यूरेनियम से अपंग होता पंजाब

Submitted by admin on Sun, 09/06/2009 - 08:24
Source
Gethin Chamberlain, Bathinda The Observer, 30 August 2009


गुरप्रीत सिंह: गुरप्रीत सिंह (उम्र 7 वर्ष), जो सेरेब्रल पॉल्सी और माइक्रोसिफेली का शिकार है। वह भटिंडा के पंजाबी कस्बे से 50 किमी. दूर स्थित सिरसर का रहने वाला है। उसका इलाज भटिंडा में विशेष बच्चों के लिए बने बाबा फरीद सेंटर में हो रहा है। उनके सिर या तो बहुत बड़े हैं या बहुत छोटे, अंग इतने छोटे हैं कि वें मुड़ नहीं सकते, दिमाग कभी विकसित ही नहीं हुआ, कभी बोल नहीं पाए, काश की उन" यह तस्वीर गुरप्रीत सिंह (उम्र 7 वर्ष) की है, जो सेरेब्रल पॉल्सी और माइक्रोसिफेली का शिकार है। वह भटिंडा के पंजाबी कस्बे से 50 किमी. दूर स्थित सिरसर का रहने वाला है। उसका इलाज भटिंडा में विशेष बच्चों के लिए बने बाबा फरीद सेंटर में हो रहा है।

उनके सिर या तो बहुत बड़े हैं या बहुत छोटे, अंग इतने छोटे हैं कि वें मुड़ नहीं सकते, दिमाग कभी विकसित ही नहीं हुआ, कभी बोल नहीं पाए, काश की उनका जीवन छोटा होः ये वे बच्चे हैं जिंहें शायद ही दुनिया ने देखा है, एक सकैंडल का शिकार हुए इन बच्चों पर यूरेनियम का पड़ने वाला प्रभाव देशों की सीमाओं से परे है।

कुछ बच्चे तो चुपचाप, बस शून्य में टकटकी लगाए हुए अपनी ही दुनिया में खोए हैं, कुछ रो रहे हैं, कुछ ही ऐसे हैं जिनका अपने शरीर पर नियंत्रण है। माता पिता धीरे धीरे उंहें सांत्वना और प्रोत्साहन देते हैं कि किसी दिन कोई चमत्कार होगा और एक बुरे सपने की तरह उनके सारे दुख दूर हो जाएंगें।


पंजाब के भटिण्डा और फ़रीदकोट शहरों के स्वास्थ्य कार्यकर्ता, डॉक्टर और अन्य सामाजिक संस्थायें, यह देख-देखकर हैरान हैं कि अचानक पंजाब के इन शहरों में छोटे बच्चों की खतरनाक पैदाईशी बीमारियों में तेजी से बढ़ोतरी हो गई है, उन्हें समझ नहीं आ रहा कि ऐसा क्यों हो रहा है? उन्हें बार-बार लगता है कि शायद ये बच्चे किसी घातक धीमे ज़हर के शिकार हैं। इनमें से कुछ बच्चों के सिर बड़े हैं, कुछ के बहुत ही छोटे। कुछ बच्चों के दिमाग का विकास ही नहीं हुआ, किसी को अब तक बोलना नहीं आया, कोई बच्चा एकदम चुपचाप बैठा रहता है, कुछ रोते हैं, जबकि कुछ बच्चे सतत आगे-पीछे हिलते-झूलते रहते हैं। इन मासूम बच्चों के माता-पिता दिन भर इनकी देखभाल करते रहते हैं, उनके कानों में समझाइश भरे और हौसला बढ़ाते शब्दों को बुदबुदाते हैं, इस उम्मीद में कि शायद कोई चमत्कार हो जायेगा और वे इस भयानक सपने से बाहर निकल सकेंगे…लेकिन ऐसा कुछ होने की उम्मीद कम ही है। जब वैज्ञानिकों द्वारा इन बच्चों के विभिन्न टेस्ट जर्मनी की प्रयोगशालाओं में करवाने का फ़ैसला किया तब इन बच्चों की वास्तविक दुर्दशा उजागर हो गई, परिणाम एकदम स्पष्ट थे, इन बच्चों के शरीर में यूरेनियम की भारी मात्रा पाई गई, एक मामले में तो यह मात्रा सुरक्षित मानक से 60 गुना अधिक पाई गई। निश्चित रूप से यह परिणाम आश्चर्यजनक और महत्वपूर्ण हैं।

