प्रचंड गर्मी के बावज़ूद लखनऊ में बड़े मंगल के भंडारों के आयोजन में लोगों का उत्साह देखने को मिल रहा है।
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लखनऊ में बढ़ रहा ‘ग्रीन बड़ा मंगल' का चलन, हरियाली वाली पर्यावरणीय पहलों की ओर बढ़ते कदम
हर शहर की अपनी एक खास सांस्कृतिक पहचान होती है, जो कुछ मौकों पर काफी प्रमुखता से उभर कर सामने आती है। ‘बड़ा मंगल’ या 'बुढऊ मंगल' उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की एक ऐसी ही खास पहचान है, जिसके लिए यह मशहूर है। हिन्दू पंचांग के अनुसार इस बार ज्येष्ठ माह में चार की जगह आठ बड़े मंगल पड़ रहे हैंहैं । रिकॉर्ड तोड़ गर्मी के बावजूद लखनऊ में बड़े मंगल का जोश और उससे जुड़े भंडारों, शरबत वितरण और भजन-जागरण जैसे आयोजनों का सिलसिला बदस्तूर जारी है।
शुरुआती दो-तीन मंगलों पर शुरुआत थोड़ी धीमी रहने के बावजूद आज (26 मई) चौथे मंगल पर आयोजनों की संख्या में अच्छी खासी बढ़ोतरी देखने को मिली है। सबसे खास बात यह है कि इस बार रिकॉर्ड तोड़ गर्मी पड़ने के कारण लोग जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संरक्षण के महत्व को संजीदगी से समझ रहे हैं। इसे लेकर कई जगह बड़े मंगल से जुड़ी कुछ हरित पहलें यानी Green Initiatives भी देखने को मिल रहे हैं। आज हम आपको ऐसी ही कुछ अनूठी पहलों के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसमें पर्यावरण और हरियाली को बढ़ावा देने से जुड़े कुछ कदम उठाए जा रहे हैं, ताकि बड़े मंगल को 'ग्रीन मंगल' भी बनाया जा सके।
पिछले बड़े मंगल पर लखनऊ के व्यस्ततम चौराहों में गिने जाने वाले बर्लिंगटन चौराहे पर आयोजित भंडारे में लोगों को मुफ्त में पौधे बांटे जाने की पहल काफी चर्चा में रही। यह कदम शहर में हरियाली को बढ़ावा देने और लोगों को पर्यावरण संरक्षण के प्रति सक्रिय करने के उद्देश्य से की गई। इसके अलावा भी बड़े मंगल पर शहर में कई जगहजगह नि:शुल्क जगह पौध वितरण किया गया।
अच्छी बात यह है कि यह पहल किसी भी प्रकार के प्रचार या श्रेय लेने की होड़ से दूर रहते हुए बिना किसी बैनर-पोस्टर के शहर के कुछ जागरूक पर्यावरण प्रेमियों, समाज सेवियों और व्यापारिक संगठनों ने आपसी सहयोग से मिलजुल कर की।
“ग्रीन बड़ा मंगल” थीम के तहत कई पर्यावरण प्रेमियों (climate enthusiasts) और स्थानीय सामाजिक समूहों ने भंडारों में आम, बेल, अमलतास, जामुन, नीम, पीपल और करी पत्ते यानी मीठी नीम आदि के हरे-भरे पौधे वितरित किए। इसका उद्देश्य प्रसाद वितरण के साथ ही लोगों को जलवायु परिवर्तन और हरियाली के प्रति भी जागरूक करना था।
पौध वितरण के जरिये बड़े मंगल के पारंपरिक भंडारे को पर्यावरणीय संदेश से जोड़ने की कोशिश की गई, ताकि लोग पौधे ले जाकर उसे अपने घर, मोहल्ले में या आसपास लगाएं और उसकी देखभाल भी करें। यही वजह है कि यह पहल सामान्य भंडारों से अलग और काफी चर्चित रही।
बड़े मंगल की एक ऐसी ही चर्चित ग्रीन पहल अलीगंज स्थित Plant House Nursery के संचालक बद्रीनाथ अग्निहोत्री की रही। उन्होंने लोगों को पौधे मुफ्त दिए और उन्हें तीन महीने तक सुरक्षित रखने पर अतिरिक्त पौधे देने की घोषणा भी की। लखनऊ विश्वविद्यालय से पर्यावरण विज्ञान में डिप्लोमा प्राप्त बद्रीनाथ अग्निहोत्री की योजना इस साल पड़ने वाले 8 बड़े मंगलों पर विभिन्न किस्मों के कुल 11,000 पौधे वितरित करने की है। इसके तहत कोई भी व्यक्ति अलीगंज स्थित Plant House Nursery या विभिन्न भंडारों पर लगने वाले उनके स्टॉल पर अपनी संपर्क जानकारी साझा करके अपने घर के लिए दो पौधे चुन सकता है। इस जानकारी का उपयोग पौधों की स्थिति की जांच के लिए किया जाएगा। जो लोग पौधे को लगभग तीन महीने तक सुरक्षित रखने में सफल होंगे, उन्हें पांच और पौधे मुफ्त में दिए जाएंगे।
