नदियों के जल प्रदूषण का अध्ययन : गंगा नदी के विशेष सन्दर्भ में
सारांश
नदी आशा, विश्वास का प्रतीक है और इसकी पवित्रता के कारण इसकी पूजा की जाती है। हालांकि मानवजनित गतिविधि के कारण नदी का पानी लगातार प्रदूषित हो रहा है। नदियों के आस-पास के शहरों का अपशिष्ट जल नदी को गंभीर रूप से प्रदूषित कर रहा है। गंगा नदी न केवल लाखों लोगों के लिए विश्वास और आशा का प्रतीक है बल्कि रोज लोगों के उपयोग और पशुधन प्रबंधन के लिए भी अहम है। मात्रा के हिसाब से औद्योगिक प्रदूषण का योगदान लगभग 20 प्रतिशत है। लेकिन इसकी विषाक्त और नष्ट न होने वाले कचरे के कारण, इसका बहुत अधिक प्रभाव है। रामगंगा और काली नदियों के जलग्रहण क्षेत्र और कानपुर शहर में औद्योगिक क्षेत्र औद्योगिक प्रदूषण के महत्वपूर्ण स्रोत हैं। कानपुर में चर्म शोधन कारखाने, आसवनी, पेपर मिल और कोसी, रामगंगा और काली नदी के जलग्रहण क्षेत्र में चीनी मिलें प्रमुख रूप से जिम्मेवार हैं।
कूटशब्द : गंगा नदी, जल प्रदूषण, जल प्रबन्धन
प्रस्तावना
भारत वर्ष नदियों, झीलों व तालाबों का देश है। यहां की सभ्यता का विकास नदियों के किनारे हुआ। यहां पर नदियों के तटों पर हमारे ऋषियों व मुनियों ने बहुत तपस्या की तथा विश्व के विभिन्न विषयों का ज्ञान दिया। हमारें वेदों, पुराणों, उपनिषदों, महाकाव्यों (रामायण व महाभारत) आदि की रचना विभिन्न नदियों के तट पर हुई। हमारी सभी नदियों में सबसे महत्वपूर्ण गंगा नदी है। यह दैवीय नदी है। जिसकी उत्पत्ति भगवान शिव की जटाओं से हुई है। इसीलिये हमारे धार्मिक कार्यों व कर्मकाण्डों में इसके पवित्र जल का उपयोग किया जाता है। गंगा का जल सबसे पवित्र इसलिये भी माना जाता था क्योंकि इसका जल वैक्टीरिया व प्रदूषण से मुक्त था तथा इसका जल खराब नही होता था। ऐसी गुणवत्ता का जल अन्य नदियों में दुलर्भ है। भौगोलिक रूप से गंगा की उत्पत्ति हिमनदों से हुई है तथा गौमुख व गंगोत्री को इसका उद्गम स्थल मानते हैं। समय की विडम्बना यह है कि आर्थिक विकास की दौड में हम अपनी धार्मिक महत्व की चीजों की भी उपेक्षा करने लगे है। हमनें गंगा नदी पर अनेक बांध बनवाये तथा कई नालों से प्रदूषित जल छोड़ा जिससे इसका जल अशुद्ध होता गया। आज यह गंगाजल बहुत से स्थलों पर पीने योग्य भी नहीं है। शहरी कूड़ा करकट और औद्योगिक अपशिष्टों को भी हम निरन्तर गंगा नदी में प्रवाहित कर रहे हैं। जिससे वर्तमान में इसका जल जहरीला हो गया है। यदि हम इस जहरीले होते हुये गंगा जल का सेवन बिना शुद्ध किये करें तो अनेक भंयकर बीमारियों को जन्म दे सकता है। इस गंगा नदी के प्रदूषित जल का विश्लेषणात्मक विवरण निम्नवत है -
जल में हानिकारक रसायनिक तथा जैविक पदार्थों के मिलने से जल प्रदूषण की समस्या उत्पन्न हो जाती है। इनका दुष्प्रभाव मनुष्य तथा जीव जन्तुओं पर पड़ता है। जल प्रदूषण का प्रमुख कारण औद्योगिक उत्पादन प्रक्रिया अपशिष्ट पदार्थ तथा उपभोग क्रिया से प्राप्त अपशिष्ट पदार्थ है।
प्रोफेसर दिनेशमणि के अनुसार -
