चन्देल और बुन्देलाकालीन जल विज्ञान के साक्ष्य

बुन्देलखण्ड परिचय


. भारत के मध्य भाग में स्थित क्षेत्र को बुन्देलखण्ड कहते हैं। इसका इलाक़ा वर्तमान उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश राज्यों में स्थित है। मूल बुन्देलखण्ड में उत्तर प्रदेश के सात जिले (झाँसी, जालौन, हमीरपुर, ललितपुर, बाँदा, महोबा और चित्रकूट) और मध्य प्रदेश के छह जिले (दतिया, टीकमगढ़, छतरपुर, पन्ना, सागर और दमोह) आते हैं। मध्य प्रदेश का नरसिंहपुर जिला, जबलपुर जिले का पश्चिमी भाग और होशंगाबाद जिले का पूर्वी भाग, अनेक दृष्टियों से बुन्देलखण्ड के काफी करीब हैं।

बुन्देलखण्ड का प्राकृतिक परिदृश्य


बुन्देलखण्ड का इलाका मुख्यतः चट्टानी है। बुन्देलखण्ड के उत्तरी भाग में ग्रेनाइट एवं नीस, दक्षिणी भाग में बेसाल्ट, सेंडस्टोन और चूनापत्थर मिलता है। उत्तरी बुन्देलखण्ड में ग्रेनाइट की कम ऊँची और दक्षिणी बुन्देलखण्ड में सेंडस्टोन की अपेक्षाकृत अधिक ऊँची पहाड़ियाँ मिलती हैं। उत्तरी और मध्य बुन्देलखण्ड में कई स्थानों पर क्वार्ट्ज-रीफ ने स्थानीय चट्टानों को काटा है। इस इलाके में क्वार्ट्ज-रीफों ने कई किलोमीटर लम्बी किन्तु समान्तर पहाड़ियों का निर्माण किया है। बुन्देलखण्ड के ग्रेनाइटी इलाको में डोलेराइट डाइकें भी मिलती हैं। इन डाइकों ने भी स्थानीय चट्टानों को काटा है। भूजल वैज्ञानिकों का मानना है कि जल संरक्षण में क्वार्ट्ज-रीफ की तुलना में, डोलेराइट डाइकों की भूमिका अपेक्षाकृत कम महत्त्वपूर्ण है। सागर और दमोह जिलों में अधिकांश पहाड़ियों की ऊँचाई 300 से 380 मीटर के बीच है। इस क्षेत्र के मैदानी हिस्सों और घाटियों में मुख्यतः बेसाल्ट पाया जाता है। यह हिस्सा लगभग पठारी है। इस क्षेत्र के दक्षिण में नर्मदा नदी की घाटी है। नर्मदा घाटी का विस्तार पूर्व-पश्चिम दिशा में है।

बुन्देलखण्ड में मिलने वाली मिट्टियों का विकास इस क्षेत्र में मिलने वाली चट्टानों की टूटन और सड़न से हुआ है। आधुनिक वैज्ञानिक भाषा में इसे भौतिक और रासायनिक प्रक्रिया से हुआ अपक्षय कहते हैं। इस अपक्षय के परिणामस्वरूप मुख्यतः तीन प्रकार की मिट्टियाँ निर्मित हुई हैं। कहीं-कहीं उनके मिश्रण (मिश्रित मिट्टियाँ) भी मिलते हैं। स्थानीय लोग इन मिट्टियों को मार, काबर और राखड़ कहते हैं। मार मिट्टी काले रंग की उपजाऊ मिट्टी है। यह मिट्टी गेहूँ और कपास के लिये मुफीद है। काबर मिट्टी अपेक्षाकृत कम उपजाऊ एवं हलके काले रंग की मिट्टी है। राखड़ मिट्टी लाल और पीले रंग की होती है। यह सबसे कम उपजाऊ मिट्टी है। बुन्देलखण्ड के मैदानी इलाकों में काबर और मार मिट्टियाँ मिलती है। झाँसी और ललितपुर के बीच के पहाड़ी इलाकों और मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों में राखड़ मिट्टी मिलती है। इस मिट्टी में रेत, बजरी और कंकड़ के कण होते हैं। कृषि वैज्ञानिक इस मिट्टी को खेती के लिये अच्छा नहीं मानते।

