इंदौर में दूषित पानी से हुई डेढ़ दर्ज़न मौतें 4 लेवल पर सिस्टम के फेलियर और लापरवाही का नतीज़ा
इंदौर में दूषित पानी पीने से बीमार तमाम लोग अस्पताल में अब भी भर्ती हैं। अब तक 17 लोगों की मौत हो चुकी है और शहर हैरान परेशान है। मामले की प्राथमिक जांच में पता चला कि पीने की पाइपलाइन में लीकेज के कारण सीवर का पानी घुस गया था। यानि बड़ी प्राशसनिक चूक हुई, जिस पर हाईकोर्ट तक ने फटकार लगायी है। लेकिन सवाल यह उठता है कि लीकेज की तमाम शिकायतों के बावजूद उसे ठीक करने की कार्रवाई क्यों नहीं हुई? क्या संबंधित विभाग को जलापूर्ति पाइप लाइन में बड़े स्तर पर हुए लीकेज की जानकारी नहीं थी? क्या जानकारी के बावजूद लापरवाही की गई या विभाग लीकेज का पता लगा पाने में सक्षम नहीं था? या उसके पास इसे ठीक करने के लिए ज़रूरी तकनीतक नीकें और साजो-सामान नहीं था?
यह कुछ ऐसे ज़रूरी सवाल हैं, जो घटना में हुई करीब डेढ़ दर्ज़न मौतों के शोर में फिलहाल दब कर रह गए हैं। पर, इनके जवाब और जवाबदेही पर बात किया जाना ज़रूरी है, ताकि सिस्टम में मौज़ूद ख़ामियों का पता लगाकर आगे इंदौर और अन्य शहरों में ऐसी अफ़सोसजनक घटनाओं के दोहराव को रोका जा सके। इस रिपोर्ट में हम इसी बात की गहरी पड़ताल करते हुए आपको इन चीज़ों की विस्तार से जानकारी देने जा रहे हैं। इस रिपोर्ट में हम उन नई नौ तकनीकों पर बात करेंगे, जो आज आसानी से उपलब्ध हैं।
भागीरथपुरा वार्ड की घटना का अपडेट
आगे बढ़ने से पहले आपको बता दें कि यहां के नगर निगम जोन-4 में पड़ने वाले भागीरथपुरा वार्ड में दूषित पानी पीने से 5 जनवरी तक 17 मौतें हो चुकी हैं। भास्कर खबर के मुताबिक 4 जनवरी (रविवार) तक आंकड़ा 16 मौतों का था। पर, सोमवार को रिटायर्ड पुलिसकर्मी ओमप्रकाश शर्मा (69) की मौत के साथ मृतकों का आंकड़ा 17 पर पहुंच गया है। यह मामला पहली नज़र में ही घोर लापरवाही और शिकायतों की अनसुनी का नज़र आता है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक भागीरथपुरा वार्ड की वाटर सप्लाई लाइन में कई जगहों पर लीकेज थे। स्थानीय लोगों द्वारा इनकी कम से कम 23 शिकायतें दर्ज कराई गई थीं। इनमें से केवल 5 का ही समाधान किया गया। इस तरह सूचना दिए जाने पर भी कई जगहों पर लीकेज को ठीक न किया जाना इस जानलेवा घटना का कारण बना।
कई स्तरों पर, कई तरह से फेल हुआ सिस्टम
