फ़ोटो - विकिकॉमंस
केंचुए (Earthworm) क्या होते है ? परिभाषा, प्रकार और महत्वपूर्ण जानकारी
यह एक कृमि है जो लंबा, वर्तुलाकार, ताम्रवर्ण का होता है और बरसात के दिनों में गीली मिट्टी पर रेंगता नजर आता है। केंचुआ ऐनेलिडा (Annelida) संघ (Phylum) का सदस्य है। ऐनेलिडा विखंड खंडयुक्त द्विपार्श्व सममिति वाले (bilatrally symmetrical) प्राणी है।
सीटा और शरीर की संरचना
इनके शरीर के खंडों पर आदर्शभूत रूप से काईटिन के बने छोटे छोटे सुई जैसे अंग होते है। इन्हें सीटा कहते है। सीटा चमड़े के अंदर थैलियों में पाए जाते है और ये ही थैलियां सीटा का निर्माण भी करती है।
ऐनेलिडा संघ की विशेषताएं
ऐनेलिडा संघ में खंडयुक्त कीड़े आते है। इनका शरीर लंबा होता है और कई खंडों में बंटा रहता है। ऊपर से देखने पर उथले खात इन खंडों को एक दूसरे से अलग करते है और अंदर इन्हीं खातों के नीचे मांसपेशी युक्त पर्दे होते है, जिनको पट या भित्तिका कह सकते है।
पट शरीर के अंदर की जगह को खंडों में बांटते है। प्रत्येक आदर्शभूत खंड में बाहर उपांग का एक जोड़ा होता है और अंदर एक जोड़ी तंत्रिका गुच्छिका एक जोड़ी उत्सर्जन अंग, एक जोड़ा जननपिंड तथा रक्त नलिकाओं की जोड़ी और पांचनांग एवं मांसपेशियां होती है।
कैसा होता है आकार ?
केंचुए के शरीर में लगभग 100 से 120 तक खंड होते है। इसके शरीर के बाहरी खंडीकरण के अनुरूप भीतरी खंडीकरण भी होता है। इसके आगे के सिरे में कुछ ऐसे खंड मिलते हैं जो बाहरी रेखाओं द्वारा दो या तीन भागों में बंटे रहते है।
इस प्रकार एक खंड दो या तीन उपखंडों में बंट जाता है। खंडों को उप खंडों में बांटने वाली रेखा केवल बाहर ही पाई जाती है। भीतर के खंड उप खंडों में विभाजित नहीं होते। केंचुए का मुख शरीर के पहले खंड में पाया जाता है। यह देखने में अर्धचन्द्राकार होता है। इसके सामने एक मांसल प्रवर्ध लटकता रहता है, जिसको प्रोस्टोमियम कहते है।
परितुंड, क्लाइटेलम और जनन छिद्र
पहला खंड, जिसमें मुख घिरा रहता है परितुंड (पेरीस्टोमियम Peristomium) कहलाता है। शरीर के अंतिम खंड में मलद्वार या गुदा होती है। इसलिये इसका गुदाखंड कहते है। वयस्क केंचुए में 14वें 15वें और 16वें खंड एक दूसरे से मिल जाते है और एक मोटी पट्टी बनाते है, जिसको क्लाइटेलम कहते है।
इसकी दीवार में ग्रंथियां भी होती है, जो विशेष प्रकार के रस पैदा कर सकती है। इनसे पैदा हुए रस अंडों की रक्षा के लिये कोकून बनाते है। पांचवें और छठे, छठे और सातवें, सातवें और आठवें और नवें के बीच वाली अंतर खंडीय खातों में अगल-बगल छोटे छोटे छेद होते है, जिनको शुक्रधानी रंध्र (Spermathecal pores) कहते है।
इनमें लैंगिक संपर्क के समय शुक्र दूसरे केंचुए से आकर एकत्रित हो जाता है। 14वें खंड के बीच में एक छोटा मादा जनन-छिद्र होता है और 18वें खंड के अगल बगल नर-जनन छिद्रों का एक जोड़ा होता है।
