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लाइसेंस से लेकर बिक्री, स्टॉक और मासिक रिटर्न तक का रखा जाएगा अब डिजिटल होगा रिकॉर्ड
नए नियमों का मकसद निगरानी को मजबूत करना, पर कीटनाशकों के इस्तेमाल पर नकेल के पुख्ता इंतज़ाम नहीं
असली परीक्षा बाजार से खेतों तक नियमों को प्रभावी ढंग से लागू करने की
खेती में कीटनाशकों का बेतहाशा इस्तेमाल आज दुनिया की सबसे बड़ी चिंताओं में से एक है। कृषि उत्पादों के जरिये शरीर में प्रवेश कर हमारे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहे कीटनाशकों पर लगाम लगाने के कारगर और सख्त नियमों की ज़रूरत लंबे समय से महसूस की जा रही है। सरकार ने इस ओर एक अहम कदम बढ़ाते हुए कीटनाशकों के नियंत्रण के नए नियमों को आज (15 सितंबर) से देश में लागू कर दिया है। इससे कीटनाशकों के अतिशय इस्तेमाल पर लगाम लगने की उम्मीद के साथ ही यह सवाल भी उठ रहा है कि आज से लागू हो रहा Insecticides (Amendment) Rules, 2026 कीटनाशकों पर नियंत्रण में किस तरह और कितना कारगर होगा?
15 सितंबर से लागू नए नियमों में कीटनाशक बनाने के लाइसेंस के लिए आवेदन आवेदन, बिक्री और स्टॉक के रिकॉर्ड, मासिक रिटर्न, निरीक्षण, सैंपलिंग और जांच से जुड़ी कई प्रक्रियाओं को डिजिटल किया गया है। यानी सरकार की कोशिश कीटनाशक के पूरे कारोबारी प्रवाह का ऐसा डिजिटल रिकॉर्ड तैयार करने की है, जिससे यह पता लगाना आसान हो कि कौन सा उत्पाद किसने बनाया, कहां गया, कितना स्टॉक हुआ और उसकी निगरानी कब हुई।
मोटे तौर पर यह तो यह व्यवस्था सटीक और कारगर नज़र आती है, पर सवाल यह है कि क्या डिजिटल रिकॉर्ड से खेतों में कीटनाशकों का इस्तेमाल भी कम होगा? फिलहाल इसका जवाब सीधे तौर पर ‘हां' में नहीं में नहीं दिया जा सकता। नए नियम मुख्य रूप से नियमन और निगरानी की क्षमता बढ़ाने वाले तो लगते हैं। पर इनके पर्यावरणीय फायदे तभी सामने आएंगे, जब डिजिटल जानकारी का इस्तेमाल जोखिम आधारित निरीक्षण, नकली और अवैध उत्पादों पर कार्रवाई, प्रतिबंधित उत्पादों की निगरानी को मुश्तैदी के साथ कारगर ढंग से लागू किया जा सके।
कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने Insecticides (Amendment) Rules, 2026 को 17 जून 2026 को अधिसूचित किया था। नए नियमों का सबसे अहम बदलाव यह है कि इसमें कीटनाशक बनाने के लाइसेंस के लिए आवेदन अब डिजिटल मोड में Form II के जरिए करना होगा। इसी तरह कीटनाशकों को बेचने, स्टॉक करने, बिक्री के लिए प्रदर्शित करने या वितरित करने के लाइसेंस के आवेदन भी डिजिटल होंगे। निर्धारित फीस के भुगतान के लिए भी डिजिटल व्यवस्था की गई है। मैन्युफैक्चरिंग लाइसेंस की फीस 2,000 रुपये प्रति कीटनाशक और एक आवेदन में अधिकतम 20,000 रुपये की सीमा है। यानी एक Form II में अधिकतम 10 कीटनाशकों के लिए आवेदन किया जा सकता है।
