हर वर्ष 22 अप्रैल को विश्व पृथ्वी दिवस मनाया जाता है

हर वर्ष 22 अप्रैल को विश्व पृथ्वी दिवस मनाया जाता है

पृथ्वी दिवस पर निबंध - इतिहास, महत्व, 2026 की थीम और भारत पर गहराते संकट

विश्व पृथ्वी दिवस की शुरुआत किसी एक देश या संस्था की पहल नहीं, बल्कि उस दौर की बढ़ती वैश्विक चिंताओं का नतीजा है।
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अप्रैल की सुबहें अब पहले जैसी नहीं रहीं। धूप पहले से अधिक तीखी लगती है, हवा में धूल का बोझ बढ़ गया है, और मौसम का मिज़ाज लगातार अनिश्चित होता जा रहा है। असमय बारिश, लंबी और झुलसाती गर्मियाँ, तथा शहरों की दमघोंटू हवा अब केवल मौसमी बदलाव नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन और पृथ्वी के बिगड़ते संतुलन के स्पष्ट संकेत हैं।

हम अक्सर पृथ्वी को एक स्थिर, अडिग और असीमित संसाधन मान लेते हैं। जबकि सच यह है कि यही धरती हमें जल, अन्न, जंगल, नदियां और जीवन का आधार देने वाली मिट्टी प्रदान करती है। जब इस प्राकृतिक तंत्र का संतुलन बिगड़ता है, तो उसका असर सबसे पहले हमारे रोज़मर्रा के जीवन, पानी, खेती, मौसम और स्वास्थ्य सभी पर दिखाई देता है।

<div class="paragraphs"><p>विश्व पृथ्वी दिवस की शुरुआत किसी औपचारिक उत्सव के रूप में नहीं, बल्कि बढ़ते पर्यावरणीय संकट के प्रति एक वैश्विक चेतावनी के रूप में हुई थी। </p></div>

विश्व पृथ्वी दिवस की शुरुआत किसी औपचारिक उत्सव के रूप में नहीं, बल्कि बढ़ते पर्यावरणीय संकट के प्रति एक वैश्विक चेतावनी के रूप में हुई थी।

चित्र: पीआईबी

इसी साझा चिंता और जिम्मेदारी को याद करने के लिए हर वर्ष 22 अप्रैल को विश्व पृथ्वी दिवस मनाया जाता है। यह केवल एक औपचारिक दिवस नहीं, बल्कि हमारा ध्यान इस अहम सवाल की तरफ़ लेकर जाता है कि क्या विकास की तेज़ रफ़्तार में हम अपने एकमात्र घर यानी पृथ्वी को खोते जा रहे हैं? 

पृथ्वी दिवस का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि विकास की कोई भी परियोजना, चाहे वह शहरी विस्तार हो, उद्योग हो या खेती, तब तक दीर्घकालिक और टिकाऊ नहीं मानी जा सकती, जब तक वह जल, भूमि और पारिस्थितिकी के संतुलन को साथ लेकर न चले।

विश्व पृथ्वी दिवस का इतिहास

विश्व पृथ्वी दिवस की शुरुआत किसी औपचारिक उत्सव के रूप में नहीं, बल्कि बढ़ते पर्यावरणीय संकट के प्रति एक वैश्विक चेतावनी के रूप में हुई थी। लेकिन यह दिन केवल एक प्रतीकात्मक तारीख़ भर नहीं है। बल्कि इसके पीछे एक लंबा वैश्विक पर्यावरणीय संघर्ष और जागरूकता का इतिहास जुड़ा हुआ है।

1960-70 के दशक में औद्योगीकरण के कारण वायु और जल प्रदूषण तेजी से बढ़ रहा था। नदियां दूषित हो रही थीं, शहर धुएं से भर रहे थे और प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव लगातार बढ़ रहा था।। इन सब से लोगों का जीवन प्रभावित होने लगा था। 

