जब चिपको आन्दोलन के गर्भपात की नौबत आयी
जब चिपको आन्दोलन के गर्भपात की नौबत आयी

जब चिपको आन्दोलन के गर्भपात की नौबत आयी

जानिए क्यों चिपको आन्दोलन महिलाओं के एक बड़ी चुनौती बन गया
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जनवरी, 1979 को सुन्दरलाल बहुगुणा ने हिमालय के वनों को संरक्षित वन घोषित करवाने के लिए 24 दिनों का उपवास किया था। लिहाजा उत्तर-प्रदेश सरकार ने फरवरी के अन्तिम सप्ताह में नये शासनादेश जारी कर हरे पेड़ों की कटाई पर पूर्ण पाबंदी लगा दी। सो गाँव वालों को निःशुल्क और पी. डी. की लकड़ी पर भी रोक लगा दी गई। सरकारी अधिकारियों, ठेकेदारों तथा उनसे साँठ-गाँठ रखने वाले राजनीतिज्ञों को यह भय सताने लगा कि हरे पेड़ों के कटान पर पाबन्दी लगने से उनकी गलत-सही आमदनी का स्त्रोत ही सूख जायेगा। यही नहीं, निहित स्वार्थ वाले तमाम लोग चिपको आन्दोलन तथा सुन्दरलाल बहुगुणा के खिलाफ हो गए। वे जगह-जगह लोगों का मनोबल तोड़ने लग गए कि उन्हें अब कभी रियासती दर पर लकड़ी नहीं मिलेगी और उनके सारे हक छीन लिये गये हैं। असन्तोष भड़काने के पीछे मंशा थी कि चिपको आन्दोलन बदनाम हो और लोग पेड़ कटवाने की माँग करने लगें। जबकि आन्दोलन की एक प्रमुख माँग यही थी कि वनवासियों के अधिकार बदली हुई परिस्थितियों में सुधारे जायें तथा वनों से उनका सीधा रिश्ता स्थापित किया जाए।

'विश्व वन दिवस' (21 मार्च, 1979) के अवसर पर आकाशवाणी दिल्ली चिपको आन्दोलन पर एक वार्ता प्रसारित करना चाहती थी। उसने सामग्री जुटाने के लिए चित्रा नारायण को उत्तराखण्ड भेजा। वन सचिव नरोत्तम प्रसाद त्रिपाठी को इस कार्यक्रम की सूचना मिली, तो उन्होंने देहरादून, टिहरी, उत्तरकाशी, पौड़ी और चमोली के वनाधिकारियों को निर्देश दिया कि चित्रा जीके स्वागत की जोरदार तैयारियाँ की जायें तथा उनके घूमने-फिरने के लिए हर सुविधा उपलब्ध कराई जाये। चित्रा नारायण 7 से 10 मार्च, 1979 तक उत्तराखण्ड का भ्रमण करती रहीं। वन-विभाग और वन-निगम के अधिकारीगण उनके स्वागत के लिए पूरे साज-बाज के साथ ऋषिकेश से ही तैनात हो गये थे। उसके बाद ऋषिकेश से लेकर उत्तरकाशी तक एवं टिहरी से लेकर गोपेश्वर तक वन-विभाग के पतरौल-फॉरेस्टर, रेंजर आदि अधिकारी दिन भर सड़क के किनारे सैल्यूट मारने की मुद्रा में धूल फाँकते रहे। चित्रा नारायण उस जगह देर से पहुँचीं।

वन-विभाग के छोटे कर्मचारियों को सलाम दागने की मुद्रा में खड़े देख कर लोगों को लगा कि शायद कोई ऐसी हस्ती पधार रही है, जो वन-नीति पर अपना अन्तिम फैसला दे देगी। यही जानकर घनसाली में जंगल के ठेकेदारों तथा सादी वर्दी में आये वन-विभाग एवं वन-निगम के कर्मचारियों ने ढोल-नगाड़ों के साथ एक प्रदर्शन को आयोजन किया। प्रदर्शनकारी हाथों में हरे झण्डे तथा एक काला झण्डा भी लिये हुए थे। हरे झण्डे आकाशवाणी वालों के स्वागत में थे और काला झण्डा सुन्दरलाल बहुगुणा के विरोध में था। चित्रा नारायण को दो-तीन जगह 'सेवा में, आकाशवाणी महोदय' सम्बोधित करके ज्ञापन भी दिये गये। 29 मार्च 1979 को साढ़े नौ बजे रात का आकाशवाणी दिल्ली से चित्रा नारायण की वार्ता अंग्रेजी में प्रसारित हुई, जिसमें वन-निगम द्वारा किये गये अहसान का पूरा-पूरा भुगतान किया गया था।

