

शेर-का-डांडा पहाड़ी के 18 सितंबर, 1880 के भू-स्खलन के बाद इस क्षेत्र में तैनात विशेष सिविल अधिकारी मिस्टर एच. सी. कोनीबीयरे, ( ई.एस.क्यू.सी. एस.) ने 11 अक्टूबर, 1880 को नॉर्थ वेस्टर्न प्रोविंसेस एण्ड अवध के सचिव को भू-स्खलन के बारे में एक विस्तृत रिपोर्ट भेजी। इस रिपोर्ट का हिन्दी भावार्थ निम्न प्रकार थाः-
नैनीताल दिनाँक 11 अक्टूबर 1880,
प्रेषक- एच. सी. कोनीबीयरे, (ई. एस. क्यू.)
सी.एस. ऑन स्पेशल डयूटी,
सेवा में,
सचिव, सूबा, उ.प्र. एवं अवध सरकार,
महोदय,
शासन आदेश सं. 2983/ (सामान्य विभाग) दिनांक 5 अक्टूबर, का आज्ञा पालन करते हुए यह मेरे लिए सम्मान का विषय है कि मैं 'नैनीताल भू-स्खलन की वृतान्त सूचना आपके विचारार्थ प्रस्तुत करूं। इस भयानक त्रासदी का ब्योरा, लेखा-जोखा अनेक विभागों द्वारा इंजीनियरिंग कमेटी के अध्यक्ष भू-गर्भ सर्वेक्षण के श्रीमान ओल्डहम व दो सैन्य जाँच समिति द्वारा तैयार व प्रस्तुत किया गया है। यह वृत्तांत अपने को केवल सामान्य तथ्यों तक सीमित रखेगा व खास टिप्पणी एवं पेशेवर बिन्दुओं से परहेज करेगा। संलग्न अधिकारी सूची, यद्यपि लेखक ने जिन स्थानों व व्यक्तियों के चिर परिचित हैं और उनका उल्लेख किया है, वह स्वयं भू-स्खलन के समय अनुपस्थित थे।
18 सितंबर, 1880 के विनाशकारी भू-स्खलन के बाद नैनीताल के विकास की प्रक्रिया रुकी नहीं, बल्कि और तेज हो गई। एक ओर ब्रिटिश सरकार के अधिकारी नैनीताल की पहाड़ियों और तालाब की सुरक्षा व्यवस्था को चाक-चौबंद करने में जुटे थे, वहीं दूसरी ओर यहाँ मनोरंजन और रोमांच के नए साधन तलाशे जा रहे थे। मेरठ के तत्कालीन कमिश्नर मिस्टर फ्लीडवुड विलियम्स ने 1880 में यहाँ सेलिंग की शुरुआत की। फ्लीडवुड विलियम्स ने औकरिज नामक स्थान पर यॉट बनाई। यॉट को एक ट्राली की सहायता से तालाब में उतारा गया। फिर कर्नल हैनरी ने "जैमिनाए" नाम से दो हल वाली नावें बनाकर उन्हें तालाब में तैराया। इसके बाद 'मरे एण्ड कंपनी' ने तीन सेलिंग मंगाई। इनका नाम रखा गया था - कोया' 'डुडल्स' और 'दोरोथी' । कंपनी इन नावों को किराये पर भी उठाती थी।
1880 के दौर में नॉर्थ वेस्टर्न प्रोविंसेस की आबादी तेजी से बढ़ रही थी। बढ़ती आबादी के मद्देनजर अंग्रेजों को ऐसे स्कूलों की जरुरत थी, जो यूरोपियन लड़कों को उनके घर इंग्लैंड की तर्ज पर शिक्षित कर सकें। उधर भारत के मैदानी क्षेत्रों में गर्मी से झुलसते यूरोपियन बच्चों और महिलाओं को वक्त गुजारना भारी पड़ रहा था। यूरोप जैसा वातावरण और जलवायु की वजह से यूरोपीय लोगों में भारत के हिल स्टेशनों में रहने की आकांक्षाएं बढ़ रही थीं। इसके मद्देनजर रेव. एन. जी. चैनी और रेव. जे. डब्ल्यू, वॉ ने यूरोपियन एवं एंग्लो इंडियन बच्चों के लिए नैनीताल में 1 अप्रैल, 1880 को 'द बॉयज हाईस्कूल' की नींव रखी। स्कूल में दाखिला लेने के इच्छुक बच्चों की संख्या अधिक हो जाने के कारण एक