खेती कैसे बने लाभ का व्यवसाय

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एक ओर जहां खेती योग्य भूमि कम होती जा रही है वहीं खेती को लाभ का व्यवसाय बनाने के प्रयास तेजी से किए जा रहे हैं। यह इसलिए भी जरूरी है कि बढ़ती जनसंख्या को देखते हुए आने वाले वर्षों में खाद्य समस्या से निपटना भी देश के सामने एक चुनौती है। खेती को लाभ का व्यवसाय बनाने के लिए यह जरूरी है कि कृषि के साथ-साथ उससे जुड़े अन्य घटकों जैसे पशुपालन, उद्यानिकी, मछलीपालन, डेयरी आदि गतिविधियों को आपस में जोड़ा जाए। इसके बगैर खेती को लाभ के व्यवसाय में परिवर्तित करना संभव नहीं।

फसल काटने के बाद बचे हुए फसल अवशेष जलाना खेती के लिए आत्मघाती कदम सिद्ध हो सकता है। इससे भूमि की उर्वरता पर भी विपरीत असर पड़ता है। इसके साथ ही धुएं से उत्पन्न कार्बन डाई-ऑक्साइड से वातावरण का तापक्रम बढ़ता है और प्रदूषण में भी वृद्धि होती है।खेती से जुड़ी इन सभी गतिविधियों का आपस में समन्वय स्थापित कराते हुए किसानों की आर्थिक उन्नति में सहायता की जा सकती है। किसान और कृषि के लिए संचालित विभागीय योजनाओं के समन्वय के साथ ही ग्रामीण विकास विभाग के सहयोग से कृषकों को उन्नतिशील किसान बनाने में मदद मिल सकती है, लेकिन सवाल वही कि क्या ऐसा करना संभव है? इसके लिए हमें योजनाबद्ध तरीके से कार्य करना होगा। हमें यह कोशिश करनी होगी कि किसान पुराने ढर्रे पर चल रही खेती के तरीके को बदले और नई जानकारी के अनुसार लाभ की खेती करें। इसके लिए प्रत्येक जिले में सौ-सौ किसानों का चयन कर उन्हें प्रशिक्षित करना होगा ताकि उनके यहां इन सभी गतिविधियों का संचालन कराया जा सके। इससे होगा यह कि इन कृषकों से प्रेरणा लेकर अन्य किसान भी उन्नति कर अपनी आर्थिक स्थिति को और भी ज्यादा मजबूत करने आगे आएंगे।

कर्ज सदुपयोग प्रशिक्षण

खेती में पढ़े-लिखे युवाओं की दिलचस्पी को बढ़ाना भी आवश्यक है ताकि वे व्यावसायिक उद्यानिकी फसलों के उत्पादन के साथ ही मसाला व औषधीय पौधों के उत्पादन में रुचि लें। देखा यह गया है कि पढ़े-लिखे लोग खेती में दिलचस्पी नहीं लेते, वे गांवों से पलायन कर रहे हैं। खेती को बचाना है और उत्पादन बढ़ाने के साथ खाद्य संकट से निपटना है तो पढ़े-लिखे लोगों को खेती से जोड़ने के लिए अभियान चलाना जरूरी है। यह भी जरूरी है कि किसानों में आत्महत्या की प्रवृत्ति को रोका जाए। इसके लिए कर्ज लेने वाले किसानों को कर्ज के उपयोग के बारे में प्रशिक्षित किया जाए। प्रशिक्षण में उन्हें खेती के आधुनिक तरीकों से भी अवगत कराया जाए ताकि मौसम की विपरीत परिस्थितियों में भी वे नुकसान में न रहें।