हम बढ़ते तापमान के बारे में बहुत कुछ पढ़ते हैं। हम लू की बात तो करते हैं, लेकिन इसके मूल कारण पर चर्चा नहीं करते। अगर हम पेड़ नहीं लगाएंगे और उनका संरक्षण नहीं करेंगे, तो स्थिति और भी खराब हो जाएगी। किसान परिवार से होने के कारण, मैं हमेशा से प्रकृति प्रेमी रहा हूं । मैं 1976 में लखनऊ आया था, जब मैं 16 साल का था। मेरे बेटे ने मुझे 1984 में एक नर्सरी शुरू करने के लिए प्रेरित किया।
बद्रीनाथ अग्निहोत्री, नर्सरी संचालक व पर्यावरण प्रेमी
इसके अलावा Breath Farming नाम से चलाई जा रही एक पहल के तहत रेपर्टवाहर फाउंडेशन (Repertwahr Foundation) ने हर महीने लगभग 1000 पौधे वितरित करने की योजना शुरू की है। इस पहल के तहत लखनऊ में मशहूर हनुमान सेतु मंदिर के पास तुलसी के पौधे भी बांटे गए। साथ ही 'लेटे हुए हनुमान’ मंदिर में श्रद्धालुओं से पर्यावरण संरक्षण और वृक्षारोपण का संकल्प लेने को कहा गया। यह मंदिर चौक क्षेत्र में गोमती नदी के पंचवटी घाट और लक्ष्मण टीला (पक्का पुल) के पास स्थित है। इसे पातालपुरी हनुमान मंदिर” के नाम से भी जाना जाता है। यहां दो साल पहले यानी 2024 के बड़े मंगल के दौरान फाउंडेशन ने पर्यावरण संरक्षण की शपथ दिलाने और तुलसी के पौधे बांटने की पहल शुरू की थी।
लखनऊ के भंडारों में स्वच्छता बनाए रखने और प्रसाद वितरण के लिए पत्तल और दोनों के चलन को बढ़ावा देने के लिए सहभागिता भवन में एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया।
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‘ज़ीरो वेस्ट’ बड़ा मंगल और ‘ग्रीन भंडारा’ पर ज़ोर
लखनऊ नगर निगम ने भी बड़े मंगल के आयोजनों में सहयोग के लिए हाथ बढ़ाया है। नगर निगम ने बड़े मंगल के दौरान “Zero Waste Bada Mangal” मॉडल पर भी जोर दिया। इसके तहत कई जगहों पर निगम की ओर से भंडारा आयोजकों को कूड़ेदान (डस्टबिन) उपलब्ध कराए गए। साथ ही भंडारे व स्टालों का कचरा उठाने के लिए अलग टीमें लगाई गईं और सिंगल यूज़ प्लास्टिक इस्तेमाल पर रोक लगाने की कोशिश की गई। इसके चलते कई जगहों पर आयोजकों ने स्टील के गिलास और बड़े पानी के कंटेनर इस्तेमाल किए, ताकिप्लास्टिक की बोतलों और डिस्पोजेबल ग्लास का कचरा कम हो।
शहर की मेयर सुषमा खर्कवाल ने घोषणा की है कि बड़े मंगल पर प्याऊ, भंडारा या शरबत के स्टॉल लगाने के लिए जिन भी लोगों या संस्थाओं को स्वच्छ पेयजल की आवश्यकता होगी, निगम उन्हें अपने वाटर टैंकरों के जरिये पानी मुहैया कराएगा। इससे पहले 2023 में भी नगर निगम ने स्थानीय कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं और सामाजिक संगठनों के साथ मिलकर “Clean and Green Bhandara” अभियान चलाया था। इस पहल का उद्देश्य बड़े मंगल के दौरान होने वाले प्लास्टिक और थर्माकोल कचरे को कम करना था। इसमें आयोजकों को सिंगल-यूज़ प्लास्टिक, थर्माकोल प्लेट और पॉलीथीन के बजाय पर्यावरण-अनुकूल विकल्प अपनाने के लिए प्रेरित किया गया। इस पहल के तहत मंगलम संस्था ने करीब 100 संगठनों को इससे जोड़ा और उन्हें कचरा प्रबंधन व इको-फ्रेंडली आयोजन के लिए मार्गदर्शन दिया गया।
पत्तल में प्रसाद वितरण की पहल
