विस्थापन मतलब जिंदगी का उजड़ जाना

Submitted by admin on Mon, 09/30/2013 - 13:29
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विकास संवाद
मानव समाज आज उस मुकाम पर पहुंच चुका है, जहां दुनिया जाइरोस्कोप जैसी तेजी से बदल रही है। इसके बावजूद मनुष्य के स्वभाव में, उसकी सामाजिकता में इतना कम परिवर्तन हो सका है कि हम यह दावा नहीं कर सकते कि विज्ञान मनुष्य को अच्छा मनुष्य भी बनाता है। ‘भगवान सिंह’

विकास के क्रम में मनुष्य ने जिन उपादानों को विकसित किया था आधुनिक औद्योगिक विकास ने पिछली तीन शताब्दियों में न सबको समेट कर एक ऐसी दिशा दे दी जिसमें कि सिर्फ शक्तिशाली मनुष्य ही सुकून से रह सकता है। कहा जाता है कि यूनान के ‘स्वर्णकाल’ में प्रत्येक यूनानी नागरिक के ‘स्वामित्व’ में करीब 18 गुलाम थे। इससे उस समाज की वास्तविकता की कल्पना की जा सकती है। मानव सभ्यता का इतिहास और विस्थापन संभवतः समानांतर धाराएं हैं। पहला विस्थापन कब हुआ, यह जान पाना तो असंभव है परंतु घुमंतु समुदाय का एक जगह ठहर जाना, वहां कुछ वर्ष रहकर यदि उन्हें प्राकृतिक अथवा बलात् उस जगह को छोड़ना पड़े तो क्या उसे विस्थापन माना जा सकता है? अनादिकाल से विभिन्न सभ्यताओं के अंतर्गत अनेक नगरों और भौतिक संपदाओं के निर्माण ने संभवतः विस्थापन की नींव रखी होगी। विस्थापन की नींव में मूलतः भौतिक विकास ही रहा है और भारतीय समाज की इसके प्रति वितृष्णा ऋग्वेद काल के बाद प्रकट होती है।

इस संबंध में भगवान सिंह ने लिखा है, प्राचीन भारत में भौतिक विकास को लेकर एक कुंठा उत्पन्न हो गई थी। ऋग्वेद के बाद का चिंतन इस कुंठा का ही चिंतन है, जिसमें यह चेतना व्यापक रूप से फैली कि ज्ञान से, भौतिक प्रगति से, सुख सुविधा के समान जुटाने से कुछ नहीं होता। अपने समय को देखते हुए असाधारण भौतिक प्रगति करने वाले समाज ने मनुष्य के रूप में अपना पतन न किया हो तो उत्थान भी नहीं किया। विकास की सीढ़ी चढ़ते मनुष्य ने अपने सामने आई हर वस्तु को अपना दुश्मन समझा और थोड़े से लोगों के आराम व मनोरंजन के निमित्त उसने जंगलों पहाड़ों को नष्ट किया, जीव-जंतुओं का संहार किया। धरती, आकाश व समुद्र तक को इस हद तक प्रदूषित कर डाला है कि अब उनके पूर्व स्थिति में आने की संभावनाएं नित्य प्रति धूमिल होती जा रही है। विकास की इस अंधी दौड़ में हमने भस्मासुर को अपना लिया और अपने ही विनाश में लग गए।

विकास के क्रम में मनुष्य ने जिन उपादानों को विकसित किया था आधुनिक औद्योगिक विकास ने पिछली तीन शताब्दियों में न सबको समेट कर एक ऐसी दिशा दे दी जिसमें कि सिर्फ शक्तिशाली मनुष्य ही सुकून से रह सकता है। कहा जाता है कि यूनान के ‘स्वर्णकाल’ में प्रत्येक यूनानी नागरिक के ‘स्वामित्व’ में करीब 18 गुलाम थे। इससे उस समाज की वास्तविकता की कल्पना की जा सकती है। परंतु उस गुलाम परंपरा के पीछे तर्क यही दिया जा रहा था कि यूनान के नागरिक बेहतर मनुष्य के निर्माण हेतु अपना जीवनयापन कर बौद्धिक विचार-विमर्श कर मनुष्य और मनुष्यता का विकास कर सकें।

कमोबेश कुछ इसी तरह की बातें आधुनिक विज्ञान के प्रादुर्भाव के समय की गई थी कि इसके माध्यम से मनुष्य को अवकाश मिलेगा और वह एक बेहतर जीवन जीने की ओर अग्रसर होगा। परंतु विज्ञान का आधुनिक स्वरूप अपने विचार में जहां अत्यंत प्रगतिशील नजर आता था वहीं अपने व्यवहार में विपरीत नतीजे देकर गया। यूनान में जहां व्यक्तिगत गुलामी अपने चरम पर थी वहीं आधुनिक औद्योगिक विकास के युग तक पहुंचते-पहुंचते स्थितियों में आमूलचूल परिवर्तन आया और विकास की सुरसा का मुंह भरने के लिए अब देशों को ही गुलाम बनाकर उन्हें उपनिवेश में बदल दिया गया। सवाल आधुनिक विकास के औचित्य से ज्यादा इसे लागू करने वाले वर्ग की प्रवृत्ति पर है। तथाकथित आधुनिक सुनियोजित विकास ने अपनी परिधि में पूरी दुनिया को समेट लिया। यूरोप को अपने कल-कारख़ानों के लिए कच्चे माल की आवश्यकता थी अतएव सारी दुनिया की खनिज संपदा पर उनकी निगाह पड़ी। इस तरह ज़मीन के नीचे दबे खनिजों को बड़े पैमाने पर निकालने के लिए उन पर बसे आदिवासियों को खदेड़ने की जो शुरुआत तीन शताब्दियों पूर्व हुई थी वह आज भी जारी है। सिर्फ नाम बदल गए हैं पहले उनमें से एक ईस्ट इंडिया कंपनी थी, अब वेदांता है और यह अजीब सा दुर्योग है कि दोनों के मुख्यालय लंदन में ही हैं।

