंधन के लिए पर्याप्त तकनीक, संसाधन एवं जनचेतना का भी अभाव है। यही कारण है कि भारत सहित अधिसंख्य विकासशील देशों में आपदाओं की मारक क्षमता अधिक घातक सिद्ध हुई है।

विकास योजनाएँ तथा आपदा प्रबंधनभारत में आपदा प्रशमन (डिजास्टर मिटिगेशन) की दिशा में कतिपय प्रयास विगत पाँच दशकों में अवश्य हुए हैं किंतु आपदाओं के स्थाई समाधान तथा उनके प्रबंधन के क्रम में सुविचारित प्रयास विगत तीन-चार वर्षों से ही शुरू हो पाए हैं। अक्टूबर 1999 में उड़ीसा में आए भयंकर समुद्री तूफान तथा 26 जनवरी 2001 को गुजरात में आए भूकंप ने केंद्र सरकार को झकझोर कर रख दिया। परिणामस्वरूप केद्रीय स्तर पर 'राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन' इकाई का गठन हुआ। कृषि मंत्रालय के अधीन कार्यरत यह संगठन समस्त प्राकृतिक आपदाओं पर निगरानी, प्रबंधन तथा समन्वय का कार्य करता है। इसी प्रकार ग्यारहवें वित्त आयोग की अनुशंसा पर 'राष्ट्रीय आपदा सहायता कोष' में निर्धारित मात्रा में सहायता राशि का प्रावधान किया गया है। वस्तुतः ये सब प्रयास 'आपदा-पश्चात' प्रकृति के उपबंध हैं जिनके माध्यम से केवल राहत एवं बचाव कार्य निष्पादित हो रहे हैं, आपदाओं से बचाव के नहीं जबकि बचाव को उपचार से बेहतर रणनीति माना जाता है। दुःखद स्थिति यह है कि हमारी नौ पंचवर्षीय योजनाओं के (45 योजना वर्षों में) 36 वर्ष भयंकर आपदाओं से त्रस्त रहे हैं। जाहिर है ऐसी स्थिति में योजना की प्राथमिकताएँ तथा क्रियान्वयन प्रक्रिया विपरीत रूप से प्रभावित होती है।

असंगठित प्रयास


भारत में सूखा, बाढ़, समुद्री तूफान, अंधड़, लू, आकाशीय बिजली तथा हिम एवं भू-स्खलन स्थाई प्राकृतिक आपदाएँ हैं जो प्रतिवर्ष औसतन 10 हजार व्यक्तियों का जीवन लील लेती हैं। संयुक्त राष्ट्र के एक अनुमान के अनुसार भारत में प्रतिवर्ष औसतन तीन हजार करोड़ रुपयों का आर्थिक नुकसान आपदाओं के कारण होता है। राजस्थान, गुजरात, उड़ीसा तथा कर्नाटक के कुछ जिले सूखे से; असम, बिहार, उत्तरप्रदेश तथा पश्चिम बंगाल के बाढ़ से; उड़ीसा तथा आंध्र प्रदेश, जम्मू-कश्मीर तथा पश्चिम बंगाल के भू एवं हिम-स्खलन से स्थाई रूप से ग्रस्त हैं। बार-बार प्राकृतिक आपदाओं से ग्रस्त होने के बावजूद किसी भी राज्य सरकार अथवा केंद्र सरकार के पास सुविचारित कारगर नीति या व्यूहरचना नहीं है। यही कारण है कि स्वतंत्रता के पाँच दशकों के उपरांत भी देश में सूखा बाढ़, भू-स्खलन, तूफान तथा ओलावृष्टि के कारण होने वाला नुकसान संपूर्ण अर्थव्यवस्था को चपेट में ले लेता है। यह सही है कि भूकंप, आकाशीय बिजली, लू, कोहरा, अत्यधिक ठंड तथा हिम-स्खलन का पूर्वानुमान लगाना कठिन है किंतु तूफान, सूखा तथा बाढ़ जैसी आपदाएँ यकायक नहीं आतीं। इनका प्रभाव शनैः शनैः होता है। ऐसी स्थिति में इन आपदाओं से बचाव, राहत, पुनर्वास तथा रोकथाम के कार्य सफलतापूर्वक किए जा सकते हैं। विडंबना यह है कि राज्यों में आपदा-प्रबंधन कार्य किसी एक सरकारी विभाग का दायित्व नहीं है। यह कृषि विभाग, राजस्व विभाग, राहत विभाग, विकास विभाग तथा गृह विभाग का संयुक्त दायित्व है। लोक प्रशासन में यह सामान्य मान्यता है कि 'सभी की जिम्मेदारी, किसी की भी जिम्मेदारी, नहीं होती है। अतः जब तक यह कार्य किसी एक विभाग या संगठन को नहीं दिया जाएगा तब तक राहत कार्यों में बिखराव बना रहेगा।