इसी को आधार बनाकर अमेरिका के सीनेटर गेलॉर्ड नेल्सन ने इस मुद्दे को जन-आंदोलन का रूप देने का फ़ैसला किया। नतीजतन, 22 अप्रैल 1970 को पहली बार पृथ्वी दिवस मनाया गया। 

इसे आधुनिक पर्यावरण आंदोलन की शुरुआत माना गया। उस दिन लाखों छात्र, शिक्षक, वैज्ञानिक और आम नागरिक सड़कों पर उतरे थे। यह केवल विरोध नहीं था, बल्कि यह स्वीकारोक्ति थी कि पर्यावरण का संकट भविष्य की समस्या नहीं, वर्तमान की वास्तविकता है। आज, पांच दशकों से अधिक समय बीत जाने बाद, पृथ्वी दिवस दुनिया के 190 से अधिक देशों में मनाया जाता है

जब शहरों में कंक्रीटीकरण बढ़ता है, तो वर्षा जल का प्राकृतिक पुनर्भरण घटता है। जब जंगल कटते हैं, तो न केवल जैव विविधता प्रभावित होती है, बल्कि नदियों और भूजल पर भी सीधा असर पड़ता है।

आज पृथ्वी दिवस पहले से अधिक क्यों महत्त्वपूर्ण है

अगर हम गौर से देखें, तो विश्व पृथ्वी दिवस की प्रासंगिकता और उसका महत्त्व हमें अपने आसपास ही दिखाई देने लगता है। आज पृथ्वी जिन चुनौतियों का सामना कर रही है, उनका संबंध केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है; वे समाज, अर्थव्यवस्था और मानव जीवन के भविष्य से भी गहराई से जुड़ी हैं।

इन चुनौतियों में प्रमुख हैं: 

  • जलवायु परिवर्तन

  • ग्लोबल वार्मिंग

  • जैव विविधता का क्षरण

  • बंजर होती भूमि 

  • जल संकट

  • वायु प्रदूषण

  • वनों की कटाई

  • प्लास्टिक कचरा

इसके अलावा, लगातार बढ़ते तापमान ने मौसम चक्र को अस्थिर बना दिया है। कहीं सूखा है, तो कहीं बाढ़, कहीं जंगलों में आग लग रही है, तो कहीं समुद्र का स्तर लगातार बढ़ रहा है।

भारत जैसे देशों में इसका प्रभाव और अधिक स्पष्ट दिखाई देता है। अत्यधिक गर्मी, अनियमित मानसून, जल स्रोतों का सिकुड़ना और कृषि पर बढ़ता दबाव अब रोज़मर्रा की वास्तविकताएं बन चुकी हैं।

इन परिस्थितियों को देखते हुए यह स्पष्ट है कि पृथ्वी का संकट केवल प्रकृति का संकट नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के भविष्य का संकट है।

विश्व पृथ्वी दिवस का व्यापक लक्ष्य

विश्व पृथ्वी दिवस का उद्देश्य केवल प्रतीकात्मक रूप से जागरूकता फैलाने तक सीमित नहीं है। इसका व्यापक लक्ष्य लोगों, समुदायों, सरकारों, शैक्षणिक संस्थानों और नीति-निर्माताओं को इस दिशा में प्रेरित करना है कि विकास का मॉडल पृथ्वी की वहन-क्षमता के भीतर रहे।

दरअसल, यह दिवस हमें याद दिलाता है कि पर्यावरण संरक्षण और विकास को दो अलग-अलग ध्रुवों की तरह नहीं देखा जा सकता। स्वच्छ जल, सुरक्षित शहर, जलवायु स्थिरता और जैव विविधता, ये सभी किसी भी टिकाऊ समाज की बुनियादी शर्तें हैं।

<div class="paragraphs"><p>पृथ्वी&nbsp;दिवस हमें याद दिलाता है कि पर्यावरण संरक्षण और विकास को दो अलग-अलग ध्रुवों की तरह नहीं देखा जा सकता।</p></div>

