

वानस्पतिक अवरोध प्रौद्योगिकी उत्तर पश्चिमी हिमालय के 2-8% वाले हल्के ढालू क्षेत्रों के लिए विकसित की गई थी जीनिया, खसखस एवं भाभर घास की जड़युक्त प्ररोहों को एक मीटर अंतराल पर बिखरे हुए तरीके से समोच्च के साथ लगाया गया ( फोटो 1), जो कि 2, 4 एवं 8% ढलानों पर क्रमश: 50, 25 और 12.5 मी0 के क्षैतिज अंतराल की समरूपता को दर्शाता था। घास प्रजातियों की उपलब्धता के आधार पर किसान इनमें से कोई भी घास प्रजाति अपना सकते हैं। इस प्रौद्योगिकी में भूमि बांध की लागत का केवल एक चौथाई खर्च आता है।
वानस्पतिक अवरोधों हेतु आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण घासों का चुनाव करना चाहिए जो घना एवं बारहमासी आवरण उपलब्ध कराती हों। स्थानीय रूप से उपलब्ध चासें जैसे पेनिक्कम मैग्जिमम (जीनिया घास), पेटिपेरा जिजानिओड्स (खसखस ) एवं यूलेलियोप्सिस बिनाटा (भाभर) शिवालिक एवं निचले हिमालय क्षेत्र के लिए उपयुक्त पाई गई हैं प्रभावी ढंग से अपरदन एवं अवसाद नियंत्रण हेतु निम्नलिखित कारणों से इन तीनों प्रजातियों को प्रयोग किया जाता है:-
नीचे बताए गए अनुसार 2, 4 एवं 8% ढलानों पर अवरोध रोपण के विभिन्न उपकरणों की लागत क्रमश: रू0 2,480 / हेक्टे0 रु04,960 / हेक्टे0 एवं रु0 9920/हेक्टे0 आती है, जो कि समान ढलानों पर समोच्च बंध निर्माण लागत की तुलना में लगभग एक तिहाई है।
बिना मक्का एवं गेहूँ की फसलों को गंवाए विशेषकर सर्दी के मौसम में चारा उपलब्धि एक अतिरिक्त लाभ है।
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