गंदगी ढोने की साधन बन गई हैं नदियां
गंदगी ढोने की साधन बन गई हैं नदियां

संदर्भ गंगा : गंगा में रुहेलखंड और कुमायूं की गंदगी

गंगा नदी की गंदगी में कुमायूं और रुहेलखंड के उद्योगों का बड़ा हाथ है। रामगंगा, कोसी, बैगुल समेत कई सहायक नदियाँ औद्योगिक कचरा लेकर गंगा में मिलती हैं। ये मिलान फर्रुखाबाद में काली से पहले होता है। गर्रा नदी भी स्थानीय गंदगी लेकर हरदोई में गंगा में मिलती है।
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गंगा नदी को गंदी और जहरीली बनाने में कुमायूं तथा रुहेलखंड के उद्योगों और शहरों का भारी योगदान है। इस क्षेत्र की हिमालय से निकली रामगंगा, कोसी, बैगुल तराई से निकली अपनी अनेक सहायक नदियों बगद, महरवा, सोन, शंखा, नकटिया, देवरिनया, भाखड़ा, गौला, गांगन, सहजनी, किच्छा, देवहा, अरिल आदि के जरिये इस इलाके के ढेर सारे औद्योगिक तथा शहरी कचड़े को लेकर अंततः गंगा में मिलती है। गंगा से रामगंगा की यह भेंट फर्रुखाबाद में काली की मुलाकात से पहले होती है।

इनके अलावा गर्रा नदी खनतिया, खत्रौत तथ बक्शा नाला से जहरीली गंदगी लेकर हरदोई के पास गंगा में मिलती है।

दिल्ली से सड़क मार्ग से लखनऊ आने में हापुड़, सिम्भौली, गजरौला, मुरादाबाद, रामपुर, बरेली, शाहजहांपुर, लखीमपुर खीरी, सीतापुर, हरदोई जिलों में कई स्थानों पर उद्योगों से निकली दुर्गंध नाक में रुमाल लगाने को विवश करती है।

रास्ते में गढ़मुक्तेश्वर के पास ब्रजघाट पर गंगा मिलती है। गंगा का पानी देखने में यहां साफ है। गढ़मुक्तेश्वर में गंगा के प्रदूषित होने का एकमात्र कारण यहां काफी अधिक तादाद में लाशों का अंतिम संस्कार किया जाना है। उत्तर प्रदेश के आसपास के जिलों के अलावा पंजाब तथा हरियाणा के लोग भी अपने सगे संबंधियों के शव यहां लाते हैं। गढ़मुक्तेश्वर से पहले सिम्भौली चीनी मिल अपनी गंदगी खुले खेतों में डाल रही है। यहां के हैंडपंप से शीरे के रंग और गंधयुक्त पानी भूमिगत जल प्रदूषण की निशानी है। फैक्ट्री की चिमनी से निकली राख चारों तरफ उड़ती है। हवा में दुर्गंध भी व्याप्त रहती है। किसानों ने फैक्ट्री के प्रदूषण से अपनी फसल बर्बाद होने की शिकायत परगना मजिस्ट्रेट से की है।

ब्रजघाट में सुबह-सुबह सूरज निकलने से पहले जब भक्त गंगा में डुबकी लगा रहे होते हैं, श्मशान घाट पर झाड़ू लग रहा होता है और किनारे की राख छानकर दो चार सिक्के ढूंढे जा रहे होते हैं। जब भिखारी अपना आसन जमा रहे होते हैं तथा घाट के पंडे अपने तखत सजाते और चंदन आदि घिसकर तैयार कर रहे होते हैं उसी समय इस सबसे बेखबर सैकड़ों पक्षी गंगा जल में किलोलकर रहे होते हैं। ऐसे पक्षियों के झुंड अब नदियों में दुर्लभ हो चले हैं। यहां गंगा में मछलियां भी खूब है और कछुआ तथा सुइस आदि भी।