जनन पापिला और पृष्ठीय छिद्र
रेखा में ही, उनके आगे और पीछे उभरे हुए, पापिला (Papillae) होते है। इनको जनन पापिला कहते है। जनन पापिला की उपस्थिति एवं बनावट भिन्न-भिन्न जाति के केंचुओं में भिन्न होती है। पहले 12 खंडों को छोड़कर सब खंडों के बीच वाली आंतरखंडीय रेखाओं के बीच में छोटे छोटे छिद्र होते हैं। चूँकि ये पृष्ठीय पक्ष में होते है, इसलिये इन्हें पृष्ठीय छिद्र कहते है। ये छिद्र शरीर की गुहा को बाहर से संबंधित करते है।
नफ्रीडियोपोर्स और सीटा की संरचना
पहला पृष्ठछिद्र 12वें और 13वें खंड के बीच की खात में पाया जाता है। अंतिम खात को छोड़कर बाकी सब में एक एक छेद होता है। पहले दो खंडों को छोड़कर बाकी शरीर की दीवार पर अनेक अनियमित रूप से बिखरे छिद्र होते है। ये उत्सर्जन अंग के बाहरी छिद्र है। इनको नफ्ऱेीडियोपोर्स (Nephridio-pores) कहते है।
केंचुए का लगभग तीन चौथाई भाग शरीर की दीवार के अंदर गड़ा होता है और थोड़ा सा ही भाग बाहर निकला रहता है। ये पहले और अंतिम खंडों को छोड़कर सब खंडों के बीच में पाए जाते है। प्राय: ये खंडों के बीच में उभरी हुई स्पष्ट रेखा सी बना लेते हैं।
एक खंड में लगभग 200 सीटा होते है। इनको यदि निकाल कर देखा जाय तो इनका रंग हल्का पीला होगा। यदि सीटा के ऊपर और नीचे के सिरों को खींच दिया जाए, जैसा चित्र में दिखाया गया है, तो आकार में सीटा अंग्रेजी अक्षर S से मिलता है।
प्रत्येक सीटा एक थैले में स्थित रहता है। वह थैला बाहरी दीवार के धंस जाने से बनता है और यही थैला सीटा का निर्माण करता है। सीटा अपनी लंबाई के लगभग बीच में कुछ फूल जाता है। इन गांठों को नोड्यूल्स (Nodules) नाम दिया जाता है। सीटा विशेषकर केंचुए को चलने में सहायता करते है।
पाचन तंत्र और तंत्रिका तंत्र
जैसा पहले बता चुके है, इन खंडों के अनुरूप पट या भित्तियां होती है, जो शरीर की गुहा को खंडों में बांटती है। केंचुए के पाचनांग लंबी, पतली दीवार वाली नली के रूप में होते है, जो मुख से गुदा तक फैली रहती है, केंचुए का केंद्रीय तंत्र स्पष्ट होता है और इसकी मुख्य तंत्रिका आंतों के नीचे शरीर के प्रति पृष्ठ भाग से होती हुई जाती है।
प्रत्येक खंड में तंत्रिका फूलकर गुच्छिका बनाती हैं। इससे अनेक तंत्रिकाएँ निकलकर शरीर के विभिन्न अंगों में जाती है। केंचुए का एक छोटा सा मस्तिष्क भी होता है। इसका आकार साधारण होता है और यह आँतों के अगले भाग में स्थित रहता है। इसके अलावा शरीर में कई समांतर रक्त नलिकाएं होती है।
प्रजनन प्रक्रिया
इनमें रक्त का संचार करने के लिये चार बड़ी बड़ी स्पन्दनशील नलिकाएँ रहती हैं। ये सिकुड़ती और फैलती रहती है। इससे रक्त का संचार होता रहता है। जहाँ तक प्रजनन अंगों का संबंध है, एक ही केंचुए में दोनों लिंगों के अंग पाए जाते हैं इसलिए इन्हें द्विलिंगी (hermaphrodite) कहते हैं। किंतु उनमें स्व संसेचन संभव नहीं हैं, परसंसेचन ही होता है। दो केंचुए एक दूसरे से संपर्क में आते है और संसेचन करते है।