इस बात का तो कोई दस्तावेजीकरण नहीं मिलता कि उस पहले आदिवासी, जिसे उसकी भूमि से बेदखल किया गया होगा ने क्या कहा होगा। परंतु हमारे समय में वेदांता जो उड़ीसा की नियमगिरि पहाड़ी से एल्यूमिनियम निकालने के लिए एक पैर पर खड़ी है और कुछ हिस्सों में उसने यह कार्य आरंभ भी कर दिया है, में निवास करने वाली व विस्थापित की विभीषिका झेलने वाली डोंगरिया कोंध जनजाति के कृष्णा वडाका का कथन सचमुच में आंखे खोल देता है। कृष्णा का कहना है, ‘वे (वेदांता) कहते हैं कि हमारी नियमगिरि पहाड़ियों की चट्टानों में एल्यूमिनियम नाम का बहुत मूल्यवान खनिज है। मेरे पूर्वजों ने कभी इसकी परवाह नहीं की। क्योंकि जब हमारे देवता ‘नियमराजा’ ने हमें ज़मीन के ऊपर सब कुछ दे रखा है तो हम अपने पैरों के नीचे की ज़मीन से कुछ भी निकाल कर क्यों खाएं? क्या एल्यूमिनियम हमारे जीवन, हमारी पहाड़ियों और हमारे जंगलों से भी अधिक महत्वपूर्ण है? वे कहते हैं कि एक युद्ध लड़ा जाएगा, बहुत बड़ा युद्ध। इसके लिए बहुत सारे हथियारों की आवश्यकता पड़ेगी। एल्यूमिनियम ऐसी धातु है जिससे ऐसे हथियार बनाए जाएंगे जो लाखों लोगों को मार सकते हैं। वे लाखों लोगों को क्यों मरना चाहते हैं? क्या वे हम लोगों जैसे बैठकर आपस में निपटारा नहीं कर सकते? कृष्णा का दर्द पूरी मानवता का दर्द है और उसका प्रश्न किसी एक व्यक्ति से नहीं बल्कि पूरी आधुनिक विकास प्रणाली से है। उसके जीवन के 47 साल इन जंगलों और पहाड़ियों में बीते हैं। उसके बचपन की स्मृतियाँ उसे अपने बच्चों के बच्चों से जोड़ती हैं और वह कहता है कि अब ‘वे’ (बच्चे) यहां नहीं रह पाएंगे?

विस्थापन की इस पूरी प्रक्रिया को समझाते हुए अरुंधति राय कहती हैं, ‘लाखों लाख विस्थापितों का अब कोई वजूद नहीं है। जब इतिहास लिखा जाता है, वे इसमें नहीं होते। आंकड़ों में भी नहीं। उनमें से कुछ लगातार तीन बार और चार-बार विस्थापित हुए हैं। बांध के लिए, चांदमारी के इलाके के लिए, दूसरे बांध के लिए, यूरेनियम की खान के लिए, बिजली परियोजना के लिए। एक बार वे लुढ़कना शुरू करते हैं तो फिर रुकने की कोई जगह नहीं होती। इनमें से बहुत बड़ी संख्या आखिरकार हमारे बड़े शहरों की परिधि पर झोपड़पट्टियों में खप जाती है, जहां यह सस्ते निर्माण मज़दूरों की बहुत बड़ी भीड़ में बदल जाती है (जो और ज्यादा परियोजनाओं पर कार्य करती है जिससे और ज्यादा लोग बेदखल होते है)। सही है कि उनका सफाया नहीं किया जा रहा है या उन्हें गैस चैंबरों में नहीं डाला जा रहा है, मगर मैं दावा करती हूं उनकी रिहाइस का स्तर थर्ड राइख (नाजीकेंप) के किसी यातना शिविर से बदतर है। वे कैदी नहीं हैं, लेकिन वे मुक्ति के मतलब की एक दूसरी ही परिभाषा देते हैं।’