पृथ्वी दिवस हमें याद दिलाता है कि पर्यावरण संरक्षण और विकास को दो अलग-अलग ध्रुवों की तरह नहीं देखा जा सकता।

चित्र: कैन्वा फोटो स्‍टॉक

इसी कारण इसका संबंध संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) से गहराई से जुड़ता है। संयुक्त राष्ट्र की 2030 एजेंडा रूपरेखा में कई पर्यावरणीय लक्ष्य केंद्रीय भूमिका निभाते हैं, विशेषकर:

  • SDG 6 का स्वच्छ जल और स्वच्छता: सभी के लिए सुरक्षित पेयजल और जल संसाधनों का टिकाऊ प्रबंधन

  • SDG 11 का टिकाऊ शहर और समुदाय: सुरक्षित, समावेशी और जलवायु-संवेदनशील शहर

  • SDG 13 की जलवायु कार्रवाई: जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए त्वरित कदम

  • SDG 15 का स्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र का संरक्षण: जंगलों, मिट्टी, जैव विविधता और आर्द्रभूमियों की रक्षा।

पृथ्वी दिवस का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि विकास की कोई भी परियोजना, चाहे वह शहरी विस्तार हो, उद्योग हो या खेती, तब तक दीर्घकालिक और टिकाऊ नहीं मानी जा सकती, जब तक वह जल, भूमि और पारिस्थितिकी के संतुलन को साथ लेकर न चले।

जब शहरों में कंक्रीटीकरण बढ़ता है, तो वर्षा जल का प्राकृतिक पुनर्भरण घटता है। जब जंगल कटते हैं, तो न केवल जैव विविधता प्रभावित होती है, बल्कि नदियों और भूजल पर भी सीधा असर पड़ता है।

इस अर्थ में पृथ्वी दिवस केवल एक वैश्विक पर्यावरण दिवस नहीं, बल्कि जल, भूमि और जीवन के साझा भविष्य पर पुनर्विचार का अवसर है।

नदियों, झीलों और समुद्री तटों में जमा प्लास्टिक अब केवल कचरे का प्रश्न नहीं रह गया है। माइक्रोप्लास्टिक के रूप में यह पेयजल, मिट्टी और खाद्य श्रृंखला तक पहुंच चुका है, जिससे यह पर्यावरण के साथ-साथ सार्वजनिक स्वास्थ्य का भी गंभीर मुद्दा बन गया है।

पृथ्‍वी दिवस पर हर साल एक नई थीम, एक नया फोकस

विश्व पृथ्वी दिवस हर साल एक विशेष थीम के साथ मनाया जाता है, ताकि किसी एक महत्वपूर्ण पर्यावरणीय चुनौती पर वैश्विक ध्यान केंद्रित किया जा सके। यह थीम केवल एक नारा नहीं होती, बल्कि नीति, जनभागीदारी और व्यवहार परिवर्तन के लिए दिशा तय करती है।

उदाहरण के लिए, साल 2022 की थीम “Invest in Our Planet” (अपने ग्रह में निवेश करें) थी। इस थीम के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण को भविष्य की अर्थव्यवस्था, सार्वजनिक स्वास्थ्य और जलवायु सुरक्षा में निवेश के रूप में देखने पर जोर दिया गया। कोविड-19 के बाद “ग्रीन रिकवरी” और स्वच्छ ऊर्जा को लेकर वैश्विक बहस इसी संदर्भ में तेज हुई।

इसके बाद साल 2024 की थीम “Planet vs. Plastics” (ग्रह बनाम प्लास्टिक्स) रही, जिसने प्लास्टिक प्रदूषण को जल, जैव विविधता और मानव स्वास्थ्य के गंभीर संकट के रूप में रेखांकित किया। इस अभियान के तहत साल 2040 तक प्लास्टिक उत्पादन में 60 प्रतिशत कमी की मांग भी उठाई गई।