2026 के बड़े मंगल में Lucknow के कई भंडारों में प्लास्टिक प्लेट की जगह पत्तों से बनी “ग्रीन लीफ प्लेट्स” इस्तेमाल की गईं। रिपोर्ट्स के अनुसार ‘वाटर वूमेन’ के नाम से प्रसिद्ध समाजसेवी शिप्रा पाठक ने इसके लिए पिछले बड़े मंगल पर 55 हजार हरे पत्तल बांटकर प्लास्टिक मुक्त भविष्य का संदेश दिया। इसका मकसद धार्मिक आयोजन को पर्यावरणीय जिम्मेदारी के साथ जोड़ना था।
उन्होंने अपनी संस्था ‘पंचतत्व’ के सदस्यों के साथ प्रेस क्लब, दक्षिण मुखी हनुमान मंदिर, हजरतगंज, इंदिरानगर, गोमती नगर और हनुमान सेतु समेत यहां कई स्थानों पर आयोजित भंडारों में पहुंचकर आयोजकों और श्रद्धालुओं को हरे पत्तल वितरित किए। पाठक ने लोगों से कहा कि प्लास्टिक की पत्तलों में गर्म भोजन परोसने से हानिकारक रसायन निकलते हैं, जो स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक होते हैं।
प्रसाद वितरण के लिए पत्तल बांटने की ऐसी ही एक और पहल स्वयंसेवी संस्था मंगलमान की ओर से भी की गई। लखनऊ के भागीदारी भवन में आयोजित समारोह में भंडारा संचालकों कोहरी पत्तलों का वितरण किया गया। समारोह के मुख्य अतिथि उत्तर प्रदेश के समाज कल्याण मंत्री असीम अरुण ने इस मौके पर कहा कि हमारी आस्था से प्रकृति का नुकसान नहीं होना चाहिए। उन्होंने स्वच्छता का पालन करने वाले भंडारा आयोजकों को सम्मानित करने की भी बात कही।
अखिल भारतीय उद्योग व्यापार मंडल के राष्ट्रीय अध्यक्ष संदीप बंसल ने कहा कि लखनऊ का यह संदेश पूरे देश में प्रेरणा बनेगा। मुख्य वक्ता राकेश जैन ने बर्तन बैंक के उपयोग को शून्य अपशिष्ट के लिए अनिवार्य बताया। विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित दैनिक जागरण, यूपी के स्टेट हेड व वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष शुक्ल ने कहा कि मंगलमान का यह कार्य समाज में एक स्थायी संस्कार उत्पन्न करेगा। उन्होंने प्रसाद लेने वालों को प्रकृति की सेवा का भी उत्तरदायित्व लेने की बात कही।
इंडिया वाटर पोर्टल से बातचीत करते हुए आशुतोष शुक्ल ने कहा कि भंडारों में पौधे बांटना, पत्तल बांटना बहुत अच्छी बात है। यह लोगों में प्रकृति और पर्यावरण के प्रति चेतना बढ़ने का द्योतक है। पत्तल और कुल्हाड़ का इस्तेमाल करना बहुत अच्छा है। इससे गंदगी और प्रदूषण घटाने के साथ ही कुम्हारों और कुटीर उद्योगों को रोजगार व आर्थिक मदद मिलती है।
उन्होंने बताया कि इस बार गैस संकट के चलते भले ही खाने के भंडारों की संख्या पर असर पड़ा है, पर पानी और शर्बत के भंडारे एक बार फिर से बढ़े हैं। इस साल आठ बड़े मंगल पड़ने के चलते भी भंडारों की संख्या डिवाइड हुई है। हालांकि, कुल भंडारों की संख्या बढ़ी है, पर भंडारे अलग-अलग दिनों पर होने के कारण कम प्रतीत हो हैं। उन्होंने हरे मंगल पर की जाने वाली हरित पहलों को मीडिया कवरेज में बेहतर स्थान देने की बात भी कही, ताकि पर्यावरण संरक्षण का संदेश ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंच सके। साथ ही ऐसी सार्थक पहल करने वाले लोगों व संस्थाओं का उत्साह वर्धन भी हो सके।
बबड़े मंगल पर लखनऊ में कई जगह पौधों का वितरण किया गया। इसी क्रम में लोगों को पौधे बांटती सामाजिक कार्यकर्ता शिप्रा पाठक।
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गर्मी से राहत दिलाने की भी व्यवस्था