भारत में विकास की राजनीति और विस्थापन को समझने के लिए 19वीं शताब्दी पर नजर डालते हैं। इस दौरान विकास के एक प्रतीक ‘रेलवे’ को लेते हैं। भारत में सन् 1849 से रेल पथ निर्माण का कार्य प्रारंभ किया गया था। तत्कालीन योजनाकारों का मानना था कि भारत जैसे ‘दरिद्र’ देश में 6 हजार मील रेल पथ बनाने से काम चल जाएगा। सन् 1873 में करीब 5697 मील रेलवे लाइन डल चुकी थी परंतु यह कार्य सतत् चलता रहा और 1906 में यह बढ़कर 29000 मील तक पहुंच गई थी। विकास के इस ‘प्रतीक’ को लेकर तब भी विरोध प्रारंभ हो चुका था और सितंबर 1900 में ‘न्यू इंग्लैंड म्यागजिन’ में अमेरिकन पादरी रेवरेंड जे.टी. रुयांडर ल्यांड ने लिखा था, ‘शिक्षा-प्रचार, स्वास्थ्य रक्षा, नहर-खनन आदि कामों के लिए जिन्हें भारतवासी बहुत अधिक चाहते हैं, के लिए भारत सरकार के पास धन की चाहे जितनी कमी हो, रेल बनाने के लिए उनके पास खूब धन आ जाता है।’

विकास की प्राथमिकताओं को लेकर यह द्वंद आज भी बरकरार है। सामान्य तौर पर यह माना जाता है कि भारत में रेलपक्ष निर्माण के लिए सर्वप्रथम भूमि अधिग्रहण को कानूनी रूप दिया गया होगा। परंतु वास्तविकता यह है कि इसके बहुत पहले सन् 1824 ईं. में नियम-1 के तहत यह कार्यवाही प्रारंभ हो चुकी थी। सर्वप्रथम कोर्ट विलियम (मद्रास) में लागू इस नियमन में कहा गया था, “इस नियमन की आवश्यकता इसलिए है जिससे कि सरकारी अधिकारी सड़क, नहरें या अन्य सार्वजनिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए वाजिब मूल्य पर ज़मीन एवं अन्य अचल संपत्तियों का अधिग्रहण कर सकें। इसके अतिरिक्त अधिकारियों एवं जमींदारों को (निश्चित इलाकों में) नमक बनाने के लिए जमीनें उपलब्ध करवाने हेतु इस नियम का उपयोग किया जाता था।” इस प्रक्रिया को ‘दि डॉक्ट्रिन ऑफ इमिनेट डोमेन’ भी कहा जाता था। जो कि ब्रिटेन का एक साधारण कानून था और इसके अनुसार राज्य का अपनी सीमा में आने वाली संपत्ति पर पूरा अधिकार रहता है और नागरिक से कभी भी सार्वजनिक उपयोग के लिए भूमि लेने का अधिकार राज्य के पास सुरक्षित है। इसके बाद बम्बई में सन् 1839 में भवन अधिनियम पारित किया गया जिसके अंतर्गत सरकार को वर्तमान सड़कों को चौड़ा करने या उनमें परिवर्तन करने, नई सार्वजनिक सड़क, ड्रेनेज, गली बनाने हेतु बम्बई एवं कोलाबा के टापू में भूमि अधिग्रहण का अधिकार मिल गया था। इसमें मुआवजा देने का प्रावधान भी किया गया था।

सन् 1850 के अधिनियम क्रमांक 18 में रेलवे एवं अन्य सार्वजनिक सुविधा व अन्य कार्यों के लिए भूमि अधिग्रहण का प्रावधान किया गया। 1850 के ही कानून क्रामांक 42 के अनुसार 1824 के नियमन 1 के अंतर्गत अब बंगाल में भी इस कानून के अंतर्गत रेलवे एवं अन्य सार्वजनिक कार्यों के लिए भूमि अधिग्रहण किया जा सकता था।

सन् 1857 के अधिनियम क्रमांक 7 के लागू होते ही इस विषय से संबंधित पूर्ववर्ती सारे कानून रद्द हो गये। साथ ही यह ऐसा पहला ब्रिटिश कानून था जो कि पूरे भारत पर एक सा लागू हुआ। इसके अंतर्गत सार्वजनिक उद्देश्य हेतु भूमि अधिग्रहण एवं मुआवज़े का प्रावधान था तथा अस्थायी एवं स्थायी दोनों स्थिति में अधिग्रहण का प्रावधान था और सभी सार्वजनिक उद्देश्यों जिसमें सड़कें, रेल व नहरें शामिल थीं, के लिए भूमि अधिग्रहण संभव था। ध्यान देने योग्य बात यह है कि देश में अभी तक ब्रिटिश साम्राज्य का नहीं बल्कि ईस्ट इंडिया कंपनी का राज था।

सन् 1857 के इस अधिनियम में सन् 1861 के कानून क्रमांक 2 के द्वारा बदलाव कर यह प्रावधान किया गया कि अब रेल, सड़क आदि के निर्माण के लिए अधिग्रहित भूमि के दोनों ओर की निश्चित सीमा तक की भूमि को भी कच्चे माल की आपूर्ति, अस्थायी सड़क आदि बनाने के लिए अधिग्रहित किया जा सकता है। कुछ मामलों में यह सीमा 2 मील तक की थी। इस कानून में पहली बार यह प्रावधान किया गया था कि विरोध की स्थिति में पुलिस कमिश्नर के द्वारा भूमि का कब्ज़ा दिलवाया जाए। ग़ौरतलब है कि इस समय तक भारत सीधे-सीधे ब्रिटिश साम्राज्य का अंग बन चुका था।