नदियों, झीलों और समुद्री तटों में जमा प्लास्टिक अब केवल कचरे का प्रश्न नहीं रह गया है। माइक्रोप्लास्टिक के रूप में यह पेयजल, मिट्टी और खाद्य श्रृंखला तक पहुंच चुका है, जिससे यह पर्यावरण के साथ-साथ सार्वजनिक स्वास्थ्य का भी गंभीर मुद्दा बन गया है।

इस तरह, हर वर्ष की थीम हमें यह समझने का अवसर देती है कि पृथ्वी के सामने इस समय सबसे बड़ा संकट क्या है और उसे दूर करने में हमारी भूमिका क्या हो सकती है।

साल 2026 की थीम केवल स्वच्छ ऊर्जा की अपील नहीं, बल्कि जलवायु न्याय और सामाजिक न्याय को साथ लेकर चलने का संदेश भी देती है।

2026 की थीम है Our Power, Our Planet (हमारी ऊर्जा, हमारा ग्रह)

साल 2026 के विश्व पृथ्वी दिवस की वैश्विक थीम “Our Power, Our Planet” है। 14 जनवरी 2026 को EARTHDAY.ORG ने आधिकारिक रूप से इस थीम की घोषणा की थी। यह थीम दुनिया को कोयला और अन्य जीवाश्म ईंधन आधारित बिजली संयंत्रों से हटाकर नवीकरणीय ऊर्जा की ओर तेज़ संक्रमण का आह्वान करती है।

इसका सीधा अर्थ है कि सौर, पवन और अन्य स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देकर कार्बन उत्सर्जन और वायु प्रदूषण को कम किया जाए। इससे जलवायु परिवर्तन की रफ्तार धीमी करने और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर सकारात्मक असर पड़ने की उम्मीद है।

हालांकि, इस बदलाव का एक मानवीय और आर्थिक पक्ष भी है। कोयला खनन और ताप विद्युत संयंत्रों पर आज भी बड़ी संख्या में लोगों की आजीविका निर्भर है। ऐसे में इस संक्रमण के दौरान सरकारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि जलवायु हितों और लोगों की रोज़ी-रोटी के बीच संतुलन बनाया जाए।

इसीलिए विशेषज्ञ “न्यायपूर्ण ऊर्जा संक्रमण” (just transition) पर ज़ोर देते हैं, जिसमें स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ते हुए प्रभावित समुदायों के लिए वैकल्पिक रोजगार, कौशल विकास और आर्थिक पुनर्वास सुनिश्चित किया जाए।

दूसरे शब्दों में, यह थीम केवल स्वच्छ ऊर्जा की अपील नहीं, बल्कि जलवायु न्याय और सामाजिक न्याय को साथ लेकर चलने का संदेश भी देती है।

<div class="paragraphs"><p>साल 2026 की थीम केवल स्वच्छ ऊर्जा की अपील नहीं, बल्कि जलवायु न्याय और सामाजिक न्याय को साथ लेकर चलने का संदेश भी देती है। </p></div>

साल 2026 की थीम केवल स्वच्छ ऊर्जा की अपील नहीं, बल्कि जलवायु न्याय और सामाजिक न्याय को साथ लेकर चलने का संदेश भी देती है।

चित्र: अजय मोहन

भारत में नवीकरणीय ऊर्जा का लक्ष्‍य

बात अगर रिन्‍युवेबल एनर्जी की करें तो भारत ने साल 2030 तक 500 गीगावाट (GW) नवीकरणीय ऊर्जा हासिल करने और साल 2035 तक अपनी ऊर्जा मिश्रण में 60 फ़ीसद गैर-जीवाश्म ईंधन शामिल करने का लक्ष्य बनाया है। 

