वर्मीकम्पोस्ट एवं कम्पोस्ट खाद बनाने की विधियाँ
(क) सामान्य विधि (General method):
वर्मीकम्पोस्ट बनाने के लिए इस विधि में क्षेत्र का आकार (area) आवश्यकतानुसार रखा जाता है किन्तु मध्यम वर्ग के किसानों के लिए 100 वर्गमीटर क्षेत्र पर्याप्त रहता है। अच्छी गुणवत्ता की केंचुआ खाद बनाने के लिए सीमेन्ट तथा ईटों से पक्की क्यारियां (Vermi-beds) बनाई जाती हैं। प्रत्येक क्यारी की लम्बाई 3 मीटर, चौड़ाई 1 मीटर एवं ऊँचाई 30 से 50 सेमी० रखते हैं। 100 वर्गमीटर क्षेत्र में इस प्रकार की लगभग 90 क्यारियां बनाई जा सकती है। क्यारियों को तेज धूप व वर्षा से बचाने और केंचुओं के तीव्र प्रजनन के लिए अंधेरा रखने हेतु छप्पर और चारों ओर मल से हरे नेट से ढकना अत्यन्त आवश्यक है।
क्यारियों को भरने के लिए पेड़-पौधों की पत्तियाँ, घास, सब्जी व फलों के छिलके, गोबर आदि अपघटनशील कार्बनिक पदार्थों का चुनाव करते हैं। इन पदार्थों को क्यारियों में भरने से पहले ढेर बनाकर 15 से 20 दिन तक सड़ने के लिए रखा जाना आवश्यक है। सड़ने के लिए रखे गये कार्बनिक पदार्थों के मिश्रण में पानी छिड़क कर ढेर को छोड़ दिया जाता है। 15 से 20 दिन बाद कचरा अधगले रूप (Partially decomposed) में आ जाता है। ऐसा कचरा केंचुओं के लिए बहुत ही अच्छा भोजन माना गया है।
अधगले कचरे को क्यारियों में 50 सें०मी० ऊँचाई तक भर दिया जाता है। कचरा भरने के 3-4 दिन बाद प्रत्येक क्यारी में केंचुऐ छोड़ दिए जाते हैं और पानी छिड़क कर प्रत्येक क्यारी को गीली बोरियो से ढक देते है। एक टन कचरे से 0.6 से 0.7 टन केंचुआ खाद प्राप्त हो जाती है।
(ख) चक्रीय चार हौद विधि (Four-pit method):
इस विधि में चुने गये स्थान पर12'x12'x2.5' (लम्बाई x चौड़ाई x ऊँचाई) का गड्ढा बनाया जाता है। इस गड्ढे को ईंट की दीवारों से 4 बराबर भागों में बाँट दिया जाता है। इस प्रकार कुल 4 क्यारियां बन जाती हैं। प्रत्येक क्यारी का आकार लगभग 5.5' x 5.5' x 2.5' होता है। बीच की विभाजक दीवार मजबूती के लिए दो ईंटों (9 इंच) की बनाई जाती है। विभाजक दीवारो में समान दूरी पर हवा व केंचुओं के आने जाने के लिए छिद्र छोड़े जाते हैं। इस प्रकार की क्यारियों की संख्या आवश्यकतानुसार रखी जा सकती है। अगर आप केचुआ पालन कैसे करें यह पढ़ना चाहते हैं तो यह लेख पढ़ सकते हैं।
इस विधि में प्रत्येक क्यारी को एक के बाद एक भरते हैं। अर्थात पहले एक महीने तक पहला गड्ढा भरते हैं पूरा गड्ढा भर जाने के बाद पानी छिड़क कर काले पॉलीथिन से ढक देते हैं ताकि कचरे के विघटन की प्रक्रिया आरम्भ हो जाये।
इसके बाद दूसरे गड्ढे में कचरा भरना आरम्भ कर देते हैं। दूसरे माह जब दूसरा गड्ढा भर जाता है तब ढक देते हैं और कचरा तीसरे गड्ढे में भरना आरम्भ कर देतें है। इस समय तक पहले गड्ढे का कचरा अधगले रूप में आ जाता है।