मिट्टी परीक्षण के माध्यम से पता करके किसान ऐसी खेती करें जिसमें उन्हें घाटा ना सहना पड़े। जहां फूलों की खेती की अपार संभावनाएं हो वहां फूल उगाए और जहां दलहन-तिलहन की खेती की संभावनाएं हो वहां दालें या तिल्ली की खेती करें। इस दिशा में किसानों को प्रोत्साहित किए जाने की जरूरत है। इसके लिए क्लस्टर योजना बनाकर उद्यानिकी की गतिविधियां संचालित करना भी अच्छा विकल्प हो सकता है ताकि बाजार की भी उपलब्धता सुगम हो सके। हाट बाजारों के अतिरिक्त अन्य मेलों के माध्यम से कृषकों को आदान सामग्री प्रदान की जा सकती है, जिससे वहां किसान अपनी पसंद का आदान क्रय कर सकें और इस हेतु राशि उनके खाते में प्रदान कर दी जाए। मत्स्योत्पादन बढ़ाने के लिए तालाब में भी मत्स्यपालन करने तथा ज्यादा से ज्यादा कृषकों को मछुआ क्रेडिट कार्ड प्रदान किए जाने चाहिए। चयनित स्थलों में क्लस्टर में मछुआ आवास निर्माण कराए जा सकते हैं।

प्रत्येक ग्राम का माइक्रोप्लान

गौवंश उत्पादकता की वृद्धि के साथ सघन नस्ल सुधार कार्यक्रम व दुधारू पशु उत्प्रेरण कार्यक्रम भी चलाया जाना चाहिए। जिला स्तर पर पशु मेलों का आयोजन कर उन्नत नस्ल के पशुओं की बिक्री हेतु उपलब्धता सुनिश्चित कराई जाए ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों को डेयरी व्यवसाय से जोड़ा जा सके। तयशुदा मिल्क रूट के गांवों के पशुओं में उन्नत नस्ल पशु सुधार कार्यक्रम लागू किए जाने से सार्थक परिणाम प्राप्त हो सकते हैं। चाहें तो प्रमुख फसलों के उत्पादन को बढ़ाने के लिए प्रत्येक ग्राम का माइक्रोप्लान बनाएं और फसलों का उत्पादन लेने के लिए प्रमाणित बीज के उपयोग को बढ़ावा दिया जाए। गांव में प्रदर्शन के समय किसानों को बुलाया जाए।

सोशल इंजीनियरिंग का उपयोग कर फसलों का उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। यदि कृषि उत्पादन सामूहिक सहभागिता पर आधारित होगा तो सारे ग्रामीण जागरूक हो सकेंगे और फसल का उत्पादन बढ़ेगा तो हर व्यक्ति को अच्छा फायदा होगा। इसके लिए सामुदायिक समृद्धि बढ़ाने में निजी क्षेत्र में उपलब्ध संसाधनों का उपयोग किया जाना चाहिए। समग्र उत्पादन बढ़ाने के लिए कृषि अमले को प्रत्येक चयनित ग्राम में उत्पादकता यात्रा भी करनी चाहिए। यही नहीं बीज व डेयरी समितियों का गठन कर किसानों को जोड़ा जाए और उन्हें एक ही तरह की गतिविधि संचालन के लिए प्रोत्साहित किया जाए।

परती भूमि सुधार

कृषि उत्पादकता को बढ़ाने के लिए देश में साधनों की कमी नहीं है, तकनीकी एवं सामूहिक प्रयासों से कृषि उत्पादन एवं उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है। फसलों की उत्पादकता बढ़ाने की दृष्टि से ना केवल कार्ययोजना बनाई जाए बल्कि अमल में भी लाई जाए। परती भूमि को सुधार कर फसलों की बुआई कराना भी लाभदायक हो सकता है। पर जरूरी यह है कि उन्नत कृषि तकनीक व गांवों का चयन तय समय में किया जाए। चाहे रबी हो या खरीफ अभियान, जो भी प्रयास आवश्यक है समय के पूर्व और समन्वित रूप से किए जाए। कार्ययोजना ऐसी हो जो दीर्घकालीन वातावरण का निर्माण करें।