सन् 1894 के इस मूल अधिनियम में गैर सरकारी कंपनियों हेतु भूमि अधिग्रहण का प्रावधान नहीं था। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि गवर्नर जनरल परिषद के पास भी इस कानून के अंतर्गत सीमित अधिकार थे। परंतु आज़ादी के बाद भारत सरकार ने सन् 1984 में इस कानून में काफी सारे संशोधन कर भूमि अधिग्रहण (संशोधन) अधिनियम 1984 संसद से पारित कराया। सन् 1863 तक निजी व्यक्तियों या कंपनियों के लिए सार्वजनिक सुविधाओं के निर्माण हेतु भूमि अधिग्रहण का कोई कानूनी प्रावधान नहीं था। सार्वजनिक सुविधाओं से तात्पर्य था, कोई भी पुल, सड़क, रेलपथ, ट्रामपथ, सिंचाई या नौचालन हेतु नहर निर्माण, नदी या तट सुधार कार्य, कृत्रिम बंदरगाह निर्माण, समुद्री बंदरगाह, ड्रेनेज या बिजली का कार्य, टेलीग्राफ या इन सबसे संबंधित सहायक कार्य। यह कानून इन्हीं उद्देश्यों तक के लिए सीमित था। हालांकि यह गवर्नर जनरल काउंसिल के हाथ में था कि वे किसी अन्य कार्य को सार्वजनिक सुविधाओं में शामिल करने की अधिसूचना जारी कर सकते थे।

उपरोक्त सभी क़ानूनों को एक साथ मिलाकर सन् 1870 में बने अधिनियम क्रमांक 10 का मुख्य उद्देश्य मुख्यतया मध्यस्थों से संबंधित न उल्लेखों को विलुप्त करना था जिनके माध्यम से प्रशासनिक निर्णय अंतिम निर्णय माने जाते थे। इस अधिनियम के जरिए यह प्रावधान किया गया था कि संबंधित पक्ष मुआवज़े की राशि हेतु अपने मामले लेकर दीवानी न्यायालय में जा सकें। इस अधिनियम के अंतर्गत अधिग्रहण से संबंधित विस्तृत प्रक्रिया का वर्णन किया गया था। इसी के साथ मुआवज़े के निर्धारण के संबंध में नियम भी इस अधिनियम के अंतर्गत बनाए गए थे।

इसके बाद बारी आई भूमि अधिग्रहण अधिनियम 1894 (1894 का क्रमांक 1) की। इसके माध्यम से 1870 के अधिनियम को रद्द कर दिया गया। इस कानून को भूमि अधिग्रहण से संबंधित पहले परिपूर्ण कानून की संज्ञा दी जा सकती है। इसे सार्वजनिक उद्देश्य एवं कंपनियों हेतु भूमि अधिग्रहण के उद्देश्य से संशोधित किया गया था। आज़ादी के बाद अनेक संशोधनों के साथ यह कानून आज भी प्रचलन में है।

सन् 1894 के इस मूल अधिनियम में गैर सरकारी कंपनियों हेतु भूमि अधिग्रहण का प्रावधान नहीं था। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि गवर्नर जनरल परिषद के पास भी इस कानून के अंतर्गत सीमित अधिकार थे। परंतु आज़ादी के बाद भारत सरकार ने सन् 1984 में इस कानून में काफी सारे संशोधन कर भूमि अधिग्रहण (संशोधन) अधिनियम 1984 संसद से पारित कराया। इसके पारित हो जाने से इसके अंतर्गत कंपनी अधिनियम में पंजीकृत गैर सरकारी कंपनियों, सोसाइटी अधिनियम 1860 (2) के अंतर्गत पंजीकृत सोसायटियों और सहकारी समितियों के लिए भी भूमि अधिग्रहित की जा सकती है। मूल अधिनियम के अध्याय 4 के सह अध्याय (1) में किसी भी तरह के सार्वजनिक उद्देश्य के साथ ही साथ यह शब्द या एक कंपनी के लिए भी, घुसेड़ दिया गया।

सन् 1824 ई. से प्रारंभ हुआ कानूनी अधिग्रहण का यह सफर 185 वर्ष का सफर पूरा कर चुका है । इस बीच सन् 1894 में जो भूमि अधिग्रहण कानून बना था उसे सन् 1984 के संशोधनों के जरिए और भी जनविरोधी बना दिया गया। इसी के साथ सबसे विचारणीय तथ्य यह है कि इन 185 वर्षों के सफर में इस बात की आवश्यकता न तो औपनिवेशिक शासकों ने समझी थी कि अधिग्रहण के साथ ही साथ पुनर्वास से संबंधित कानून भी बनाया जाए और न ही आज़ादी के बाद की सरकारों ने इस दिशा में कोई पहल की। पिछले दिनों स्तर पर अधिग्रहण और पुनर्वास संबंधी नए कानून को लोकसभा से पारित कराने का प्रयत्न भी किया गया था। जनआंदलोनों एवं संबंधित पक्षों का मानना था कि यह नया कानून औपनिवेशिक कानून से भी ज्यादा खतरनाक है।