आवास और भोजन
केंचुए पृथ्वी के अंदर लगभग 1 या 1 फुट की गहराई तक रहते हैं। यह अधिकतर पृथ्वी पर पाई जाने वाली सड़ी पत्ती बीज, छोटे कीड़ों के डिंभ (लार्वे), अंडे इत्यादि खाते हैं। ये सब पदार्थ मिट्टी में मिले रहते है। इन्हें ग्रहण करने के लिए केंचुए को पूरी मिट्टी निगल जानी पड़ती है। ये पृथ्वी के भीतर बिल बनाकर रहने वाले जंतु है।
बिल बनाने की प्रक्रिया
इनके बिल कभी-कभी छह या सात फुट की गहराई तक चले जाते है। वर्षा ऋतु में, जब बिल पानी से भर जाते है, केंचुए बाहर निकल आते है। इनका बिल बनाने का तरीका रोचक है। ये किसी स्थान में मिट्टी खाना प्रारम्भ करते हैं और सिर को अंदर घुसेड़ते हुए मिट्टी खाते जाते है।
वर्म कास्टिंग क्या है?
मिट्टी के अंदर जो पोषक वस्तुएं होती है उन्हें इनकी आँतें ग्रहण कर लेती है। शेष मिट्टी मलद्वार से बाहर निकलती जाती है। केंचुए के मल, जो अधिकतर मिट्टी का बना होता है, मोटी सेवई की आकृति का होता है। इसको वर्म कास्टिंग (worm casting) कहते है। प्राय: बरसात के पश्चात पेड़ों के नीचे, चरागाहों और खेतों में, वर्म कास्टिंग के ढेर अधिक संख्या में दिखाई पड़ते हैं।
वर्मी कम्पोस्ट क्या है ?
नियन्त्रित परिस्थिति में केंचुओं को व्यर्थ कार्बनिक पदार्थ खिला कर पैदा किये गये वर्मीकास्ट और केंचुओं के मृत अवशेष, अण्डे, कोकून, सूक्ष्मजीव (Micro-organisms) आदि के मिश्रण को केंचुआ खाद (Vermi- compost) कहते है। नियन्त्रित दशा में केंचुओं द्वारा केंचुआ खाद उत्पादन की विधि को वर्मीकम्पोस्टिंग (Vermi-composting) और केंचुआ पालन की विधि को वर्गीकल्चर (Vermiculture) कहते हैं।
वर्मीकम्पोस्ट तैयार होने में लगा समय केंचुओं की नस्ल, परिस्थितियों, प्रबन्धन तथा कचरे के प्रकार पर निर्भर करता है। वर्मीकम्पोस्ट जैसे-जैसे तैयार होती जाये उसे धीरे-धीरे एकत्र करते रहना चाहिए। क्यारियों से केंचुआ खाद एकत्र करने से पहले यह अच्छी तरह सुनिश्चित कर लें कि खाद पूरी तरह तैयार हो गयी है। केंचुए अपनी प्रवृत्ति के अनुसार ऊपर से नीचे की ओर कचरे को खाना आरम्भ करते हैं अतः खाद पहले ऊपरी भाग में तैयार होती है।
जैविक खेती के लिए ऑस्ट्रेलियन केंचुआ वरदान साबित हो रहा है। यही वजह है कि बिलासपुर, मुंगेली, जांजगीर-चांपा, महासमुंद, बस्तर, कांकेर सहित राज्य के कई जिलों में किसान बड़े पैमाने पर वर्मी खाद को खेती में इस्तेमाल और उत्पादन कर रहे हैं।
बढ़ती हुई जनसंख्या एवं अधिक उत्पादन के लिये सीमित भूमि पर अधिक मात्रा में रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग मिट्टी की उर्वरा शक्ति को ह्रास कर रही है एवं मिट्टी, जल तथा वायु तीनों को प्रदूषित कर रहा है। इस बात को ध्यान में रखते हुए कृषि विज्ञान केन्द्र, चतरा ने किसानों के घर में उपलब्ध कम्पोस्ट एवं अन्य घरेलु अवशेष के माध्यम से वर्मी कम्पोस्ट उत्पादन का कार्यक्रम बनाया।