खेत तालाब योजना

हमारा देश कृषि प्रधान है। देश की उन्नति कृषि की उन्नति से जुड़ी है। उन्नत कृषि तकनीकें ही उन्नति के शिखर पर ले जाएंगी। खेती को लाभ का धंधा बनाने के लिए कृषि अधिकारियों को लगन और दृढ़ इच्छाशक्ति से कार्य को अंजाम देना होगा। इतना ही नहीं विभागीय कार्यक्रमों के दायरे से बाहर भी जाकर काम करना पड़े तो सदैव तत्पर रहना होगा। सिंचाई की समस्या से निजात पाने के लिए खेत तालाब योजना काफी उपयोगी है इसका समुचित लाभ किसानों को मिलना चाहिए। फसलों से जुड़े सभी प्रकार के शासकीय कार्यक्रमों का लाभ किसानों तक पहुंचाने के लिए विशेष अभियान के तहत विभिन्न प्रकार के उपकरण व अन्य आदान, जो किसानों को दिलाया जाना है, उसे अभियान के रूप में उपलब्ध कराया जाए। जैविक खेती के प्रति आकर्षण को और बढ़ाना होगा। इतना ही नहीं प्रसंस्करण, भंडारण और फसलोत्तर प्रबंधन के प्रति जागरूकता अभियान चलाया जाना भी किसानों के लिए हितकर होगा।

तकनीक से उत्पादकता बढ़ाने पर जोर

कृषि के क्षेत्र में कम समय में कायाकल्प किया जा सकता है। चुनौती तकनीक को खेत में उतारना है। खेती को लाभदायक बनाना केवल कृषि विभाग का ही विषय नहीं है, इससे जनप्रतिनिधियों को जोड़ना होगा। ग्रामसभाओं में भी कृषि तकनीक व उक्त विषयों को जोड़ने पर जोर देना होगा। पारंपरिक फसलों के उत्पादन में गुणात्मक सुधार लाने के लिए व्यापक रूप से कार्य करने की जरूरत है। गैर-सरकारी संगठनों का जुड़ाव, जल संसद तथा उत्तम कार्य करने वाले किसानों को पुरस्कार के संबंध में भी निर्णय लिए जा सकते हैं। उच्च तकनीक के उपयोग तथा पौधारोपण में वृद्धि कर उत्पादकता बढ़ाई जाए। प्रदेश में उद्यानिकी फसलों के वर्तमान क्षेत्राच्छादन में पांच लाख हेक्टेयर रकबा बढ़ाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। उद्यानिकी के लिए जिलों की कृषि जलवायु तथा स्थानीय संसाधनों के अनुसार कार्ययोजना बने तथा इसे दीर्घकालिक स्वरूप में क्रियान्वित किया जाए। उद्यानिकी कार्ययोजना में परस्पर संबंधित विभाग संयुक्त योजना बनाकर क्रियान्वित करें तथा जिले को फोकस कर क्लस्टर का चयन कर उक्त क्लस्टर में ही विभिन्न योजनाएं बनाई जाए।

नरवाई न जलाए

फसल काटने के बाद बचे हुए फसल अवशेष जलाना खेती के लिए आत्मघाती कदम सिद्ध हो सकता है। इससे अन्य खेतों में अग्नि दुर्घटना की संभावना तो रहती है, इससे भूमि की उर्वरता पर भी विपरीत असर पड़ता है। इसके साथ ही धुएं से उत्पन्न कार्बन डाई-ऑक्साइड से वातावरण का तापक्रम बढ़ता है और प्रदूषण में भी वृद्धि होती है।

इस संबंध में किसानों को यह समझाना आवश्यक है कि वे किसी भी स्थिति में नरवाई न जलाए। किसानों को बताया जाए कि खेती की उर्वर परत लगभग 6 इंच की ऊपरी सतह पर ही होती है। इसमें तरह-तरह के जीवाणु उपस्थित रहते हैं। नरवाई जलाने से उत्पन्न उच्च तापमान में उपजाऊ मिट्टी की दशा ईंट बनाने की प्रक्रिया की तरह कड़ी और जीवाणुरहित होती जाती है, जो धीरे-धीरे बंजरता की ओर बढ़ने लगती है।