विकास और विस्थापन को भारतीय परिप्रेक्ष्य में समझने के लिए एक अन्य तथ्य पर भी गौर करना आवश्यक है। सन् 1894 में जब वर्तमान भू-अधिग्रहण कानून लागू हुआ तब भारत की जनसंख्या 27.96 करोड़ (जनसंख्या वर्ष 1891) थी। साथ ही वर्तमान पाकिस्तान और बांग्लादेश भी भारत के ही अंग थे। आज हमारी आबादी 110 करोड़ है और आज़ादी के बाद भारत में करीब 1.50 लाख वर्ग कि.मी. भूमि राज्य द्वारा अधिग्रहित की जा चुकी है, जो कि क्षेत्रफल में बांग्लादेश के बराबर बैठती है।

ये अधिग्रहण बांध, कारख़ानों, रेल, हवाई जहाज़, औद्योगिक क्षेत्र, शहरी बसाहट, सुरक्षित वन, बाघ अभ्यारण्य, सड़क निर्माण, परमाणु एवं ताप विद्युतगृह, खेल के स्टेडियम से लेकर श्मशान बनाने तक के लिए किए गए हैं। एक मोटे अनुमान के अनुसार आज़ादी के बाद से करीब 10 करोड़ नागरिक इनकी वजह से विस्थापित हुए हैं। इन विस्थापितों में से कम से कम 45 प्रतिशत बच्चे हैं। जब देश में पुनर्वास को लेकर कोई कानून नहीं है तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि हमारा देश अपने नागरिकों को लेकर कितना संवेदनशील है? विस्थापित परिवार के मुखिया के पुनर्वास को लेकर ही सरकारें चिंतित नहीं हैं तो ऐसे में विस्थापित बच्चों की स्थिति की सहज ही कल्पना की जा सकती है।

आज हम 11वीं पंचवर्षीय योजना की मध्यावधि समीक्षा वर्ष में हैं। आज़ादी के बाद के वर्षों में बच्चों को लेकर अनेक योजनाएं बनाई गई। उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य व अन्य समस्याओं को लेकर बड़ी-बड़ी कार्य योजनाएं हमारे सामने आई हैं। वहीं दूसरी ओर योजना आयोग विकास की परियोजनाओं के निर्माण के समानांतर विकास से उजड़े समुदाय की किसी योजना को संबंधित विकास परियोजना के अंग के रूप में सम्मिलित करने के प्रति उत्सुक नहीं दिखता है। ये विरोधाभास सिर्फ सरकार नीति निर्धारकों में ही नहीं है। बल्कि गैर सरकारी संगठनों एवं संस्थाओं द्वारा प्रस्तावित नए भूमि अधिग्रहण एवं पुनर्वास बिल के मसौदे में भी बच्चों के लिए विद्यालय, खेल के मैदान से अधिक का प्रावधान नहीं किया गया है। नई पुनर्वास नीति किस तरह बच्चों और महिलाओं के लिए लाभकर हो इस नज़रिए का वैकल्पिक नियोजनकर्ताओं में भी अभाव नजर आता है।

वहीं भारत के संविधान में अनुच्छेद 39 में राज्य अनुसरणीय नीति तत्वों में से 39च (संविधान बयालीसवां संशोधन अधिनियम 1976 की धारा 7 द्वारा) के अनुसार, बालकों को स्वतंत्र और गरिमामय वातावरण में स्वस्थ विकास के अवसर व सुविधाएं दी जाएं और बालकों और अल्प व्यय व्यक्तियों की शोषण से तथा नैतिक और आर्थिक परित्याग से रक्षा की जाए। इन्हीं नीति निर्देशक तत्वों में राज्य को यह भी निर्देशित किया गया है कि पुरुष और स्त्री कर्मकारों के स्वास्थ्य और शक्ति तथा बालकों की सुकुमार अवस्था का दुरुपयोग न हो आर्थिक आवश्यकता से विवश होकर नागरिकों को ऐसे रोज़गार में न जाना पड़े जो उनकी आयु या शक्ति के अनुकूल न हो। (अनुच्छेद 395)

ग़ौरतलब है कि भारतीय संविधान अपनी उद्देशिका तक में व्यक्ति की गरिमा का जिक्र करता है। परंतु विस्थापित बच्चों की गरिमा और उनके विकास के लिए अनिवार्य तत्वों को लेकर किसी विशेष व्यवस्था का प्रावधान कहीं भी नजर नहीं आता। प्रत्येक योजना को उसकी आर्थिक उपयोगिता से तौला जाता है। इन सभी योजनाओं में कहीं भी यह दिखाई नहीं देता कि ‘बच्चे’ भी ध्यान देने योग्य हैं। भारत के संविधान के नवीनतम संशोधन (86वां) के अनुसार 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए शिक्षा को अनिवार्य बना दिया गया है। परंतु विस्थापन पीड़ित समुदाय की स्थितियों से जो कोई थोड़ा सा भी परिचित है वह अनिवार्य शिक्षा के प्रावधान की ज़मीनी हकीक़त को बहुत अच्छे से समझ सकता है। विस्थापन को प्रोत्साहित करती हमारी विकास नीति में जब हाशिए पर पड़े समाज की ही कोई खोज-खबर नहीं रखी गई है तो हाशिए पर पड़े बच्चों की ओर किसका ध्यान जाएगा?