बुन्देलखण्ड के अधिकांश क्षेत्रों में ज़मीन पठारी और ऊबड़-खाबड़ है। बहुत से इलाकों में मिट्टी की परत की मोटाई बहुत कम है। इस पठारी और ऊबड़-खाबड़ ज़मीन में सामान्यतः लाभप्रद खेती करना कठिन होता है। आधुनिक कृषि वैज्ञानिक बताते हैं कि बुन्देलखण्ड के मध्य क्षेत्र में मिलने वाली काली मिट्टी में कार्बनिक पदार्थों और लाल मिट्टी में नाइट्रोजन और फास्फेट की कमी है।

बुन्देलखण्ड में कम ऊँची पहाड़ियाँ, संकरी घाटियाँ और घाटियों के बीच में खुले मैदान हैं। यह इलाका बंगाल की गर्म और आर्द्र एवं राजस्थान की गर्म जलवायु वाले इलाके के बीच स्थित है। यहाँ की जलवायु मुख्यतः अर्द्ध-शुष्क है। इस क्षेत्र में बरसात में अकसर बाढ़ की और गर्मी में सूखे की स्थिति बनती है। इस क्षेत्र में 90 प्रतिशत वर्षा जून से सितम्बर के बीच होती है। जुलाई और अगस्त सबसे अधिक गीले होते हैं। उत्तर के मैदानी हिस्सों को छोड़कर बाकी क्षेत्र की औसत बरसात 75 सेंटीमीटर से लेकर 125 सेंटीमीटर के बीच है। वर्षा का वितरण, असमान, अनिश्चित और निरापद खेती की दृष्टि से असनतुलित है।

बुन्देलखण्ड का लगभग पूरा क्षेत्र यमुना कछार में आता है। इस इलाके की मुख्य नदियाँ केन, बेतवा, टोंस, केल, धसान, बेबस, पहुज, उर्मिल, तेंदुआ, कुटनी, सोनार, बीला, जामनी, लखेरी और गुरुैया इत्यादि हैं। इस क्षेत्र में बड़ी नदियों का अभाव है।

आधुनिक कृषि वैज्ञानिकों ने अधिक उत्पादन लेने के लिये खेतों के ढाल, मिट्टी की किस्म, फसल, सिंचाई की आवश्यकता, सिंचाई स्रोत, जल उपलब्धता और लागत-लाभ इत्यादि के आधार पर सिंचाई की अनेक विधियों की खोज की है। वे, परिस्थितियों के अनुसार उपयुक्त सिंचाई विधि अपनाने की सलाह देते हैं। ग़ौरतलब है कि कृषि वैज्ञानिकों ने प्रयोगों के आधार पर ज्ञात किया है कि सभी प्रकार की मिट्टियाँ सिंचाई के लिये उपयुक्त नहीं होतीं। उनके अनुसार हल्की संरचना वाली कछारी मिट्टी और रेत, बजरी तथा चट्टानों के टुकड़े वाली उथली मिट्टी सिंचाई के लिये अनुपयुक्त होती हैं। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार गहरी मिट्टी वाले उन्हीं खेतों में सिंचाई करना चाहिए जो लगभग समतल हों। उल्लेखनीय है कि जलवायु, फसल की किस्म और मिट्टी के गुणों का भी उत्पादन पर प्रभाव पड़ता है।

कृषि वैज्ञानिक बताते हैं कि अधिकतम उत्पादन लेने के लिये सिंचित खेत में मिट्टी की परत की मोटाई 150 सेंटीमीटर से अधिक होना चाहिए। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार 100 सेंटीमीटर मोटाई वाली मिट्टी की परत से बहुत अधिक उत्पादन की अपेक्षा थोड़ी कठिन होती है। तीस सेंटीमीटर से कम मोटी परत में नमी अधिक देर तक नहीं टिक पाती। इस कारण उसे बार-बार सींचना पड़ता है। ऐसा करना ठीक नहीं है क्योंकि बार-बार सींचने से मिट्टी की ऊपरी उपजाऊ परत के बह जाने का खतरा होता है। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार 30 सेंटीमीटर से कम मोटाई वाली ज़मीन से, सिंचाई के बावजूद अच्छे उत्पादन की अपेक्षा नहीं होती।