एक दो दिन बाद जब पहले गड्ढे में गर्मी (heat) कम हो जाती है तब उसमें लगभग 5 किग्रा0 (5000) केंचुए छोड़ देते हैं। इसके बाद गड्ढे को सूखी घास अथवा बोरियों से ढक देते हैं। कचरे में गीलापन बनाये रखने के लिए आवश्यकतानुसार पानी छिड़कते रहते है।
इस प्रकार 3 माह बाद जब तीसरा गड्ढा कचरे से भर जाता है तब इसे भी पानी से भिगो कर ढक देते हैं और चौथे गड्ढे में कचरा भरना आरम्भ कर देते हैं। धीरे-धीरे जब दूसरे गड्ढे की गर्मी कम हो जाती है तब उसमें पहले गड्ढे से केंचुए विभाजक दीवार में बने छिद्रों से अपने आप प्रवेश कर जाते हैं और उसमें भी केंचुआ खाद बनना आरम्भ हो जाता है।
इस प्रकार चार माह में एक के बाद एक चारों गड्ढे भर जाते हैं। इस समय तक पहले गड्ढे में जिसे भरे हुए तीन माह हो चुके है, केंचुआ खाद (वर्मीकम्पोस्ट) बनकर तैयार हो जाता है। इस गड्ढे के सारे केंचुए दूसरे एवं तीसरे गड्ढे में धीरे-धीरे बीच की दीवारों में बने छिद्रों द्वारा प्रवेश कर जाते हैं।
अब पहले गड्ढे से खाद निकालने की प्रक्रिया आरम्भ की जा सकती है। खाद निकालने के बाद उसमें पुनः कचरा भरना आरम्भ कर देते हैं। इस विधि में एक वर्ष में प्रत्येक गड्ढे में एक बार में लगभग 10 कुन्तल कचरा भरा जाता है जिससे एक बार में 7 कुन्तल खाद (70 प्रतिशत) बनकर तैयार होता है। इस प्रकार एक वर्ष में चार गड्ढों से तीन चक्रों में कुल 84 कुन्तल खाद (4x3x7) प्राप्त होता है। इसके अलावा एक वर्ष में एक गड्ढे से 25 किग्रा0 और 4 गड्ढों से कुल 100 किग्रा0 केंचुए भी प्राप्त होते हैं।
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(ग) केंचुआ खाद बनाने की चरणबद्ध विधि
केंचुआ खाद बनाने हेतु चरणबद्ध निम्न प्रक्रिया अपनाते हैं -
वर्मी बेडों में केंचुआ छोड़ने से पूर्व कच्चे माल (गोबर व आवश्यक कचरा) का आंशिक विच्छेदन (Partial decomposition) जिसमें 15 से 20 दिन का समय लगता है करना अति आवष्यक है।
आंशिक विच्छेदन की पहचान के लिए ढेर में गहराई तक हाथ डालने पर गर्मी महसूस नहीं होनी चाहिए। ऐसी स्थिति में कचरे की नमीं की अवस्था में पलटाई करने से आंशिक विच्छेदन हो जाता है।
वर्मीबेडों में भरे गये कचरे में कम्पोस्ट तैयार होने तक 30 से 40 प्रतिशत नमी बनाये रखें। कचरे में नमीं कम या अधिक होने पर केंचुए ठीक तरह से कार्य नही करतें।
वर्मीबेडों में कचरे का तापमान 20 से 27 डिग्री सेल्सियस रहना अत्यन्त आवश्यक है। वर्मीबेडों पर तेज धूप न पड़ने दें। तेज धूप पड़ने से कचरे का तापमान अधिक हो जाता है परिणामस्वरूप केंचुए तली में चले जाते हैं अथवा अक्रियाशील रह कर अन्ततः मर जाते हैं।
वर्मीबेड में ताजे गोबर का उपयोग कदापि न करें। ताजे गोबर में गर्मी (Heat) अधिक होने के कारण केंचुए मर जाते हैं अतः उपयोग से पहले ताजे गोबर को 4-5 दिन तक ठण्डा अवश्य होने दें।
केंचुआ खाद तैयार करने हेतु कार्बनिक कचरे में गोबर की मात्रा कम से कम 20 प्रतिशत अवश्य होनी चाहिए।
कांग्रेस घास को फूल आने से पूर्व गाय के गोबर में मिला कर कार्बनिक पदार्थ के रूप में आंशिक विच्छेदन कर प्रयोग करने से अच्छी केंचुआ खाद प्राप्त होती है।