जल में आवश्यकता से अधिक खनिज लवण, कार्बानिक तथा अकार्बनिक पदार्थ तथा औद्योगिक संयत्रों से निकले रसायनिक पदार्थ तथा मृत जीव जन्तु, नदियों, झीलों, सागरों तथा अन्य जलीय क्षेत्रों में बिसर्जित किये जाने से ये पदार्थ जल के प्राकृतिक व वास्तविक रूप को नष्ट करके उसे प्रदूषित कर देते है। जिसका मनुष्य तथा अन्य जीवों पर घातक प्रभाव पडता है। इस प्रकार जल को दूषित हानेो जल प्रदूषण कहलाता है। इस प्रकार जल प्रदूषण के अन्तर्गत स्वच्छ जल के श्रोतों में ऐसे निलम्बित वाइय पदार्थ का समिश्रण होना है। इसके गुणों में परिवर्तन लाकर इसके इस्तेमाल करने वाले या उससे लाभान्वित होने वालों के लिये हानिकारक होता है।
पृथ्वी की सतह पर जल की मात्रा में सर्वाधिक जल सांगर के पास 97.25 प्रतिशत है बर्फ के रूप में जल की मात्रा 2.05 प्रतिशत है। भूमिगत जल 0.68 प्रतिशत, झीलों का जल 0.01 प्रतिशत जातीय मृदानमी 0.005 प्रतिशत. वायु मण्डल 0.001 प्रतिशत, नदियों में जल 0.001 प्रतिशत पाया जाता है। विश्व जल सर्वेक्षण के अनुसार समस्त जल ससाधनों में मीठा जल, 2.6 प्रतिशत, काम में आने वाला मीठा जल जल 0.24 प्रतिशत, कुल सिंचित जल 0.03 प्रतिशत, भू सिंचित जल 0.007 प्रतिशत, मीठे जल की खपत 0.00015 प्रतिशत है। भारत वर्ष में सिंधु, गंगा, ब्रम्हपुत्र एवं उसकी सहायक नदियों ही स्वच्छ जल के बड़े श्रोत है। इन सभी नदियों के मुख्य श्रोत हिमखण्ड हैं।
हमारे देश में औसत रूप से 19000 घन मीटर करोड़ पानी उपभोग के लिये मिलता है। यह पानी नदियों, झीलों, सरोवरों और पोखरों का है। इसमें अधिकांश जल प्रदूषण के कारण पीने और नहाने योग्य नही रह गया है। महानगरों में भारत वर्ष में जल प्रदूषण की अत्यधिक गंभीर समस्या है। इन महानगरों में कस्बों व नगरों की तुलना में जल के उपभोग का स्तर भी अधिक है। हमारे देश के प्रमुख शहरों में जल के उपभोग का स्तर इस प्रकार है:-
प्रो० पीटर ने प्रदूषित जल की 10 कोटियां बताई हैं
1. अत्याधिक अम्लीयता या क्षारीयता ।
2. अत्याधिक खनिजीकरण।
3. निलम्बित पदार्थों की उच्च मात्रा।
4. आक्सीजन निवेश को प्रभावित करने वाले पदार्थों से युक्त तेल, ग्रीस आदि।
5. सामान्य रूप से हानिकारक विद्यटनीय पदार्थों की उच्च मात्रा ।
6. सवेदी गुणों से युक्त तेल, क्लोरोफिनोल आदि।
7. विषैले पदार्थों से युक्त।
8. नाईट्रोजन तथा फास्फोरस के यौगिकों से युक्त उर्वरक तथा साबुन ।
9. गरम जल।
10. अम्लीय जल।
भारत वर्ष में जल प्रबन्धन स्तही जल, भूमिगत जल, प्रबन्ध और दूषित जल की निकासी की व्यवस्था के लिये केन्द्र और राज्य स्तर पर कई एजेसियां काम कर रही है। जल प्रबन्धन में विभिन्न पहलुओं से जुड़ी केन्द्र सरकार की एजेन्सियां निम्न है।
1. जल संसाधन मंत्रालय ।
2. केन्द्रीय जल आयोग।
3. केन्द्रीय भूमिगत जल आयोग।
4. केन्द्रीय सिंचाई और बिजली बोर्ड।
5. शहरी विकास मंत्रालय।
6. केन्द्रीय स्वास्थ्य और पर्यावरण इंजीनियरिंग संगठन।
7. ग्रामीण विकास संगठन।