दूसरा बड़ा बदलाव रिकॉर्ड-कीपिंग से जुड़ा है। बिक्री और वितरण के साथ-साथ तकनीकी ग्रेड और फॉर्मुलेटेड कीटनाशकों से जुड़े स्टॉक रिकॉर्ड डिजिटल मोड में रखने होंगे। निर्माताओं और आयातकों को उत्पादन, आयात और बिक्री का डिजिटल रिकॉर्ड रखना होगा तथा हर महीने संबंधित रिटर्न जमा करना होगा। तकनीकी ग्रेड और फॉर्मुलेटेड कीटनाशकों के लिए Appendix D1 और D2 में मासिक विवरण लाइसेंसिंग अधिकारी को महीने की समाप्ति के 15 दिन के भीतर देना होगा।
इसका अर्थ यह है कि नियामक के पास केवल लाइसेंस का रिकॉर्ड नहीं रहेगा, बल्कि उत्पादन और बाजार में उत्पाद की आवाजाही से संबंधित लगातार अपडेट होने वाला डेटा भी उपलब्ध होगा। कागजी रजिस्टरों पर निर्भरता घटने से अलग-अलग स्तरों के रिकॉर्ड को मिलाकर देखने की संभावना बढ़ेगी। नए नियमों का मकसद कीटनाशकों के इस्तेमाल पर सीधे प्रतिबंध लगाना नहीं, बल्कि उनके लाइसेंस, उत्पादन, आयात, स्टॉक, बिक्री, निरीक्षण और जांच को डिजिटल रिकॉर्ड से जोड़कर निगरानी और ट्रेसेबिलिटी मजबूत करना है।
नए नियमों की जानकारी के मुताबिक इसके प्रमुख प्रावधानों को इस प्रकार समझा जा सकता है-
लाइसेंस आवेदन ऑनलाइन होगा
कीटनाशक बनाने के लाइसेंस तथा कीटनाशक बेचने, स्टॉक रखने, बिक्री के लिए प्रदर्शित करने या वितरण करने के लाइसेंस के लिए आवेदन डिजिटल माध्यम से करना होगा।
लाइसेंस फीस का डिजिटल भुगतान
निर्धारित लाइसेंस फीस का भुगतान भी डिजिटल माध्यम से किया जा सकेगा। विनिर्माण लाइसेंस के लिए फीस प्रति कीटनाशक ₹2,000, जबकि एक आवेदन के लिए अधिकतम ₹20,000 की सीमा निर्धारित है।
बिक्री और स्टॉक का डिजिटल रिकॉर्ड
निर्माताओं, आयातकों और वितरकों को कीटनाशकवार बिक्री, स्टॉक, उत्पादन, आयात और खरीद का रिकॉर्ड डिजिटल रूप में रखना होगा।
हर महीने डिजिटल रिटर्न देना होगा
तकनीकी ग्रेड और फॉर्मुलेटेड कीटनाशकों से संबंधित मासिक रिटर्न इलेक्ट्रॉनिक रूप में लाइसेंसिंग अधिकारी को जमा करना होगा। यह रिटर्न संबंधित महीने की समाप्ति के 15 दिनों के भीतर देना होगा।
बैच नंबर से लेकर एक्सपायरी तक की जानकारी दर्ज होगी
नए डिजिटल रिकॉर्ड में बैच नंबर, निर्माण और एक्सपायरी तारीख, उत्पादन, आयात, घरेलू खरीद, बिक्री, इस्तेमाल और बचा हुआ स्टॉक जैसी विस्तृत जानकारी दर्ज करनी होगी।
निरीक्षण की डिजिटल निगरानी
कीटनाशक निरीक्षकों को निरीक्षण, सैंपल लेने, स्टॉक जब्त करने और की गई कार्रवाई का डिजिटल रिकॉर्ड रखना होगा।
कार्रवाई का रिकॉर्ड 24 घंटे में अपलोड करना होगा
निरीक्षक द्वारा निरीक्षण या प्रवर्तन कार्रवाई किए जाने के बाद उसका डिजिटल रिकॉर्ड 24 घंटे के भीतर अपलोड करना होगा। इससे कार्रवाई की टाइमलाइन और जवाबदेही को ट्रैक करना आसान हो सकता है।
सैंपल और लैब रिपोर्ट भी डिजिटल होंगी
निरीक्षकों द्वारा लिए गए सैंपल की रसीद और प्रयोगशाला की टेस्ट रिपोर्ट डिजिटल रूप में जारी/उपलब्ध कराई जाएगी। सैंपल की जांच के लिए भेजी गई सूचना भी डिजिटल माध्यम से दी जाएगी।
स्टॉक, बिक्री और रिटर्न के नए डिजिटल फॉर्मेट
बिक्री एवं वितरण रजिस्टर, तकनीकी ग्रेड कीटनाशक स्टॉक रजिस्टर, फॉर्मुलेटेड कीटनाशक स्टॉक रजिस्टर और मासिक विवरण/रिटर्न के लिए संशोधित प्रारूप लागू किए गए हैं।
पूरी सप्लाई चेन की ट्रेसेबिलिटी मजबूत होगी
