जलग्रहण विकास - क्या, क्यों, कैसे, पद्धति एवं परिणाम
24 Aug 2018
Soil conservation

5.1 प्रस्तावना : (Introduction)
5.1.1 प्रादेशिक समस्याएँ


राजस्थान के प्राकृतिक संसाधन बहुमूल्य है परन्तु अधिकतर क्षेत्र सूखा-ग्रस्त पहाड़ी एवं मरुस्थलीय है। बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण दिनों-दिन समस्याएँ बढ़ती जा रही हैं; जैसे-

1. पर्यावरण का बिगड़ना
2. वन क्षेत्र का घटना
3. कृषि योग्य भूमि का क्षरण
4. भूमि का कटाव
5. भूजल का गिरता स्तर
6. बेरोजगारी एवं गरीबी
7. खाद्यान्न उत्पादन में अस्थिरता

5.1.2 राजकीय प्रयास
इन सभी प्रमुख समस्याओं के समाधान के लिये राजस्थान सरकार ने जल ग्रहण अवधारणा को ग्रामीण विकास का माध्यम बनाने के उद्देश्य से सूखा सम्भाव्य क्षेत्र विकास कार्यक्रम, मरुक्षेत्र विकास कार्यक्रम, आश्वासित रोजगार योजना एकीकृत बंजर भूमि विकास परियोजना, राष्ट्रीय जलग्रहण विकास परियोजना कार्यक्रमों को लागू किया है।

जलग्रहण कार्यक्रम ग्रामीण समाज का, ग्रामीण समाज द्वारा एवं ग्रामीण समाज के लिये चलाया जाने वाला कार्यक्रम है जिसमें सरकारी तंत्र की भागीदारी सहयोगी, समन्वयक तथा उत्प्रेरक की होगी।

5.1.3 जलग्रहण क्षेत्र क्या है
जलग्रहण क्षेत्र भूमि की एक ऐसी इकाई है जिसका जल निकास एक ही बिन्दु/स्थान पर होता है। यह क्षेत्र कुछ हेक्टेयर से लेकर कई वर्ग किलोमीटर का हो सकता है। जलग्रहण क्षेत्र ही ग्रामीण विकास कार्यक्रम की नई इकाई है जिसका केंद्र बिन्दु ग्रामीण समाज है।

जलग्रहण क्षेत्र क्या हैजलग्रहण क्षेत्र क्या है 5.1.4 जलग्रहण क्षेत्र ही विकास की इकाई क्यों?
मिट्टी और पानी जैसे प्राकृतिक संसाधनों का सीधा संबंध प्रशासनिक इकाइयों से न होकर जलग्रहण क्षेत्र से है। अतः प्राकृतिक संसाधनों के विकास कार्यक्रम को प्रशासनिक इकाइयों के स्थान पर जलग्रहण क्षेत्र के आधार पर लिया जाना अधिक तर्कसंगत एवं प्रभावी है।

5.1.5 जलग्रहण क्षेत्र का क्षेत्रफल
राजस्थान में जलग्रहण क्षेत्र के चयन के लिये “जलग्रहण एटलस” उपलब्ध है। इस एटलस में जिलेवार एवं पंचायत समितिवार नाम उपलब्ध है तथा प्रत्येक पंचायत समिति के नामों में मैक्रो एवं माइक्रो जलग्रहण क्षेत्रों का सीमांकन/रेखांकन वैज्ञानिक आधार पर किया गया है। साथ ही प्रत्येक पंचायत समिति के अन्तर्गत आने वाले विभिन्न मैक्रो जलग्रहण क्षेत्रों एवं उनके अधीन आने वाले माइक्रो जलग्रहण क्षेत्र का कुल क्षेत्रफल एवं भू उपयोग विवरण भी तालिका के रूप में उपलब्ध कराया गया है। प्रत्येक माइक्रो जलग्रहण क्षेत्र का क्षेत्रफल कुछ हेक्टेयर से लेकर कई हजार हेक्टेयर तक का हो सकता है। प्रत्येक माइक्रो जलग्रहण क्षेत्र के उपचार हेतु प्राथमिकता निर्धारित है जिसके अनुसार जिन जलग्रहण क्षेत्रों में कृषि भूमि के उपलब्धता एवं निकास नालियों की सघनता अधिक है उन्हें उपचार में प्राथमिकता दी गई है। भारत सरकार के स्तर से वर्ष 2008-09 में जारी जलग्रहण क्षेत्र विकास हेतु काॅमन मार्गदर्शिका के अनुसार वैज्ञानिक आधार पर चयनित जलग्रहण क्षेत्रों को उपचार हेतु प्राथमिकता के आधार पर चयनित किया जाना है।

