बड़े काम की धूल : बर्फ़बारी और ग्लेशियारों के बनने में मददगार हैं रेगिस्तानी धूल के कण
धूल और रेगिस्तान यानी मरुस्थलों के बारे में आमतौर पर लोगों का नज़रिया नकारात्मक होता है। दोनों को ही लोग एक समस्या के रूप में देखते हैं। अकसर लोग धूल को एक प्रदूषण फैलाने वाली चीज़ समझते हैं। इसी तरह रेगिस्तान को धरती का सूखा, बेकार और बंजर रेतीला हिस्सा मानकर अनुपयोगी समझा जाता है। पर, एक हालिया रिसर्च ने रेगिस्तानों के बारे में इस धारणा को झूठा साबित कर दिया है। जर्मनी के ईटीएच ज्यूरिख इंस्टीट्यूट के अंतरराष्ट्रीय शोध दल की रिसर्च रिपोर्ट बताती है कि खुद पानी के लिए तरसने वाले धूल भरे रेगिस्तानों की धरती पर बारिश और बर्फ़बारी कराने में अहम भूमिका होती है। साथ ही यह हज़ारों किलोमीटर दूर तक के इलाकों में ग्लेशियर्स के जमने में भी मददगार होते हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक रेगिस्तानों से हवा में उड़ने वाले धूल के कण पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध में धरती के ऊपर घिरने वाले बादलों में बर्फ़ (स्नो) के क्रिस्टल बनाने में बादलों की मदद करते हैं। इस बर्फ़बारी से ही पृथ्वी की उत्तरी गोलार्ध में स्थित पर्वतीय इलाकों और उत्तरी ध्रुव के समीपवर्ती इलाकों में ग्लेशियर्स (हिमनदों) का निर्माण होता है या उनका आकार बढ़ता है। इस तरह रेगिस्तानी धूल का पूरी पृथ्वी की जलवायु और मौसम प्रणाली पर असर पड़ता है। धूल कणों का यह असर रेगिस्तानी इलाकों के इर्द-गिर्द के पहाड़ी इलाकों में सबसे ज्यादा प्रभावी ढंग से देखने को मिलता है। रिसर्चर्स की यह खोज बादलों के व्यवहार को समझने, वर्षा और हिमपात की भविष्यवाणी करने सहित जलवायु परिवर्तन में बादलों और रेगिस्तानों की भूमिका और महत्व को उजागर करती है।
साइंस और टेक्नॉलजी से जुड़े पोर्टल टेक्नॉलजी नेटवर्क्स की एक हालिया रिपोर्ट में बताया गया है कि ईटीएच ज्यूरिख के तत्वावधान में एक अंतरराष्ट्रीय शोध दल ने उपग्रहों से बीते 35 वर्षों के दौरान मिले डेटा के विश्लेषण में पाया कि खनिज हवा के साथ उड़कर ऊपरी वायुमंडल में पहुंच जाने वाले धूल के सूक्ष्म कण बादलों में मौजूद नमी की बूंदों को अपने ऊपर जमकर बर्फ़ बनाने का स्थान देते हैं। यह प्रक्रिया उत्तरी क्षेत्रों में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जहां बादल अकसर हिमांक (जल के जमकर बर्फ़़ बनने का तापमान) से थोड़े कम तापमान पर बनते हैं। शोधकर्ताओं ने इस इलाके में इस बात का एक सुव्यवस्थित पैटर्न देखा कि बादलों में मौज़ूद पानी की बूंदें कैसे धूल कणों पर जमकर बर्फ़ के क्रिस्टल में बदल जाती हैं। मौसम विज्ञान की भाषा में वायुमंडल में रेगिस्तानी धूल से उत्पन्न इस बर्फ़़ को बादल हिमनद यानी क्लाउड ग्लेशियर के रूप में जाना जाता है। ईटीएच ज्यूरिख में वायुमंडलीय भौतिकी के पोस्ट-डॉक्टरल शोधकर्ता और अध्ययन के प्रमुख लेखक डिएगो विलानुएवा बताते हैं, "बादल के हिमनदीकरण (ग्लेशियलाइज़ेशन) की प्रक्रिया नैनोमीटर के सूक्ष्म स्तर से लेकर किलोमीटर तक के व्यापक पैमाने तक एक ही पैटर्न का अनुसरण करती है। इसलिए जहां अधिक धूल होती है, वहां बादलों के जमने की संभावना अधिक होती है। इस तरह इस सूक्ष्म क्रियाविधि के जलवायु पर पड़ने वाले प्रभाव काफी व्यापक हो सकते हैं। इस प्रकार इस रिसर्च ने मौसम विज्ञानियों के लिए लंबे समय से चली आ रही इस पहेली को हल कर दिया है कि बादलों में बूंदें किस प्रकार जमती हैं।'’