कृषि वैज्ञानिकों ने बुन्देलखण्ड के दतिया, छतरपुर और टीकमगढ़ को बुन्देलखण्ड कृषि जलवायु क्षेत्र में पन्ना जिले को कैमूर कृषि जलवायु क्षेत्र में और सागर एवं दमोह को विंध्यन हिल्स कृषि जलवायु क्षेत्र में स्थित माना है। आधुनिक कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार बुन्देलखण्ड कृषि जलवायु क्षेत्र में गेहूँ और ज्वार, कैमूर कृषि जलवायु क्षेत्र में गेहूँ और धान एवं विंध्यन कृषि जलवायु क्षेत्र में मुख्यतः गेहूँ उपयुक्त फसलें हैं।

बुन्देलखण्ड के परिचय से प्रारम्भ हो तालाबों तथा परम्परागत सूखी खेती में मौजूद जल विज्ञान के अनछुए साक्ष्यों पर खत्म होती है। इसलिये, इस पुस्तक में अनेक जगह, सूखी खेती से जुड़ी जानकारियाँ और मानसून के अन्तरालों के कुप्रभावों को कम करने वाले प्रयासों से जुड़ी प्रासंगिक सामग्री सम्मिलित की गई है। हकीक़त बयान करने वाले कुछ विवरण और स्थानीय किसानों के अनुभव दर्ज किये गए हैं। यह विवरण, जल विज्ञान की गहरी समझ, पानी और नमी की भूमिका तथा उसके योगदान को रेखांकित तथा उजागर करता है।उपर्युक्त प्राकृतिक परिस्थितियों में ही बुन्देलखण्ड की धरती पर भारतीय जल विज्ञान और जल प्रणालियों का विकास हुआ है। विकास यात्रा में अनुभव सहेजे गए हैं। अनुभवों को मार्गदर्शक स्वरूप प्रदान किया गया है। अगले पन्नों में जल विज्ञान और जल प्रणालियों के तकनीकी बिन्दुओं पर सिलसिलेवार चर्चा की गई है।

बुन्देलखण्ड में जल विज्ञान और जल प्रणालियाँ


बुन्देलखण्ड में मानवीय गतिविधियों का विकास का क्रम लगभग वही रहा होगा जो प्रदेश के अन्य क्षेत्रों में था इसलिये तत्कालीन पशुपालक तथा खेतिहर समाज ने आजीविका को सुनिश्चित करने की दृष्टि से सबसे पहले मौसम तथा स्थानीय बरसात के चरित्र को समझा होगा। बरसात के चरित्र की अनिश्चितता को समझने के बाद सूखे अन्तरालों की चुनौतियों से निजात पाने की रणनीति का विकास शुरू हुआ होगा। इसी कारण, बुन्देलखण्ड पानी की स्थानीय पाठशाला बना होगा। पानी को केन्द्र में रखकर, निरापद सूखी खेती तथा विभिन्न मिट्टियों के व्यवहार पर सतत चिन्तन-मनन हुआ होगा। सबसे पहले अधिक पानी चाहने वाली फसलों और केवल ओस में पकने वाली फसलों को पहचाना गया होगा। बरसात के मौसम में आने वाले सूखे किन्तु अनिश्चित अन्तरालों में मिट्टी में घटती नमी के विभिन्न बरसाती फसलों पर पड़ने वाले प्रभाव को समझा गया होगा। उसे समझने के बाद, खेतों की स्थिति और मिट्टी की परत की मोटाई के अनुसार उनमें उपयुक्त खरीफ फसलें बोने का सिलसिला प्रारम्भ हुआ होगा। बरसात के बाद, धरती की नमी तथा ओस के योगदान की समझ के आधार पर शीतकालीन फसलों का सिलसिला प्रारम्भ हुआ होगा। बीज, मिट्टी और पानी के अन्तरसम्बन्ध पर सैकड़ों सालों तक करके देखो और चिन्तन-मनन के बाद ही निरापद सूखी खेती की समझ बनी होगी। इसी कारण, पानी और नमी का अन्तर स्पष्ट हुआ होगा। इसी समझ ने बरसात के वितरण, खेतों की स्थिति तथा मिट्टी के आधार पर बरसाती खेती और मिट्टी, नमी और ओस के आधार पर शीतकालीन सूखी खेती की यह आसान की होगी।