कचरे का पी. एच. उदासीन (7.0 के आसपास) रहने पर केंचुए तेजी से कार्य करते हैं अतः वर्मीकम्पोस्टिंग के दौरान कचरे का पी. एच. उदासीन बनाये रखे। इसके लिए कचरा भरते समय उसमें राख (ash) अवश्य मिलायें।
केंचुआ खाद बनाने के दौरान किसी भी तरह के कीटनाशकों का उपयोग न करें।
खाद की पलटाई या तैयार कम्पोस्ट को एकत्र करते समय खुरपी या फावड़े का प्रयोग कदापि न करें। इन यंत्रों के प्रयोग से केंचुओं के कट कर मर जाने की सम्भावना बनी रहती है।
कचरे में से काँच के टुकड़े, कील, पत्थर, प्लास्टिक, पोलीथीन आदि को छाँट कर अलग कर दें।
केंचुओं को चिड़ियों, दीमक, चींटियों आदि के सीधे प्रकोप से बचाने के लिए क्यारियों के कचरे को बोरियो से अवश्य ढकें।
केंचुए को अंधेरा अति पसंद है अतः वर्मी बैंड को हमेशा टाट बोरा/सूखी घास-फूस इत्यादि से ढक कर रखना चाहिए।
केंचुए के अधिक उत्पादन हेतु बेड में नमी 30 से 35 प्रतिशत तथा केंचुआ खाद के अधिक उत्पादन के लिए नमीं 20 से 30 प्रतिशत के बीच रखनी चाहिए।
वर्मीबेड में नमीं की मात्रा 35 प्रतिशत से अधिक होने से वायु संचार में कमीं हो जाती है जिसके कारण केंचुए बेड की ऊपरी सतह पर आ जाते हैं।
अच्छी वायु संचार के लिए वर्मी बेड में प्रत्येक सप्ताह कम से कम एक बार पंजा चलाना चाहिए जिससे केंचुओं को वर्मी कम्पोस्ट बनाने हेतु उपयुक्त वातावरण मिल सके।
केंचुओं के अधिक उत्पादन हेतु बेड पर केंचुआ छोंड़ने के समय 500 मि.ली. मट्ठा/500 मि. ली. शीरे को 5 से 10 लीटर पानी में घोलकर प्रति बैड पर छिड़काव करने से केंचुओं का प्रजनन तथा कम्पोस्टिंग तेजी के साथ होता है।
बोकाशी का मिश्रण जिसमें गेहूँ की भूसी, चने का छिलका / पाउडर एवं नीम / सरसों की खली के समान मिश्रण की 500 ग्राम मात्रा 5 से 10 लीटर पानी में घोलकर प्रति बैड पर छिड़कने से केंचुओं की प्रजनन बढ़ाई जा सकती है।
केंचुओं की अच्छी बढ़वार एवं गुणवत्तायुक्त उत्पादन के लिए वर्मी शैडों में अंधेरा, नमी, वायु संचार, आंशिक रूप से विच्छेदित कचरा, नियमित देखभाल तथा अच्छा प्रबंधन होना अति आवश्यक है।
केंचुआ खाद में प्रयुक्त कृषि अवशेषों के तीव्र विच्छेदन (डिकम्पोजीशन) के लिए गाय के गोबर की स्लरी या ट्राईकोडर्मा पाउडर 50 से 100 ग्राम मात्रा प्रति बेड में मिला सकते हैं।
यदि पौधों व जानवरों के अवशेष के अतिरिक्त कोई प्रोसेस किए हुए कार्बनिक अवशेष का प्रयोग करना है तो केचुओं को धीरे-धीरे नयी माध्यम सामग्री पर अपने को ढ़ालने एवं स्वीकार करने के लिए गाय के गोबर के साथ भिन्न-भिन्न अनुपातों में मिला कर देना चाहिए।
सब्जी आदि के अवशेषों में यदि कीट आदि के प्रकोप होने व उसके अंडे लार्वा होने का अंदेशा है तो नीम आधारित कीटनाशक का 100 मि.ली. घोल 5 से 10 किलो व्यर्थ पदार्थ की दर से डिकम्पोजीशन से पूर्व छिड़काव कर सकते हैं।
एजोटोबेक्टर तथा पी.एस.बी. पाउडर जो कि विच्छेदन के कार्य में सहायक है 50 से 100 ग्राम मात्रा प्रति बेड में शुरूआत में ही छिड़क कर मिलाने से खाद जल्दी परिपक्व होती है