धूल कणों की सतह पर कैसे जमती है बर्फ़
ईटीएच ज्यूरिख इंस्टीट्यूट की इस रिसर्च से पहले 2016 में यूसीएल और जर्मनी के कार्ल्सरूहे इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (केआईटी) की एक टीम भी बादलों में बर्फ़ जमने की प्रक्रिया को लेकर अध्ययन कर चुकी है। इस अध्ययन में बताया गया था कि वायुमंडल में मौज़ूद खनिज धूल कणों (फेल्डस्पार) की सतह पर बर्फ कैसे जमती है। इस अध्ययन में पाया गया कि फेल्डस्पार वायुमंडलीय बर्फ के सबसे सक्रिय नाभिकीकरण कारकों में से एक है, क्योंकि फेल्डस्पार की सतह पर, किनारों, दरारों और छोटे गड्ढों जैसे उजागर सतही दोषों पर बर्फ बनना शुरू हो जाती है। अध्ययन के सह-लेखक और यूसीएल भौतिकी और खगोल विज्ञान और लंदन सेंटर फॉर नैनोटेक्नोलॉजी प्रोफेसर एंजेलोस माइकेलिडेस ने कहा, '’फेल्डस्पार पर बर्फ के नाभिकीकरण (न्यूक्लिएशन) के सक्रिय स्थलों की पहचान करके, हमने इस पहेली का एक महत्वपूर्ण हिस्सा खोज निकाला है कि आणविक स्तर पर बादलों में बर्फ कैसे बनती है। टीम ने इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप और कंप्यूटर सिम्युलेशन की तकनीक का उपयोग करके यह पाया कि बर्फ फेल्डस्पार कणों के चिकने, क्रिस्टलीय सतहों पर नहीं, बल्कि कण की सतह पर अनियमित रूप से उत्पन्न होने वाले सूक्ष्म सतही दोषों (माइक्रोस्कोपिक सर्फेस डिफेक्ट्स) पर बनती है। सतही दोषों पर मौजूद हाइड्रॉक्सिल समूह बर्फ और फेल्डस्पार के बीच परस्पर क्रिया में मध्यस्थता करते हैं। हालांकि, यह बर्फ बनाने में इतना सहायक क्यों है, यह अभी स्पष्ट नहीं हो सका है।''
इस रिसर्च के मुताबिक पृथ्वी पर भूमि पर होने वाली 90% से ज़्यादा वर्षा और हिमपात वायु में मौजूद कणों पर बर्फ़ के क्रिस्टल बनने पर निर्भर करती है। इससे यह स्पष्ट हो गया था कि ये खनिज धूल कण पृथ्वी की जलवायु के लिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि बादलों में पानी केवल तभी जम सकता है जब बर्फ़ के क्रिस्टल बनने के लिए आधार के रूप में ऐसे कण मौजूद हों जिससे बर्फ़ या ओले बन सकें। लेकिन, यह बात अज्ञात थी कि सभी वायुमंडलीय कणों का केवल एक छोटा सा अंश ही बर्फ़ के विकास को क्यों शुरू कर पाता है। ईटीएच ज्यूरिख इंस्टीट्यूट की इस रिसर्च ने अब इससे जुड़े नाभिकीय पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए स्पष्ट किया है कि ऐसा धूल कणों के नाभिक की भूमिका निभाने के कारण होता है। क्योंकि यह कण नमी को आकर्षित करके उसे अपनी सतह पर जमने का स्थान देते हैं।
नाभिक की भूमिका निभाते हैं धूल के अतिसूक्ष्म कण