इंडियन नेचुरल रिसोर्स इकनॉमिक्स एंड मैनेजमेंट फाउंडेशन (INREM) के कार्यकारी निदेशक सुंदरराजन कृष्णन ने इस मुद्दे पर इंडिया वाटर पोर्टल से बातचीत करते हुए कहा कि इंदौर की घटना पेयजल जैसी जीवन की मूलभूत आवश्यता के प्रबंधन में कई स्तरों पर और कई तरह से सिस्टम के फेलियर को दर्शाती है। सबसे पहली बात तो यहां पाइप लाइन में कई लीकेज होने की सूचना दिए जाने पर भी उसे ठीक करने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए गए। ये शिकायतें ऊपरी तौर पर लीकेज दिखाई देने पर स्थानीय निवासियों ने की थीं, जिनपर उचित कार्रवाई नहीं हुई। ऊपरी तौर पर नज़र आने वाले लीकेजों के अलावा अगर ज़मीन के भीतर पाइप लाइन के ऐसे रिसावों की भी बात करें, जो ऊपर से दिखाई नहीं देते, तो आज इनका भी बड़ी आसानी से और सटीक ढंग से पता लगा लेने वाली तकनीकें मौज़ूद हैं।
सुंदरराजन बताते हैं कि आज के दौर में लगभग सभी जगह जलापूर्ति भूमिगत पाइपलाइनों से ही की जाती है। पर, अकसर सड़क निर्माण, केबल व ऑप्टिक फाइबर बिछाने के दौरान या भूवैज्ञानिक परिवर्तनों, पाइपलाइनों के पुराने होने, पाइपों की गुणवत्ता सही न होने या ठीक से न बिछाए जाने जैसी तमाम वजहों से भूमिगत पाइपलाइनों में रिसाव होने लगता है। ऐसे में रिसाव बिंदुओं की शीघ्र और सटीक ढंग से पहचान कर जल्द से जल्द उनकी मरम्मत करना ज़रूरी होता है। आज के दौर में यह कोई मुश्किल काम भी नहीं है। जो लीकेज ऊपरी तौर पर दिखाई नहीं देते उनका पता मशीनों से पाइप लाइन में दो स्थानों के बीच प्रेशर चेक करके असानी से लगाया जा सकता है। इस जांच में जिन दो बिंदुओं के बीच प्रेशर में कमी पाई जाती है, लीकेज पाइप लाइन के उसी हिस्से में होता है। इस तरह लीकेज वाले हिस्से सीमित हिस्से की जानकारी मिल जाती है।
उन्होंने आगे बताया कि पाइप लाइन के किसी भी हिस्से में छोटे रोबोट भेज कर लीकेज का पता लगाया जा सकता है। आज पाइप के भीतर जाकर लीकेज (की फोटो या वीडियो भेजने वाले छोटे-छोटे रोबोट भी मौज़ूद हैं। इसके अलावा सेटेलाइट के ज़रिये क्लोरीन डिटेक्शन करके लीकेज की सटीक जगह का पता लगाकर ठीक उसी जगह खुदाई करके पाइप लाइन की मरम्मत की जा सकती है। अंडर ग्राउंड पाइप लाइन का रिवास का पता लगाने के लिए आमतौर पर निम्नलिखित तकनीकों का सहारा लिया जाता है-
1. जल दाब परीक्षक (वाटर प्रेशर टेस्टर)
वाटर प्रेशर टेस्टर पाइपलाइन में दबाव डालकर रिसाव का पता लगाता है। यह जलपूर्ति पाइप लाइन पर एक निश्चित स्तर का पानी का दबाव डालता है और रिसाव का पता लगाने के लिए दबाव में होने वाले बदलावों की जांच करता है। यह विधि सुलभ और उपयोग में आसान है। हालांकि, छोटे रिसावों के प्रति इसकी संवेदनशीलता कम होती है। यह केवल बड़े रिसाव बिंदुओं का ही पता लगा सकती है।
2. साउंड डिटेक्टर