उक्त काॅमन मार्गदर्शिका के आने से पूर्व अर्थात 31 मार्च 2008 तक स्वीकृत एवं क्रियान्वित किये जा रहे जलग्रहण क्षेत्रों का क्षेत्रफल सामान्यतः 500 हेक्टेयर लिया जाता था। पूर्व में यह माना जाता था कि सामान्यतः एक गाँव का क्षेत्रफल 500 हेक्टेयर के आस-पास होता है तथा इसे पूर्व की हरियाली एवं वरसा जन सहभागिता मार्गदर्शिका में उपचार हेतु इकाई माना गया था। समन्वित बंजर भूमि विकास कार्यक्रम के अन्तर्गत वास्तविक मैक्रो जलग्रहण क्षेत्र उपचार हेतु लिये जाते थे। प्रत्येक माइक्रो जलग्रहण क्षेत्र में गतिविधियों का क्रियान्वयन ऊपरी भाग से प्रारम्भ करते हुए निचले भाग की ओर किया जाता है। प्रत्येक जलग्रहण क्षेत्र में उपचार से पूर्व सर्वेक्षण किया तब जाकर जलग्रहण क्षेत्र की सीमा की पहचान/पुष्टि कर ली जाती है एवं जलग्रहण क्षेत्र के एटलस के नामों को उसी स्केल के राजस्व नामों के ऊपर (Superimpose) के बाद वास्तविक उपचार हेतु गतिविधियों की आयोजना की जाती है।

5.1.6 जलग्रहण विकास से जुड़े विभिन्न कार्यक्रम
ग्रामीण विकास मंत्रालय भारत सरकार

i. सूखा सम्भाव्य क्षेत्र विकास कार्यक्रम (डी.पी.ए.पी.)
ii. मरुक्षेत्र विकास कार्यक्रम (डी.डी.पी.)
iii. समन्वित बंजर भूमि विकास कार्यक्रम (आई. डब्ल्यू.डी.पी.)
iv. कृषि मंत्रालय, भारत सरकार
v. राष्ट्रीय जलग्रहण विकास परियोजना (एन.डब्ल्यू.पी.)

5.1.7 कार्य क्रम के उद्देश्य
जलग्रहण विकास कार्यक्रम को भारत सरकार द्वारा लागू कई कार्यक्रमों में शामिल किया गया है। इनके उद्देश्य अलग-अलग हैं। ग्रामीण विकास मंत्रालय के जलग्रहण विकास सम्बन्धी कार्यक्रमों के उद्देश्य निम्न प्रकार हैं-

क्र.सं

कार्यक्रम

उद्देश्य

1.

मरु विकास कार्यक्रम

वनों का प्रसार करना, गर्म एवं ठंडे रेगिस्तान के प्रसार को रोकना।

2.

सूखासम्भाव्य क्षेत्र विकास

अकृषि भूमि एवं जल निकास नालियों में मिट्टी जल का संरक्षण, कृषि एवं वन, चारागाह, बागवानी, आदि का विकास तथा भूमि का दूसरे उपयोगी कार्यों हेतु विकास करना।

3.

समन्वित बंजर भूमि विकास कार्यक्रम

निजी स्वामित्व की कृषि भूमि, गाँव की सामूहिक भूमि एवं सरकारी भूमि के बंजर हिस्सों में मिट्टी पानी का संरक्षण एवं चारागाह तथा वनों का विकास करना।

इन कार्यक्रमों का प्राथमिक ध्येय मिट्टी एवं पानी का संरक्षण कर ज्यादा फसल उत्पादन करना है। इस ध्येय को पूरा करने हेतु जन भागीदारी को कार्यक्रम का अभिन्न अंग माना गया है। जिससे मिट्टी और पानी जैसी प्राकृतिक सम्पदा पर ग्रामीण समाज द्वारा अधिक ध्यान दिया जायेगा व जलग्रहण विकास कार्यक्रम में ग्रामीण समाज की रूचि बढ़ाने से निम्न उद्देश्यों को पूरा किया जा सकेगा-

1. गाँव के ग्रामीण समुदाय का आर्थिक विकास करना जो कि प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से जलग्रहण विकास पर निर्भर करता है।

(अ) जलग्रहण क्षेत्र में पाये जाने वाले प्राकृतिक साधन जैसे- भूमि, पानी वनस्पति आदि का पूरा-पूरा उपयोग करना, इससे सूखे का विपरीत प्रभाव कम होगा एवं वातावरण का ह्रास रुकेगा।

(ब) ग्रामवासियों के लिये रोजगार सृजन होगा तथा सामाजिक एवं आर्थिक प्रगति के साथ-साथ ग्रामीणों की आमदनी एवं बचत को बढ़ावा मिलेगा।

2. गाँव में पारिस्थितिकीय/पर्यावरण संतुलन बनाये रखने को बढावा देना

(अ) जलग्रहण क्षेत्र में सृजित सम्पत्तियों के संचालन, संधारण तथा उनके और विकास हेतु ग्रामीण समुदाय द्वारा लगातार प्रयास करना।