8. कृषि मंत्रालय।
9. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ।
10. पर्यावरण और वन मंत्रालय।
11. केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड।
12. गंगा परियोजना निदेशालय।
13. राष्ट्रीय नदी संरक्षण निदेशालय।
14. पर्यावरणीय प्रभाव विवेचक शाखा।
केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड जल की गुणवत्ता की देख-रेख के लिये नदी प्रदूषण पर नजर रखाना पहली शर्त है। इसके लिये केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड देश की प्रमुख नदियों के जल प्रदूषण पर ध्यान देता है :-
1. भारतीय राष्ट्रीय जल संसाधन की देख रेख कार्यक्रम के अन्तर्गत जल की गुणवत्ता खास कर नदी और झील जैसे ताजे पानी के श्रोतों पर नजर रखने के लिये देश भर में 480 केन्द्रों की स्थापना और विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा चलाये जा रहे कार्यक्रमों के तहत पर्यावरण निगरानी व्यवस्था से जुड़ना।
2. भूमिगत जल की गुणवत्ता पर नजर रखने के लिये 21 समस्याग्रस्त क्षेत्रों में 134 केन्द्रों की स्थापना।
3. तटीय क्षेत्रों में 173 स्थानों पर जल गुणवत्ता की निगरानी और पूरे तटीय क्षेत्र के जल श्रोतों का खाका तैयार करना।
4. नदियों के मुहानों का सर्वेक्षण करना ताकि प्रदूषण की वर्तमान स्थिति और सम्भावनाओं का पता लग सके और आवश्यक कार्यवाही के विषय में निर्णय लिया जा सके। इस तरह के सर्वेक्षणें से ही गंगा कार्य योजना और राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना तैयार करने में मदद मिलती है।
5. गंगा परियोजना निदेशालय द्वारा नदी ते की प्रदूषित मात्रा का पता लगाने और गंगा कार्य योजना के तहत जल गुणवत्ता को बनाये रखने के लिये उठाये जा रहे कदमों के प्रभाव का पता लगाना।
6. विभिन्न उद्योगों से होने वाले नदियों के प्रदूषण की सम्भावनाओं का विस्तृत अध्ययन करना और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों द्वारा लागू किये जाने वाले गुणवत्ता के न्यूनतम मानको को तय करना।
7. पर्यावरण और वन मंत्रालय के परियोजना के प्रभाव खास कर जल गुणवत्ता पर होने वाले असर के अध्ययन में मदद करना।
दसवीं पंचवर्षीय योजना में नदी जल संरक्षण
पर्यावरण और वन 2001 के कोयम्बटूर चार्टर में कई पहले शुरू की गयी थी और राष्ट्रीय नदी प्राधिकरण की दसवीं बैठक में कई संकल्प लिये गये थे जिनमें कुछ निम्न है-
1. वर्ष 2007 तक प्रमुख प्रदूषित नदियों की सफाई ।
2. गंगा तथा इसकी सहायक नदियों की सफाई को उच्च प्राथमिकता देना।
3. कार्य योजनाओं का केन्द्र बड़े नगर होगा जो नदियों तथा झीलों के प्रमुख प्रदूषणकर्ता है।
4. एक अधिक प्रभावी नदी मोर्चा विकास दृष्टिकोण को अपनाया जायेगा जहां दोनों किनारों पर वृक्षों, झाड़ियों या बारहमासी घास / सरंकडो का व्यापक रोपण किया जाना।
5. विभिन्न नदियों में न्यूनतम प्रवाह अपेक्षाओं का निर्धारण किया जायेगा तथा सभी नदियों के संवेदनशील विस्तार खण्डों में न्यूनतम प्रवाह व्यवस्था सुनिश्चित करने के प्रयास किए जायेगें।