शोधकर्ताओं ने ऐसे बादलों पर ध्यान केंद्रित किया जिनमें अतिशीतित जल यानी सुपर कूल्ड वाटर और बर्फ़ दोनों ही मौजूद होते हैं, ये -39°C से लेकर 0°C के तापमान के बीच बनती हैं। ऐसे बादल आमतौर पर पृथ्वी के मध्य और उच्च अक्षांश क्षेत्रों में, विशेष रूप से उत्तरी अटलांटिक, साइबेरिया और कनाडा में देखने को मिलते हैं। शोधकर्ताओं ने पाया कि ऐसे बादल पर्यावरणीय परिवर्तनों के प्रति अत्यंत संवेदनशील होते हैं। इनमें एरोसोल जितने सूक्ष्म धूलकण बर्फ़ के क्रिस्टलों को तैयार करने के लिए नाभिकों की भूमिका निभाते हैं। बर्फ़ के बादलों के बनने की आवृत्ति यानी बर्फ़़ के बादल कितनी बार बनते हैं, वैज्ञानिकोें ने इसका सीधा संबंध भी हवा में मौज़ूद धूल की मात्रा से पाया। शोधकर्ताओं ने इसमें एक निश्चित पैटर्न देखा कि वायुमंडल जितने ज़्यादा धूल के कण होंगे, बर्फ़ के बादल उतनी ही ज़्यादा बार बनेंगे। रिसर्च पेपर के वरिष्ठ सह-लेखक और ईटीएच ज्यूरिख में वायुमंडलीय भौतिकी के प्रोफेसर उलरिके लोहमान कहते हैं, "इस अध्ययन में धूल कणों और बर्फ़ के बादलों के परीक्षण के आंकड़े उपग्रह से प्राप्त आंकड़ों से मेल खाते हैं।"
जलवायु मॉडलों को सुधारने के लिए मिला एक नया मानक
रिसर्च टीम के सदस्य विलानुएवा धूल कणों की मौज़ूदगी के एक और पहलू की चर्चा करते हुए कहते हैं, "बादलों में बर्फ़ के क्रिस्टल या क्लाउड ग्लेशियर बनना इस बात पर भी निर्भर करता है कि धूल कणों से परावर्तित होकर कितनी धूप अंतरिक्ष में वापस चली जाती है। यह बात जलवायु मॉडलों के लिए भी काफ़ी महत्वपूर्ण है। अबतक बारे में कोई ठोस और प्रामाणिक जानकारी नहीं थी, जैसी कि इस रिसर्च में सामने आई है। नए निष्कर्षों ने हवा में धूल कणों और बादलों में बर्फ़ की प्रचुरता के बीच एक मापनीय संबंध (मेज़रेबल रिलेशनशिप) को स्पष्ट किया है। इससे जलवायु अनुमानों में सुधार लाने का एक विश्वसनीय और मज़बूत मानक मिला है।"
धूल कण पृथ्वी तक पहुंचने वाले सूर्य के प्रकाश की मात्रा को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करतें हैं, जिसका जलवायु पर व्यापक प्रभाव पड़ता है। इसलिए हवा में धूल कणों की उपस्थिति को जलवायु मॉडल में एक अहम पहलू के तौर पर शामिल किया जाना चाहिए।
रिसर्च टीम
सहारा और दक्षिणी गोलार्ध में दिखता है अलग पैटर्न
रिसर्च ये अब यह बात पूरी तरह से स्पष्ट हो चुकी है कि उत्तरी गोलार्ध में -15° और -30°C के बीच बर्फ़ के बादलों के निर्माण में वायुमंडल में उपस्थित धूल के कणों का अनुपात महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। बादलों में नैनोमीटर आकार के धूल कणों की सतह पानी की बूंदों को जमने का कारण बनती है और यह प्रभाव कई किलोमीटर तक बर्फ़ के क्रिस्टल बनने के लिए उपयुक्त माहौल प्रदान करता है। इसके बावज़ूद धूल और बर्फ़ का यह संबंध पूरी दुनिया में एक समान रूप में देखने को नहीं मिलता। दुनिया के बससे बड़े रेगिस्तािन सहारा के आसपास के इलाकों में बर्फ़़ के बादलों का निर्माण कम होता है, क्योंकि यहां गर्म हवा के झोंकों की तेज़ गति बर्फ़़ जमने की प्रक्रिया को बाधित करती है। इसी तरह दक्षिणी गोलार्ध में बर्फ़ के बादलों के बनने में धूल कणों के बजाय समुद्री एरोसोल ज़्यादा अहम भूमिका निभाते हैं। इसकी वज़ह पृथ्वी के इस हिस्से में बड़े रेगिस्तानों का न होना लगता है। इन अलग पैटर्न्स को देखते हुए शोधकर्ताओं का कहना है कि बादलों के हिमनदीकरण पर वायु धाराओं की अपड्राफ्ट की ताकत और आर्द्रता जैसी अन्य चीज़ों के असर को स्पष्ट करने के लिए इन इलाकों में अलग से अध्ययन किए जाने की ज़रूरत है।