प्रशांत महासागर में उत्पन्न होने वाला अलनीनो प्रभाव दुनिया के एक बड़े क्षेत्र के मौसम और बारिश को प्रभावित करता है।
स्रोत : विकी कॉमंस
क्या है सुपर अलनीनो ? जिसके चलते मौसम विभाग ने जताई कमज़ोर मानसून की आशंका
भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने इस वर्ष अलनीनो के कारण मानसून की बारिश दीर्घकालिक औसत (LPA) के 92% के आसपास रहने का अनुमान जताया है, जो सामान्य से कम है। इसका प्रमुख कारण जून के बाद ‘सुपर अलनीनो’ की परिस्थितियां पैदा होने की आशंका है। दुनियाभर के मौसम विज्ञानियों के मुताबिक अलनीनो की आशंका 62% की और सुपर अलनीनो की आशंका 25% है। इससे खरीफ फसलों, खासकर दलहन और तिलहन उत्पादन पर असर पड़ने की आशंका है।
IMD के पूर्वानुमान के अनुसार इस साल देश में दक्षिण-पश्चिम मानसून की वर्षा सामान्य से कम रहने की संभावना है। जून से सितंबर के दौरान होने वाली बारिश दीर्घकालिक औसत (LPA) के लगभग 92% रहने का अनुमान है, जो ‘सामान्य से कम’ की श्रेणी में आता है। IMD के मुताबिक मानसून की बारिश इस बार 87 सेमी की औसत वर्षा से करीब 8% कम रहने की संभावना है। इसमें पांच फीसदी ज्यादा या कम रहने (±5% त्रुटि) हो सकती है। इसके अलावा एक सप्ताह पहले निजी मौसम पूर्वानुमान एजेंसी स्काईमेट ने भी दक्षिण-पश्चिम मानसून के सामान्य से कम रहने का अनुमान जताया था। एजेंसी के अनुसार, मानसून दीर्घकालिक औसत (868।6 मिमी) के 94% रहने की संभावना है। जून में वर्षा 101% के साथ सामान्य के करीब रह सकती है, लेकिन जुलाई में 95%, अगस्त में 92% और सितंबर में 89% तक कमजोर पड़ने का अनुमान है। पूर्वानुमान के अनुसार इस बार मानसून में वर्षा सामान्य से कम वर्षा की संभावना 31% है, जबकि सामान्य से काफी कम वर्षा की 35% संभावना है। इसका सबसे ज़्यादा प्रभाव मध्य और पश्चिम भारत में देखने को मिल सकता है, जिसे मानसून कोर ज़ोन माना जाता है। क्योंकि देश के इस हिस्से में कृषि की सिंचाई मुख्य रूप से वर्षा पर ही निर्भर हैं।
मौसम विज्ञानियों के अनुसार जून के बाद अलनीनो परिस्थितियां विकसित होने की आशंका है। मौसम विभाग ने चेतावनी दी है कि अलनीनो का प्रभाव विशेष रूप से मानसून के दूसरे हिस्से यानी अगस्त और सितंबर में पड़ सकता है। हालांकि, राहत देने वाली बात यह है कि मौसम विज्ञान विभाग ने कहा है कि मानसून के उत्तरार्ध में विकसित होने वाली इंडियन ओशन डाइपोल (IOD) की सकारात्मक स्थिति अलनीनो के प्रतिकूल प्रभाव को आंशिक रूप से कम कर सकती है, क्योंकि सकारात्मक IOD से भारत में बेहतर वर्षा होती है। हालांकि, इसके व्यवहार का सटीक अनुमान लगाना कठिन होता है। दोनों एजेंसियों के पूर्वानुमानों के मुख्य बिंदुओं को संक्षेप में इस प्रकार समझा जा सकता है-
IMD के पूर्वानुमान की 5 मुख्य बातें
2026 में दक्षिण-पश्चिम मानसून LPA (दीर्घकालिक औसत) का लगभग 92% रहने का अनुमान है।
यह स्तर “below normal” (सामान्य से कम) श्रेणी में आता है।
देशभर में औसत वर्षा करीब 87 सेमी रहने की संभावना जताई गई है।