सामान्यतः यूरेनियम समूची दुनिया में पाया जाता है, लेकिन इसकी अनाज और पानी में इसकी मात्रा मानक स्तर से बहुत ही कम होती है, जो कि मानव स्वास्थ्य के लिये हानिकारक सीमा में नहीं आती। पंजाब में ऐसा कोई ज्ञात स्रोत नहीं है जिसके कारण इन बच्चों में यूरेनियम का संक्रमण इस स्तर तक मिले, और जब एक बड़े इलाके में ही सैकड़ों बच्चे इससे प्रभावित पाये गये हैं तो हजारों बच्चे ऐसे भी होंगे जो प्रभावित होंगे अथवा हो सकते हैं। यह सवाल भारतीय अधिकारियों को परेशान कर रहा है, लेकिन इसका कोई हल भी उन्हें नहीं सूझ रहा। निजी क्लीनिकों में कार्य करने वाले बताते हैं कि उन्होंने प्रभावित इलाके का दौरा किया था, लेकिन क्लीनिक बन्द करवाने की धमकी देकर उन्हें चुप करवा दिया गया है। एक दक्षिण अफ़्रीकी वैज्ञानिक की इस घोटाले को उजागर करने की जिज्ञासा को देखते हुए उन्हें चेतावनी दी गई थी कि वापस इस देश में वे नहीं आ पायेंगे।

एक स्वतन्त्र पर्यवेक्षक ने इस विचलित कर देने वाली घटना की कड़ियाँ इलाके में कोयले से चलने वाले पावर प्लांट से जोड़ने में सफ़लता पाई है। जैसा कि सभी जानते हैं, जब कोयला जलाया जाता है तब वातावरण में फ़्लाय ऐश उड़ती है जिसमें यूरेनियम का स्तर बहुत तीव्र होता है, जबकि इसी तारतम्य में रूस में प्रकाशित एक शोधपत्र के अनुसार थर्मल पावर स्टेशन के आसपास रहने वालों को विकिरण का गम्भीर खतरा होता है। पंजाब के इस इलाके में रहने वाले बच्चों के शरीर में भी भारी मात्रा में यूरेनियम पाया गया है। भूजल के परीक्षण से मालूम हुआ है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा यूरेनियम के सुरक्षित मानक स्तर से 15 गुना अधिक इस पानी में पाया गया है। परीक्षण से यह भी पता चला है कि यह समूचे राज्य में खतरनाक स्तर तक बढ़ चुका है और लगभग 24 मिलियन लोग इसकी चपेट में आ सकते हैं।

इन परिणामों से भारत पर तो गम्भीर असर होगा ही, क्योंकि अकेला पंजाब राज्य देश के दो-तिहाई से अधिक का गेहूं पैदा करता है और देश के 40% से अधिक चावल का उत्पादन भी यहीं होता है, लेकिन दुनिया के अन्य देश जैसे, चीन, रूस, जर्मनी और अमेरिका, भी कोयला आधारित पावर प्लाण्ट बनाने की योजना पर काम कर रहे हैं। ब्रिटेन में केण्ट के नज़दीक किंग्सवर्थ में ही कोल फ़ायर स्टेशन बनाने की योजना है।

इस विपदा से पीड़ित बच्चों का इलाज बच्चों के लिये विशेष रूप से बनाये गये भटिण्डा के बाबा फ़रीद केन्द्र में किया जा रहा है, जबकि फ़रीदकोट के नज़दीक ही दो थर्मल प्लाण्ट मौजूद हैं। इन दोनों स्वास्थ्य केन्द्रों के कर्मचारियों ने ही सबसे पहले इस सम्बन्ध में आवाज़ उठाई थी, क्योंकि उन्होंने देखा कि अचानक ऐसे मरीजों की संख्या में बढ़ोतरी हो गई थी। जन्म से ही उन बच्चों में हाइड्रोसिफ़ाली, माइक्रोसिफ़ाली, सेरेब्रल पाल्सी, डाउन्स सिन्ड्रोम और अन्य कई विकृतियाँ मौजूद थीं, जबकि कई बच्चे तो जन्म लेते ही मर गये।