इस तकनीक में ध्वनि तरंगों की मदद से पाइप लाइन में रिसाव का पता लगाया जाता है। जब किसी बिंदु से पानी रिसता है, तो वहां विशिष्ट ध्वनि तरंग कंपन उत्पन्न होते हैं, जो मिट्टी और पाइपलाइन की दीवारों जैसे माध्यमों से सतह तक पहुंचते हैं। ध्वनि डिटेक्टर इन ध्वनियों को बढ़ाता है और रिसाव के स्थानों का सटीक रूप से पता करने में मदद करता है। इससे बिना खुदाई किए या पाइप लाइन को कोई नुकसान पहुंचाए बिना ही लीकेज की पहचान करना संभव हो जाता है। हालांकि इस तकनीकी की भी कुछ सीमाएं हैं, क्योंकि भौगोलिक स्थितियों, पाइपलाइन सामग्री और अन्य वजहों से इसकी सटीकता प्रभावित हो सकती है। इसके अलावा यह तकनीक शांत वातावरण में ही सबसे अच्छा काम करती है,ज़्यादा शोर-शराबे से इसकी सटीकता में कमी आ सकती है।।
3. अंडर ग्राउंड पाइप लीकेज डिटेक्टर
इसमें भूमिगत जल पाइप रिसाव डिटेक्टर की मदद से भूमिगत पाइप लाइनों में रिसाव के कारण उत्पन्न होने वाले विद्युत धारा और चुंबकीय क्षेत्र परिवर्तनों का पता लगा कर रिसाव को चिह्नित किया जाता है। इसके के लिए विद्युत चुम्बकीय प्रेरण (Electromagnetic induction) तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे रिसाव के सटीक बिंदुओं का पता चलता है। यह तकनीक लंबी दूरी की पाइप लाइनों में रिसाव का पता लगाने के लिए काफ़ी उपयुक्त मानी जाती है। साथ ही यह उपकरण पानी की क्वालिटी और उसमें मौज़ूद गंदगी जैसी चीज़ों से अप्रभावित रहता है। इसलिए यह काफ़ी लीकेज के स्थान का सटीक निर्धारण करता है। हालांकि, यह अलग-अलग तरह की संरचना वाले जटिल भूभागों में कई बार खराब प्रदर्शन कर सकता है और इसके लिए इसके बेहतर समायोजन (एडजेस्टमेंट) की ज़रूरत होती है।
4. थर्मल इमेजिंग कैमरा
थर्मल इमेजिंग कैमरा वस्तुओं की सतहों के तापमान को मापता है। इससे तापमान के अंतर के आधार पर लीकेज का पता लगाया जा सकता है। जब भूमिगत जल पाइपलाइन में रिसाव होता है, तो रिसाव बिंदु के आसपास की मिट्टी का तापमान बदल जाता है। पानी के रिसाव के कारण यहां का तापमान आसपास की जगहों की तुलना में कम या ज़्यादा दिखाई देता है। थर्मल इमेजिंग कैमरा अवरक्त (इन्फ्रारेड) तकनीक का उपयोग करके कैप्चर कर लेता है, जिससे रिसाव के स्थान की सटीक पहचान करने में मदद मिलती है। इस तकनीक की एक बड़ी खूबी यह है कि यह कम रोशनी या रात के अंधेरे में भी रिसाव का काफी सटीकता से पता लगा लेती है। हालांकि, कई बार ज़्यादा गहराई वाली भूमिगत पाइप लाइन में रिसाव का पता लगाने में इसके प्रयोग में कुछ समस्याएं या सटीकता में कमी जैसी कुछ सीमाएं होती हैं।
5. ग्राउंड-पेनेट्रेटिंग रडार (जीपीआर)
ग्राउंड-पेनेट्रेटिंग रडार (जीपीआर) भूमिगत पाइपलाइन संरचनाओं के बारे में जानकारी प्रदान करने के लिए विद्युत चुम्बकीय तरंगों के परावर्तन और प्रसार सिद्धांतों का उपयोग करता है। इसक एक बड़ी खूबी यह है कि यह पानी के पाइपों की स्थिति के साथ ही उसमें बह रहे पानी के बहाव की दिशा तक बता सकता है, जिससे रिसाव बिंदु का सटीक पता लगाने में मदद मिलती है। जीपीआर की रेडियो तरंगों में मजबूत भेदन क्षमता होती है इसलिए यह काफ़ी गहराई तक सटीकता से काम करती है। साथ ही यह एक बड़े इलाके का विस्तृत भूमिगत चित्र प्राप्त करने में भी सक्षम होती है। हालांकि, इसमें इस्तेमाल होने वाले उपकरणों की कीमत काफ़ी अधिक होने के कारण यह एक खर्चीली तकनीक है। साथ ही इसके डेटा की व्याख्या के लिए विशेष कौशल की आवश्यकता होती है।