अच्छे प्रजनन हेतु बेड का तापक्रम 25 से 32 डिग्री के बीच होना चाहिए।
वर्मीकम्पोस्ट बनाने के लिए हमेंशा ऊँचे स्थान का चुनाव करें।
केंचुए को लाल चींटियों से बचाने के लिए चारकोल पाउडर का छिड़काव किया जा सकता है।
कम्पोस्ट खाद कैसे बनाएं? ग्रामीण विकास विज्ञान समिति टीम द्वारा बतायी गई विधि
कम्पोस्ट को ‘कूड़ा खाद’ कहते हैं। पौधों के अवशेष पदार्थ, घर का कूड़ा कचरा, मनुष्य का मल, पशुओं का गोबर आदि का जीवाणु द्वारा विशेष परिस्थिति में विच्छेदन होने से यह खाद बनती है। अच्छा कम्पोस्ट खाद गन्द रहित भूरे या भूरे काले रंग का भुरभुरा पदार्थ होता है। इसके 0.5 से 1.0 प्रतिशत पोटाश एवं अन्य गौण पोषक तत्व होते हैं।
कम्पोस्ट खाद का महत्त्व
हमारी पारम्परिक खेती में कचरा, गोबर, जानवरों का मलमूत्र व अन्य वनस्पतिजन्य कचरे को एकत्रित करके खाद बनाने की प्रथा प्रचलित थी, जिसमें पौधे के लिये आवश्यक सभी पोषक तत्व तथा मिट्टी में जैविक पदार्थों का विघटन करने वाले सभी प्रकार के सूक्ष्मजीव प्रचुर मात्रा में होते थे। इस प्रकार जैविक खाद के इस्तेमाल से मिट्टी की प्राकृतिक उपजाऊ शक्ति का विकास होता था एवं मिट्टी अधिक समय तक अच्छी फसल देने में सक्षम रहती थी। खाद बनाने का कच्चा माल सभी किसानों के खेत में ही उपलब्ध होने के कारण उसे बनाने में विशेष खर्च नहीं होता था। जैविक खाद फसल और मिट्टी दोनों के लिये लाभकारी है, यह समझते हुए आजकल किसान खाद बनाने व खेती में उसका उपयोग करने के प्रति उदासीन हैं। इसके सम्भावित कारण निम्नलिखित हैः-
कम्पोस्ट को ‘कूड़ा खाद’ कहते हैं। पौधों के अवशेष पदार्थ, घर का कूड़ा कचरा, मनुष्य का मल, पशुओं का गोबर आदि का जीवाणु द्वारा विशेष परिस्थिति में विच्छेदन होने से यह खाद बनती है। अच्छा कम्पोस्ट खाद गन्द रहित भूरे या भूरे काले रंग का भुरभुरा पदार्थ होता है। इसके 0.5 से 1.0 प्रतिशत पोटाश एवं अन्य गौण पोषक तत्व होते हैं।
जैविक खाद बनाने में श्रम एवं समय खर्च होता है, जबकि रासायनिक खाद आसानी से बाजार में उपलब्ध है हालांकि उसे प्राप्त करने के लिये पैसा खर्च करना होता है।
जैविक खाद का असर धीरे-धीरे किन्तु लम्बे समय के लिये होता है जबकि रासायनिक खाद का असर कम समय के लिये फसलों पर तुरन्त दिखाई देता है।
कम्पोस्ट खाद बनाने की विधियाँ
ग्रामीण विकास विज्ञान समिति टीम के अनुसार कम्पोस्ट खाद भी जैविक खाद है, अतः कम्पोस्ट खाद बनाने की आसान विधियाँ विकसित हो चुकी हैं वे इस प्रकार हैः-
गड्ढा विधि
ऊँची जगह पर जहाँ पानी स्रोत पास हो गड्ढे का आकार 3 मीटर लम्बा X 2 मीटर चौड़ा X 1 मीटर गहरा रखें। खोदने के बाद गड्ढे को गोबर से लीप दें। इसके बाद पोषक तत्वों को सोखने के लिये 10 से 12 सेमी. की सेन्द्रीय पदार्थों की आधार परत बिछाएँ। इस आधार परत पर 20 सेमी मोटी पहली परत गौशाला की बिछावन डालें, गोबर एवं गोबर से सना हुआ पुआल गन्ने का छिलका, अन्य कचरा तथा पत्तियाँ बिछाएँ।