राष्ट्रीय नदी परिरक्षण योजना इस योजना का उद्देश्य कमी वाले क्षेत्र में अतिरिक्त मलजल उपचार संयत्र स्थापित करके तथा दाहगृहों की स्थापना करके नदी प्रदूषण का समाधान करना है। वर्तमान में राष्ट्रीय नदी परिरक्षण योजना के अन्तर्गत 153 नगरों पर विचार किया गया है। जिनमें से 74 नगर गंगा के किनारे, 21 यमुना के किनारे, 12 दमोदर के किनारे, 6 गोदावरी के किनारे, 9 काबेरी नदी के किनारे, 4-4 सतलुज तथा तुंगभ्रदा नदी के किनारे, 3-3 सुवर्णरेखा, बेतवा, बाणगंगा, ब्राहिमणी, चम्बल तथा गोमती के किनारे, दो कृष्णा के किनारे तथा एक-एक साबरमती, रवान, क्षिप्रा, नर्मदा तथा महानदी के किनारे स्थिति है। यह परियोजना केन्द्र द्वारा 100 प्रतिशत वित्तपोषण से शुरू की गई थी। तथापि, संसाधन दबावों को देखते हुये राज्यों को दसवीं योजना के दौरान लागत का 30 प्रतिशत हिस्सा देना है। गंगा चरण ख सहित एनआरसीपी के अन्तर्गत आने वाले कार्यों की लागत 3.780 करोड रूपये व्यय हो चुके है। गंगा की सफाई का लगभग 45 प्रतिशत कार्य पूरा हो चुका है। तथापि, भूमि अधिग्रहण में विलम्ब तथा नगर निगमों द्वारा कार्य की धीमी गति के कारण समग्र प्रगति कम हुई है।
गंगा नदी में प्रदूषण की रासायनिक जांच प्रमुख नदियों के बहाव में मैदानों में प्रवेश करते तथा शहरों से गुजरते हुये धीमापन आ जाता है। इनमें मुख्य प्रदूषक है- उर्वरक तथा कीटनाशी, नगर निगम का अनउपचारित मल-जल तथा औद्योगिक निःस्त्राव। राज्य प्रदूषण बोर्डो के साथ 507 स्थानों पर जल गुणवत्ता, बीओडी, कुल कोलीफोर्म का अनुवीक्षण करता आ रहा है। वर्ष 1998 के दौरान प्राप्त जल गुणवत्ता अनुवीक्षण परिणाम बताते है कि भारतीय जल संसाधनों में जैव तथा वैक्टीरिया संदूषक प्रदूषण का संकटपूर्ण श्रोत बन रहे है। उच्च कोलीफोर्म सघनता वाले प्रेक्षणों की संख्या में वर्ष 1997 की तुलना में वर्ष 1998 में बढ़ोत्तरी हुई है।
केन्द्रीय जल आयोग के अध्ययनों में नाइट्रेट, पोटेशियम और यहां तक की फास्फेट का भी उच्च सेकेंद्रण प्रकट किया है जबकि अन्य गहन औद्यौगिक गतिविधियों वाले क्षेत्र में भूजल में भिन्न अनुपातों में भारी विषैली धातुओं का उच्च सेकेन्द्रण है। वर्ष 1997 में नदियों और झीलों के पास 851 दोषी उद्योग कार्य कर रहे थे।
गंगा नदी में प्रदूषण के कारण
गंगा नदी में गंगोत्री से लेकर गंगा सागर तक लगभग 200 बड़े उद्योगों से अपशिष्ट एवं विभिन्न प्रकार के रासायनिक तत्वों के होने वाले प्रदूषण के प्रभाव को देखा जा सकता है कामियस से पैरों की खाल पर फोड़े, दाग तथा फेफड़ों में सूजन होती है। कानपुर में कोमियम की अधिकता के कारण जल पीने योग्य नही है। शीशा की अधिकता से जोड़ों में ऐंठन, लकवा, हाथों में पीलापन आदि बीमारियां होती है। निकिल एवं नाइट्रेट की अधिकता से त्वचा तथा श्वास नली में कैंसर, श्वास रोग आदि होते है। कानपुर में गंगा नदी में इन तत्वों की अधिकता के कारण यह बीमारियां जन सामान्य में पायी जाती है।