उत्पादन या आयात से लेकर खरीद, स्टॉक, बिक्री और वितरण तक डिजिटल रिकॉर्ड बनने से किसी कीटनाशक की सप्लाई चेन को पीछे तक ट्रेस करना आसान हो सकता है।
फसलों पर कीटनाशकों का ज्यादा इस्तेमाल हमारी सेहत के लिए एक बड़ा खतरा बन गया है।
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किसान को सीधे नया डिजिटल लाइसेंस नहीं लेना है, लेकिन बाजार में उपलब्ध उत्पादों की गुणवत्ता और उनकी ट्रेसेबिलिटी पर इसका अप्रत्यक्ष असर पड़ सकता है। यदि लाइसेंस और स्टॉक का डिजिटल रिकॉर्ड प्रभावी तरीके से इस्तेमाल होता है तो अधिकृत विक्रेता और अधिकृत उत्पादों की निगरानी मजबूत हो सकती है।
किसान के लिए इसका दूसरा महत्वपूर्ण पहलू है गलत, नकली या घटिया कीटनाशक मिलने पर शिकायत और जांच की बेहतर प्रक्रिया। भविष्य में यदि डिजिटल रिकॉर्ड को शिकायत प्रणालियों और उत्पाद पहचान व्यवस्था से जोड़ा जाता है, तो किसी उत्पाद के निर्माता और वितरण श्रृंखला तक पहुंचना आसान हो सकता है।
हालांकि किसान के लिए वास्तविक सुरक्षा केवल डिजिटल रिकॉर्ड से नहीं आएगी। उसे सही कीटनाशक, सही मात्रा और सही फसल के लिए सही उपयोग की जानकारी मिलना भी उतना ही जरूरी है। कृषि मंत्रालय पहले से ही एकीकृत कीट प्रबंधन (Integrated Pest Management) और जरूरत आधारित कीटनाशक उपयोग को बढ़ावा देने के लिए प्रशिक्षण और जागरूकता कार्यक्रम चलाता है।
अभीतक देश में कीटनाशकों के निर्माण, बिक्री और उपयोग का मुख्य नियामकीय ढांचा Insecticides Act, 1968 और उसके तहत बने Insecticides Rules, 1971 के तहत नियंत्रित किया जा रहा था। सरकार के पत्र सूचना कार्यालय यानी PIB की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक नए नियम यानी Insecticides (Amendment) Rules, 2026, 1971 के इन्हीं नियमों में संशोधन है। यानी यह कोई एकदम नया अलग कानून नहीं, बल्कि 1971 के नियमों का संशोधित संस्करण है।
नए नियमों को मुख्यत: कीटनाशकों की गुणवत्ता, उपयोग और बाजार में नकली/जाली या घटिया उत्पादों पर नकेल कसने के लिए लागू किया गया है। कृषि मंत्रालय के अनुसार, 2023-24 में देश में 80,789 कीटनाशक नमूनों की जांच की गई और इनमें 2,222 नमूने नकली” या “जाली” (Spurious) पाए गए। इससे पहले 2020-21 से 2024-25 के बीच 3,56,091 कीटनाशक नमूनों का विश्लेषण हुआ, जिनमें 9,088 नमूने नकली या घटिया पाए गए थे। यह आंकड़े बताते हैं कि गुणवत्ता नियंत्रण और बाजार निगरानी लगातार जरूरी है। इसके अलावा कीटनाशकों के बेतहाशा और जानकारी के बिना इस्तेमाल पर लगाम कसने की भी जरूरत महसूस किया जाना भी नए नियमों को लागू करने की एक अहम वजह है।
पुरानी कागजी व्यवस्था में अलग-अलग जगहों पर रखे गए उत्पादन, बिक्री, स्टॉक और निरीक्षण रिकॉर्ड को तेजी से मिलाकर देखना कठिन हो सकता था। डिजिटल व्यवस्था से कम से कम यह संभावना बढ़ती है कि नियामक किसी लाइसेंसधारी के रिकॉर्ड, उसके स्टॉक और बिक्री से जुड़ी जानकारी को ज्यादा व्यवस्थित ढंग से देख सके। साथ ही सरकार ने 5 जुलाई 2025 का राज्यसभा में दिए गए एक लिखित उत्तर में बताया कि नए नियमों के तहत कीटनाशकों की बेहतर निगरानी के लिए केंद्र और राज्यों के स्तर पर 12,511 कीटनाशक निरीक्षकों की नियुक्ति की गई है।