पूर्वानुमान में ±5% की त्रुटि सीमा (error margin) शामिल है।
अल नीनो जैसी समुद्री-जलवायु परिस्थितियों को कमजोर मानसून का प्रमुख कारण माना गया है।
Skymet Weather के पूर्वानुमान की 5 मुख्य बातें
2026 में मानसून के सामान्य से कम (below normal) रहने की आशंका।
अल नीनो प्रभाव को बारिश में कमी का प्रमुख कारण बताया गया।
जून–सितंबर के दौरान बारिश में असमान वितरण (spatial variability) की संभावना।
कृषि, खासकर खरीफ फसलों पर असर पड़ने का संकेत।
निजी मॉडल्स के आधार पर मॉनसून की शुरुआत और प्रगति में अनिश्चितता जताई गई।
दुनिया भर के मौसम पर नज़र रखने वाली एजेंसियों ने इस साल सुपर अलनीनो की आशंका जताई है, जिसके चलते मानसून में वर्षा की कमी से भारत के कई इलाकों में सूखे की स्थिति भी देखने को मिल सकती है।
स्रोत: विकी कॉमंस
अर्थव्यवस्था के लिए बढ़ेंगी चुनौतियां
मानसून को लेकर IMD यह पूर्वानुमान मौसम ही नहीं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था के लिए भी एक चेतावनी भरा संकेत है, क्योंकि भारत में खेती काफी हद तक मानसूनी वर्षा पर निर्भर है, खासकर खरीफ फसलों की पैदावार। इसके अलावा भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी करीब 25% यानी एक चौथाई जितनी बड़ी होने के कारण देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) पर इसका असर काफी व्यापक होता है। इसीलिए औसत से कम मानसून के इस पूर्वानुमान ने अर्थशास्त्रियों और नीति-निर्माताओं की चिंता बढ़ा दी है। पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव (ईरान युद्ध ) के कारण यह चिंता और भी बढ़ गई है, क्योंकि युद्ध ने वैश्विक आपूर्ति शृंखला (सप्लाई चेन) को बाधित किया है। इसके कारण उर्वरक और ऊर्जा की लागत बढ़ने से कृषि के खर्च (इनपुट कॉस्ट) को पहले ही बढ़ा दिया है। बारिश कम होने से खेती की लागत और भी बढ़ सकती है, जिससे दलहन और तिलहन की फसलों के दाम बढ़ सकते हैं, जिससे देश में खाद्य महंगाई में इज़ाफा हो सकता है। हालांकि पर्याप्त बफर स्टॉक के कारण सरकार को धान उत्पादन को लेकर ज्यादा चिंता नहीं होगी, लेकिन अन्य फसलों के उत्पादन में गिरावट से इनकी कीमतों में होने वाली बढ़ोतरी खाद्य महंगाई पर दबाव बढ़ा सकती है। अलनीनो या सुपर अलनीनो की आशंका से अर्थशास्त्री इसलिए भी चिंतित हैं, क्योंकि इससे पहले भी अलनीनो के कारण अनियमित वर्षा पैटर्न से 2023-24 फसल वर्ष में खाद्यान्न उत्पादन 6।1% तक घट गया था। आंकड़ों के मुताबिक 1980 के बाद के लगभग 70% अलनीनो वर्षों में देश में कम वर्षा दर्ज की गई है। अगर ऐसा हुआ तो आने वाले महीनों में न सिर्फ गर्मी नया रिकॉर्ड बनाएगी, बल्कि देश के कुछ इलाकों को सूखे का सामना भी करना पड़ सकता है।
‘सुपर अलनीनो’ बिगाड़ रहा बारिश का खेल