इस अध्याय की कहानी बुन्देलखण्ड के परिचय से प्रारम्भ हो तालाबों तथा परम्परागत सूखी खेती में मौजूद जल विज्ञान के अनछुए साक्ष्यों पर खत्म होती है। इसलिये, इस पुस्तक में अनेक जगह, सूखी खेती से जुड़ी जानकारियाँ और मानसून के अन्तरालों के कुप्रभावों को कम करने वाले प्रयासों से जुड़ी प्रासंगिक सामग्री सम्मिलित की गई है। हकीक़त बयान करने वाले कुछ विवरण और स्थानीय किसानों के अनुभव दर्ज किये गए हैं। यह विवरण, जल विज्ञान की गहरी समझ, पानी और नमी की भूमिका तथा उसके योगदान को रेखांकित तथा उजागर करता है। यह रेखांकन एक ओर यदि खरीफ तथा रबी की असिंचित फसलों को निरापद बनाते नजर आता है तो दूसरी ओर फसलों तथा कृषि पद्धतियों की विविधता के माध्यम से परिमार्जित होते जल विज्ञान और जल प्रणालियों का यथार्थ पेश करता है। इस अध्याय में जल विज्ञान की चुनौतियों और योगदान को केन्द्र में रखकर भारतीय तथा पाश्चात्य जल विज्ञान के दृष्टिबोध की जगह-जगह सांकेतिक चर्चा की है। इस सांकेतिक चर्चा के कारण अनेक बार विषय से भटकाव प्रतीत होता है पर वह भटकाव न केवल कुछ साक्ष्य पेश करता है वरन अनेक मामलों में सोचने का अवसर तथा दिशाबोध भी प्रदान करता है।

इस अध्याय में बुन्देलखण्ड में चन्देल और बुन्देलाकालीन तालाबों, कुओं, बावड़ियों और खेतों में बनने वाली बंधियाओं का संक्षिप्त विवरण पेश किया है। इस विवरण का उद्देश्य चन्देल और बुन्देलाकालीन जल विज्ञान और जल प्रणालियों को समझने के लिये दृष्टिबोध प्रदान करना है। प्रसंगवश जानना उचित होगा कि बुन्देलखण्ड के काफी बड़े भूभाग पर चन्देल राजाओं ने दसवीं से तेरहवीं सदी तक और बुन्देला राजाओं ने पन्द्रहवीं सदी के मध्यकाल से अट्ठारहवीं सदी तक राज किया था। इन सभी राजाओं ने तालाबों के निर्माण में रुचि ली और खेती को निरापद बनाने वाली जल प्रणालियों को आगे बढ़ाया। तालाबों तथा परम्परागत खेती में मौजूद साक्ष्यों से पता चलता है कि एक ओर यदि तालाबों, कुओं और बावड़ियों की उपयुक्तता, उनके दीर्घ जीवन का रहस्य और स्थल चयन का आधार, भारतीय जल विज्ञान की समझ, शिल्पियों की दक्षता और समाज की आकांक्षाओं का प्रतिबिम्ब था तो दूसरी ओर खेतों में बनने वाली बंधियाओं से जुड़ा विवरण, ऐसा अकाट्य साक्ष्य प्रस्तुत करता है जो बुन्देलखण्ड के मौसम के उतार-चढ़ाव को झेलती और धरती के साथ तालमेल बिठाती सूखी खेती को यथासम्भव निरापद बनाता था।