यह लक्ष्य देश की संशोधित राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित अंशदान यानी नेशनली डिटरमाइंड कॉन्ट्रिब्यूशन्स (NDC) के तहत निर्धारित किया गया है। लेकिन इस महत्वाकांक्षी लक्ष्य की सफलता केवल तकनीक या नीति पर नहीं, बल्कि कर्ज वित्त की संरचना पर भी निर्भर करेगी।

इंस्टिट्यूट फॉर एनर्जी इकोनॉमिक्स एंड फाइनेंशियल एनालिसिस (IEEFA) द्वारा जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, रिन्यूएबल एनर्जी, स्टोरेज और ट्रांसमिशन में वार्षिक निवेश 2032 तक 68 बिलियन डॉलर (लगभग 6.18 ट्रिलियन रुपये) से बढ़कर 2035 तक 145 बिलियन डॉलर (लगभग 13.19 ट्रिलियन रुपये) तक पहुंच सकता है।

यानि कि पृथ्‍वी को स्वच्‍छ ऊर्जा की ओर ले जाने के लक्ष्‍य की ओर भारत पूरी तरह से तत्पर है।

भारत ने साल 2030 तक 500 गीगावाट (GW) नवीकरणीय ऊर्जा हासिल करने और साल 2035 तक अपनी ऊर्जा मिश्रण में 60 फ़ीसद गैर-जीवाश्म ईंधन शामिल करने का लक्ष्य बनाया है।

थीम के अंतर्गत उठाए गए कई मुद्दे

EARTHDAY.ORG ने इसे एक “rallying cry” के रूप में प्रस्तुत किया है। यानी लोगों को अपनी आवाज़, अपने अधिकार और अपने भविष्य के लिए संगठित होने के लिए कहना। 

इस थीम के तहत विशेष रूप से जिन मुद्दों पर ज़ोर दिया गया है, उनमें शामिल हैं:

  • स्वच्छ और नवीकरणीय ऊर्जा की ओर तेज़ संक्रमण

  • जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से सामुदायिक स्तर पर मुकाबला

  • जल स्रोतों, नदियों और झीलों की सफाई

  • वृक्षारोपण और पारिस्थितिकी तंत्र की पुनर्बहाली

  • प्लास्टिक प्रदूषण को कम करने के लिए स्थानीय अभियान

  • नागरिक भागीदारी, जन-जागरूकता और सामुदायिक संवाद

EARTHDAY.ORG ने अप्रैल 2026 के लिए community cleanups (सामुदायिक स्तर की सफ़ाई), teach-ins (प्रशिक्षण), peaceful marches (शांतिपूर्ण जुलूस), town halls (शहर के मुख्य केंद्र) और reforestation drives (पुनर्वनीकरण अभियान) जैसे कार्यक्रमों को शुरू करने की भी अपील की है।

इस थीम का मुख्य संदेश यही है कि पृथ्वी की सुरक्षा किसी एक संस्था का काम नहीं, बल्कि एक साझी नागरिक जिम्मेदारी है। घर में पानी बचाने से लेकर स्वच्छ ऊर्जा अपनाने, प्लास्टिक के न्यूनतम उपयोग और स्थानीय हरित पहलों में भागीदारी तक, ये सभी कदम पृथ्वी के भविष्य को आकार देने वाले निर्णय हैं।

दूसरे शब्दों में, यह थीम हमें याद दिलाती है कि परिवर्तन की सबसे बड़ी शक्ति हमारे सामूहिक प्रयासों में निहित है।

भारत में पृथ्वी दिवस: जल, खेती और शहरों का संकट

वैश्विक स्तर पर उठ रही ये चिंताएं भारत जैसे देश में और भी अधिक स्पष्ट रूप से महसूस की जा सकती हैं, जहां पर्यावरण का संकट सीधे जीवन और आजीविका से जुड़ जाता है।

भारत में पृथ्वी दिवस केवल पर्यावरण का एक प्रतीकात्मक दिन नहीं है, बल्कि यह जीवन, आजीविका और भविष्य की स्थिरता से जुड़ा एक अहम सवाल भी है।