इसे सरल तरीके से समझें तो नए नियमों के तहत कीटनाशकों के नियंत्रण और निगरानी की व्यवस्था की कड़ी कुछ इस तरह होगी—
लाइसेंस आवेदन → उत्पादन/आयात → स्टॉक रिकॉर्ड → बिक्री/वितरण → मासिक रिटर्न → निरीक्षण → सैंपलिंग → प्रयोगशाला जांच → कार्रवाई
यदि इन सभी चरणों का डेटा एक-दूसरे से जुड़ता है तो नियामक के लिए किसी उत्पाद की आवाजाही की निगरानी करना आसान हो सकता है। इससे किसी बिक्री केंद्र पर संदिग्ध उत्पाद मिलने पर उसके बैच, निर्माता, स्टॉक और वितरण शृंखला से संबंधित जानकारी डिजिटल रिकॉर्ड से निकाली जा सकती है। नए नियमों के तहत मासिक रिटर्न की व्यवस्था भी महत्वपूर्ण है। महीने की समाप्ति के 15 दिन के भीतर रिपोर्ट मिलने से नियामक के पास केवल सालाना या निरीक्षण के समय मिलने वाली जानकारी के बजाय ज्यादा नियमित डेटा उपलब्ध होगा। आगे चलकर इसी डेटा का इस्तेमाल जोखिम आधारित निरीक्षण के लिए किया जा सकता है। यानी अगर किसी खास उत्पाद, निर्माता, इलाके या वितरण चैनल में असामान्य पैटर्न दिखाई दे तो वहां जांच को प्राथमिकता दी जा सके। हालांकि यह संभावित क्षमता है और वास्तविक परिणाम सामने आना अभी बाकी है।
पर्यावरण के लिहाज से नए नियमों का सबसे बड़ा संभावित लाभ यह है कि वे कीटनाशक के इस्तेमाल को सीधे कम करने के बजाय उसके नियमन को मजबूत कर सकते हैं। यदि बाजार में अनधिकृत, नकली या अवमानक उत्पादों की पहचान जल्दी होती है, तो अनियंत्रित रसायनों के पर्यावरण में पहुंचने का जोखिम घट सकता है।
पर्यावरणीय नज़रिये से देखा जाए तो, कीटनाशक केवल लक्षित कीटों पर असर नहीं डालते। इनमें इस्तेमाल किए जाने वाले कुछ रसायन मिट्टी के जीवों, परागणकर्ताओं, जलीय जीवों और अन्य गैर-लक्षित जीवों को भी प्रभावित करते हैं। खेतों से बहकर जाने वाले रसायन सतही जल और अन्य जल स्रोतों तक पहुंच कर जल प्रदूषण का कारण बन रहे हैं। इसलिए उत्पादन और बिक्री की बेहतर निगरानी से पर्यावरण संरक्षण, जल प्रदूषण पर नियंत्रण और जैव विविधता के संरक्षण में भी मदद मिलने की उम्मीद है। हालांकि, डिजिटल स्टॉक रजिस्टर अपने आप नदी में कीटनाशक पहुंचने से नहीं रोक सकता। इसके लिए खेत स्तर पर सुरक्षित उपयोग, सही मात्रा, सही समय, सुरक्षित भंडारण, खाली कंटेनरों के निपटान, बफर जोन और एकीकृत कीट प्रबंधन जैसी व्यवस्थाएं भी जरूरी हैं। यही कारण है कि नए नियमों को पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक नियामकीय आधारभूत ढांचा माना तो जा सकता है, पर अपने आप में संपूर्ण पर्यावरणीय समाधान नहीं।
किसानों को कीटनाशकों के दुष्प्रभावों के बारे में सही जानकारी न होना भी इसके अत्यधिक इस्तेमाल की एक बड़ी वजह है।
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नए नियम डिजिटल निगरानी के जरिये कीटनाशकों की प्रशासनिक निगरानी को तो मजबूत करते हैं, पर इस बात पर लगाम लगाते नहीं दिखते कि किसान किस कीटनाशक का कितना इस्तेमाल करेगा या खेत में कौन सा रसायन कितनी बार डाला जाएगा?