वैसे प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के गाजियाबाद क्षेत्र से अधिकारी यहां भी गंगा जल को बिना साफ किये पीने लायक नहीं मानते। आई.टी.आर.सी. लखनऊ की जांच में यहां क्रोमियम और आयरन प्रति ली० क्रमशः 3.742 तथा 1.026 मि०ग्रा० पाया गया है, जबकि पेयजल में इसकी अधिकतम सीमा 0.050 हो सकती है। कन्नौज में गंगा के पानी में आयरन और मैंगनीज काफी अधिक पाया गया है। यह निश्चय ही काली तथा रामगंगा नदियों का प्रभाव है। गढ़मुक्तेश्वर और कन्नौज के बीच अनूपशहर कायमगंज की चीनी मिलें तो गंगा को प्रदूषित कर रही थीं। हाल में चालू नरोरा परमाणु बिजलीघर सबसे भयावह संभावित खतरा बनकर उभरा है। बबराला में प्रस्तावित खाद कारखाने भी अंततः गंगा को ही गंदी करेगा।

गढ़मुक्तेश्वर से मुरादाबाद मार्ग पर गजरौला में उद्योग विभाग एक औद्योगिक आस्थान बना रहा है। और प्रदूषणकारी औद्योगिक इकाइयां यहां पहले से स्थित हैं। ये हैं मेसर्स वैम आर्गेनिक ऐंड केमिकल्स लि०, मेसर्स रामगंगा फर्टिलाइजर लि०, मेसर्स श्री एसिड एण्ड केमिकल्स फर्टिलाइजर और पेपर यूनिट, मेसर्स रोनक आटोमोबाइल्स कम्पोनेंट लि०, मेसर्स बेस्ट लि०।

हवा में दूर-दूर तक दुर्गंध फैला रही व्री एसिड एण्ड केमिकल्स (पेपर यूनिट) और मेसर्स वैम आर्गेनिक्स अपना दूषित उत्प्रवाह बगद नदी में गिराते हैं जो महावा नदी में होता हुआ रामगंगा पहुंचता है।

इन कारखानों की गंदगी से बगद और महावा नदी की मछलियां मरने के अलावा भूले-भटके पानी पीने वाले जानवरों के मरने की शिकायतें भी मिली हैं।

मुरादाबाद जिले में हसनपुर स्थित चीनी मिल अपनी गंदगी जमीन में बहाकर खेत और भूमिगत जलभराव करती है तो अमरोहा की चीनी मिल सोन नदी को। सोन नदी में गणेश पेपर मिल बदांयू तथा किसान सहकारी चीनी मिल बदांयू का उत्प्रवाह भी गिरता है। मुरादाबाद के अन्य प्रमुख जल प्रदूषणकारी उद्योग हैं। अजुध्या शुगर मिल तथा डिस्टलरी, यू०पी० एग्रो प्रोडक्ट, अधवानपुर, किसान सहकारी चीनी मिल, दलपतपुर की दूधवाली फैक्ट्री तथा अधवानपुर पेपर मिल, सोत नदी फर्रुखाबाद से पहले गंगा में गिर जाती है।

कोसी-रामपुर-नैनीताल

कोसी रामगंगा की प्रमुख सहायक नदी है। यह नैनीताल जिले से होती हुई रामपुर की गंदगी समेटकर रामगंगा में मिल जाती है।

ैनीताल में किसान सहकारी चीनी मिल और बाजपुर चीनी मिल का सीधे तथा किच्छा चीनी मिल का उत्प्रवाह किच्छा से होकर कोसी में आता है, जबकि गदरपुर चीनी मिल की गंदगी भाखड़ा से होकर रामगंगा में पहुंचती है। मेसर्स सेंचुरी पल्प ऐंड पेपर मिल, लालकुआं, नैनीताल की गंदगी गैला नदी के जरिये रामगंगा में आती है। यह उद्योग आसपास के वातावरण में असहज दुर्गंध पैदा करती है।

रामपुर जिले की रुद्रा विलास किसान सहकारी चीनी मिल की गंदगी भाखड़ा में होते हुए रामगंगा पहुंचती है।

रामपुर में रजा टेक्सटाइल, रामपुर डिस्टिलरी, यू०पी० स्टेट शुगर मिल और शिवा पेपर मिल का विषैला उत्प्रवाह कोसी नदी में गिरता है। देवरनिया नदी पूरे रामपुर शहर की गंदगी रामगंगा पहुंचाती है। जिले के शाहाबाद कस्बे की सारी गंदगी रामगंगा में गिरती है।