यहां जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय असंतुलन का असर सबसे पहले लोगों के रोज़मर्रा के जीवन में दिखाई देता है। हाल के वर्षों में बेंगलुरु, चेन्नई और दिल्ली जैसे शहरों में जल संकट, हीटवेव और बढ़ती टैंकर-निर्भर जल आपूर्ति ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की नहीं, वर्तमान की वास्तविकता है। 

कई शहरों में भूजल स्तर के गिरने और अनियमित वर्षा के कारण जल प्रबंधन एक गंभीर शहरी चुनौती बन चुका है। राजस्थान और मध्य भारत के कई हिस्सों में सूखते तालाब और गिरता भूजल स्तर जल संकट को गहरा रहे हैं, वहीं उत्तर भारत के शहरों में बढ़ती गर्मी और जहरीली हवा जीवन की गुणवत्ता पर सीधा असर डाल रही है।

हाल के वर्षों में बेंगलुरु, चेन्नई और दिल्ली जैसे शहरों में जल संकट, हीटवेव और बढ़ती टैंकर-निर्भर जल आपूर्ति ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की नहीं, वर्तमान की वास्तविकता है।

भारत सरकार के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के जलवायु परिवर्तन आकलन रिपोर्ट के अनुसार देश में मौसम चक्र में बदलाव स्पष्ट रूप से दर्ज किए जा रहे हैं। साल 1901 से 2018 के बीच भारत के औसत सतही तापमान में लगभग 0.7 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि दर्ज की गई है।

आंकड़ों के अनुसार, साल 2024 भारत में अब तक का सबसे गर्म वर्ष रहा है, जब वार्षिक औसत तापमान दीर्घकालिक औसत से लगभग 0.65℃ अधिक दर्ज किया गया।

इसके अलावा एक अध्ययन में यह भी पाया गया कि लगभग 57 फ़ीसद भारतीय जिलों में उच्च से बहुत उच्च हीटवेव का ख़तरा है, जहां देश की लगभग 76 फ़ीसद आबादी रहती है। 

इस रिपोर्ट में इस बात का भी उल्लेख है कि दिन का तापमान और रात का तापमान बढ़ने के कारण हीट स्ट्रेस से स्वास्थ्य पर व्यापक प्रभाव हो रहा है। नतीजतन, हीटस्ट्रोक और गर्मी के मौसम में स्वास्थ्य संबंधित होने वाले समस्याओं से जुड़े मामले बढ़े पाए गए हैं।

आंकड़ों के अनुसार, साल 2024 भारत में अब तक का सबसे गर्म वर्ष रहा है, जब वार्षिक औसत तापमान दीर्घकालिक औसत से लगभग 0.65℃ अधिक दर्ज किया गया।

इस रिपोर्ट में इस बात का भी उल्लेख है कि दिन का तापमान और रात का तापमान बढ़ने के कारण हीट स्ट्रेस से स्वास्थ्य पर व्यापक प्रभाव हो रहा है। नतीजतन, हीटस्ट्रोक और गर्मी के मौसम में स्वास्थ्य संबंधित होने वाले समस्याओं से जुड़े मामले बढ़े पाए गए हैं।

भारत में हीटवेव की घटनाओं में होने वाली वृद्धि के कारण न सिर्फ पेयजल उपलब्धता में कमी आई है, बल्कि मिट्टी की नमी घटने से पानी की मांग बढ़ी है। नतीजतन फसलों के उत्पादन पर दबाव पड़ रहा है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार चेन्नई में हाल ही में एक सर्वे में पाया गया कि लगभग 85 फ़ीसद लोगों ने बहुत ज़्यादा गर्मी की बात कही। वहीं 70 फ़ीसद लोगों को पानी की कमी जैसी समस्याओं से जूझना पड़ा। 