अलनीनो प्रशांत महासागर की सतह के तापमान में वृद्धि से जुड़ी जलवायु घटना है, जो ऐतिहासिक रूप से भारत में कमजोर मानसून से जुड़ी रही है। अलनीनो की स्थिति ज़्यादा गंभीर होने पर यह ‘सुपर अलनीनो’ कहलाती है, जिसमें मानसूनी वर्षा और भी कम हो जाती है। नेटवेदर की रिपोर्ट के मुताबिक प्रशांत महासागर में होने वाली घटनाओं पर नजर रखने वाले वैज्ञानिकों का कहना है कि इस बार सुपर अलनीनो की संभावना अधिक है। अमेरिका की स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ न्यूयॉर्क में पर्यावरण विज्ञान के प्रोफेसर डॉ। पॉल राउंडी ने एक लेख में बताया है कि पिछले 140 वर्षों में सबसे शक्तिशाली अलनीनो की आशंका है। विश्व मौसम संगठन (World Meteorological Organization) की सेक्रेटरी जनरल सेलेस्ते साउलो ने कहा है कि 2023-24 का अलनीनो अब तक दर्ज पांच सबसे शक्तिशाली अलनीनो घटनाओं में से एक था। इसने 2024 में रिकॉर्ड वैश्विक तापमान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अमेरिका के जलवायु पूर्वानुमान केंद्र की तरफ से 6 अप्रैल को जारी अनुमान के अनुसार इस गर्मी में अलनीनो विकसित होने की 62 प्रतिशत संभावना है और इसके वर्ष के अंत तक बने रहने के आसार हैं।
अलनीनो प्रभाव के कारण IMD ने इस बार मानसून में सामान्य से 8% कम बारिश होने का पूर्वानुमान जारी किया है।
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क्या होते हैं अलनीनो और सुपर अलनीनो
अलनीनो (El Niño) एक जलवायु घटना है, जो प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से में समुद्र सतह के तापमान के असामान्य रूप से बढ़ने पर उत्पन्न होती है। सामान्य परिस्थितियों में व्यापारिक पवन (Trade Winds) गर्म पानी को पश्चिम की ओर धकेलती हैं, लेकिन अल नीनो के दौरान ये हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं या दिशा बदल लेती हैं। इससे गर्म पानी पूर्वी प्रशांत में फैल जाता है और वैश्विक मौसम पैटर्न प्रभावित होता है। भारत में इसका सबसे बड़ा असर मानसून पर पड़ता है। अकसर अल नीनो वर्ष में बारिश कम होती है, जिससे सूखे जैसी स्थिति बन सकती है।
जब यही स्थिति बेहद तीव्र हो जाती है और समुद्र का तापमान सामान्य से बहुत अधिक बढ़ जाता है, तो उसे सुपर अलनीनो (Super El Niño) कहा जाता है। सुपर अल नीनो दुर्लभ, लेकिन अत्यधिक प्रभावशाली होता है, जो वैश्विक स्तर पर चरम मौसम घटनाओं (Extreme Weather Events) को जन्म देता है, जैसे कहीं भीषण सूखा, तो कहीं भारी बाढ़। 1997-98 और 2015-16 के सुपर अल नीनो इसके प्रमुख उदाहरण हैं, जिनका असर भारत समेत पूरी दुनिया के कृषि, जल संसाधनों और अर्थव्यवस्था पर पड़ा। कुल मिलाकर, अल नीनो एक प्राकृतिक लेकिन शक्तिशाली समुद्री-जलवायु प्रक्रिया है, जिसका प्रभाव स्थानीय से लेकर वैश्विक स्तर तक महसूस किया जाता है।
अलनीनो के 'सुपर अलनीनो' में बदलने की प्रक्रिया
अल नीनो के सुपर अल नीनो में बदलने की प्रक्रिया दरअसल समुद्र और वायुमंडल के बीच लगातार मजबूत होते फीडबैक का नतीजा होती है। सामान्य El Niño की शुरुआत तब होती है जब प्रशांत महासागर में व्यापारिक हवाएं कमजोर पड़ती हैं। इससे पश्चिमी हिस्से का गर्म पानी धीरे-धीरे पूर्व की ओर फैलने लगता है और समुद्र सतह का तापमान बढ़ जाता है।