दूसरे शब्दों में कहें तो, इससे 'कितना उत्पादन हुआ और कहां गया' का रिकॉर्ड बेहतर हो सकता है, लेकिन 'खेत में कितना इस्तेमाल हुआ और उसका पर्यावरण पर क्या असर पड़ा' का सवाल अब भी बरकरार है। यदि भविष्य में बिक्री के डिजिटल रिकॉर्ड को फसल, क्षेत्र, उपयोग की मात्रा और पर्यावरणीय निगरानी के आंकड़ों से जोड़ा जाए, तभी जोखिम का अधिक पूरा आकलन संभव होगा।
दूसरी चुनौती डिजिटल विभाजन की है। बड़े निर्माता और संगठित कंपनियां डिजिटल अनुपालन अपेक्षाकृत आसानी से कर सकती हैं, लेकिन छोटे निर्माता, डीलर और दूरदराज के कारोबारी पोर्टल, इंटरनेट कनेक्टिविटी और तकनीकी प्रशिक्षण की समस्या का सामना कर सकते हैं। इसलिए शुरुआती दौर में हेल्पडेस्क, प्रशिक्षण, स्थानीय सहायता और पोर्टल की विश्वसनीयता महत्वपूर्ण होगी।
तीसरी चुनौती डेटा की गुणवत्ता है। डिजिटल रिकॉर्ड तभी उपयोगी होगा जब उसे सही और समय पर दर्ज किया जाए। गलत या अधूरा डेटा केवल कागज की जगह कंप्यूटर में मौजूद एक नई समस्या बन सकता है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कीटनाशक प्रबंधन का फोकस अब केवल यह तय करने पर नहीं है कि कोई रसायन बाजार में आ सकता है या नहीं। वैश्विक नियम कीटनाशक रसायनों के पूरे जीवन चक्र यानी उत्पादन से लेकर भंडारण, बिक्री, उपयोग, जोखिम नियंत्रण और निपटान तक को नियंत्रित करने की दिशा में बढ़ रहे हैं। इस संदर्भ में संयुक्त राष्ट्र का खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की कीटनाशक प्रबंधन पर अंतर्राष्ट्रीय आचार संहिता यानी International Code of Conduct on Pesticide Management में कीटनाशकों के पूरे जीवन चक्र के प्रबंधन के लिए एक स्वैच्छिक अंतरराष्ट्रीय ढांचा तैयार किया गया है। इसमें सरकारों, उद्योग और अन्य हितधारकों की साझा जिम्मेदारी पर जोर है।
इसके अलावा कीटनाशक नियंत्रण की वैश्विक दिशा को समझने के लिए कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव-विविधता ढांचा (Kunming-Montreal Global Biodiversity Framework) भी महत्वपूर्ण है। इसके Target 7 में 2030 तक प्रदूषण से जैव विविधता को होने वाले जोखिम को कम करने की दिशा में कार्रवाई और कीटनाशकों तथा अत्यधिक खतरनाक रसायनों से जुड़े जोखिम को कम करने की बात है। इसमें कीटनाशक पर्यावरणीय सांद्रता यानी pesticide environmental concentration पर नियंत्रण करना भी शामिल है।
इसी तरह यूरोपीय संघ ने भी 2020 में 2030 तक रासायनिक कीटनाशकों के उपयोग और जोखिम को 50% कम यानी आधा करने तथा सबसे खतरनाक कीटनाशकों के उपयोग को 50% कम करने के लक्ष्य तय किए हैं। इन सबकी तुलना में भारत के नए नियमों की खासियत यह है कि वे डेटा और ट्रेसेबिलिटी की आधारभूत व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में हैं। लेकिन, भारत को वैश्विक स्तर पर कीटनाशक जोखिम घटाने की दिशा में आगे बढ़ने के लिए केवल डिजिटल रिकॉर्ड से आगे जाना होगा। पर्यावरणीय जोखिम के आंकड़े, उपयोग की मात्रा, जोखिम आधारित नियमन, सुरक्षित विकल्प, एकीकृत कीट प्रबंधन (Integrated Pest Management) और अत्यधिक खतरनाक कीटनाशकों के जोखिम में कमी जैसे पहलुओं को भी मजबूत करना होगा। 15 सितंबर से लागू हुए नियमों को एक शुरुआत की तरह देखा जा सकता है। बशर्ते कि यह केवल कीटनाशक से जुड़ा डिजिटल डेटा केवल लाइसेंस और रिटर्न तक सीमित न रह जाए। यदि इसे राज्य स्तरीय निरीक्षण, प्रयोगशाला रिपोर्ट, उत्पाद के बैच, बिक्री, फसल क्षेत्र और पर्यावरणीय निगरानी से जोड़ा जाए तो भारत के पास कीटनाशक जोखिम काफी हद तक कम किया जा सकता है।
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