संविधान के अनुच्छेद 39 के दृष्टिगत भारत सरकार ने अगस्त 1974 में राष्ट्रीय बालनीति बनाई। इसकी प्रस्तावना में कहा गया है, राष्ट्र के बच्चे एक सर्वोच्च महत्वपूर्ण संपत्ति हैं। उनकी देखभाल और चिंता करना हमारी ज़िम्मेदारी है। मानव संसाधन विकास के लिए हमारी राष्ट्रीय योजनाओं में बच्चों के कार्यक्रमों को प्रमुख स्थान मिलना चाहिए ताकि हमारे बच्चे पुष्ट नागरिक बनें। हमारा लक्ष्य होना चाहिए कि बढ़त की अवधि में सभी बच्चों को विकास के समान अवसर मिलें क्योंकि इससे असानता कम करने और सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने का हमारा ज्यादा व्यापक उद्देश्य पूरा होगा।

इसी के साथ बच्चों से संबंधित अनेक प्रावधान हमको इस बालनीति में मिलते हैं। परंतु रोज़गार की तलाश में आने या विकास योजनाओं की वजह से अपने घरों व इलाकों से विस्थापित समुदाय के बारे में पूरी नीति में एक भी शब्द नहीं है। इससे भारतीय नीति निर्धारकों की दूरदृष्टि और बच्चों के प्रति उनके नज़रिए की सत्यता भी उजागर हो जाती है।

संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी 20 नवम्बर 1989 को बच्चों के अधिकार पर एक घोषणा-पत्र को स्वीकृति दी थी। भारत ने भी इस पर हस्ताक्षर किए हैं। यह घोषणा-पत्र बचपन पर विशेष ध्यान और सहायता की आवश्यकता की ओर हमारा ध्यान दिलाता है। साथ ही इसमें यह भी कहा गया है कि बच्चों के संरक्षण और सुसंगत विकास के लिए प्रत्येक राष्ट्र की परम्पराओं और सांस्कृतिक मूल्यों का पूरा ध्यान रखते हुए प्रत्येक देश में, खासतौर से विकासशील देशों में, बच्चों के जीने की स्थितियों में व सुधार के काम में अंतरराष्ट्रीय सहयोग के महत्व को समझते हुए, निम्न बातों पर समहत हुए। इसके पश्चात पूरा घोषणा-पत्र हमारे सामने आता है। इस घोषणा-पत्र के अनुच्छेद – 22 के अनुसार समझौते में शामिल देश यह सुनिश्चित करने के लिए उचित प्रयास करेंगे कि अगर कोई बच्चा शरणार्थी का दर्जा दिए जाने की मांग करता है अथवा लागू होने वाले अंतरराष्ट्रीय अथवा कानूनी प्रक्रियाओं के अंतर्गत शरणार्थी माना गया है वह चाहे अपने माता-पिता अथवा किसी अन्य व्यक्ति के साथ हो अथवा न हो, उस बच्चे को उचित संरक्षण और समझौते तथा अन्य ऐसे अंतरराष्ट्रीय मानव अधिकार अथवा मानवीय प्रसंविदाओं जिसके कि ये देश सदस्य हैं के अनुसार मिलने वाले अधिकार दिलाने में मानवीय सहायता मिले।

पूरा घोषणा-पत्र पढ़ लेने के बाद पुनः जिस वाक्य पर गौर करना आवश्यक है वह है, खासतौर से विकासशील देशों में यानि कि इस घोषणा-पत्र का केंद्र बिंदु विकासशील देश है और इन देशों का केंद्र बिंदु है विकास। ये पूरा घोषणा-पत्र विकास कार्यों से होने वाले विस्थापन को लेकर मौन है। जबकि पूरी दुनिया में बच्चों के विस्थापन का सबसे बड़ा कारण विकास के लिए होने वाला विस्थापन ही है। यह घोषणा-पत्र शरणार्थी एवं युद्ध या गृहयुद्ध की स्थिति में बच्चों के अधिकारों पर अपनी चिंता दर्शाता है परंतु विकास से विस्थापित बच्चों को लेकर एक भी शब्द इसमें नहीं है।