गंगा एक्शन प्लान
गंगा भारत की प्रमुख नदी है तथा सिन्धु गंगा का मैदान भारत की 40 प्रतिशत जनसंख्या के लिये उपयोगी है। सिन्धु गंगा का यह मैदान भारतीय अर्थव्यवस्था के लिये आर्थिक रूप से अत्यन्त महत्वपूर्ण है। यह औद्योगिक घरेलू तथा कृषि कार्य हेतु देश की रीढ की हडडी का कार्य करता है। इसमें अधिंकाश पानी नदियां द्वारा प्रभावित है। गंगा हिन्दू धर्म के हिसाब से सबसे पवित्र नदी है और यह उनके लिये विशेष महत्व रखती है। यह माना गया है कि गंगा नदी में अस्थि विसर्जन से स्वर्गलोक की प्राप्ति होती है परन्तु आज यही गंगा नदी जिनमें अनेको गुण थे भारतवर्ष के अत्याधिक प्रदूषित नदियों में से एक हो गयी है। गंगा नदी के पानी की सबसे महत्वपूर्ण गुणवत्ता यह थी कि यह स्वास्थ्यवर्धक था तथा अधिक समय तक संग्रहित करने पर भी खराब नही होता था। परन्तु आज कानपुर की गंगा नदी का पानी नहाने के योग्य भी नही रह गया है पीने की बात जाने दीजिये। गंगा नदी के प्रदूषण के 2 प्रमुख कारण हैः-
1. ऊपरी गंगा नहर नेटवर्क तथा निचली गंगा नहर द्वारा सिंचाई, औद्योगिक तथा घरेलू उद्देश्यों हेतु अत्याधिक मात्रा में पानी की निकासी।
2. घरेलू औद्योगिक तथा कृषि अपशिष्टों का नदियों में जाना।
गंगा नदी की भीषण प्रदूषण की समस्या को ध्यान में रखते हुये केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने एक बहुत बड़ी और महत्वाकांक्षी परियोजना प्रारम्भ की है जिससे कि गंगा नदी को उसके पुराने स्वरूप में लाया जा सके। इस प्रोजेक्ट का नाम गंगा एक्शन प्लान है। इसको कई चरणों में क्रियान्वित किया जायेगा। गंगा एक्शन प्लान के अन्तर्गत कानपुर महानगर में कार्य चल रहा है। गंगा नदी की सफाई की परियोजना भारत सरकार की नदियों की सफाई की परियोजना में सबसे बड़ी परियोजना है इसके प्रथम चरण में 462 करोड़ रूपये का प्रारम्भिक व्यय किया गया है।
गंगा एक्शन प्लान के प्रथम चरण का मुख्य उद्देश्य गंगा नदी की पानी की गुणवत्ता को केवल नहाने के स्तर तक शुद्ध करना है। अर्थात रसायनिक रूप से गंगा नदी में जीव रसायनिक आक्सीजन की मांगे को 3 मिग्रा० प्रति लीटर से कम लाने का प्रस्ताव है जबकि वर्तमान में यह स्तर 5 मिग्रा० प्रति लीटर है। गंगा नदी के पानी की गुणवत्ता का विश्लेषण राष्ट्रीय नदी सर्वेक्षण निदेशालय ने किया है इसमें इन्होने अन्य शैक्षणिक व शोष संस्थाओं की भी सहायता ली थी। इसके निष्कर्षो के अनुसार कानपुर में गंगा नदी में गुणवत्ता का स्तर लगभग पूर्ववत रहा है। अर्थात प्रदूषण की मात्रा में कोई उल्लेखनीय कमी नही रही है लोगों को भी यही आम धारणा है कि गंगा एक्शन प्लान से जन समुदाय को कोई लाभ नही मिला है। इस सन्दर्भ में गंगा नदी सुधारने वाली कियान्वयन एजेसियों का यह तर्क था कि प्रथम चरण में प्रदूषण स्तर में थोड़ी कमी करना ही हमारा लक्ष्य था और इसको पाने का हमने भरपूर प्रयास किया है। इन संस्थाओं का यह कहना कि द्वितीय चरण में महत्वपूर्ण परिवर्तन गंगा नदी के जल के गुणवत्ता स्तर में होगें।