रात्रिचर स्वभाव और विशेषताएं
केंचुए रात में कार्य करने वाले प्राणी है। भोजन और प्रजनन के लिये वे रात में ही बाहर निकलते हैं दिन में छिपे रहते है। साधारणत: शरीर को बिल के बाहर निकालने के पश्चात ये अपना पिछला हिस्सा बिल के अंदर ही रखते है, जिसमें तनिक भी संकट आने पर यह तुरंत बिल के अंदर घुस जाएं। फेरिटाइमा (Pheretima) जाति के केंचुए पृथ्वी के बाहर बहुत कम निकलते है। इनकी सारी क्रियाएं पृथ्वी के अंदर ही होती है।
केंचुए मछलियों का प्रिय भोजन है। मछली पकड़ने वाले कांटे में केंचुए को लगा देते है, जिसको खाने के कारण वे कांटे में फंस जाती है। केंचुए की कुछ जातियां प्रकाश देने वाली होती है। इनके चमड़े की बाहरी झिल्ली प्रकाश को दिन में ग्रहण कर लेती है और रात्रि में चमकती रहती है।
भारत में केंचुओं की जातियाँ
भारत में कई जातियों के केंचुए पाए जाते है। इनमें से केवल दो ऐसे हैं जो आसानी से प्राप्त होते है। एक है फेरिटाइमा और दूसरा है यूटाइफियस। फेरिटाइमा पॉसथ्यूमा (Pheretima Posthuma) सारे भारतवर्ष में मिलता है। उपर्युक्त केंचुआ का वर्णन इसी का है। फेरिटाइमा और यूटाइफियस केवल शरीर रचना में ही भिन्न नहीं होते, वरन् इनकी वर्म कास्टिंग भी भिन्न प्रकार की होती है। फेरिटाइमा की वर्म कास्टिंग मिट्टी की पृथक् गोलियों के छोटे ढेर जैसी होती है और यूटाइफियस की कास्टिंग मिट्टी की उठी हुई रेखाओं के समान होती है।
किसानों के सच्चे मित्र के रूप में केंचुआ
केंचुआ किसानों के सच्चे मित्र और सहायक है। इनका मिट्टी खाने का ढंग लाभदायक है। ये पृथ्वी को एक प्रकार से जोतकर किसानों के लिये उपजाऊ बनाते हैं। वर्म कास्टिंग की ऊपरी मिट्टी सूख जाती है, फिर बारीक होकर पृथ्वी की सतह पर फैल जाती है। इस तरह जहाँ केंचुए रहते हैं वहाँ की मिट्टी पोली हो जाती है, जिससे पानी और हवा पृथ्वी की भीतर सुगमता से प्रवेश कर सकती है। इस प्रकार केंचुए हल के समान कार्य करते है।
डार्विन ने बताया है कि एक एकड़ में 10,000 से ऊपर केंचुए रहते है। ये केंचुए एक वर्ष में 14 से 18 टन, या 400 से 500 मन मिट्टी पृथ्वी के नीचे से लाकर सतह पर एकत्रित कर देते हैं। इससे पृथ्वी की सतह 1/5 इंच ऊंची हो जाती है।
यह मिट्टी केंचुओं के पाचन अंग से होकर आती है, इसलिये इसमें नाइट्रोजन युक्त पदार्थ भी मिल जाते है और यह खाद का कार्य करती हैं। इस प्रकार वे मनुष्य के लिये पृथ्वी को उपजाऊ बनाते रहते हैं। यदि इनको पूर्ण रूप से पृथ्वी से हटा दिया जाए तो हमारे लिये समस्या उत्पन्न हो जाएगी। (सत्यनारायण प्रसाद)
लेटेस्ट अपडेट्स के लिए हमारे व्हाट्सऐप चैनल को फॉलो करें