महीने के भीतर ही स्कूल को आईबी पार्क स्थानांतरित करना पड़ा। कुछ समय बाद इस स्कूल को 'स्टोनले' ले जाया गया। स्टोनले उस समय नैनीताल के सबसे बड़े बंगलों में शामिल था। इस स्कूल कमेटी के चेयरमैन कुमाऊँ के तत्कालीन कमिश्नर लेफ्टिनेंट जनरल सर हैनरी रैमजे थे। इस बीच नैनीताल की सुरक्षा के बेहतर उपायों की खोज जारी रही। सरकार ने यहाँ की पहाड़ियों की हिफाजत के बारे में सुझाव देने के लिए 25 सितंबर, 1882 को कर्नल फोर्बेस की अध्यक्षता में एक और कमेटी गठित की। इस कमेटी में मेजर गार्सटिन, मिस्टर पिटमैन मिस्टर एफ. एच. एशहर्स्ट, मिस्टर जे. एच. ब्रेसफोर्ड और नगर पालिका के प्रतिनिधि के तौर पर एफ. ई. जी. मैथ्यूज सदस्य थे। कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि शेर-का-डांडा में फुलवाड़ी बनाने पर भी प्रतिबन्ध लगाया जाय। भू-स्खलन के बाद सरकार ने शेर-का-डांडा पहाड़ी की सुरक्षा के लिए 1880-81 तथा 1881-82 में बड़ा नाला, पॉपुलर नाला, स्टाफ हाउस एवं एज हिल नाला, सेंट-लू से ग्राण्ट होटल नाला, लेकव्यू नाला तथा मेलविले हॉल के नाले के निर्माण में 2,11,579 रुपये खर्च किए।
इसी साल एफ. ई. जी. मैथ्यूज ने शेर-का-डांडा पहाड़ी की सुरक्षा को लेकर अपनी निजी जाँच रिपोर्ट प्रकाशित की। 1880 में भू-स्खलन में ध्वस्त असेम्बली रुम्स 1882 में दूसरी बार बन कर तैयार हो गया था। इसके निर्माण कार्य में 39,600 रुपये खर्च हुए थे। इसी साल नैनीताल क्लब का नया ब्लॉक भी बनकर तैयार हुआ। 1882 में मल्लीताल में जामा मस्जिद बनी।
1882 में बलियानाले में हो रहे कटाव से कार्ट रोड की हालत का जायजा लेने के लिए लेफ्टिनेंट कर्नल एफ.एल.एम. ब्राउन तथा मिस्टर रयान ने बलियानाले का व्यापक सर्वे किया। 1883 में नगर पालिका के तत्कालीन सभासद लेफ्टिनेंट कर्नल सी. जे. गार्सटिन ने बलियानाले की सुरक्षा के लिए अनेक सुझाव सुझाए।
18 सितंबर के भू-स्खलन के बाद सरकार साल भर पहले सेंट-लू की पहाड़ी पर बने नए राजभवन की सुरक्षा को लेकर बेहद चिंतित थी। ब्रिटिश सरकार को हर हाल में राजभवन की सुरक्षा करनी थी। राजभवन साम्राज्यवादी सत्ता के वैभव और शक्तिशाली सामर्थ्य का प्रतीक था। नॉर्थ वेस्टर्न प्रोविंसेस की सरकार ने 17 मार्च, 1883 को जारी एक शासनादेश के जरिए राजभवन की स्थिति की जाँच के लिए मिस्टर एफ. बी. हेन्सलोव की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय एक जाँच कमेटी बना दी। कमेटी में एफ. बी. हेन्सलोव, जे. एस, ब्रेसफोर्ड और एफ. एच. एशहर्स्ट शामिल थे। कमेटी ने 11 अप्रैल, 1883 को प्राथमिक जाँच रिपोर्ट सरकार को सौंपी। रिपोर्ट में राजभवन में दरारें आने की बात कही गई। शेर-का-डांडा पहाड़ी के भू-स्खलन से डरी-सहमी सरकार ने 1883 में बलियानाले में भी सुरक्षा उपाय करने प्रारंभ कर दिए। इसी साल जिमखाना बना।
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