फ़रीदकोट में क्लीनिक चलाने वाले डॉ प्रीतपाल सिंह के अनुसार, '…गत 6-7 साल से अचानक ऐसे प्रदूषण से पीड़ित बच्चों की संख्या में तेजी आई है, लेकिन सरकार के अधिकारी इस सारे मामले को दबाने में लगे हैं। ये अधिकारी बच्चों का ज़हर तो कम नहीं कर सकते, लेकिन अब उन्हें पूरे पंजाब को ही जहरमुक्त करना होगा। उन्होंने हमें धमकी दी है कि यदि इस मामले पर हम अधिक बोलेंगे तो वे हमारे क्लीनिक बन्द करवा देंगे, लेकिन मैंने निश्चय किया कि यदि मैं चुप रहा तो यह सब कुछ और वर्षों तक चलता रहेगा, और कोई कुछ नहीं करेगा। यदि मैं चुप रहा तो हो सकता है कल मेरे बच्चे के साथ भी यही हो, क्योंकि मैंने कई बच्चों को अपनी आँखों के सामने दम तोड़ते देखा है…'।

दक्षिण अफ़्रीका की मेटल टॉक्सिकोलॉजिस्ट डॉ केरिन स्मिथ, जिन्होंने बच्चों के नमूनों को जर्मनी की प्रयोगशाला में जाँच के लिये भेजा, कहती हैं कि स्थिति को और अधिक बिगड़ने से तुरन्त रोकना ही होगा। 'इन बच्चों के शरीर में घातक रेडियोएक्टिव पदार्थ मौजूद हैं और इन्हें तत्काल प्रभाव से साफ़ करने की आवश्यकता है, ताकि इनके शरीर फ़िर से ठीक ढंग से काम करना शुरु करें…'। यदि यह रेडियोएक्टिव प्रदूषण अधिक प्रसार पाता है तो पश्चिम में पाकिस्तानी सीमा तक मुक्तसर तक एवं पूर्व में हिमाचल प्रदेश की पहाड़ियों की तलछटी तक भी पहुँच सकता है, और ऐसे में एक बड़ी आबादी भारी खतरे का सामना कर रही होगी। फ़रीदकोट के केन्द्र में 15 वर्षीय हरमनबीर कौर तेजी से आगे-पीछे डोल रही थीं, उसके नमूने के परीक्षण में यूरेनियम का स्तर 10 गुना पाया गया, जबकि उसी के छोटे भाई नौनिहाल सिंह के शरीर में यह दोगुने से भी अधिक पाया गया। हरमनबीर का जन्म फ़रीदकोट से 25 मील दूर मुक्तसर में हुआ। उसकी माँ कुलबीर कौर (37) ने देखा कि उसकी स्वस्थ बच्ची धीरे-धीरे सुस्त होने लगी, खाने में उसकी अरुचि बढ़ने लगी और धीरे-धीरे उसके शरीर के अंगों ने एक-एक करके काम करना बन्द कर दिया। कुलबीर कहती हैं, 'भगवान जाने, मैंने कौन सा पाप किया था, हमारे गाँव वाले कहते हैं कि यह मेरे परिवार को श्राप मिला है, लेकिन मैं विश्वास नहीं करती…, इस इलाके का हर गाँव प्रभावित है, मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि मेरे बच्चे यूरेनियम से पीड़ित हो जायेंगे…'।

भटिण्डा से कुछ ही किमी दूर एक किसान सुखमिन्दर (48) अपने बेटे कुलविन्दर (13) की ओर कातर दृष्टि से देखते हैं, जो अपने गाल पर उंगली रखे आसमान को शून्य में ताक रहा है। परिणामों से पता चला है कि कुलविन्दर के शरीर में यूरेनियम की मात्रा मानक स्तर से 19 गुना अधिक है। उसे सेरेब्रल पाल्सी हो चुका है और उसके हाथ और पैरों के सात ऑपरेशन किये जा चुके हैं। वे कहते हैं कि '…सरकार को इसकी गहन जाँच करनी चाहिये, क्योंकि यदि हमारे बच्चे इस प्रदूषण से प्रभावित हैं तो आने वाली पीढ़ी भी बुरी तरह प्रभावित होगी… आखिर सरकार किस बात का इन्तज़ार कर रही है? और कितने बच्चों को बीमार करना चाहते हैं वे? मैं तो दिन भर काम पर चला जाता हूँ, लेकिन मेरी पत्नी दिन भर उसकी देखभाल करती है और अक्सर भगवान से पूछती है कि वह क्यों हमारी किस्मत से खेल रहा है? हमारी प्रत्येक सुबह एक नई परेशानी के साथ शुरु होती है…'। 15 माह का दोनी चौधरी, अपने टेस्ट करवाने का इन्तज़ार कर रहा है, हालांकि क्लिनिक का स्टाफ़ जानता है कि जो लक्षण अन्य मरीजों में पाये गये हैं वही इसमें भी है और यह भी यूरेनियम बाधित हो सकती है, उसकी माँ नीलम (22) जो चण्डीगढ़ से आई हैं, कहती हैं 'बच्चे को जन्म से ही हाइड्रोसिफ़ाली था और इसकी दोनों टांगें अब बेकार हो चुकी हैं। वह अब अन्य लोगों की मदद पर ही निर्भर है, मेरे बाद उसका ध्यान कौन रखेगा?, वह बोलना चाहता है, लेकिन कुछ कह नहीं पाता, उसे यह समझने में वक्त लगेगा कि उसके पैर जीवन भर काम नहीं करेंगे, पता नहीं वह भीतर से कैसा महसूस करता होगा?'