भारत का संविधान, बाल नीति, संयुक्त राष्ट्र का बाल अधिकार घोषणा-पत्र सब विस्थापित बच्चे को लेकर मौन हैं। भारत की कुल जनसंख्या का करीब 10 प्रतिशत हिस्सा विस्थापितों का जीवन बिता रहा है जिसमें आदिवासियों की संख्या सर्वाधिक है। इसकी वजह उन इलाकों में प्राकृतिक संसाधनों की प्रचूरता है तो विकास परियोजनाओं से नवनिर्मित समुदाय को एक विशेष वर्ग के रूप में मान्यता देकर इनके बच्चों के लिए आरक्षण के माध्यम से क्या कुछ किया जा सकता है इस बात पर भी गंभीरता से विचार होना चाहिए। राजकिशोर सम्पादित पुस्तक ‘बच्चे और हम’ की प्रस्तावना में लिखते हैं ‘मेरे एक मित्र का कहना है कि स्त्री दुनिया का आखिरी उपनिवेश है और बच्चे? उनके बारे में सोचने की जरूरत किसे है? क्या हर माता-पिता को यह मालूम नहीं रहता कि बच्चे के लिए क्या ठीक है? जब हम यह निर्धारित कर देते हैं कि बच्चे के लिए क्या ठीक है, तो हम यह भी परिभाषित कर देते हैं कि बच्चे के जीवन का अर्थ क्या है। निश्चय ही इसके पीछे प्रेम भी होता है, बल्कि यह भी कहा जा सकता है कि जरुरत से कुछ ज्यादा ही प्रेम होता है। प्रेम का अतिरेक या तो श्रद्धा में बदल जाता है या तानाशाही में। बच्चा चूंकि दुनया का सबसे असहाय प्राणी है इसलिए अक्सर उसके हिस्से में तानाशाही ही आती है। इस कथोपथन में अगर हम माता-पिता के स्थान पर रज्य एवं सरकार को रखकर विचार करें तो विस्थापित बच्चे की वास्तविक स्थिति को समझने में कोई कठिनाई नहीं होगी। क्योंकि राज्य और सरकार कोई भी कार्य प्रेमवश नहीं करते। वे अपने विकास कार्यों को लोहे के हाथों और पत्थर दिल कार्य प्रणाली से अंजाम देते हैं। ऐसे में बच्चों के बारे में सोचने की उन्हें फ़ुरसत ही नहीं होती। तब आप कल्पना कीजिए कि जब हमारा अपने बच्चों के प्रति अत्यधिक प्यार तानाशाही में परिवर्तित होकर उनकी निजता और स्वतंत्रता का हनन करता है ऐसे में राज्य जिसका निर्माण ही संभवतः इस परिकल्पना पर किया गया है कि वह भावशून्य होगा तो वह विस्थापित बच्चे से तानाशाही से आगे जो कुछ होता है वैसा ही व्यवहार करेगा और यदि स्त्री आज भी उपनिवेश है तो बच्चा? यह गंभीर मामला है और विस्थापन की दशा में इन परिस्थितियों पर विचार करना और भी आवश्यक हो जाता है। घोषणा-पत्र के अनुच्छेद 22 को सामने रखकर देखने के बावजूद विस्थापित बच्चों को कोई राहत मिलती नजर नहीं आती।

भारत का संविधान, बाल नीति, संयुक्त राष्ट्र का बाल अधिकार घोषणा-पत्र सब विस्थापित बच्चे को लेकर मौन हैं। भारत की कुल जनसंख्या का करीब 10 प्रतिशत हिस्सा विस्थापितों का जीवन बिता रहा है जिसमें आदिवासियों की संख्या सर्वाधिक है। इसकी वजह उन इलाकों में प्राकृतिक संसाधनों की प्रचूरता है तो विकास परियोजनाओं से नवनिर्मित समुदाय को एक विशेष वर्ग के रूप में मान्यता देकर इनके बच्चों के लिए आरक्षण के माध्यम से क्या कुछ किया जा सकता है इस बात पर भी गंभीरता से विचार होना चाहिए।

बच्चों का विस्थापन कोई कानूनी मुद्दा भी नहीं है। इसकी वजह यह है कि परियोजनाओं की पुनर्वास नीतियों में (यदि कोई है तो) सारा लेनदेन कमोबेश व्यस्क (पुरुषों) से ही किया जाता है। पुनर्वास के मामले में महिलाओं का दर्जा भी अभी तक दोयम दर्जे का है। ऐसे में बच्चों की क्या बिसात? संयुक्त राष्ट्र संघ का बाल अधिकार का अनुच्छेद – 12 (1) कहता है, ‘अपने विचार बना सकने वाले बच्चे को समझौते में शामिल देश आश्वस्त करेंगे कि उससे जुड़े हर मुद्दे पर स्वतंत्र रूप से अपने विचार व्यक्त करने का उसे अधिकार है। बच्चे की आयु तथा परिपक्वता के अनुरूप उसके विचारों को पर्याप्त महत्व दिया जाएगा।’ क्या भारत की किसी भी विकास परियोजना से होने वाले विस्थापन से पहले कोई सलाह मशविरा किया जाता है? अपने इस अध्ययन के दौरान हमने करीब-करीब पूरे मध्य प्रदेश का भ्रमण किया और इस दौरान एक भी ऐसा बच्चा नहीं मिला जिससे विस्थापन के संबंध में राय ली गई हो।