बरेली

आगे चलकर बरेली में माचिस बनाने वाली मेसर्स विमकों लिमिटेड कंपनी तथा तारपीन बनाने वाली मेसर्स इंडियन टरपेन्टाइन एण्ड रेजिन कंपनी लि० अपनी उत्प्रवाह देवरनिया के माध्यम से रामगंगा में डालते हैं। बरेली की सिंथेटिक एण्ड केमिकल की गंदगी शंखा होकर रामगंगा में जाती है। यहां स्टेट शुगर कारपोरेशन की मिल शहर के नाले से होकर अपनी गंदगी रामगंगा में पहुंचाती है। सेमीखेड़ा शुगर वर्क्स की चीनी मिल और डिस्टलरी यूनिट और केसर शुगर वर्क्स, बहेड़ी की गंदगी नाले से देवरनिया होते हुए शंखा रामगंगा में जाता है। बरेली की कैम्फर ऐंड एलाइड कंपनी क्लेक्टरगंज की गंदगी भी शंखा होकर रामगंगा में गिरती है।

बरेली शहर की गंदगी नालों से होकर नकटिया और देवरनिया से होकर अंततः रामगंगा में गिरायी जाती है।

बरेली शहर में शराब बनाने वाली अनेक फैक्ट्रियां भी वायु प्रदूषण तथा जल प्रदूषण का स्रोत हैं। ये फैक्ट्रियां शीरे से शराब बनाती हैं। इस समय ये मिति इंडस्ट्रियल एस्टेट प्रेमनगर में स्थित है। अब इन्हें शहर से दूर हटाने की कार्यवाही चल रही है।

शाहजहाँपुर

बरेली से शाहजहांपुर मार्ग पर मीरानपुर कटरा में सेठ काशीनाथ शुगर मिल के नाम से एक बड़ी खांडसारी इकाई है। इसका गंदा पानी सड़क के किनारे के नाले से होकर एक बड़े तालाब में जाता है। नेतराम का कहना है कि मिल के गंदे पानी से मच्छर इतना बढ़ गये हैं कि पूरा कस्बा परेशान है। लोग मलेरिया व अन्य बुखार से पीड़ित रहते हैं। मिल के विष से मछली तो मरती ही हैं। प्रदूषित तालाब का पानी पीने से गांवों के गायों के गर्भ गिर जाते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि एक अरसे से मिल की गंदगी जाते-जाते पानी काफी अम्लीय हो गया है।

इसी रोड पर आगे किसान सहकारी चीनी मिल तिलहर है। चीनी मिल की गंदगी बक्शा नाला में गिरती है। मिल की गंदगी के कारण न केवल मछली बल्कि नाले के कछुवा और मेंढक भी समाप्त हो चले हैं। नाले के इर्द-गिर्द बसे गांव मच्छर, मक्खी और बुखार से पीड़ित रहते हैं।

शाहजहाँपुर नदियों के मामले में बड़ा धनी जनपद है। स्वयं शाहजहाँपुर नगर एक समय अत्यंत रमणीक स्थान माना जाता था, क्योंकि यह गर्रा और खत्रौत दो नदियों के मध्य स्थित है। शाहजहाँपुर के एक हिस्से में स्थित चीनी मिलों का उत्प्रवाह तो गोमती से होकर गंगा में आता है, जबकि बाकी खत्रीत, गर्रा, बेगुल और रामगंगा से होकर खत्रौत शाहजहाँपुर में ही गर्रा में मिल जाती है।

यहाँ गर्रा नदी को प्रदूषित करने वाले दो कारखाने हैं एक रोजा चीनी मिल, दूसरी केरु ऐंड कंपनी डिस्टिलरी। रोजा चीनी मिल का उत्प्रवाह अब भी बराबर गर्रा में जा रहा है, जबकि केरु एंड कंपनी अदालती निषेधाज्ञा से साल भर से बंद है। यह कंपनी

अपने यहां ट्रीटमेंट प्लांट लगा रही है। कंपनी के प्रबंधकों का आरोप है कि प्रदूषण बोर्ड के अधिकारी पैसा वसूलने के लिए तरह-तरह से तंग करते हैं। जिन कारखानों के लोग पैसा दे देते हैं, वह बचे रहते हैं।

