पानी ही पानी, लेकिन पीने को बूंद भी नहीं

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अंतरराष्ट्रीय गैर सरकारी संगठन वाटर एड और सरकार के बीच सहयोग से जो आंकड़े सामने आएं हैं वे उन सरकारी दावों के उलट हैं जिनमें कहा गया था कि 94 फीसदी शहरी और 91 फीसदी ग्रामीण आबादी को अब पीने का साफ़ पानी मिल रहा है।

वाटर एड के मुताबिक अंतर यह भी है कि अभी तक आधिकारिक आंकड़ों में आपूर्ति किए जाने वाले पानी की गुणवत्ता का कोई ज़िक्र नहीं है। यह भी नहीं बताया गया कि क्या पानी की आपूर्ति साल भर होती है?

यूनिसेफ के जल, पर्यावरण और सफाई के प्रमुख लिजेट बर्जर का कहना है कि लाखों लोगों तक पानी पहुंचाने की भारत की कोशिश के बावजूद, “बढ़ती आबादी, जीवाणु संक्रमण, और दूसरी समस्याओं के कारण पानी की प्रभावी पहुंच में काफी अंतर है।”

लिजेट बर्जर

भारत एमडीजी के तहत पानी के क्षेत्र में 2015 तक साफ़ पानी से वंचित आबादी की संख्या आधी करने के लिए प्रतिबद्ध है।

वाटर एड इंडिया के दिपिंदर कपूर कहते हैं कि उनके संगठन को पूरे भारत में विभिन्न समुदायों से अपने सघन अभियान के दौरान प्रदूषित पानी के बारे में गहरी हिदायत मिली। कपूर कहते हैं कि वाटर एड का अनुभव है कि भारत में प्रदूषित पानी की आपूर्ति का कारण खुले में मलत्याग, सफ़ाई की कमी, भूमिगत जल का अत्यधिक दोहन और जल स्रोतों में रसायनों का इस्तेमाल है।

इस प्रदूषण का सबसे अधिक शिकार भारत के गांव हैं जहां देश की करीब 70% आबादी रहती है।

ग्रामीण क्षेत्रों के लोग अत्यधिक दोहन किए गए भूमिगत जल में आर्सेनिक और फ्लोराइड के प्रदूषण के कारण कई तरह की स्वास्थ्य समस्याओं का सामना कर रहे हैं। इन इलाकों में पानी की मात्रा काफी कम भी हो गई है। ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं और बच्चों में खून की कमी यानी एनीमिया का कारण फ्लोराइड प्रदूषण माना जा रहा है।

दिल्ली स्थित फ्लोरोसिस शोध एवं ग्रामीण विकास फाउंडेशन की डॉ. ए के सुशीला कहती हैं, “इसका एक सीधा प्रभाव यह पड़ रहा है कि महिलाएं कम वज़न वाले बच्चों को जन्म देती हैं। इसकी वजह से बच्चों को कम शारीरिक एवं मानसिक विकास के साथ-साथ कई अन्य तरह की स्वास्थ्य समस्याओं का सामना भी करना पड़ता है।”

2008 में यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक विश्व के 43 फीसदी कम वज़न के बच्चे भारत में पैदा होते हैं।

अपने तर्क के समर्थन में सुशीला कहती हैं कि कमज़ोर बच्चों के जन्म को रोकने के लिए भारत सरकार 1970 से ही गर्भवती महिलाओं को फोलिक एसिड दे रही है लेकिन इसका कोई ठोस नतीजा अभी तक सामने नहीं आया है। उनका मानना है कि फ्लोराइड प्रदूषण के कारण पेट की आंतरिक दीवार पर बुरा असर पड़ता है जिससे वे पोषक तत्वों को सोख नहीं पाती।

सुशीला कहती हैं 'हम बिना कारण की ओर ध्यान दिए भारत में विक्लांग बच्चों की आबादी बढ़ा रहे हैं।’’

देश के विभिन्न हिस्सों के करीब हजारों लोग पानी में फ्लोराइड और आर्सेनिक के प्रदूषण से प्रभावित हैं। दोनों तरह के प्रदूषण का स्रोत खनिज हैं जिसका कारण भूमिगत जल का अत्यधिक दोहन है।

कई प्रमाणित अध्ययनों के मुताबिक उत्तरी और पूर्वी भारत में गंगा नदी के किनारे की आबादी आर्सेनिक विषाक्तता से पीड़ित है।

कोलकाता स्थित जादवपुर विश्वविद्यालय में पर्यावरण विज्ञान संस्थान के दीपांकर चक्रवर्ती प्रशासन पर सार्वजनिक स्वास्थ्य के प्रति कोताही बरतने का आरोप लगाते हैं। चक्रवर्ती ने ही २० साल पहले इस मसले को उठाया था।

च्रकवर्ती कहते हैं कि मुख्य समस्या, प्रशासन के पानी की आपूर्ति के ख़राब प्रबंधन में है। आपूर्ति के लिए भूमिगत जल के बजाए नदियों का इस्तेमाल करके इस समस्या का समाधान किया जा सकता है।

सरकार के राजीव गांधी राष्ट्रीय पेय जल मिशन और पेय जल आपूर्ति विभाग के निदेशक भारत लाल स्वीकार करते हैं कि पानी की गुणवत्ता का मसला दूसरे दर्जे का है। “एक बार पानी की पहुंच सुनिश्चित हो जाने के बाद हम पानी के प्रभाव की निगरानी नहीं करते’’

लाल कहते हैं कि जिला स्तर पर आर्सेनिक और फ्लोराइड परीक्षण के लिए प्रशिक्षित कर्मचारियों की भारी कमी है। वह विभिन्न राज्य स्तरीय संस्थाओं को पानी की गुणवत्ता जांचने के लिए दिये गए धन का उपयोग नहीं हो सकने का मुद्दा भी उठाते हैं।

लाल कहते हैं 'पानी की आपूर्ति के लिए ज़िम्मेदार सरकार, नगर पालिका ओर ग्रामीण निकाय आपूर्ति किए की गई की गुणवत्ता की ज़िम्मेदारी लेने से बचते हैं।'

केया आचार्य

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