6. पाइप लाइन रिसाव निगरानी प्रणाली
पाइप लाइन रिसाव निगरानी प्रणाली सेंसर, डेटा केलेक्टर, डेटा ट्रांसमिशन उपकरणों और डेटा एनालिसिस सॉफ्टवेयर की मदद से काम करती है। यह भूमिगत पाइप लाइनों में पानी के प्रवाह की वास्तविक समय में निगरानी (रीयल टाइम सर्विलांस) करने में सक्षम है। पाइप लाइन में कहीं भी रिसाव का पता चलने पर, यह तुरंत अलर्ट जारी करती है और रिसाव के स्थान की सटीक जानकारी देती है। यह उपकरण स्वचालित (ऑटोमेटिक) तकनीक से काम करता है। इससे श्रम और प्रबंधन लागत में काफी कमी आती है। इसीलिए इसे बड़े पैमाने पर जल आपूर्ति प्रणालियों के नियमित निरीक्षण और निगरानी के लिए उपयुक्त माना जाता है।
7. स्मार्ट रोबोट
रोबोटिक्स तकनीक की प्रगति के साथ ही भूमिगत पाइप लाइनों में रिसाव का पता लगाने के लिए स्मार्ट और नन्हें रोबोटों का उपयोग बढ़ता जा रहा है। ये रोबोट हाई डिफिनिशन कैमरों, सेंसरों और अन्य उपकरणों से लैस होते हैं और अपने छोटे आकार व मूविबिलिटी के कारण पाइपलाइनों के अंदर जाकर उसका सटीकता के साथ निरीक्षण कर सकते हैं। ये पाइपलाइनों के भीतर दरारों, जंग और रिसाव के अन्य संभावित समस्याओं का पता लगा सकते हैं। यह पाइप लाइन के भीतर से रीयल टाइम तस्वीरें और वीडियो जमीनी ऑपरेटरों को भेज सकते हैं। स्मार्ट रोबोटों के उपयोग से लीकेज का पता लगाने की सटीकता और दक्षता में काफी वृद्धि होती है। साथ ही इससे मानवीय भूलों (ह्यूमन एरर) और संभावित जोखिम की संभावना भी कम हो जाते है।
8. स्मार्ट बॉल तकनीक
यह तकनीक आज जलापूर्ति पाइपलाइनों में छिपे लीकेज का पता लगाने की सबसे प्रभावी आधुनिक तकनीकों में गिनी जाती है। स्मार्ट बॉल एक छोटी, गोलाकार डिवाइस होती है, जिसे बिना खुदाई किए सतह पर मौज़ूद वेंट के ज़रिये सीधे पानी की पाइपलाइन के भीतर छोड़ा जाता है। पाइप के अंदर पानी के प्रवाह के साथ बहते हुए यह डिवाइस अत्यंत संवेदनशील अकॉस्टिक सेंसर के ज़रिए पानी के रिसाव से पैदा होने वाली सूक्ष्म ध्वनियों को रिकॉर्ड करती है। इन ध्वनियों के विश्लेषण से यह सटीक रूप से पता लगाया जा सकता है कि लीकेज कहां और कितना बड़ा है। जटिल पाइप नेटवर्क में बिना बड़े खोदे या ख़राब किए ही लीकेज को खोजकर सटीक ढंग से बता सकती है। इस तकनीक की खास बात यह है कि ‘स्मार्ट बॉल’ तकनीक बड़े और पुराने शहरी पाइप नेटवर्क में कम समय, कम लागत, बिना किसी जोखिम के काम करने में सक्षम। इसलिए आज के दौर में इसे बेहद कारगर माना जा रहा है।