50 प्रतिशत गोबर एवं गोमूत्र का पानी सोखने की क्षमता का उपयोग हो सके। अब 100 किग्रा. भुरभुरी मिट्टी में 3 किग्रा. अधपका गोबर कम्पोस्ट तथा 250 ग्राम सुपर फॉस्फेट या 3-5 किग्रा राक फॉस्फेट मिलाकर मिश्रण बनाएँ। इस मिश्रण की 2-3 सेमी परत बिछाएँ और पानी से गीला कर दें। इन परतों की पुनरावृत्ति जब तक करते रहें, तब तक गड्ढे की पूरी सामग्री अच्छी तरह हिलाते हुए पलटें।
2. ढेर विधि
इस विधि में कम्पोस्ट बनाने के लिये जमीन के ऊपर कोठी बनाते हैं। ऊँची व समतल भूमि पर 3 मीटर लम्बी x 2 मीटर चौड़ी x 1 मीटर ऊँची कोठी, अनुपयोगी लकड़ी की पट्टियाँ, चटाइयाँ एवं ईंटों से बनाई जा सकती है। 2 सेमी. ईंटों की तह जमा देने से ढेर लगाने में सुविधा होती है। इस विधि में भी भरने का तरीका गड्ढा विधि जैसे ही है लेकिन इस विधि में गोबर के घोल की अधिक आवश्यकता होती है।
ऊपर का हिस्सा ढाल देते हुए भरें तथा मिट्टी, भूसे के मिश्रण के 5 सेमी प्लास्टर कर गोबर से लीप दें। हर 4-6 सप्ताह में खाद को पलटते रहें और नमी बनाए रखने हेतु पानी का छिड़काव करते रहें और पुनः लीप कर बन्द कर दें इस प्रकार 3 माह में कम्पोस्ट बनकर तैयार हो जाता है।
3. इन्दौर विधि
यह पद्धति सर्वप्रथम 1931 में अलबर्ट हावर्ड और यशवंत बाड ने इन्दौर में विकसित की थी एवं इसी आधार पर इसे इन्दौर विधि/पद्धति नाम से जाना जाता है।
संरचना
इस पद्धति में कम्पोस्ट खाद बनाने के लिये कम-से-कम 9 फीट लम्बा, 5 फीट चौड़ा एवं 3 फीट गहरा गड्ढा बनाया जाता है, गड्ढे की लम्बाई सुनिधानुसार 21 फीट तक रखी जा सकती है। इस गड्ढे को लम्बवत 3 से 6 समान भागों में बाँट दिया जाता है। प्रत्येक हिस्सा अलग-अलग भरा जाता है एवं अन्तिम हिस्सा खाद पलटने के लिये खाली छोड़ा जाता है।
गड्ढों की भराई
गड्ढों की प्रत्येक भाग में कचरा अलग-अलग परतों में भरा जाये। पहली परत में पशु कोठों से लाया गया फसल अवशेष एवं कचरे की एक समान 3 इंच मोटी परत बिछाई जाती है। इसके पश्चात पशु कोठों से एकत्रित किया हुआ पशु मूत्र मिश्रण (कीचड़) की एक तह उसके ऊपर फैला दी जाती है। दूसरी परत के रूप में 2 इंच गोबर और पशु कोठों की मूत्र मिश्रित मिट्टी की एक समान परत बिछाकर पर्याप्त पानी का छिड़काव करें।
इस प्रकार 8 से 10 परत में गड्ढा जमीन से 1 फीट ऊपर तक भर जाएगा। सबसे ऊपर की परत पशु मूत्र एवं राख मिश्रित पशुकोठों की गीली मिट्टी की होती है। इस प्रकार एक हिस्से को खाद पलटने के लिये छोड़ दें एवं शेष हिस्से को भर दें। गड्ढे भरने का कार्य दो तीन दिन में पूर्ण कर लिया जाता है। सुबह शाम पानी का छिड़काव करते रहें, ताकि नमी बनी रहे।
कम्पोस्ट को पलटना
धीरे-धीरे गड्ढों में भरा हुआ कचरा, दबकर जमीन की सतह के बराबर आता-जाता है। 15 दिन के बाद जो खाली छोड़ा था, इसमें पूर्व में भरे गए हिस्से का पूरा कचरा पलट दें। इस क्रिया में ऊपर का कचरा नीचें एवं नीचे का कचरा ऊपर एवं मध्य का कचरा किनारे हो जाएगा। तत्पश्चात अच्छी तरह से पानी डालकर इसे नम कर दें। इस क्रिया के बाद गीली मिट्टी से पुनः भरे हुए गड्ढे को लीप कर ढँक दें।