कई आयोजकों ने अपने भंडारों ने सिर्फ भोजन वितरण तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि गर्मी से राहत देने के लिए कूलर, पंखे और शीतल जल की व्यवस्था की। इसके तहत शहर भर में दर्ज़नों भंडारों में लोगों के लिए कूलिंग व्यवस्था भी की गई थी। अमीनाबाद, चौक सहित शहर में कई जगहों पर व्यापारी संगठनों ने ट्रैफिक सिग्नलों के पास टेंट लगाकर अस्थायी छाया, पंखे और पानी की व्यवस्था करके “हीट रिलीफ पॉइंट” या “कूलिंग स्टेशन” बनाए। बड़े मंगल पर बनाए गए ऐसे कुछ कूलिंग स्टेशनों पर सामाजिक संगठनों द्वारा ORS घोल, ग्लूकोज बिस्किट और प्राथमिक उपचार की सुविधा भी दी गई।
यह पहल खासतौर पर रिक्शा चालक, डिलीवरी बॉय, ट्रैफिक पुलिस और दिहाड़ी मजदूरों के लिए बहुत मददगार साबित हुई है, जिन्हें लंबे समय तक धूप में रहना पड़ता है। यह बड़े मंगल की भावना को आधुनिक जरूरतों के साथ जोड़ने का अच्छा उदाहरण है। यह पहल खासकर ग्लोबल वॉर्मिंग और जलवायु परिवर्तन के चलते हीटवेव की बढ़ती मार और पर्यावरणीय संकट को ध्यान में रखकर की गई।
मोबाइल प्याऊ : जहां जरूरत, वहीं पानी
लखनऊ और आसपास के कुछ युवाओं ने हाल के वर्षों में “मोबाइल प्याऊ” की शुरुआत की है। इसमें संस्थाएं व सामाजिक कार्यकर्ता ई-रिक्शा या छोटे वाहन पर पानी के बड़े कंटेनर, ग्लास और शर्बत लेकर शहर के अलग-अलग इलाकों में घूमते हैं जैसे बस स्टॉप, रेलवे स्टेशन, मजदूरों के काम वाली साइट्स (लेबर चौक) और ट्रैफिक सिग्नल। इसका फायदा यह होता है कि पानी की बर्बादी नहीं होती और सबसे ज़्यादा ज़रूरत वाले लोगों तक पानी पहुंचता है, खासकर उन जगहों पर जहां स्थायी प्याऊ लगाना मुश्किल है। कई बार ये टीमें दिनभर अलग-अलग लोकेशन बदलती हैं, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों को राहत मिल सके।
लखनऊ में कई वर्षों से We Care Foundation और Robin Hood Army Lucknow जैसे स्थानीय युवा समूह बड़े मंगल के मौके पर स्थायी स्टॉल लगाने के बजाय मोबाइल प्याऊ चलाते रहे हैं। ये लोग ई-रिक्शा या छोटे वाहनों में पानी के कैंपर, शर्बत और ग्लास लेकर चारबाग रेलवे स्टेशन, कैसरबाग बस अड्डा, हजरतगंज चौराहा जैसे शहर के अलग-अलग हिस्सों में लोगों को पानी पिलाते नज़र आते हैं। खास बात यह है कि ये टीमें भीड़-भाड़ वाले भंडारों से दूर उन जगहों पर जाती हैं, जहां दिहाड़ी मजदूर, रिक्शा चालक या ट्रांजिट में फंसे लोग होते हैं।
‘जल-संरक्षण’ की सीख पर भी दिया ज़ोर
कुछ जगहों पर प्याऊ को सिर्फ पानी पिलाने तक सीमित न रखकर उसके साथ “जल-साक्षरता” की सीख को भी जोड़ा गया। ऐसे स्टॉलों पर लोगों को पानी पिलाने के साथ-साथ पोस्टर, पर्चों (पैंफलेट) बांटकर या बातचीत के जरिए जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन और भूजल संकट के बारे में जानकारी दी गई। बच्चों को इसमें खास तौर पर शामिल किया गया, ताकि उनमें बचपन से ही पानी के प्रति संवेदनशीलता विकसित हो। इस तरह बड़े मंगल को एक धार्मिक आयोजन के साथ ही सामाजिक संदेश देने का माध्यम बनाने की कोशिशें भी की गईं।
निष्कर्ष : पुरानी परंपरा को मिल रहा नया स्वरूप
बड़े मंगल पर की गई इन सभी पर्यावरणीय पहलों के उदाहरणों में एक बात समान है कि इनमें बड़े मंगल की मूल भावना को बरकरार रखते हुए उसे आज के लिए ज़रूरी सामाजिक व पर्यावरणीय सरोकारों से जोड़कर एक नए स्वरूप में ढालने का प्रयास किया गया। चाहे प्याऊ हो या भंडारा, अहम सवाल यह नहीं रहा कि क्या किया जा रहा है, बल्कि इस बात पर भी ज़ोर दिया गया कि क्यों और कैसे किया जा रहा है। इस तरह लखनऊ में बड़े मंगल पर सेवा में संवेदना, समझ और सामाजिक जिम्मेदारियों को जोड़कर एक बड़ा बदलाव लाने की कई कोशिशें देखने को मिलीं।
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