इन सभी मामलों से यह साफ़ होता है कि हीटवेव सीधे लोगों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी और पानी जैसी बुनियादी जरूरतों को प्रभावित कर रही है।

अध्ययनों के अनुसार, भारत में कुल मीठे जल उपयोग का लगभग 80 - 90 फ़ीसद हिस्सा खेती के क्षेत्र में खर्च होता है, जिससे जल संकट और जलवायु परिवर्तन का असर सीधे खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।

हिमालयी क्षेत्र इस संकट का एक और महत्त्वपूर्ण पहलू सामने लाते हैं। ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना केवल पहाड़ों की चिंता नहीं है, क्योंकि यही हिमनद गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु जैसी प्रमुख नदी प्रणालियों को जीवन देते हैं।

विशेषज्ञों ने हिमालयी ग्लेशियरों के सिकुड़ने, ग्लेशियल झीलों के फैलने और GLOF (Glacial Lake Outburst Flood) जैसी घटनाओं के बढ़ते जोखिम की ओर संकेत किया है।

अध्ययनों के अनुसार हिमालय में अब तक 4,198 से अधिक बड़े ग्लेशियल झीलों की पहचान की गई है, जिनका आकार 0.01 वर्ग किलोमीटर से बड़ा है, और धीरे‑धीरे इन झीलों का विस्तार हो रहा है। जिससे अचानक टूटने का खतरा बढ़ रहा है। इनमें से लगभग 60 झीलों को विशेष रूप से उच्च GLOF खतरे वाला माना गया है, जबकि सैकड़ों को मध्यम जोखिम श्रेणी में रखा गया है।

<div class="paragraphs"><p>पिछले 30 साल में ग्लेशियल झीलों के अचानक टूटने (GLOF) की औसत संख्या सालाना लगभग 1.26 रही है। </p></div>

पिछले 30 साल में ग्लेशियल झीलों के अचानक टूटने (GLOF) की औसत संख्या सालाना लगभग 1.26 रही है।

चित्र: पीआईबी

अध्ययन से यह भी पता चला है कि पिछले 30 साल में ग्लेशियल झीलों के अचानक टूटने (GLOF) की औसत संख्या सालाना लगभग 1.26 रही है। ऐसी बाढ़ें एक बार निकलने पर कम से कम 15,600 क्यूबिक मीटर प्रति सेकंड की तेज़ धार बना सकती हैं, जो कि मानसूनी नदियों के प्रवाह के बराबर या उससे भी ज्यादा है। 

इन झीलों का विस्तार और संभावित टूटन न केवल हिमालयी नदी घाटियों में तेज़ी से आने वाले बाढ़ों के ख़तरे को बढ़ाता है, बल्कि लाखों लोगों, बुनियादी ढांचे और खेती वाली उपजाऊ ज़मीन के लिए भी खतरा है। क्योंकि ये झीलें अक्सर कमजोर बर्फ और मलबे द्वारा बनी अस्थिर बांधों में बंधी रहती हैं।

महानगरों में भी पृथ्वी का संकट एक अलग रूप में सामने आता है। तेजी से बढ़ता कंक्रीटीकरण, हरित क्षेत्रों में कमी और हीट आइलैंड इफ़ेक्ट यानी शहरों में कंक्रीट, डामर और इमारतों के कारण आसपास के इलाकों की तुलना में अधिक गर्मी महसूस होना, शहरों को पहले से अधिक तपता हुआ बना रहे हैं।

पृथ्‍वी के लिए क्यों महत्वपूर्ण है भारत?
भारत दुनिया के 17 मेगा-बायोडायवर्स देशों में से एक है। यहां केवल 2.4 फ़ीसद भूमि होने के बावजूद दुनिया की लगभग 8 फ़ीसद प्रजातियां पाई जाती हैं। इसमें 96,000 से अधिक जानवरों और 47,000 से अधिक पौधों की प्रजातियां शामिल हैं, जिनमें आधी जलीय पौधे भी शामिल हैं। यह अनमोल प्राकृतिक धरोहर केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और हमारी जिम्मेदारी भी है।
<div class="paragraphs"><p>पृथ्वी की रक्षा की शुरुआत बहुत छोटे और लगभग अनदेखे-से रोज़मर्रा के फ़ैसलों से होती है।</p></div>