इसी प्रकार सभी भागों का कचरा पलटें। इस प्रकार 15 दिन के अन्तराल पर 2 से 3 बार पलटने की क्रिया करें एवं दो माह पश्चात अन्तिम पलटाई करें। तीन माह उपरान्त अच्छी पकी खाद तैयार हो जाती है। यह खाद काले रंग की मिट्टी जैसी गन्ध वाली होती है। गाँव में जो परम्परागत खाद के गड्ढे होते हैं उनका ठीक प्रकार से नियोजन इन्दौर पद्धति के आधार पर किया जा सकता है। इस पद्धति में जमीन के ऊपर ढेर बनाकर भी खाद बनाई जा सकती है।
4. रायपुर विधि
गाँव में परम्परागत तरीके से जमीन में गड्ढा खोदकर उसमें गोबर व कूड़ा डाला जाता है, जिन्हें डालने का कोई क्रम नहीं होता तथा बेतरकीब विधि से डाला जाता है जिससे उसे सड़ने में अधिक समय लगता है। इन्हें भरते समय पानी छिड़कने का भी ध्यान नहीं दिया जाता है।
सूखे के मौसम में जहाँ एक ओर खाद के गड्ढों में पानी बिल्कुल नहीं डाला जाता वहीं दूसरी ओर वर्षा ऋतु में गाँव में गली/सड़क के किनारे बने खाद के गड्ढों में अत्यधिक मात्रा में पानी भरा रहता है, जिससे अच्छी सड़ी हुई उत्तम क्वालिटी की खाद तैयार नहीं होती बल्कि वर्षा ऋतु में गली व सड़क के किनारे जगह-जगह खाद के गड्ढों में गन्दा पानी भरा रहने से गन्दगी का वातावरण निर्मित होता है।
इससे विभिन्न बीमारियों के फैलने की सम्भावना बनी रहती है। किन्तु रायपुर विधि से भू- नाडेप खाद बनाने के तरीके से परम्परागत तरीके के विपरीत बिना गड्ढा खोदे जमीन पर एक निश्चित आकार का 12 फीट लम्बा, 5 फीट चौड़ा अथवा उपलब्ध जगह के अनुसार भी लम्बाई का किन्तु 5 फीट चौड़ा ले-आउट देकर उस पर 6 इंच मोटी 4-5 प्रतिशत गोबर के घोल में डूबा हुआ जीवांश कचरा बिछाएँ। उस पर अच्छी तरह चलना चाहिए ताकि वह अच्छे से दब सके।
प्रत्येक परत पर खेत की बारीक भुरभुरी मिट्टी 50-60 किलो की परत बिछाएँ। जहाँ बायोमास सिर्फ पानी में भिगोकर डाला जाता है, उसके ऊपर पूर्ववत गोबर घोल निर्मित बायोमास की परत बिछाई जाती है।
इस तरह लगभग 5 फीट ऊँचाई तक गीले बायोमास की परत भिछाई जाती है। इसके बाद इस आयताकार ढेर को सब तरफ से मिट्टी से लेप कर दिया जाता है। बन्द करने के दूसरे तीसरे दिन जब गीली मिट्टी कुछ सख्त हो जाएँ तब गोलाकार या आयताकार टीन के डिब्बे से ढेर की लम्बाई व चौड़ाई में 9-9 इंच के अन्तर से 7-7 इंच के छेद करें। उक्त छिद्रों से हवा का आवागमन होगा और आवश्यकता पड़ने पर पानी भी डाला जा सकता है। ताकि बायोमास में पर्याप्त नमी रहे और सड़न क्रिया अच्छी तरह से हो सके।
इस तरह से भरा गया बायोमास 3 से 4 माह के भीतर भली-भाँति सड़ जाता है। इस प्रकार दुर्गन्ध रहित भुरभुरी क्वालिटी की जैविक खाद तैयार हो जाती है। वहीं दूसरी ओर गाँवों में गन्दगी कम करने में मदद मिलती है जो जन-स्वास्थ्य के लिये एक अच्छा उपाय है।