उत्तर-प्रदेश का जंगल विभाग इस बात से छोटापन महसूस करता था कि गाँव का अनपढ़ एवं गंवार आदमी उसके काम पर उँगली उठाता है, जबकि उसके विचारों को देश का प्रेस-जगतखासा महत्व देता है। शायद इसी ख्याल से वन-विभाग ने 6 से 11

अप्रैल, 1979 तक लखनऊ और दिल्ली के 12 पत्रकारों की टोली उत्तराखण्ड के छोटे-बड़े कस्बों में घुमाई। देहरादून, ऋषिकेश, हिहरी, उत्तरकाशी एवं पुरोला तक वन-विभाग उस टोली को अपनी जीपों पर ले गया और प्रत्येक पत्रकार पर प्रतिदिन 50 रुपये के हिसाब से खर्च करता रहा। टिहरी वृत्त के अरण्यपाल अपने अधीनस्थ अधिकारियों को यह कहते भी सुने गये कि वे अखबारनवीसा का विशेष ख्याल रखें वर्मा सब कबाड़ा हो जायेगा। उस टोली को घुमाने के बाद वन-विभाग ने स्यातिनामा पत्रकार बी.जी वर्गीज को उत्तराखण्ड की सैर करवाई, 'सामुदायिक वानिकी' पर जगह-जगह उनका भाषण कराया गया और उन्हें वैज्ञानिक कटान का अर्थ समझाया गया।

उसके बाद 'सोसाइटी फॉर डेवलपिंग ग्रामदान्स' की मदद से 14 से 16 अप्रैल 1979 तक मुनि-की-रेती में वन-विभाग ने 'सामुदायिक वानिकी' पर एक परिसम्वाद का आयोजन किया। उसी दौरान ठीक 16 अप्रैल को उत्तराखण्ड यात्रा से वापस लौटे पत्रकारों ने अपने-अपने पत्र में लम्बे-लम्बे लेख प्रकाशित किये, जिनमें चिपको आन्दोलन को आड़े हाथों लिया गया था तथा वन-विभाग की तारीफ के पुल बाँधे गये थे। यह जरूर था कि कुछेक पत्रकार वन-विभाग की नमक हरामी कर गए थे।

उधर मुनि-की-रेती के परिसम्वाद में पहाड़ के विभिन्न अंचलों से लोग बुलाए गए थे। गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान तथा हिमालय सेवा संघ, (दिल्ली) के पदाधिकारियों को बुलाना भी वन-विभाग नहीं भूला। आगंतुकों को आने-जाने का किराया देने के अलावा अच्छी दावत भी दी गई थी। यद्यपि परिसम्वाद के लिए केन्द्रीय योजना आयोग से तो पैसा वसूला गया था, लेकिन खर्च करने का दावा बन-विभाग अपनी तरफ से करता था और डेवलपिंग ग्रामदान्सवाले अपनी तरफ से। इतना जरूर था कि खाना परोसने के लिए जंगलात के फरिस्टर, रेंजर आदि सब तैनात कर दिये गये थे। सरकारी साधनों की इससे बड़ी मिसाल क्या हो सकती थी कि एक बार सात अदद पान के लिए वन-विभाग की जीप मुनि-की-रेती के टूरिस्ट बंगले से बाजार तक दौड़ायी गई।

यही वजह थी कि चिपको आन्दोलन के ज्यादातर कार्यकर्ताओं ने परिसम्वाद का बहिष्कार किया, जिससे उसके आयोजकों को काफी हताशा हुई। दरअसल, वे व्यापारिक वन कटान के निर्णयों पर आन्दोलनकारियों की स्वीकृति की मुहर लगाना चाहते थे और 'सामुदायिक वानिकी' के फेर में नई वन-नीति के सवाल को भटकाना चाहते थे। यह अलग बात है कि परिसम्वाद ने सम्वेदनशील जलागम क्षेत्रों के अलावा सब जगह हरे पेड़ों का कटान जारी रखने का निर्णय किया था परन्तु उस पर आंदोलन की मुहर नहीं लग सकी। किसी क्षेत्र का सम्वेदनशील होना भी तभी पता चल सकता है, जब उधर भूस्खलन होने लगे। सो भूस्खलन से पहले वह कटान के लिए उपयुक्त माना जाता था। इसी तरह भिलंगना घाटी में वृक्षों का कटान बन्द करने की बात कही गई, परन्तु वन-विभाग इस पर कभी अमल नहीं कर सका। एक तरफ गाँव वालों को हरे पेड़ों की कटाई बन्द करने के नाम पर लकड़ी नहीं दी गई और दूसरी तरफ 500 नेपाली मजूदरों को आरे-कुल्हाड़ों के साथ भिलंगना नदी के जलागम क्षेत्र में उतार दिया गया था।