इस समस्या की गम्भीरता को समझने में भारत की आनाकानी समझ से परे और हैरानी भरी है। इस समय देश में पंजाब सहित कई राज्यों में भारी-भरकम थर्मल पावर प्लाण्ट लगाने की योजनायें बन रही हैं। परमाणु ऊर्जा विभाग के वैज्ञानिकों का एक दल इस इलाके में जाँच करने आया था, उनका कहना है कि पानी में यूरेनियम की मात्रा 'कुछ ज्यादा' है लेकिन चिन्ता की कोई बात नहीं है। भूजल के कुछ नमूनों में यूरेनियम की मात्रा 224 mcg/l पाई गई है, जो कि विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा सुरक्षित मानक स्तर 15 mcg/l से 15 गुना अधिक है। (अमेरिका की पर्यावरण सुरक्षा एजेंसी ने इसका मानक स्तर 20 mcg/l रखा है)।

कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि भूजल के इस प्रदूषण का कारण तोशाम पहाड़ियों के दक्षिण में 150 मील दूर ग्रेनाइट की चट्टानें भी हो सकती हैं। इन चट्टानों से रिसकर आने वाला भूजल पंजाब के भूजल और नदियों को प्रदूषित कर सकता है। पानी की बढ़ती माँग, खासकर चावल की खेती की सिंचाई, की वजह से ट्यूबवेल पर निर्भरता अत्यधिक बढ़ गई है। जिस कारण भूजल लगभग 30 सेमी प्रतिवर्ष की खतरनाक गति से नीचे जा रहा है, तथा अधिकाधिक गहराई से पानी खींचने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। लेकिन इस निष्कर्ष को वह रिपोर्ट गलत साबित करती है, जिसमें इन बच्चों ने भूजल का उपयोग ही नहीं किया है, इन परिवारों ने हमेशा अन्य स्रोतों और नलों का पानी ही उपयोग किया है। कुछ समय पूर्व अमृतसर में आयोजित एक सेमिनार में पूर्व एडमिरल विष्णु भागवत ने बताया था कि काबुल से 1000 मील के व्यास वाले घेरे में आने वाले इलाके में इराक और अफ़गानिस्तान में युद्ध के दौरान उपयोग किया गया यूरेनियम भी उड़कर पंजाब पहुँच सकता है और पानी को प्रदूषित कर सकता है। हालांकि मानसून के दौरान उत्तर-पूर्वी अथवा दक्षिण-पश्चिमी हवायें पंजाब में भारी बारिश कर दें तो खतरा कम भी हो सकता है।

इस बीच बड़े-बड़े थर्मल पावर स्टेशनों की चिमनियों से काला धुँआ निकलना बदस्तूर जारी है, ट्रकों की भीड़ पास ही स्थित अम्बुजा सीमेण्ट की फ़ैक्ट्री को सीमेंट में मिलाने वाले फ़्लाय ऐश को एकत्रित करने के लिये टूटी पड़ी है। जबकि पावर प्लाण्ट के भीतर चारों तरफ़ राख बिखरी मिलेगी, त्वचा को खुरदरा करती हुई, गले में जमती हुई। प्लाण्ट के सुरक्षा अधिकारी रवीन्द्र सिंह कहते हैं कि अधिकतर फ़्लाय ऐश सीमेण्ट बनाने में खप जाती है, जबकि बची हुई राख ज़मीन में गाड़ दी जाती है। इस प्लांट में प्रतिदिन 6000 टन कोयला जलाया जाता है। सुरक्षा अधिकारी को इस बात की कोई जानकारी नहीं है कि रोज़ाना कितनी राख निकलती है, लेकिन उसे ले जाने वाले ट्रकों की कतार खत्म होने का नाम ही नहीं लेती।