नरवाई जलाने की अपेक्षा यदि फसल अवशेषों और डंठलों को एकत्र कर जैविक खाद जैसे भू-नाडेप, वर्मी कम्पोस्ट आदि बनाने में उपयोग किया जाए तो वे बहुत जल्दी सड़कर पोषक तत्वों से भरपूर खाद बना सकते हैं।

इसके अतिरिक्त खेत में कल्टीवेटर, रोटा वेटर या डिस्क हेरो आदि की सहायता से फसल अवशेषों को भूमि में मिलाने से आने वाली फसलों में जीवांश के रूप में खाद की बचत की जा सकती है। इसके लिए किसान हलधर योजना का लाभ लेकर गहरी जुताई भी कर सकते हैं। किसान सामान्य हार्वेस्टर्स से गेहूं कटवाने के स्थान पर स्ट्रा रीपर एवं हार्वेस्टर्स का प्रयोग करें तो पशुओं के लिए भूसा और खेत के लिए बहुमूल्य पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ने के साथ मिट्टी की संरचना को बिगड़ने से भी बचाया जा सकता है। दूसरी ओर नरवाई जलाने से अपनी या अन्य किसानों की फसल, घर, मवेशी को भी भीषण नुकसान पहुंच सकता है। इस संबंध में राजस्व अधिकारों के अन्तर्गत स्थानीय स्तर पर कानूनी कार्रवाई भी की जा सकती है।

इसके लिए जरूरी है कि समस्त मैदानी अधिकारियों को सचेत किया जाए कि वे नरवाई न जलाने के संबंध में सघन अभियान छेड़कर किसानों को समझा दे कि किसी भी परिस्थिति में नरवाई न जलाएं। इसके लिए पोस्टर, पम्पलेट, बैनर आदि छपवाएं, वाल पेंटिंग करवाएं, स्थानीय स्तर पर समाचार-पत्रों और इलैक्ट्रॉनिक मीडिया के माध्यम से लगातार संदेश दे तथा किसान दीदी-किसान मित्रों, सम्पर्क किसानों, पंचायत प्रतिनिधियों आदि की सहायता से प्रत्येक ग्राम तक इस विषय की जानकारी पहुंचाई जाए। पंचायत द्वारा भी नरवाई न जलाने के संबंध में प्रचार किया जाए। प्रत्येक ग्राम में कृषक दिवस अथवा विशेष बैठकों का आयोजन कर ग्रामीणजनों को नरवाई जलाने के नुकसान तथा कचरे और फसल अवशेषों के उपयोगी जैविक प्रबंधन की ठोस और व्यावहारिक जानकारी दी जाए।

फ्लैट संस्कृति को बढ़ावा

देश में जिस तेजी से उपजाऊ खेती योग्य भूमि पर कंकरीट के जंगल फैल रहे हैं और प्रापर्टी को कुछ भौतिकवाद में लिप्त लोगों ने व्यवसाय बना लिया है उसे देखते हुए जरूरी हो गया है कि देश में फ्लैट संस्कृति को बढ़ावा दिया जाए। फ्लैटों की उचित देखरेख और सही रखरखाव के लिए फ्लैट एक्ट बनाया जाना चाहिए। इससे जमीनों की आसमान छूती कीमतों में कुछ कमी आ सकेगी और सभी के लिए घर का सपना साकार करना आसान होगा। साथ ही खेती योग्य भूमि को बंजर बनने से रोका जा सकेगा। एक्ट में यह भी प्रावधान किया जा सकता है कि कृषि योग्य भूमि पर सिर्फ खेती ही की जाए।

