विस्थापन व विश्वयुद्ध से बचाव हेतु विश्वशांति जल-साक्षरता यात्रा : नेपाल
विस्थापन व विश्वयुद्ध से बचाव हेतु विश्वशांति जल-साक्षरता यात्रा : नेपाल

विस्थापन व विश्वयुद्ध से बचाव हेतु विश्वशांति जल-साक्षरता यात्रा : नेपाल

हिन्दुकुश के आठ देशों में से दो देश पाकिस्तान व चीन, इसके संचालन के लिए भारत में इसका मुख्यालय नहीं बनने देना चाहते हैं। इसलिए यह संगठन उतना प्रभावशाली नहीं रहा। इस काम को गति देने के लिए हिन्दुकुश हिमालय यात्रा आयोजित करना आवश्यक है ।
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नेपाल के काठमाण्डु में 5 दिसम्बर 2017 से 7 दिसम्बर 2017 तक एक हिन्दुकुश देशों का सम्मेलन हुआ था। इसमें भूटान, चीन, भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और हिमालय से जुड़े सभी देशों के सरकारी व गैर-सरकारी प्रतिनिधि मौजूद थे। नेपाल की राष्ट्रपति ने इस सम्मेलन का उद्घाटन किया था। हिमालय से पलायन होना बड़ी समस्या है। सभी ने हिमालय की हरियाली और नदियों के प्रवाह को बनाये रखने हेतु बातचीत की थी। सभी के मन में आज के विकास से बढ़ता विस्थापन, विकृति और विनाश का संकट गूंज रहा था। इस संकट से सभी चिंतित नजर आये।

आज लगभग सभी देशों में हिमालय के झरने सूख रहे हैं। इसलिए इनके पास तरुण भारत संघ का ही एकमात्र प्रामाणिक उदाहरण था, जहां बहुत कम बारिश में भी नदियां पुनर्जीवित हो सकी थीं। इसलिए ये जलवायु परिवर्तन अनुकूलन सीखना चाहते थे। मुझे इस हिमालय सम्मेलन में एक बार आधे घंटे और 20-20 मिनट का दो बार प्रस्तुति करने का अवसर मिला।

हिन्दुकुश के आठ देशों में से दो देश पाकिस्तान व चीन, इसके संचालन के लिए भारत में इसका मुख्यालय नहीं बनने देना चाहते हैं। इसलिए यह संगठन उतना प्रभावशाली नहीं रहा। इस काम को गति देने के लिए हिन्दुकुश हिमालय यात्रा आयोजित करना आवश्यक है । इसमें सभी को सहयोग करना चाहिए। मैंने प्रस्ताव इस हिन्दुकुश सम्मेलन में रखा। बहुत से लोगों ने सम्मेलन के समय बहुत उत्साह दिखाया लेकिन बाद में तो वह उत्साह देखने को नहीं मिला। नेपाल विस्थापन-ग्रस्त देश है।

दूसरी बार 12 नवंबर 2019 को नेपाल के धनुष जिले में कमला नदी के किनारे रामघाट नामक शहर में पहुंचा। वहां के नगर प्रमुख श्री उदयगार गोईत जी ने यात्रा का स्वागत किया, जिनके साथ श्री अक्षेश्वर यादव, श्री उदय कुमार बरबरिया नगर प्रमुख-शहीद नगर ने किया। हम कमला नदी का अवलोकन करने के बाद गोष्ठी स्थल पर पहुंचे, जहां पर दर्जनों जिला-अधिकारी, विकास-अधिकारी एवं विभिन्‍न

विभागों के अधिकारियों के अलावा कमला नदी के दोनों तरफ बसे गांवों के 1000 स्त्री-पुरुषों का समूह उपस्थित था। गोष्ठी में प्रदेश के राज्यपाल श्री तिलक परिहार जी, श्री ज्ञानेंद्र यादव कानून मंत्री-नेपाल सरकार के श्री योगेंद्र राय यादव जी, भूमि व्यवस्था कृषि एवं सहकारी मंत्री-नेपाल सरकार विशिष्ट अतिथि के रूप में रहे।

गोष्ठी में मैंने कहा कि, कमला नदी का उद्धार पूजा या सांकेतिक रैली व कार्यक्रमों से नहीं होगा कमला नदी को सही मायने में अविरल बनाने के लिये केंद्र सरकार, प्रदेश सरकार एवं समाज को मिलकर ठोस योजना बना कर उस पर सभी विभागों, समाज के लोगों को गंभीरता से कार्य करना पड़ेगा। तब ही कमला नदी साफ-स्वच्छ अविरल नदी बनेगी।

नेपाल हिमालय का सबसे प्यारा बेटा है। पूरा देश ही हिमालय की चोटी व तलहटी पर बसा है। सुन्दर पहाड़ियों व पहाड़ियों के झरने से बनी नदियों का इस देश में जब मैं अपने बचपन, तरूणाई व जवानी के दिनों में गया था तब और जब मैं विश्व शांति यात्रा के दौरान गया, उसमें बहुत बड़ा अंतर दृष्टिगत हुआ। अब यह देश भी चीन जैसे विकास रास्ते पर चल पड़ा है। जबकि यहां का आहार-विहार, आचार-विचार

और आवास सभी कुछ चीन से भिन्‍न है। फिर भी चीन के लालची विकास ने अपने विस्तार की नजर इसके ऊपर गड़ा दी है। उस विकास का शिकार यह देश अब बन गया है।

पहले नेपाल व भूटान में जो प्राकृतिक सौंदर्य की साम्यता थी, वह अब यहां नहीं बची है। इस देश को जब मैंने अपनी जवानी में समझा था, तब यह अपने आनंद के शिखर पर था। अब यह प्रकृति विनाश के शिखर की तरफ चल पड़ा है। यहां पर खनन, नए-नए उद्योग प्रकृति के सौन्दर्य को बहुत तेजी से बिगाड़ रहे हैं। पुराने जमाने में इस देश के प्रत्येक झरने का जल सहजता से पेयजल आदि के उपयोग हेतु सामुदायिक प्रबंधन की सफल प्रतियोगिता थी। अब यहां के झरने सूख रहे हैं, क्योंकि यहां की आधुनिक शिक्षा ने इन्हें शोषण सिखा दिया है। शोषण का शिकार नेपाल और शिकारी चीन बन गया है। अब इस देश में चीन में होने वाली बीमारी सभी प्रकार से नेपाल में प्रवेश पा चुकी है। इस देश की रग-रग में अब शोषण समा गया है।

नेपाल के मेरे बहुत सारे दोस्त बड़े ही विद्वान और देश दुनिया को समझने वाले, उनमें भी विज्ञान, अध्यात्म, विकास और आस्था के विचारधाराओं ने अलगाव पैदा कर दिया है। मुझे यहां अपने दोस्तों का नाम लिखने की जरूरत नहीं है। मैंने पिछले 47 वर्षों में जितना नेपाल को देखा, इसमें विकास के नाम पर उतना ही आर्थिक बिगाड़ हुआ है। यह बिगाड़ केवल हिमालय की पहाड़ियों व नदियों में ही नहीं बल्कि समग्र मानवता में हुआ है। यूं तो इस बिगाड़ से पूरी दुनिया ही त्रस्त है, लेकिन नेपाल सबसे ज्यादा है। नेपाल को अपने पैरों पर खड़ा होने की जरूरत है।

 

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