बुन्देलखण्ड में जल संचय एवं जल दोहन की समृद्ध परम्परा रही है। इसके अन्तर्गत मुख्यतः तालाब, कुएँ, बावड़ियाँ और खेतों के निचले हिस्से में कच्ची एवं अस्थायी बंधियाओं का निर्माण किया गया था। इस किताब में बूँदों की इन विरासतों का संक्षिप्त परिचय देकर उनके वैज्ञानिक पक्ष की संक्षिप्त चर्चा की गई है।

श्रुतियों के अनुसार कूप, वापी, पुष्करनी और तड़ाग पानी उपलब्ध कराने या उसका संचय करने वाली संरचनाएँ हैं। इन संरचनाओं को खोदकर बनाया जाता है। कूप की लम्बाई-चौड़ाई या व्यास पाँच हाथ से पचास हाथ (एक हाथ = लगभग 0.46 मीटर) होता है। सीढ़ीदार कुएँ, जिसका व्यास पचास से एक सौ हाथ होता है, को वापी (बेर) कहते हैं। वापी में चारों ओर से या तीन ओर से या दो ओर से या केवल एक ओर से सीढ़ियाँ बनाई जाती हैं। सौ से एक सौ पचास हाथ व्यास अथवा लम्बाई के तालाब को पुष्करनी कहते थे। तड़ाग की लम्बाई या व्यास दो सौ से आठ सौ हाथ होता है। चन्देल राजाओं ने पुष्करनी को छोड़कर कूप, वापी और तड़ागों का निर्माण कराया था। लगता है, कूप, वापी और तड़ागों के निर्माण को स्थानीय परिस्थितियों ने नियंत्रित किया है।

चन्देलों ने विभिन्न आकार के तालाब बनवाए थे। चित्र सोलह में टीकमगढ़ का वीर सागर तालाब दर्शाया गया है। चन्देल राजा मदनवर्मन ने टीकमगढ़ जिले के मदनपुर ग्राम में 27.14 हेक्टेयर का मदनसागर तालाब बनवाया था। इस राजा द्वारा महोबा में बनवाया मदनसागर तालाब पूरे बुन्देलखण्ड प्रसिद्ध है। इस राजा के नाम से अनेक बावड़ियों का भी निर्माण हुआ है। इन बावड़ियों को मदन-बेरे भी कहा जाता है। अकेले टीकमगढ़ के बलदेवगढ़ बहार, पपावनी, झिनगुंवा, जिनागढ़ इत्यादि स्थानों में इनके अवशेष देखे जा सकते हैं। मदनवर्मन ने टीकमगढ़ जिले में एक हजार से अधिक तालाब बनवाए थे इसलिये इतिहास में उसकी पहचान सर्वाधिक तालाबों का निर्माण कराने वाले राजा के रूप में है।

पन्द्रहवीं सदी के मध्यकाल से लेकर अट्ठारहवीं सदी तक बुन्देलखण्ड पर बुन्देला राजाओं का आधिपत्य रहा। छत्रसाल सहित लगभग सभी बुन्देला राजाओं ने तालाब निर्माण की चन्देल परिपाटी को आगे बढ़ाया। उन्होंने चन्देल काल में बने कुछ तालाबों की मरम्मत की, कुछ का पुनर्निर्माण किया और अनेक नए तालाब बनवाए। कुछ तालाबों से सिंचाई के लिये नहरें निकालीं। उनके शासनकाल में बनाए तालाबों का आकार अपेक्षाकृत बड़ा था जो यह सिद्ध करता है कि चन्देल काल में जल विज्ञान की समझ, तालाब निर्माण की तकनीक और उसे प्रभावित एवं नियंत्रित करने वाले घटकों पर जल वैज्ञानिकों की निर्णायक पकड़ थी।गौरतलब है कि चन्देल कालीन तालाबों का निर्माण इतना सटीक था कि उनके फूटने के उदाहरण नहीं मिलते। चन्देल कालीन तालाबों के निर्माण में शिल्पियों ने व्यावहारिक समझदारी का ऐसा जोरदार गणित बैठाया था कि चाहे जितना पानी बरसे, वह (पानी) बाँध की पाल को लाँघ कर नहीं बहता था। चन्देल तालाबों में बाँध की ऊँचाई और वेस्टवियर की चौड़ाई में 1:7 का या उससे भी अधिक का अनुपात रखा जाता था। पाल के दोनों सिरों पर छोटी पहाड़ियों, पठारों या चारागाहों (चरचरी) की जमीन को काटकर, सही ऊँचाई पर वेस्टवियर का निर्माण किया जाता था। यही वे कुछ सांकेतिक साक्ष्य हैं जो बुन्देलखण्ड में निर्मित तालाबों में भारतीय जल विज्ञान का उजला पक्ष प्रस्तुत करते हैं।