गंगा घाटी के विस्तृत सर्वेक्षण के बाद गंगा एक्शन प्लान केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड नई दिल्ली ने लागू किया था। इस संस्था का कहना था कि -
1. नगर पालिका का प्रदूषित पानी तथा औद्योगिक प्रदूषण के मध्य 75.25 का अनुपात था।
2. 80 प्रतिशत जल प्रदूषण की समस्या प्रथम श्रेणी के शहरों से थी।
इसलिये गंगा योजना के अन्तर्गत मुख्या रूप से सरकार का केन्द्र बिन्दु महापालिकाओं के गन्दे पानी का नियंत्रण था। इन्होने औद्योगिक प्रदूषण के सन्दर्भ में स्पष्ट किया है कि इनका मूल्यांकन और नियंत्रण भारत सरकार के नियमों के अन्तर्गत होगा। इसलिये गंगा सुधार योजना 65 प्रतिशत प्रथम श्रेणी के शहरों से लागू की गई इनमें कानपुर महानगर भी लिया गया है। गंगा सुधार परियोजना के प्रारम्भिक चरण में कानपुर शहर की गंगा नदी के प्रदूषित पानी का मात्रा का अनुमान 270 मिलियन ली० प्रति दिन था इसमें 9 मि०ली० प्रतिदिन बहुत उच्च स्तर का प्रदूषित पानी था। इस समस्या को सुधारने के लिये उ०प्र० जल निगम ने जाजमऊ कानपुर में एक पायलट परियोजना बनाई और इसके लिये नीदरलैण्ड सरकार ने उसकी वित्तीय मदद की थी। उन्हीं की सीवेज प्रणाली द्वारा पानी को शुद्ध करने का प्रयास किया जाता है। इसी तरह के अन्य प्लान्ट बाद में बने इन सभी प्लान्टों का मुख्य उद्देश्य कानपुर महानगर के गन्दे प्रदूषित पानी को खेती या नदी में छोड़ने से पहले ठीक (आशिक रूप से शुद्ध) करना था। इनकी आंशिक लागतें या आंशिक सहायता भारत सरकार की थी। बाद में इन प्लान्टों को नगर निगम को देने का प्राविधान था जो इनके चलाने व रख-रखाव का खर्चा उठायेगा। परन्तु खर्चे के कारण नगर निगम ने इन प्लान्टों को अपने अधीन नही लिया है। वर्तमान वित्तीय संसाधनों को ध्यान में रखते हुये हो सकता है कि कानपुर नगर निगम भविष्य में भी इनको अपने हाथ में न ले।
गंगा बैराज योजना गंगा एक्शन परियोजना के अन्तर्गत कानपुर में सीमान्त बांधो को बनाने व नदी की दिशा बदलने का भी प्रोजेक्ट चल रहा है इसको गंगा बैराज योजना कहते है। इन परियोजना में काफी व्यय किया गया है और पर्यावरण की समस्याओं पर भी ध्यान केन्द्रित किया गया है। इसके अन्तर्गत पानी की गुणवत्ता बढ़ाने पर भी ध्यान दिया गया है। उ०प्र० सरकार ने यह दावा किया है कि गंगा बैराज योजना के निर्माण से यह सभी लाभ प्राप्त होगें इसके लिये इन्होने सरकार से सहायता मांगी है। इस परियोजना की लागत 173 करोड़ रूपये है। बैराज की लम्बाई 621 मी0 प्रस्तावित है। गंगा बैराज योजना की उपलब्धियां एवं प्रभाव निम्न प्रकार है।
1. गंगा नदी की दिशा परिवर्तन करने वाला एक चैनल होगा जो गंगा नदी को दक्षिण दिशा की ओर ले जायेगा।
2. वर्तमान गंगा नदी के बहाव को सीमान्त बांधो के द्वारा रोका जाये और इस पानी से नदी की दिशा परिवर्तन के साथ साथ पानी के प्रभाव बढ़ाने पर भी ध्यान दिया जायेगा।
3. गंगा नदी के पानी की मांग में वृद्धि होगी।