संयुक्त राष्ट्र के एक अनुमान के अनुसार भारत में प्रतिवर्ष औसतन तीन हजार करोड़ रुपयों का आर्थिक नुकसान आपदाओं के कारण होता है।इसी प्रकार विभागीय वार्षिक एवं पंचवर्षीय योजनाओं में भी आपदा-प्रबंधन के कार्य को प्राथमिकता नहीं दी गई है। यही कारण है कि देश का एक हिस्सा सूखे एवं अकाल से ग्रस्त है तो दूसरा निरंतर बाढ़ की चपेट में रहता है। हालांकि भारत में गंगा, यमुना, कावेरी, कृष्णा, गोदावरी तथा नर्मदा जैसी बड़ी नदियाँ भी हैं किंतु इनका अथाह पानी समुद्र में व्यर्थ जा रहा है। किसी भी राष्ट्र के सर्वांगीण विकास के लिए बहुद्देशीय बड़ी नदी-घाटी बाँध परियोजनाओं का निर्माण अत्यावश्यक है किंतु भारत में जब भी विकास के लिए बड़ी बाँध परियोजनाएँ प्रस्तावित होती हैं, पर्यावरण की दुहाई देते हुए जनांदोलन शुरू हो जाते हैं। इस प्रकार के आंदोलनों से न केवल विकास की गति धीमी पड़ती है बल्कि जनसाधारण के मध्य एक गलत संदेश का भी प्रसार होता है जो अंततः नीति-निर्माताओं के प्रति जनता का अविश्वास बढ़ाता है। स्वतंत्रता पश्चात भारत में चहुंमुखी विकास हुआ है किंतु समय-असमय आई आपदओं ने विकास की धारा को अवरुद्ध किया है। विशेषज्ञों के अनुमान के अनुसार राजस्थान के अकाल, उड़ीसा तथा आंध्र प्रदेश के तूफानों, महाराष्ट्र, गुजरात, बिहार तथा उत्तरांचल के भूकंपों तथा असम, बिहार, उत्तर प्रदेश एवं पश्चिम बंगाल की बाढ़ों ने उतनी आर्थिक हानि पहुँचा दी है जितना कि तीसरी पंचवर्षीय योजना का कुल सार्वजनिक परिव्यय (8577 करोड़ रुपए) था। इसलिए अब यह आवश्यक हो गया है कि विकास कार्यों को आपदा-प्रबंधन के दृष्टिकोण से संयुक्त करते हुए नई रणनीति बनाई जाए।

नई जापदाएँ : नव प्रयास


विगत कुछ दशकों से आपदओं की श्रेणी में प्राकृतिक दुर्घटनाएँ तथा विभीषिकाएँ ही सम्मिलित की जाती थीं किंतु विश्वव्यापी आतंकवादी घटनाओं, आगजनी, विमान तथा ट्रेन दुर्घटनाओं, धार्मिक स्थलों की भगदड़ तथा युद्ध एवं आंतरिक अशांति के कारण उत्पन्न हालातों को भी अब इन आपदओं की श्रेणी में गिना जाने लगा है। 11 सितंबर, 2001 को अमेरिका में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर तथा पेंटागन पर हुए आतंकवादी हमलों में न केवल 10 हजार व्यक्ति एक साथ मारे गए बल्कि कई सप्ताह तक राहत एवं बचाव कार्य चलाकर भी विश्व की महाशक्ति संतोषजनक सेवाएँ नहीं दे पाई। दरअसल इस प्रकार की विभीषिकाओं का सामना करने हेतु हमारा वर्तमान तंत्र सक्षम नहीं है। अतः आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में प्राकृतिक आपदाओं के साथ-साथ मानव-प्रेरित या मानव-सृजित आपदाओं को भी सम्मिलित किया जाना प्रासंगिक प्रतीत होता है। विश्व स्तर पर उन महामारियों पर प्रभावी अंकुश लगाया जा चुका है जो व्यापक तथा त्वरित रूप से समाज के एक बड़े भाग को चपेट में ले लेती थी। संक्रामक रोगों के विरुद्ध बने टीकों तथा एंटी-बॉयोटिक दवाओं ने इस दिशा में क्रांति ला दी है किंतु अन्य आपदाएँ आज भी पूर्ववत मौजूद हैं।