9. उपग्रह आधारित और रडार तकनीकें (Ground-Penetrating Radar–GPR)
इस तकनीक का इस्तेमाल आज बड़े शहरी जल नेटवर्क में छिपे लीकेज की पहचान के लिए तेजी से किया जा रही हैं। इसमें उपग्रह आधारित प्रणालियां धरती की सतह से परावर्तित माइक्रोवेव सिग्नलों का विश्लेषण करती हैं, जिससे यह पता लगाया जाता है कि किसी इलाके की मिट्टी में सामान्य से अधिक नमी तो नहीं है। पाइपलाइन से पानी का रिसाव होने पर आसपास की मिट्टी की नमी और तापीय पैटर्न बदल जाते हैं, जिन्हें सैटेलाइट सेंसर दूर से ही पहचान लेते हैं। यह तकनीक पानी में मौज़ूद क्लोरीन का पता लगा कर (क्लोरीन डिटेक्शन) भी लीकेज की जानकारी दे सकती है। ग्राउंड-पेनेट्रेटिंग रडार (GPR) ज़मीन की सतह से रडार तरंगें भेजकर नीचे मौजूद संरचनाओं की इमेज तैयार करता है। जब ये तरंगें पाइप, खाली जगह या पानी से भरी मिट्टी से टकराती हैं, तो उनके लौटने की अवधि में फर्क आता है। इसी अंतर के आधार पर यह तकनीक यह संकेत मिलता है कि पाइप के आसपास किस जगह असामान्य नमी है यह पाइप लाइन में हुई क्षति या लीकेज का लक्षण होता है। इस तरह यह तकनीक काफ़ी बड़े क्षेत्र में संदिग्ध लीकेज ज़ोन को चिन्हित कर प्रशासन को सटीक जानकारी देकर तेज़ी से कार्रवाई का मौका देती है।
निगरानी, प्रतिक्रिया, जवाबदेही और पूर्वानुमान ज़रूरी
गौरतलब है कि इंदौर में इनमें से कोई भी तरीका नहीं अपनाया गया, जबकि विभाग को कई बार शिकायतों के ज़रिये पाइप लाइन में लीकेज होने की जानकारी दी गई थी। ऐसे में यह घटना कई स्तरों पर व्यवस्थागत ख़ामी या लापरवाही को उजागर करती है। यह घटना केवल एक तकनीकी चूक नहीं, बल्कि निगरानी, प्रतिक्रिया, जवाबदेही और जोखिम-पूर्वानुमान के चारों मोर्चों पर सिस्टम के फेल होने की तस्वीर पेश करती है।
सवाल यह नहीं है कि सरकारी महकमें को पाइप लाइन में लीकेज की जानकारी थी या नहीं? या उसके पास समय रहते इसका पता लगाने और ठीक करने की सटीक तकनीक उपलब्ध थी या नहीं, बल्कि असल सवाल यह है कि चेतावनियों के बावजूद उचित कदम क्यों नहीं उठाए गए और आमतौर पर उपलब्ध तकनीकों तक का उपयोग क्यों नहीं किया गया। जब पेयजल जैसी बुनियादी ज़रूरत के प्रबंधन में संभावित ख़तरों का आकलन और समय पर कार्रवाई नहीं होती, तो उसका ख़ामियाज़ा आम नागरिकों को अपनी सेहत और कई बार तो जान से चुकाना पड़ता है। इंदौर की यह त्रासदी एक सख़्त चेतावनी है कि जब तक जलापूर्ति तंत्र में पारदर्शिता, समयबद्ध कार्रवाई और स्पष्ट जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक ऐसे हादसों की पुनरावृत्ति से इन्कार नहीं किया जा सकता।