4. इस परियोजना से गंगा नदी की दिशा में स्थायी परिवर्तन न होग, पानी का बहाव बढ़ेगा जिससे नदी में गंगा का स्तर कम होगा।
5. गंगा बैराज योजना की डिजायन एवं लागत का विस्तृत ब्यौरा प्रदेश सरकार ने दिया परन्तु सम्बन्धी ब्यौरा नहीं दिया है।
इस प्रकार कानपुर में गंगा नदी के प्रदूषण को दो भागों में बांटा जा सकता है।
1. दृश्य प्रदूषण
2. अदृश्य प्रदूषण
दृश्य प्रदूषण पर नियंत्रण हेतु कानपुर के घाटों को पुर्ननिर्माण होना चाहिये इससे गंगा नदी की कानपुर में सुन्दरता बढ़ेगी ऐसा कार्य कलकत्ता में किया जा रहा है। इससे जनता का रुझान भी पर्यावरण के प्रति बढ़ेगा और लोग पर्यावरण के प्रति अधिक जागरूक होगें। http://www.geojournal.net/ सीवेज प्लान्टों द्वारा पानी के शुद्धिकरण से भी कानपुर का लाभ होगा। नदी के गुणवत्ता स्तर में सुधार की सही जानकारी एक्शन प्लान के कुछ चरणों के बाद ही प्राप्त हो पायेगें।
सुझाव
1. जल प्रदूषण निवारण तथा नियंत्रण अधिनियम 1974 का अधिनियमन करना जो राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को दंड इत्यादि के प्रावधान सहित अपशिष्ट जल के विसर्जन के लिये स्थल तथा श्रोत विशिष्ट मानकों का निर्धारण तथा अनुरक्षण करने की शक्ति देता है।
2. परिरक्षण, पुनःप्रयोग, निरन्तर विसर्जन के लिये प्रोत्साहन के प्रावधान के साथ उपभोक्ताओं को जलपूर्ति करने वाले स्थानीय प्राधिकारों पर उपकर लगाने के लिये राज्य प्रदूषण बोर्डों को सशक्त करने वाले जल उपकर अधिनियम 1977 का अधिनियम करने की शक्ति देता है।
3. एक संरक्षण अधिनियम पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 का अधिनियमन करना जो केन्द्र सरकार को पर्यावरण के संरक्षण के लिये सीधे हस्तक्षेप करने की शक्ति देता है।
4. पेयजल तथा जल संसाधनों के उचित प्रबन्धन को उच्चतम प्राथमिकता देने के लिये राष्ट्रीय जल प्रदूषण अधिनियम 1987 का अधिनियमन करना।
5. 50 करोड़ रूपये से अधिक के निवेश वाली विकासात्मक गतिविधियों को 30 श्रेणियों के लिये पर्यावरण प्रमाण निर्धारण 1994 अनिवार्य कर दिया गया है।
6. देश के प्रमुख नदियों के वितानों को साफ करने के लिये राष्ट्रीय नदी परिरक्षण योजना वर्ष 1995 में शुरू की गई।
7. देश की प्रमुख झीलों को साफ करने तथा बहाल करने के लिये 1997 से राष्ट्रीय झील परिरक्षण योजना का शुरू किया गया है।
सन्दर्भ -
1. सिंह केदारनाथ 21वी सदी की वानिकी नट प्रकाशन सन् 2002
2. मनोज श्रीवास्तव, पर्यावरण प्रदूषण के खतरे
3. ग्लोबल ग्रीन इलाहाबाद 2010
4. जोसेफ बेनी 2005-2006, इन्वार्यमेन्टल स्टडी
5. नमामगंगें परियोजना का जल संसाधन मंत्रालय
6. Sharma R. Bharat. "Rejuvenating nad Cleaning the Ganga": Past Efforts and Future Plans.
महत्वपूर्ण लिंक -
1. http://hindi.indiawaterprotal.org./
2. http://hindi.indiawaterpotal.org/bharat.mein- jal.keesamasyanibandh
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