(ब) जलग्रहण क्षेत्र की समस्याओं के समाधान हेतु स्थानीय ज्ञान एवं मौजूदा साधनों को काम में लेकर सरल, आसान एवं सस्ती तकनीकों का विकास करना।

3. जलग्रहण क्षेत्र के गरीब, पिछड़े हुए एवं संसाधनहीन व्यक्तियों की सामाजिक एवं आर्थिक प्रगति पर विशेष ध्यान देना।

(अ) भूमि एवं जल स्रोतों के विकास से प्राप्त फायदों एवं वित्तीय स्रोतों का क्षेत्र के ग्रामीणों में बराबर बँटवारा करना।

(ब) आमदनी बढ़ाने वाले स्रोतों का ज्यादा से ज्यादा विकास एवं मानवीय संसाधनों के विकास पर बल देना।

उपरोक्त नीति को लचीला रखना जरूरी है ताकि ग्रामीण समाज के परम्परागत ज्ञान एवं कौशल का समावेश कर समस्याओं पर विजय प्राप्त की जा सके।

5.1.8 कार्य प्रणाली
कार्यप्रणाली के अन्तर्गत योजना का उदय विकास की सबसे छोटी इकाई अर्थात गाँव से होगा। स्थानीय समस्याओं एवं परिस्थितियों की भिन्नता के कारण कार्यक्रम के योजना घटकों तथा उपचार विधियों में भिन्नता हो सकती है। कार्यक्रम के सफल क्रियान्वयन के लिये यह आवश्यक है कि जिन लोगों के लिये यह कार्यक्रम चलाया जा रहा है वे कार्यक्रम में पूर्ण रूचि लें एवं कार्यक्रम को समझें। सबसे अच्छा तरीका तो यह है कि ग्रामीण स्वयं अपने गाँव के विकास के लिये आवश्यकतानुसार योजना बनाएँ, जैसे खेत पर क्या फसल लेनी है, कहीं डोल बनानी है? इस योजना के अनुरूप ग्रामीण स्वयं कार्य कराएँगे व कार्यों के पूर्ण होने पर उनका संधारण व संचालन भी करेंगे।

5.1.9 कार्यक्रम के मुख्य तत्व
i. सामुदायिक संगठन एवं प्रशिक्षण
ii. जनसहभागिता
iii. कृषि योग्य भूमि पर संरक्षण एवं उत्पादन पद्धतियाँ
iv. अकृषि योग्य भूमि पर संरक्षण एवं उत्पादन पद्धतियाँ
v. नाला उपचार
vi. पशुधन विकास
vii. नर्सरी विकास
viii. आय वृद्धि हेतु अन्य घरेलू उत्पादन पद्धतियाँ

5.1.10 कार्यक्रम से जुड़ी चुनौतियाँ
i. समस्त लाभान्वितों की सहभागिता सुनिश्चित करना (जन आन्दोलन बनाना)
ii. क्रियान्वयन की परम्परागत सोच (ऊपर से नीचे) को बदलकर नई कार्य पद्धति लागू करना (नीचे से ऊपर)
iii. स्थानीय परम्परागत ज्ञान एवं नवीनतम वैज्ञानिक/अभियांत्रिकी तकनीक से स्थानीय समस्याओं का समाधान करना।
iv. कार्यक्रम से समाज के आर्थिक रूप से पिछड़े हुए परिवारों अनुसूचित जातियों, एवं जन-जातियों को बराबर लाभ पहुँचाना।
v. कार्यक्रम द्वारा अर्जित संसाधनों एवं लाभों का बराबर बँटवारा।
vi. कार्यक्रम द्वारा निर्मित परिसम्पत्तियों का रख-रखाव।

5.2 परियोजना क्रियान्वयन एजेंसी द्वारा सम्पादित गतिविधियाँ (Activities to be implemented by the Project Implementation Agency PLA)
जलग्रहण विकास कार्यक्रम का समयबद्ध एवं बेहतर (उत्कृष्ट) क्रियान्वयन सुनिश्चित करने के लिये पी.आई.ए. द्वारा निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण कार्य निर्धारित समय अनुसार एवं प्रदत्त वर्षवार किस्तों में किये जाएँगे। उक्त प्रावधान 31 मार्च - 2008 से पूर्व स्वीकृत जलग्रहण क्षेत्र जो कि भारत सरकार द्वारा जारी नई काॅमन मार्गदर्शिकानुसार पुरानी मार्गदर्शिकाओं से ही क्रियान्वित किये जाएँगे, के लिये लागू रहेंगे।

क्र.सं.

मार्गदर्शिका देय प्रावधान

परियोजना काल में देय राशि

वर्ष 1

वर्ष 2

वर्ष 3

वर्ष 4

वर्ष 5

1.

ग्रामीण विकास मंत्रालय भारत सरकार (हरियाली मार्गदर्शिका सूखा सम्भाव्य

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