नियोजित विकास का लाभ स्थाई हो तथा बार-बार एक ही प्रकार के कार्यों पर व्यय न करना पड़े, इसके लिए यह आवश्यक है कि आर्थिक नियोजन के लक्ष्यों, नीतियों तथा कार्ययोजना में आपदा-प्रबंधन के पक्षों को सतर्कता के साथ समाहित किया जाए। सर्वप्रथम यह आवश्यक है कि समुदाय अपने चारों ओर आसन्न विपदाओं को पहचाने तथा उसका सामना करने हेतु जागरूक बनें। गरीबी से जूझते समाजों की दुविधा यह है कि यहाँ निरक्षरता के साथ-साथ दैनिक मजदूरी की समस्या भी व्याप्त है। यही कारण है कि समुद्री तूफानों की स्पष्ट घोषणा तथा चेतावनी-संकेतों के बावजूद मछुआरे समुद्र में जाते हैं तथा आपदा के शिकार बनते हैं। दूसरी ओर बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो समय रहते सुरक्षित स्थानों पर जाना मुनासिब नहीं समझते तथा सरकारी चेतावनी को हल्के-फुल्के ढंग से लेते हैं। जनमानस की इसी लापरवाही के चलते कांडला तथा कटक में समुद्री तूफान से व्यापक जनहानि हुई थी। जनचेतना के साथ-साथ पूर्व-चेतावनी प्रणाली का विकास भी अनिवार्य है। सौभाग्य से भारत दूरसंवेदी संचार उपग्रहों के क्षेत्र में एक विकसित राष्ट्र है। सूखा, बाढ़ तथा तूफान की चेतावनी समय रहते मिल जाती है किंतु इस चेतावनी के अनुरूप एहतियाती प्रशासनिक कदम भी उठाए जाएँ तो वे अधिक सार्थक सिद्ध हो सकते हैं।

आपदा-प्रबंधन की राह में एक बड़ी बाधा राज्य सरकारों के पास वित्तीय संसाधनों की कमी होना भी है। यही कारण है कि देश की सभी राज्य सरकारों प्राकृतिक आपदा आते ही केंद्र सरकार का मुंह ताकने लगती हैं। इस निर्भरता को कम करने का एकमात्र रास्ता यही है कि राज्य सरकारें अपने आंतरिक स्रोतों से एक आपातकालीन राहत कोष स्थापित करें। इस कोष में योजना मद के अंतर्गत भी कुछ नियमित सहायता केंद्र सरकार द्वारा दी जानी चाहिए। यद्यपि भारत में राष्ट्रीय आपदा आने पर आम जनता तथा विदेशी अभिकरणों द्वारा पर्याप्त सहायकता प्राप्त होती है किंतु अभी तक इस राशि का विधिवत प्रयोग सुनिश्चित नहीं किया जा सका है और न ही योजना कार्यों में आपदा-प्रबंधन को यथोचित स्थान दिया गया है। अब समय आ गया है कि हम योजना कार्यों के साथ ही प्राकृतिक एवं मानवीय आपदओं के प्रबंधन के प्रयास भी शुरू करें। अन्यथा विकास की गति 'दो कदम आगे, एक कदम पीछे' की बनी रहेगी।

विकास योजनाएँ तथा आपदा प्रबंधन टेबल(लेखक इंदिरा गाँधी पंचायती राज एवं ग्रामीण विकास संस्थान, जयपुर में एसोसिएट प्रोफेसर हैं।)

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