कृषि को नुकसान पहुंचाने वाली अन्य गतिविधियों पर अंकुश लगाया जाए। चूंकि जमीन सीमित है उस पर भी उपजाऊ जमीन का अभाव है, ऐसे में खेती को बचाते हुए सबके लिए आवास का सपना साकार किया जाए। इसके उपाय किए जाने है। चाहे तो एक परिवार एक मकान का नियम बनाकर सख्ती से पालन कराया जा सकता है। जहां फ्लैट एक्ट नहीं हैं वहां फ्लैट एक्ट बनाकर लागू करना कारगर भूमिका निभा सकता है। फ्लैट एक्ट में बिल्डर के लिए फ्लैट और वहां मिलने वाली सुविधाओं की उम्र तय करना अनिवार्य किया जाए ताकि लोग निश्चिंत होकर फ्लैट में रह सकें और अपनी मेहनत की पूंजी का सदुपयोग कर सकें।

फ्लैट एक्ट बन जाने से बंजर भूमि का उपयोग हो सकेगा और खेती योग्य भूमि पर उत्पादन व उत्पादकता बढ़ाई जा सकेगी; खेती की भूमि का व्यावसायिक उपयोग रुकेगा। विकास और मानव बसाहट भी भली प्रकार हो सकेगी। जब मानव बसाहट सही तरीके से होगी तो लोगों को मूलभूत सुविधाएं पहुंचाना अधिक आसान हो जाएगा। उन्हें सुरक्षा और सुविधाएं उपलब्ध कराने में आने वाली दिक्कतों से बचा जा सकेगा। इससे शासन-प्रशासन का समय, श्रम और पैसे की बचत भी हो सकेगी और ऊर्जा को अन्य दूसरे बेहतर कार्यों में लगाया जा सकेगा।

एक गांव—एक निशान

राष्ट्रीय चिन्ह की तरह प्रत्येक गांव और जिले का अपना उत्पाद, फल, पशु-पक्षी और फूल हो और उस उत्पाद पर आधारित उद्योग स्थापित किए जाएं। साथ ही उन पहचान चिन्हों पर प्रमुखता से कार्य हो। जब मैं सोचता हूं कि गांवों को कैसे उन्नत बनाया जाए और गांवों से कैसे पलायन रोका जाए तब मेरे मन में यह विचार आता है कि प्रत्येक गांव को उसके प्रमुख उत्पाद से जोड़ दिया जाए। फिर चाहे उस गांव की पहचान उस उत्पाद से होने लगे तो भी चलेगा। इससे निश्चित ही गांवों की तस्वीर बदलेगी और गांव विकसित हो सकेंगे। इसके लिए हमें जनभागीदारी से आगे बढ़ना होगा। महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना इसमें सार्थक भूमिका निभा सकती है।

एक सर्वे टीम बनाई जाएगी जो गांवों का अध्ययन करेगी ताकि प्रदेश के सभी गांवों को पूरा लाभ पहुंचाया जा सके। ये सर्वे टीम गांवों में प्रमुखता से होने वाले उत्पाद और वहां उद्योग की संभावना का पता लगाएगी। इसके बाद उस गांव का प्रमुख उत्पाद निश्चित कर दिया जाएगा। जैसे अच्छे किस्म के धनिए के लिए कुंभराज, फूलों के लिए पश्चिम बंगाल, सेब के लिए कश्मीर, मसालों के लिए केरल, संतरे के लिए नागपुर, चावल के लिए छत्तीसगढ़, गुड़ और चने के लिए करेली और दलिया वाले गेहूं के लिए गंजबसौदा प्रसिद्ध है। ठीक वैसे ही प्रत्येक गांव का अपना उत्पाद होगा और उसी गांव में उस उत्पाद के प्रसंस्करण की सभी जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी। इसमें पूरा गांव एक इकाई के रूप में कार्य कर सकेगा। स्वयं-सहायता समूह और स्वयंसेवी संगठनों की भी इस कार्य में सहायता ली जा सकती है।