उधर किसान चीनी मिल तिलहर की गंदगी लाने वाला बक्शा नाला आगे चावल और गत्ता मिलों की अत्यंत प्रदूषित सामग्री लेकर गर्रा में मिलाता है। शाहजहाँपुर पेपर ऐंड बोर्ड नाम की कंपनी अभी नयी खुली है, उसमें ट्रीटमेंट प्लांट लगाया जा रहा है। शंकर स्ट्रा बोर्ड फैक्ट्री के पास ट्रीटमेंट प्लांट नहीं है। इन दो के अलावा आस-पास की कई चावल मिलों की गंदगी भी सड़क के दोनों ओर बने नालों से बक्सा नाला होते हुए गर्रा जाती है। स्ट्रा बोर्ड कारखानों के उत्प्रवाह में चूना, गंधक तथा मिट्टी के तेल की अधिकता बतायी जाती है।

कारखानों का ऐसा उत्प्रवाह ले जाने वाले नाले के किनारे स्थित खेत खराब हो रहे हैं। बक्शा नाला में मछली पकड़ने के लिए कटिया लगाये बैठे मो० तुफैल ने बताया कि जनवरी 1989 महीने में यहां काफी मछलियां मरीं। संजना, बखिया व अन्य कई गांवों में कुओं का पानी खराब हो गया है और मलेरिया बुखार चल रहा है। बक्शा नाला में तो अगर कोई आदमी घुसता है तो उसके पांव फट जाते हैं।

मंदिर के नीचे मरघटे का माहौल

शाहजहाँपुर में खत्रौत के किनारे मुख्य स्नान घाट पर एक और मंदिर बना है और वही पास में मस्जिद। स्नान, ध्यान और पूजा का यह पवित्र स्थान मरघटा सा लगता है। घाट के नीचे सड़ती लाशें गिद्ध और कुत्ते नोंचते रहते हैं। ज्ञात हुआ कि घाट से कुछ ऊपर नदी के किनारे पोस्टमार्टम के लिए बने चीरफाड़घर से निकली लावारिस लाशें पुलिस वाले सीधे नदी में छोड़ देते हैं जो बहकर यहां पहुंच जाती है। शाहजहाँपुर शहर की अधिकांश गंदगी नालों के जरिये खत्रौत में गिरती है।

शाहजहाँपुर शहर में लगभग 300 मछुवारा परिवार रहते हैं। स्थानीय मछुवारा छोटे ने बताया कि मझोला (पीलीभीत) की चीनी मिल के गंदे पानी से दिसंबर महीने में गर्रा नदी में मछलियां मरीं। खत्रौत और खननिया में भी कारखानों की गंदगी से मछली मरती रहती हैं। छोटे का कहना है कि नदियों में मछलियां बहुत कम हो जाने से अब पेट पालना मुश्किल है। मछुआरे या तो दूसरे धंधे अपना रहे हैं या फिर तालाबों में शिकार कर रहे हैं। शाहजहाँपुर में पिछले कुछ सालों में मलेरिया काफी तेजी से फैला है और हजारों लोग मरे हैं, यद्यपि स्वास्थ्य केन्द्रों पर उनके रिकार्ड नहीं हैं।

बीमारी की गंभीरता को देखते हुए केन्द्र सरकार की संस्था आई०सी०एम०आर० ने यहां तक मलेरिया अनुसंधान केन्द्र खोला है। केन्द्र के प्रभारी डा० आर०एन० प्रसाद का कहना है कि मलेरिया फैलने का एक बड़ा कारण कारखानों की गंदगी से नदियों, नालों की मछलियां समाप्त होना है। उनकी समस्या है कि सी०डी०आर०आई० व अन्य संस्थाओं ने मलेरिया नियंत्रण हेतु जो दवाएं निकाली हैं उनका बहते पानी में कोई असर नहीं होता, क्योंकि पानी के साथ दवा भी बह जाती है।

इस समस्या से निपटने के लिए केन्द्र ने तालाबों-झीलों में गम्बूसिया मछलियां डलवाने का काम प्रारंभ किया है। डा० प्रसाद बताते हैं कि मछलियां मच्छरों के अंडे तथा लार्वा खा जाती हैं और इस प्रकार मलेरिया रोकने में अत्यंत सहायक है।

डा० प्रसाद बताते हैं कि कारखानों की गंदगी से जलस्रोतों के किनारे मच्छर बढ़ने के साथ ही मलेरिया, फाइलेरिया, डेंगू और इंसेफेलाइटिस बीमारियों फैल रही हैं। प्रदूषित जल से होने वाली बीमारियां इनके अतिरिक्त हैं।

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