उत्तर-प्रदेश सरकार को इस परिसम्वाद से पहले चिपको आन्दोलन के साथ बातचीत करने की फुरसत नहीं मिली। किन्तु इसके तुरन्त बाद 26 अप्रैल को सुन्दरलाल बहुगुणा को देहरादून के सर्किट हाउस में बुलाया गया। उनके साथ वार्तालाप के लिएउप मुख्यमंत्री राम नरेश यादव तथा वन मन्त्री काजी मोहिउद्दीन देहरादून पधारे। दो घण्टे तक तीनों व्यक्तियों के बीच बहस हुई। सुन्दरलाल बहुगुणा 15 से 25 वर्षों तक उत्तराखण्ड में हरे पेड़ों की कटाई पर रोक लगाने की माँग करते रहे तो राम नरेश यादव वैज्ञानिक कटान की पुरानी जिद पर अड़े रहे। घूम-फिर कर बातचीत इन्हीं दों बिन्दुओं पर अटक जाती थी। यदि यही बात होनी थी, तो इस वार्ता का आयोजन क्यों किया गया, समझ में नहीं आता। सुन्दरलाल बहुगुणा के उपवास से पहले इन्हीं दो मुद्दों पर बातचीत उलझ जाया करती थी। एक तरफ चिपको आन्दोलन गम्भीर मानवीय और परिस्थितिकीय सवाल पर जोर दे रहा था, तो दूसरी तरफ राज्य सरकार का अपनी आय तथा कुछ मजदूरों का रोना था। सिर्फ इतनी ही बात होती तो कोई रास्ता निकल भी सकता था, पर इसके पीछे की बात तत्कालीन केन्द्रीय वित्त मन्त्री चौधरी चरण सिंह ने मार्च में सुन्दरलाल बहुगुणा से दिल्ली में कह दी थी। उन्होंने कहा था-'तुमसे किसी भी प्रकार की बातचीत नहीं हो सकती, क्योंकि तुमने श्रीचन्द (भूतपूर्व वन-मन्त्री) का विरोध किया था।'

एक तरफ सरकारी नेताओं का यह रुख था, तो दूसरी तरफ दिल्ली स्थित गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान जैसी संस्थाएँ थीं, जो अक्सर सरकार के लिए सुरक्षा वॉल्व का काम किया करती हैं। सरकारी अनुदानों पर पलने वाला गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान इसे अपना धर्म समझता है कि ऐसे जनांदोलनों को तोड़ा जाये, जो सरकार की आमदनी घटाते हों या उसके खिलाफ जाते हों। इसलिए वह लोगों का ध्यान आन्दोलन से हटा कर 'फोर्ड फाउंडेशन' या 'आक्सफैम' जैसी विदेशी संस्थाओं की मदद से उत्तराखण्ड में वृक्षारोपण अभियान चलाना चाहता था। 'सोसाइटी फॉर डेवलपिंग ग्रामदान्त'की मार्फत वह विकास के विभिन्न नुस्खे लेकर उत्तराखण्ड में घूमने लगा था। पहाड़ के लिए उसकी सारी कार्यवाईयाँ देहरादून से एक जीप के द्वारा संचालित होती थीं। जो कार्यकर्ता आज तक चना-चबेना खाकर पहाड़ों से टकराते थे, वे इन संस्थाओं द्वारा डाले गए रोटी के टुकड़ों के लिए भाग-दौड़ कर रहे थे। अपने उपनिवेशवादी कार्यक्रमों को सही साबित करने के लिए ये तथाकथित गाँधीवादी संस्थाएँ अपने बीच कभी-कभी महात्मा गाँधी की प्रमुख शिष्या सरला बहन को धरमघर (पिथौरागढ़) से बुला लाती थी।

सरकार इन संस्थाओं के प्रबन्धकों को सही मायने में गाँधीवादी मानती थी और चिपको आन्दोलन चलाने वालों को नीम-हकीम समझती थी। एक सरकारी प्रवक्ता ने हिमालय सेवा संघ के तत्कालीन अध्यक्ष करण भाई को, जो हमेशा उत्तराखण्ड के आन्दोलनों और सरकार के बीच दलाली करते रहे हैं, प्रमुख वन-विशेषज्ञ का खिताब दिया है। गरज यह है कि उत्तर-प्रदेश सरकार, जंगल के ठेकेदार और गांधी के नाम पर सरकारी तथा विदेशी पैसा बटोरने वाली संस्थाएँ एक साथ मिलकर चिपको आन्दोलन का गर्भपात करने की कोशिश कर रही थीं, जिससे हिमालय के लिए मृदा और जल संरक्षण वाली नयी वन-नीति के जन्म की सम्भावनाएँ तब धूमिल होने लगी थीं।

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