गांव के चिन्ह निर्धारित करने के बाद वहां अंतर्राष्ट्रीय मानक पर खरे उतरने वाले, अधिक मांग वाले और लोगों की पसंद के पक्के उत्पाद तैयार कराए जाएंगे। गांववासी ही उस उत्पाद को मिलकर तैयार करेंगे और लाभ का हिस्सा सभी में बराबर बांटा जाएगा। इसके लिए गांव के लोगों को बकायदा प्रशिक्षण दिया जाएगा। दुर्लभ प्रजाति के पशु-पक्षियों को बचाया जा सकेगा। उनके संरक्षण और संवर्द्धन में भी तेजी आ सकेगी। फल-फूल और ऐतिहासिक धरोहरों को विश्व मानचित्र में उभारा जा सकेगा। जैसे आज रतलामी नमकीन और सूरत का कपड़ा प्रसिद्ध है ठीक वैसे ही वह गांव उस विशेष उत्पाद के लिए जाना जाएगा।

गांव के बीचोंबीच, मंडी में या गांव की शुरुआत में निर्धारित पहचान चिन्हों की प्रदर्शनी लगाई जाएगी जिनमें पहचान-चिन्हों के संरक्षण, संवर्द्धन और गांव की प्रगति की झांकी होगी। गांववासी अपने उत्पाद की अच्छी छवि के लिए भी कार्य करेंगे। इससे क्षेत्र विशेष और वहां के लोगों की क्षमता, समय और पैसे का उपयोग करते हुए उनमें आपसी सद्भाव और रचनात्मक भावना का विकास किया जाना भी संभव हो सकेगा। इससे गांवों से होने वाला पलायन रुकेगा, गांव आत्मनिर्भर होंगे, गांवों में समृद्धि आएगी और गांव में फैली कई बुराइयों का शमन भी हो सकेगा। समूचा गांव एक टीम की तरह लोगों के सुख-दुःख में कार्य करेगा और अपने परिश्रम का पूरा ईनाम पाएगा। प्रत्येक गांव जागरूक हो सकेगा। मेरा ऐसा विश्वास है कि इस पर अमल करते हुए खुशहाली की एक नई इबारत लिखी जा सकती है।

शोध अनुसंधान की आवश्यकता

आंकड़ों के बजाय किसानों को वास्तविक और व्यावहारिक लाभ देने की योजनाओं को अमलीजामा पहनाया जाए। भंडारण और फसलोत्तर तकनीक के साथ ही खाद्य प्रसंस्करण के आधुनिक तरीकों के बारे में जानकारी का विस्तार किया जाना जरूरी है। कृषि क्षेत्र में महत्वाकांक्षी लक्ष्य बनाकर ही क्रान्तिकारी परिवर्तन किए जा सकते हैं। कृषि और किसानों के लिए जो भी योजनाएं बनाई जाएं वह जमीनी हकीकत पर आधारित हों। प्रदेश के विकास की तकदीर और तस्वीर बदलने में कृषि विभाग की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। इसके लिए परिणाम आधारित कार्यशैली को मजबूत बनाने की जरूरत है। किसानों को शासकीय सहायता के लिए इधर-उधर भटकना नहीं पड़े इसके लिए अभियान चलाकर हितग्राहियों का चयन करने और कृषि मेलों के माध्यम से अनुदान उपकरण और सहायता आदि प्रदान किए जाने चाहिए। कृषि विस्तार विकास कार्यक्रमों के साथ ही शोध और अनुसंधान की दिशा में भी प्रयासों की जरूरत है ताकि कीट व्याधि और पाले आदि की समस्याओं का सामना करने में सक्षम प्रजातियों का विकास हो सके। किसानों को समय से और सही खाद, बीज, औषधि और उपकरण प्राप्त हो, इसके लिए अग्रिम रूप से समुचित प्रबंध किए जाएं। अमानक और नकली कृषि आदानों के विक्रय के प्रकरण मिलने पर कठोरतम दंडात्मक कार्रवाई की जानी चाहिए।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

ई-मेल: ashish35.srivastava/yahoo.co.in

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