अगर यह स्थिति कुछ महीनों तक बनी रहती है, तो “ब्जेर्कनेस फीडबैक” (Bjerknes feedback) सक्रिय हो जाता है यानी गर्म पानी हवाओं को और कमजोर करता है, और कमजोर हवाएं गर्म पानी को और फैलने देती हैं। यह एक तरह का चक्र बन जाता है। जैसे-जैसे अधिक गर्म पानी सतह पर आता है और गहराई से ठंडा पानी ऊपर उठने (upwelling) की प्रक्रिया रुकती है, तापमान में तेजी से वृद्धि होती है। जब यह असामान्य गर्मी एक निश्चित सीमा (आमतौर पर +2°C या उससे अधिक) पार कर जाती है और बड़े क्षेत्र में फैल जाती है, तो यह Super El Niño का रूप ले लेती है। इस स्तर पर यह केवल एक महासागरीय घटना नहीं रहती, बल्कि वैश्विक मौसम प्रणाली को व्यापक रूप से प्रभावित करने लगती है, जिससे चरम जलवायु घटनाएं बढ़ जाती हैं।
सुपर अलनीनो से 2°C तक बढ़ जाता है समुद्र का तापमान
सुपर अलनीनो की घटना बहुत कम होती है। ऐसा तब होता है जब समुद्र की सतह का तापमान कम से कम 2 डिग्री सेल्सियस (2°C) तक बढ़ जाता है। वर्ष 1950 के बाद ऐसा बहुत कम बार हुआ है और केवल एक बार तापमान 2.5 डिग्री सेल्सियस से भी अधिक बढ़ा है। तापमान जितना अधिक बढ़ता है, अलनीनो के प्रभाव उतने ही तीव्र और व्यापक होने की संभावना रहती है। अमेरिका के नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (NOAA) के वैज्ञानिकों ने अनुमान जताया है कि इस साल शरद ऋतु या सर्दियों तक ऐसे “सुपर” अलनीनो की स्थिति बनने की संभावना 25 प्रतिशत है। हालांकि उन्होंने यह चेतावनी भी दी है कि वसंत ऋतु के दौरान किए गए पूर्वानुमान अक्सर स्पष्ट नहीं होते हैं। उनका कहना है कि वसंत के दौरान जलवायु परिस्थितियों में होने वाले बदलावों के कारण सटीक पूर्वानुमान लगाना मुश्किल होता है। इसके बावजूद कई महत्वपूर्ण संकेत दर्शाते हैं कि एक मजबूत या सुपर अलनीनो विकसित हो सकता है।
2015 में भी आया था सुपर अलनीनो
इससे पहले 2015 में सुपर अलनीनो आया था जिसने वैश्विक स्तर पर गंभीर असर डाला था। इस घटना के कारण इथियोपिया में भीषण सूखा पड़ा, जबकि प्यूर्टो रिको में पानी का संकट उत्पन्न हो गया। इसके अलावा, मध्य उत्तरी प्रशांत क्षेत्र में अत्यधिक सक्रिय मौसमी तूफानों ने कई रिकॉर्ड तोड़ दिए। विशेषज्ञों के अनुसार अलनीनो आमतौर पर ऑस्ट्रेलिया, दक्षिणी और मध्य अफ्रीका, भारत तथा दक्षिण अमेरिका के कुछ हिस्सों में सूखा और अत्यधिक गर्मी की स्थिति पैदा करता है। वहीं दूसरी ओर, भारी वर्षा की संभावना अमेरिका के दक्षिणी हिस्सों, मध्य पूर्व के कुछ क्षेत्रों और दक्षिण-मध्य एशिया में देखी जाती है, जिससे इन इलाकों में बाढ़ जैसी स्थितियां भी उत्पन्न हो सकती हैं।
सामान्य परिस्थितियों में जुलाई के पहले हफ्ते में केरल के तटीय इलाके में मानसून के पहुंचने पर बारिश का नज़ारा कुछ इस तरह का होता है।
स्रोत : विकी कॉमंस
अलनीनो और इसके प्रभाव