पृथ्वी की रक्षा की शुरुआत बहुत छोटे और लगभग अनदेखे-से रोज़मर्रा के फ़ैसलों से होती है।

चित्र: पीआईबी

पृथ्वी की सुरक्षा और उसमें हमारी भागीदारी

अक्सर हमें लगता है कि पर्यावरण संरक्षण केवल बड़े अभियानों, सरकारी नीतियों या अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों का विषय है। लेकिन सच यह है कि पृथ्वी की रक्षा की शुरुआत बहुत छोटे और लगभग अनदेखे-से रोज़मर्रा के फ़ैसलों से होती है।

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) के अनुसार, टिकाऊ जीवनशैली (sustainable lifestyle) का अर्थ ऐसी जीवन-पद्धति विकसित करना है, जिसमें हमारे दैनिक चुनाव पृथ्वी पर पड़ने वाले दबाव को कम करें। संस्था का मानना है कि हमारे ग्रह का भविष्य काफी हद तक इस बात पर निर्भर करता है कि हम कैसे रहते हैं, क्या खरीदते हैं, कितना उपभोग करते हैं और अपने संसाधनों का उपयोग किस तरह करते हैं।

इसके अनुसार यह शुरुआत घर के भीतर ही होती है:

  • नल खुला छोड़ने के बजाय पानी बचाने से

  • बिजली के अनावश्यक उपयोग को कम करने से

  • एकल-उपयोग प्लास्टिक की जगह पुनः उपयोग योग्य वस्तुएं चुनने से और 

  • ऐसी चीज़ें खरीदने से जिनकी वास्तव में ज़रूरत हो।

संयुक्त राष्ट्र की Act Now पहल भी इसी बात पर ज़ोर देती है कि ऊर्जा की बचत, कम उपभोग, मरम्मत और पुनः उपयोग जैसे छोटे कदम सामूहिक रूप से बड़े पर्यावरणीय बदलाव ला सकते हैं। 

उदाहरण के लिए, बिजली का कम उपयोग, LED बल्बों का इस्तेमाल, कपड़ों और इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं को जल्दी बदलने के बजाय उनकी मरम्मत के बाद दोबारा इस्तेमाल करना, और निजी वाहन के स्थान पर पैदल चलना या सार्वजनिक परिवहन का चुनाव करना। ये सभी कदम व्यक्ति के कार्बन फुटप्रिंट को कम करते हैं।

EARTHDAY.ORG भी अपने सार्वजनिक अभियानों में इसी बात पर ज़ोर देता है कि ग्रह को बचाने के लिए सबसे प्रभावी परिवर्तन अक्सर लोगों की जीवनशैली में छोटे लेकिन लगातार किए जाने वाले बदलावों से आता है।

दरअसल, पृथ्वी की रक्षा कोई एक दिन का संकल्प नहीं, बल्कि धीरे-धीरे विकसित होने वाली एक आदत है। यह हमारे चुनावों, हमारी संवेदनशीलता और हमारे व्यवहार में दिखाई देती है।

क्योंकि अंततः, पृथ्वी को बचाने की शुरुआत किसी बड़े मंच से नहीं, बल्कि हमारे अपने घर, गली, पार्क और दैनिक जीवन से होती है।

पृथ्वी दिवस हमें याद दिलाता है कि जल, भूमि और जलवायु के संतुलन के बिना विकास अधूरा है। भारत जैसे जल-संवेदनशील देश में यह केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि जीवन, स्वास्थ्य, आजीविका और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का प्रश्न है।

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