पंजाब में कोयला आधारित पहला थर्मल पावर स्टेशन भटिण्डा में 1974 में स्थापित हुआ था, उसके बाद 1998 में लहरा मोहबत में, जबकि तीसरा बना है रूपनगर में। भटिण्डा जिले के एक कस्बे बुचो मण्डी जो कि लहरा मोहबत से कुछ ही दूर है, भूजल परीक्षण में यूरेनियम का सर्वाधिक प्रदूषण अर्थात 56.95 mcg/l पाया गया है। यूरेनियम की इतनी मात्रा का अर्थ है कि सामान्य प्रदूषण के मुकाबले, कैंसर का 153 गुना खतरा। एक और कस्बे जयसिंह वाला के तालाब में यह स्तर 52.79 mcg/l पाया गया है, आसपास के निवासी कहते हैं कि प्लाण्ट की फ़्लाय ऐश, सड़कों और घरों के फ़र्श से लेकर चारों तरफ़ बिखरी रहती है।

पंजाब के वैज्ञानिक, जिन्होंने यूरेनियम की उपस्थिति के परीक्षण किये हैं सरकारी दावों को सफ़ेद झूठ बताते हैं। गुरुनानकदेव विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर चन्दर प्रकाश, जो वेटलैण्ड ईकोलॉजी पर काम कर रहे हैं, कहते हैं, 'यदि सरकार कहती है कि इस इलाके में यूरेनियम की इतनी उच्च मात्रा है, तो निवासियों में भय का माहौल बनता ही है, लेकिन सरकार खुले तौर पर कुछ नहीं बताती…'।

डॉ चन्द्रप्रकाश ने डॉ सुरिन्दर सिंह के साथ मिलकर काफ़ी क्षेत्रों के भूजल के परीक्षण किये हैं और पाया है कि बड़ी मात्रा में यूरेनियम प्रदूषण है और वे चाहते हैं कि इस बारे में और भी गहन शोध किये जाने चाहिये। एक और वैज्ञानिक डॉ जीएस ढिल्लों, जो कि सिंचाई विभाग के पूर्व मुख्य इंजीनियर हैं, कहते हैं 'मुझे पक्का यकीन है कि इन पावर प्लाण्ट की वजह से ही यह यूरेनियम प्रदूषण हो रहा है और सरकार फ़्लाय ऐश पोण्ड के बारे में सही नीतियाँ नहीं अपनाती और न ही सरकार का इन पर कोई नियन्त्रण है, और इसी की वजह से भूजल में प्रदूषण फ़ैल रहा है…'।

इन वैज्ञानिकों के तर्कों पर मुहर लगाती एक और रिपोर्ट मास्को के कुर्चातोव इंस्टीट्यूट से आई है, यह संस्थान परमाणु शोध के मामलों में अग्रणी माना जाता है। डॉ डीए क्रायलोव द्वारा 'थर्मल इंजीनियरिंग' जर्नल में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार थर्मल पावर स्टेशनों द्वारा अपनाये जा रहे सुरक्षा मानक सही नहीं हैं, फ़्लाय ऐश और चिमनियों से निकलने वाले धुँए की वजह से, क्षेत्र में रहने वाले व्यक्तियों पर रेडियोएक्टिव खतरे की आशंका बढ़ जाती है। कोयला जलाने पर उसमें मौजूद प्राकृतिक 'रेडियोन्यूक्लाइड', राख के साथ उड़ते हैं, और आसपास के इलाके में फ़ैल जाते हैं। स्थिति उस समय और भी खराब हो जाती है, जब इस राख को निर्माण कार्यों अथवा सड़क निर्माण में लगाया जाता है अथवा गढ़ढे में दफ़नाया जाता है, अन्ततः यह भूजल को ही प्रदूषित करता है।

एक और मैगजीन 'साइंटिफ़िक अमेरिकन' में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, थर्मल पावर प्लाण्ट से निकलने वाली फ़्लाय ऐश से आसपास वातावरण में फ़ैलने वाला रेडिएशन, न्यूक्लियर प्लाण्ट से फ़ैलने वाले रेडियेशन के मुकाबले 100 गुना अधिक होता है, जब कोयला जलाया जाता है तब वातावरण में यूरेनियम और थोरियम की तीव्रता सामान्य मूल स्तर से 10 गुना अधिक हो जाती है।

Tags - Gurpreet Sigh, 7, who has cerebral palsy and microcephaly, and is from Sirsar, 50km from the Punjabi town of Bathinda. He is being treated at the Baba Farid centre for Special Children in Bathinda.

 

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