अलनीनो प्रभाव मध्य और पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर की सतह के गर्म होने से होता है। वैज्ञानिक आम तौर पर तीन अवस्थाओं का अध्ययन करते हैं। अलनीनो के विपरीत ला नीना तब होता है जब समुद्र की सतह का तापमान औसत से कम होता है। जब न तो अलनीनो और न ही ला नीना हो और सतह का तापमान लगभग सामान्य स्तर पर हो तो तटस्थ स्थिति मानी जाती है।
उत्तरी गोलार्ध में वसंत ऋतु के दौरान विकसित होने वाली और हर तीन से सात वर्षों में बदलने वाली इन तीन अवस्थाओं को मिलाकर “अलनीनो-दक्षिणी दोलन” (ENSO) कहा जाता है। अलनीनो और ला नीना के दौरान समुद्र की सतह के तापमान में एक डिग्री से तीन डिग्री सेल्सियस तक की वृद्धि या गिरावट हो सकती है। इसका वर्षा, सूखा, गर्मी और विभिन्न क्षेत्रों में जलवायु आपदाओं पर गहरा प्रभाव पड़ता है। अलनीनो के वर्षों में वे हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं या दिशा बदल लेती हैं, जो सामान्यतः गर्म पानी को पश्चिम की ओर धकेलती हैं। इसके परिणामस्वरूप प्रशांत महासागर के उस हिस्से की सतह पर जलधाराएं गर्म होने लगती हैं। सामान्य से कम से कम 0.5 डिग्री सेल्सियस अधिक तापमान होने पर दुनिया के मौसम पर व्यापक असर होता है। यह अक्सर वैश्विक तापमान को बढ़ा देता है।
मौसम को प्रभावित करने वाले कई कारक होते हैं, लेकिन अलनीनो व्यापक बदलाव ला सकता है। यह जेट स्ट्रीम के प्रवाह को बदल देता है और वर्षा के पैटर्न को उलट देता है, जिससे दुनिया के कुछ हिस्सों में तेज तूफान आते हैं, जबकि अन्य क्षेत्रों में सूखा जैसी स्थिति बन जाती है। इसके अलावा, यह पहले से बढ़ते तापमान को और अधिक बढ़ाने की क्षमता भी रखता है, भले ही यह प्रभाव कुछ समय के लिए ही क्यों न हो।
अलनीनो से 1.5°C तक गर्म हो जाती है धरती
मौसम विज्ञानियों का पूर्वानुमान है कि दुनिया की जलवायु को प्रभावित करने वाला अल नीनो प्रभाव एक बार फिर से इस साल के अंत में देखने को मिल सकता है। चिंता की बात यह है कि पहली बार यह प्रभाव धरती के तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ा सकता है। मौसम विज्ञानियों के मुताबिक शक्तिशाली एल नीनो के कारण अब तक का सबसे गर्म वर्ष का रहा 2016 जिसने वैश्विक तापमान को बढ़ाया। इस प्रभाव के बाद 2024 में इसने धरती के तापमान में करीब 1.5 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी की। मौजूदा संभावनाओं को देखते हुए मौसम विज्ञानियों का कहना है कि इस वर्ष अल नीनो का इंपैक्ट 60% और 70% के बीच रह सकता है। अगर हमें एक बड़ा अल नीनो देखने को मिलता है, तो यह धरती के तापमान को यह 1.5 डिग्री से बढ़ा सकता है। गौरतलब है कि 1.5°C की दहलीज ऐतिहासिक 2015 पेरिस समझौते में निर्धारित वैश्विक तापमान वृद्धि की सीमा है, जिसे सागरों का जलस्तर बढ़ाने वाला टिपिंग पॉइंट माना जाता है। टिपिंग पॉइंट्स थ्रेशहोल्ड के पार जाने पर जलवायु परिवर्तन पृथ्वी पूरे वातावरण और जलवायु में नाटकीय बदलाव ला सकते हैं।
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