इस सबके बीच सबसे चिंताजनक बात यह है कि हमारे देश की संसद में भी इस विषय पर कोई व्याकुलता नहीं दिखाई जाती। सन् 2007 की संसदीय कार्यवाही पर नजर डालने से हम पाते हैं कि इसके बजट, मानसून और शीतकालीन सत्र में लोकसभा में कुल 14365 प्रश्न पूछे गए थे इसमें से बच्चों से संबंधित प्रश्न थे 373 यानि कुल प्रश्नों के 259 प्रतिशत। वहीं राज्यसभा में कुल 11091 प्रश्न पूछे गए इसमें से 563 बच्चों को लेकर थे। ये कुल प्रश्नों का 5.07 प्रतिशत था। इस तरह दोनों सदनों में कुल 25457 प्रश्न पूछे गए इसमें से 936 बच्चों पर केंद्रित थे। यह कुल प्रश्नों का मात्र 3.67 प्रतिशत है। मगर इससे भी ज्यादा अफ़सोसजनक बात यह है कि इनमें से एक भी प्रश्न परियोजनाओं से विस्थापित बच्चों की स्थिति को लेकर नहीं था। इससे पता लगता है कि हमारे नीति निर्धारक की निगाह में विस्थापित बच्चों का कोई पृथक अस्तित्व ही नहीं है। (हक, सेंटर फॉर चाइल्ड राईट्स से साभार)

इस तरह हमारे योजनाकर्ताओं से लेकर नीति निर्धारक तक, सभी विस्थापित बच्चों की स्थिति पर मौन हैं। मोटे तौर पर इन बच्चों की संख्या करीब 5 करोड़ होगी जो कि भारत के अनेक राज्यों ही नहीं दुनिया के अनेक राष्ट्रों से अधिक है। परंतु वे किसी की भी प्राथमिकता में नहीं है। अग्निशेखर ने एक कविता लिखी है, विस्थापित बच्चे। यह कविता एक किताब में उद्धृत करने के लिहाज से थोड़ी लंबी कही जा सकती है। परंतु ये कविता हमारे अध्ययन का हिस्सा बने बच्चों की स्थितियों को समझ पाने में सबकी सहायता करेगी।

विस्थापित शिविरों में सो रहे बच्चों की ख़ुशियाँ
अनिश्चिय के गर्भ में हैं
बच्चों के रंग-बिरंगे कपड़े
पीछे छूट चुके हैं सन्दूकचियों में
जो हमारे चुराए गए घरों में पड़ी है
निर्जन कोनों में
बच्चों का संसार खो जाना
कुछ अदृश्य फ़ैसलों का वास्तुशिल्प है
मेरी बुजुर्ग घाटी में
नहीं जानते अबोध विस्थापित
बच्चे कि वे नींद ले रहे हैं हम सबकी उनींदी गोद में
सैकड़ों-सैकड़ों चिथड़े तम्बुओं की बस्तियां
मेले हैं उनके लिए
वे जैसे उतरकर घर की सीढ़ियां खेल रहे हैं
अजब आंगन में वे
बस्ती में दूर से आती भोपू और झंडोवाली
कारें देखकर तालियां बजाते हुए
अपनी माताओं को राहत लेने जाने को कहते हैं
उन्हें समझ नहीं आता
कि क्यों नहीं लेना चाहते हैं कुछ बच्चों के पिता
लाइनों में प्लास्टिक की बाल्टियां
गिलास या दवाई की गोलियां
बच्चों को समझाया नहीं जा सकता
कि शिविर में कैमरावालों के साथ आए नेता
कैसे बेचते हैं उनकी बाल सुलभ नज़रों को
अखबारों में
समय खिसक रहा है पांव तले ज़मीन की तरह
और घनी रात खोलती ही जा रही है
अपनी राक्षसी जटाएं
बच्चे सो रहे हैं विस्थापित शिविरों में
हमारे खामोश शब्दों के बीच की खाली जगहों में
और हमें लेना है इन्हीं लम्हों में
आंगन में कपड़ों के तार सा कोई सीधा और
तना हुआ फैसला
जिस पर धोकर हमें सुखाने हैं
इनके मैले कपड़े
बच्चों के कपड़ों को इंतजार है
धुलने का।


इस अध्ययन में कान्हा टाईगर रिजर्व (मंडला एवं बालाघाट), पालपुर कूनो अभ्यारण्य (श्योपुर कला), इंदिरा सागर बांध (खंडवा) से विस्थपितों की बस्तियों, इंदौर शहर के बीच से शहर के बाहर बसाई गई बस्तियों एवं धार जिले के पीथमपुर औद्योगिक क्षेत्र में आटो टेस्टिंग ट्रैक के फलस्वरूप विस्थापित हुए बच्चों को सम्मिलित किया गया है। इस स्थानों के चयन में विविधता का विशेष ध्यान रखा गया है। वनों से विस्थापित समुदाय मुख्यतः आदिवासी है, वही इंदिरा सागर बांध से उजड़ा समुदाय आदिवासियों के साथ ही साथ कृषकों, श्रमिकों, मछुआरों कुम्हारों, छोटे व्यापारियों आदि का है। इंदौर शहर के मध्य स्थित गंदी बस्तियों को शहर के बाहरी छोरो पर बसाया गया है। जिससे उनके सामने नई चुनौतियाँ खड़ी हो गई है। धार जिले में आटो टेस्टिंग ट्रेक के कारण विस्थापित समुदाय में अधिकांश कृषक हैं जो पीढ़ियों से इस स्थान पर निवास कर रहे थे।

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