यूरोप की मुसीबत बनते जंगल

Submitted by HindiWater on Sat, 02/08/2020 - 11:23
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अमर उजाला, 8 फरवरी, 2020

प्रतीकात्मक फोटो - foresteurope.org

अमर उजाला, 8 फरवरी, 2020

न्यूयाॅर्क टाइम्स के लिए सोमिनी सेनगुप्त 

जलवायु परिवर्तन के इस दौर में जंगलों के अस्तित्व पर भी बड़ा खतरा मंडरा रहा है। जैसे कि भूमध्य सागरीय क्षेत्र के सूखे और गर्म वातावरण में जंगल सूखे से भी धीरे-धीरे खत्म हो सकते हैं। या गर्मी बढ़ने पर पेड़ के तने और शाखाएं संचित कार्बन छोड़ सकती हैं

देर से ही सही, पर जंगलों को अब पर्याप्त महत्व मिलने लगा है। मंगलवार की रात अमरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 10 खरब पौधे लगाने के वैश्विक लक्ष्य को अपना समर्थन दिया। उल्लेखनीय है कि विगत जनवरी में स्विट्जरलैंड के दावोस में आयोजित वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की बैठक में प्रतिनिधियों ने 10 खरब पौधे लगाने का संकल्प लिया था। तब कहा गया था कि 10 खरब पौधे लगाकर जलवायु परिवर्तन के संकट को थोड़ा कम किया जा सकता है। जंगल कार्बन को सोखने के लिहाज से महत्त्वपूर्ण होते हैं- वे पृथ्वी को गर्म करने वाली कार्बन डाई ऑक्साइड का 30 फीसदी हिस्सा सोखते हैं।

लेकिन जलवायु परिवर्तन के इस दौर में जंगलों के अस्तित्व पर भी बड़ा खतरा मंडरा रहा है। जैसे कि भूमध्य सागरीय क्षेत्र के सूखे और गर्म वातावरण में जंगल सूखे से भी धीरे-धीरे खत्म हो सकते हैं। या गर्मी बढ़ने पर पेड़ के तने और शाखाएं संचित कार्बन छोड़ सकती हैं, जिससे अचानक ही पूरा जंगल जलकर खाक हो सकता है। ऐसे में, यह प्रासंगिक सवाल खड़ा होता है कि जलवायु परिवर्तन के बीच जंगलों को कैसे बचाया जाए। दरअसल यूरोप में जंगलों को बचाने की मुहिम जोर-शोर से छेड़ी जा रही है। इस समय यूरोपीय संघ की करीब  40 फीसदी जमीन वृक्षों से आच्छादित है। इस कारण यूरोप को सर्वाधिक हरीतिमा वाले क्षेत्रों में से एक माना जाता है। लेकिन क्षेत्रों में हरियाली अधिक होने से दावानल का खतरा भी ज्यादा है। पिछले साल गर्मी और सूखे की वजह से यूरोप में 1,300 वर्गमील क्षेत्र दावानल की चपेट में आ गया। आंकड़ों के मुताबिक, 2019 में समूचे यूरोप में पूरे दशक की तुलना में 15 प्रतिशत अधिक क्षेत्र दावानल की चपेट में आए।

पिछले साल यूरोप में जंगल की आग उत्तर में स्वीडन तक फैल गई। जबकि सूखे के साथ-साथ कीड़ों के कारण जर्मनी में जंगलों का एक बड़ा हिस्सा तबाह हो गया। ब्रिटेन में पिछले साल जगंलों में आग लगने के रिकॉर्ड मामले सामने आए। स्पेन भी इससे अछूता नहीं रहा। इसी को देखते हुए यूरोपीय संघ ने दावानल को ‘खतरनाक और बढ़ता खतरा’ बताया है। स्पेन के कैटालोनियन फायर सर्विस में काम करने वाले मार्क कैस्टेलेन्यो ने पूर्वोत्तर स्पने में दावानल के खतरे को सीधे-सीधे महसूस किया है। मार्क की माँ के परिवार के लोग वहाँ के एक बेहद प्राचीन गाँव में कई पीढ़ियों से बादाम उपजा रहे थे। लेकिन जंगल की आग ने सदियों से चल रही उनकी खेती बर्बाद कर दी। बादाम के बगीचे जलकर खाक हो गए। जहाँ कभी बकरियां चरती थी, वहाँ अब दूर-दूर तक जली हुई घास दिखाई देती है।

भविष्य में आग को फैलने से रोकने के लिए स्थानीय लोगों ने घास और झाड़ियों को पूरी तरह साफ कर दिया है। किसान खेती में भी बदलाव आ रहे हैं, ताकि दावानल के सीजन से पहले अपनी फसल काट सकें। सैंतालीस साल के मार्क ने अपने जीवन में जंगल की ऐसी आग पहले कभी नहीं देखी। वह कहते हैं कि दावानल का मुकाबला करने के बजाय बेहतर यह है कि उसका असर कम करने की कोशिशें की जाएं।

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