बुन्देलखण्ड में तालाब निर्माण का कार्य राजाओं के अलावा सम्पन्न लोगों ने भी कराया था इसलिये हर गाँव में कम-से-कम एक तालाब अवश्य मिलता है। दक्षिणी बुन्देलखण्ड (सागर, दमोह और पन्ना क्षेत्र) में कम तालाब बनवाए गए हैं। उल्लेखनीय है कि सागर जिले की खुरई, देवरी और सागर के आसपास का इलाक़ा और दमोह जिले का हटा का इलाका काली मिट्टी का नमी सहेजने वाला इलाका है, इसलिये प्रतीत होता है कि इस इलाके में तालाबों के निर्माण को वरीयता नहीं मिली।

चन्देलों द्वारा बनवाए तालाबों को मुख्यतः निम्न दो वर्गो में बाँटा जा सकता है-

अ. पेयजल और स्नान हेतु तालाब-इन तालाबों पर घाट बनाए जाते थे।
ब. सिंचाई और पशुओं के लिये निस्तारी तालाब

चन्देलों द्वारा बनवाए तालाबों का एक और वर्गीकरण है। यह वर्गीकरण अधिक प्रसिद्ध है। इस वर्गीकरण के अन्तर्गत तालाबों को निम्नलिखित दो वर्गो में बाँटा जाता है-

क. स्वतंत्र तालाब (स्वतंत्र एकल संरचना)
ख. तालाब शृंखला (सम्बद्ध तालाबों की शृंखला, सांकल या शृंखलाबद्ध तालाब)

पन्द्रहवीं सदी के मध्यकाल से लेकर अट्ठारहवीं सदी तक बुन्देलखण्ड पर बुन्देला राजाओं का आधिपत्य रहा। छत्रसाल सहित लगभग सभी बुन्देला राजाओं ने तालाब निर्माण की चन्देल परिपाटी को आगे बढ़ाया। उन्होंने चन्देल काल में बने कुछ तालाबों की मरम्मत की, कुछ का पुनर्निर्माण किया और अनेक नए तालाब बनवाए। कुछ तालाबों से सिंचाई के लिये नहरें निकालीं। उनके शासनकाल में बनाए तालाबों का आकार अपेक्षाकृत बड़ा था जो यह सिद्ध करता है कि चन्देल काल में जल विज्ञान की समझ, तालाब निर्माण की तकनीक और उसे प्रभावित एवं नियंत्रित करने वाले घटकों पर जल वैज्ञानिकों की निर्णायक पकड़ थी। तालाबों के आकार में हुई उत्तरोत्तर वृद्धि सिद्ध करती है कि बुन्देलखण्ड की धरती पर भारतीय जल विज्ञान का क्रमिक विकास हुआ था। उसी विकास ने दीर्घायु जल संरचनाओं के निर्माण का रास्ता सुगम किया।

अनुपम मिश्र ने महाराजा छत्रसाल के बारे में एक कहानी का जिक्र किया है। इस कहानी के अनुसार छत्रसाल के बेटे जगतराज को गड़े हुए खजाने के बारे में एक बीजक मिला था। बीजक में अंकित सूचना के आधार पर जगतराज ने खजाना खोद लिया। जब इसकी जानकारी महाराजा छत्रसाल को लगी तो वे बहुत नाराज हुए। उन्होंने अपने बेटे को उस धन की मदद से चन्देल राजाओं द्वारा बनवाए सभी तालाबों की मरम्मत और नए तालाब बनवाने का आदेश दिया। कहा जाता है कि उस धन से 22 विशाल तालाबों का निर्माण हुआ। यह कहानी, तालाब निर्माण तकनीकों की सहज उपलब्धता, सामाजिक स्वीकार्यता और गड़े धन को परोपकार के कामों पर खर्च करने के सोच को उजागर करती है। बुन्देलों की नजर में परोपकार का अर्थ तालाब बनवाना या उनकी मरम्मत करवाना था। चित्र सत्रह में टीकमगढ़ का महेन्द्र सागर तालाब दर्शाया गया है।

कहा जाता है कि निर्माण लागत की दृष्टि से बुन्देला राजाओं द्वारा बनवाए तालाब, चन्देल राजाओं द्वारा बनवाए तालाबों की तुलना में महंगे और निर्माण की दृष्टि से जटिल थे बुन्देला तालाबों की जल संग्रहण क्षमता अधिक थी। वे पानी/नमी की बढ़ती आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये अधिक मुफीद, अधिक वैज्ञानिक और दीर्घजीवी थे दूसरे शब्दों में, वे बुन्देलखण्ड में उपलब्ध उन्नत भारतीय जल विज्ञान और निर्दोष निर्माणकला के कालजयी साक्ष्य थे। इन विशाल तालाबों का रखरखाव राजकीय अमले के द्वारा किया जाता था वहीं निजी तालाबों के रखरखाव की जिम्मेदारी ग्रामवासियों की थी।

बुन्देलखण्ड के राजाओं द्वारा बसाहट के निकट और छोटी-छोटी पहाड़ियों के ढाल पर बनवाए तालाब सामान्यतः छोटे आकार के हैं। ग़ौरतलब है कि बुन्देलखण्ड के कुछ इलाकों में, जहाँ छोटे आकार के तालाब बनाने के लिये उपयुक्त स्थल और अधिक मात्रा में बरसाती पानी मिलता था, वहाँ राजाओं ने पानी सहेजने के लिये तालाबों की शृंखलाएँ बनवाई थी। जो बरसाती पानी के अधिकतम संचय की साक्ष्य थीं। यह साक्ष्य स्थानीय टोपोग्राफी के सदुपयोग और रन-आफ के बुद्धिमत्तापूर्ण उपयोग का द्योतक है।

बुन्देलखण्ड के राजाओं ने उपयुक्त भौगोलिक परिस्थितियों में विशाल जलाशयों का भी निर्माण कराया था। बड़े तालाबों को सागर कहा जाता था। कुछ स्थानीय लोग, विशाल तालाबों को बनवाने वाले राजा की कीर्ति और उसकी महानता के प्रतीक के रूप में देखते हैं। इन तालाबों का नाम, उनको बनवाने वाले राजाओं के नाम पर रखा जाता था। बुन्देलखण्ड में बने विशाल तालाबों में कीरतसागर, मदनसागर और रहेलियासागर प्रमुख तालाब हैं।

चन्देल राजाओं के बाद जल संचय की परम्परा को आगे बढ़ाने का सिलसिला बुन्देला राजाओं के शासनकाल में भी जारी रहा। ओरछा नरेश महाराजा प्रतापसिंह ने 7086 कुएँ-बावड़ियाँ, 73 नए तालाब बनवाए और 450 चन्देल तालाबों का जीर्णोंद्धार कराया था। इनमें कुछ मिट्टी के तो कुछ चूने से जुड़े पक्के तालाब थे। महाराजा प्रतापसिंह ने सिंचाई सुविधा के लिये स्लूइस बनवाए और खेतों तक नहरों का निर्माण करवाया। तालाब बनवाने का सिलसिला विकसित बसाहटों तक सीमित नहीं था। कहा जाता है कि चन्देल और बुन्देला राजाओं ने टीकमगढ़ जिले के सघन वन क्षेत्रों में जंगली जीवों और जनजातीय लोगों के लिये लगभग 40 तालाब, बनवाए थे। इनमें से अभी भी 24 तालाब अस्तित्व में हैं। इतने सालों तक इन तालाबों का बने रहना बेहतर तकनीकी समझ का जीता-जागता प्रमाण है।

पिछले कुछ सालों में बुन्देलखण्ड के प्राचीन तालाबों के विभिन्न घटकों की भूमिका को ग्रहण लगा है। सबसे अधिक नुकसान तालाबों के कैचमेंटों का हुआ है। लगभग सभी कैचमेंटों में जंगल कटे हैं। उनके चारागाह विलुप्त हुए हैं। उनमें भूमि कटाव बढ़ा है। भूमि कटाव के कारण मुक्त हुई मिट्टी (गाद) पुराने तालाबों में जमा हो रही है। कैचमेंटों की भूमिका पर ग्रहण लगने के कारण तालाबों में गाद जमा होने लगी है। गाद जमा होने के कारण पुराने तालाबों की मूल भूमिका खतरे में पड़ गई है।अनुपम मिश्र कहते हैं कि तालाब निर्माण की परम्परा को समाज और बंजारों ने भी आगे बढ़ाया था। इसी क्रम में लाखा बंजारा द्वारा सागर नहर में बने तालाब का जिक्र मौजूं है। कहा जाता है कि पुराने वक्त में हजारों पशुओं का कारवाँ लेकर बंजारे व्यापार के लिये निकलते थे। वे गन्ने के क्षेत्र से धान के क्षेत्र में गुड़ ले जाते और फिर वहाँ से धान लाकर दूसरे इलाकों में बेचते थे। बंजारों के कारवाँ में सैकड़ों की तादाद में चरवाहे होते थे। बंजारे जहाँ पड़ाव डालते वहाँ पानी का प्रबन्ध होना आवश्यक होता था इसलिये जहाँ वे जाते वहाँ यदि पहले से बना तालाब नहीं होता तो वे वहाँ तालाब बनाना अपना कर्तव्य समझते थे। ऐसे ही किसी लाखा बंजारे ने सागर शहर में विशाल तालाब बनवाया था। यह उदाहरण इंगित करता है कि भारतीय जल विज्ञान तथा तालाबों के निर्माण की कला समाज की धरोहर थी और समाज का हर वर्ग उनके निर्माण के लिये स्वतंत्र था। बुन्देलखण्ड क्षेत्र के लोगों के अनुसार आज भी, हर गाँव में कम-से-कम एक पुराना तालाब जरूर है। आज भले ही पुराने तालाब बदहाली झेल रहे हों या विलुप्त हो गए हों, पर गुजरे वक्त में उन्होंने बखूबी अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह किया था।

मध्य प्रदेश के झील संरक्षण प्राधिकरण द्वारा प्रकाशित लेख एटलस में कुछ प्रमुख तालाबों की सूची, मौजूदा आकार, गाद की स्थिति और पानी की गुणवत्ता के बारे में संक्षिप्त विवरण दिया गया है। उपर्युक्त एटलस के अनुसार दतिया, टीकमगढ़, छतरपुर और पन्ना जिलों में बने कुछ पुराने तालाबों का विवरण निम्नानुसार है-

जिला

तालाब का नाम

प्रकार, वर्तमान क्षेत्रफल, गहराई और समस्या

दतिया

करनसागर

मिट्टी का बाँध, 20 हेक्टेयर एवं 6 मीटर, गाद भराव और बिगड़ती गुणवत्ता

सीतासागर

मिट्टी का बाँध, 25 हेक्टेयर एवं 8 मीटर, गाद भराव और बिगड़ती गुणवत्ता

लाला का ताल

मिट्टी का बाँध, 148 हेक्टेयर एवं 7 मीटर, गाद भराव और बिगड़ती गुणवत्ता

असनई ताल

मिट्टी का बाँध, 15 हेक्टेयर एवं 6.5 मीटर, गाद भराव और बिगड़ती गुणवत्ता

नया ताल

मिट्टी का बाँध, 8 हेक्टेयर एवं 5 मीटर, गाद भराव और बिगड़ती गुणवत्ता

राधासागर

मिट्टी का बाँध, 2 हेक्टेयर एवं 4 मीटर, गाद भराव और बिगड़ती गुणवत्ता

रामसागर

मिट्टी का बाँध, 5 हेक्टेयर एवं 6 मीटर, गाद भराव और बिगड़ती गुणवत्ता

लक्ष्मणताल

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