खेजड़ी के पेड़ की जड़ें रेगिस्‍तान की रेतीली ज़मीन को कस कर पकड़ कर रखती हैं, जिससे मरुस्‍थलीकरण को रोकने में मदद मिलती है।

खेजड़ी के पेड़ की जड़ें रेगिस्‍तान की रेतीली ज़मीन को कस कर पकड़ कर रखती हैं, जिससे मरुस्‍थलीकरण को रोकने में मदद मिलती है।

स्रोत : विकी कॉमंस

क्‍या है ‘खेजड़ी' जिसे बचाने के लिए राजस्‍थान में छिड़ गया है बड़ा आंदोलन

परंपरा ही नहीं, पर्यावरण से भी जुड़ा हुआ है रेगिस्‍तानी वृक्ष खेजड़ी का महत्‍व। बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई का हो रहा राज्‍यभर में विरोध। बीकानेर में आयोजित ‘खेजड़ी बचाओ महापड़ाव' में उमड़े जनसैलाब ने ली पेड़ों को कटने से बचाने की शपथ।
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राजस्थान में इन दिनों ‘खेजड़ी बचाओ आंदोलन’ काफी जोर पकड़ चुका है। यह आंदोलन अब केवल पर्यावरण संरक्षण तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि एक सामाजिक मुद्दे के रूप में उभर रहा है। प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में खेजड़ी के पेड़ों की अंधाधुंध कटाई के विरोध में हजारों लोग सड़कों पर उतरकर धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं। 

राज्‍य की सियासत की सुई भी इस आंदोलन की ओर घूम गई है, जिसके कारण कई राजनीतिक दलों के नेता भी खुलकर खेजड़ी के समर्थन में सामने आ गए हैं। इसकी झलक बीती 2 फरवरी को बीकानेर में आयोजित ‘खेजड़ी बचाओ महापड़ाव' में उमड़े जनसैलाब के रूप में देखने को मिला। इस आंदोलन को समर्थन देने के लिए राज्‍यभर में व्यापारिक संगठनों ने बाजार बंद रखा और शहरी क्षेत्र के सरकारी और प्राइवेट स्कूलों में आधे दिन की छुट्टी कर दी गई।

खेजड़ी : मरुस्थल का जीवनवृक्ष

खेजड़ी राजस्थान के शुष्क और अर्ध-शुष्क इलाकों में पाया जाने वाला एक अत्यंत उपयोगी और पारंपरिक वृक्ष है।  इसका वैज्ञानिक नाम प्रोसोपिस सिनेरेरिया (Prosopis cineraria) है। इसे ‘मरुस्थल का जीवनवृक्ष’ के रूप में भी जाना जाता है। यह राजस्‍थान का राज्य वृक्ष भी है। इस वृक्ष को यह ऊंचा दर्जा और सम्‍मान यूं ही नहीं मिला हुआ है, न ही किसी धार्मिक मान्‍यता के कारण इसे इतना महत्‍व दिया जाता है। खेजड़ी को राजस्‍थान में इतना महत्‍वपूर्ण माने जाने के पीछे इसकी प्राकृतिक खूबियां और इसकी अहम पर्यावरणीय भूमिका है। यह पेड़ बिना किसी देखभाल और सिंचाई के भीषण गर्मी, कम बारिश और रेतीली मिट्टी में भी जीवित रहता है, इसलिए यह थार जैसे शुष्‍क और निर्जन रेगिस्तानी क्षेत्र में ‘जीवन का आधार’ माना जाता है।

खेजड़ी न सिर्फ पर्यावरण, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था और संस्कृति से भी गहराई से जुड़ी है। इसकी पत्तियां पशुओं के लिए पौष्टिक चारा होती हैं, इसकी फलियां, जिन्हें सांगरी कहा जाता है। यह सांगरी राजस्थान के पारंपरिक भोजन का एक अहम हिस्सा है। यही नहीं, इस वृक्ष की जड़ें भी राजस्‍थान के रेगिस्‍तानी इलाकों के लिए काफी महत्‍वपूर्ण मानी जाती हैं, क्‍योंकि यह मिट्टी को बांधकर मरुस्थलीकरण को बढ़ने रोकती हैं। यह पेड़ और मिट्टी की उर्वरता भी बढ़ाता है। खेजड़ी की झाड़ें तपते रेगिस्‍तान में खड़ी रहकर लोगों को ठंडी छाया देती हैं। इसकी छोटी-छोटी पत्तियां हवा की गर्मी को सोखकर उसे शीतलता प्रदान करती हैं। इस तरह यह वृक्ष गर्म रेगिस्‍तानी इलाकों में तापमान नियंत्रण में भी अहम भूमिका निभाता है।

खेजड़ी बचाओ आंदोलन प्रकृति, परंपरा और भविष्य की रक्षा का संकल्प है। खेजड़ी केवल एक वृक्ष नहीं, यह मरुस्थल की जीवनरेखा, हमारी संस्कृति और पर्यावरण संतुलन की पहचान है। यह लड़ाई केवल पेड़ों की नहीं, आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य की है।

हेमाराम चौधरी, पूर्व मंत्री, राजस्‍थान सरकार

<div class="paragraphs"><p>तपते रेगिस्‍तानों में बिना किसी देखभाल के उगने और बढ़ने वाला खेजड़ी का पेड़ मरुस्‍थली इलाकों के लिए कुदरत के वरदान की तरह है।&nbsp;</p></div>

तपते रेगिस्‍तानों में बिना किसी देखभाल के उगने और बढ़ने वाला खेजड़ी का पेड़ मरुस्‍थली इलाकों के लिए कुदरत के वरदान की तरह है। 

स्रोत : विकी कॉमंस

क्‍या है खेजड़ी का ऐतिहासिक संदर्भ

खेजड़ी का सांस्कृतिक महत्व भी बेहद खास है। 1730 में खेजड़ली गांव में 363 बिश्नोई समुदाय के लोगों ने खेजड़ी के पेड़ों को बचाने के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे। इस कारण इसे दुनिया के सबसे शुरुआती पर्यावरण आंदोलनों में गिना जाता है और 1970 के दशक में हुए ‘चिपको आंदोलन’ की प्रेरणा माना जाता है। इसमें बिश्नोई समाज और एक साहसी महिला अमृता देवी बिश्नोई ने प्रकृति की रक्षा के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया, जिसने आने वाली पीढ़ियों को एक गहरी सीख दी। इसका ऐतिहासिक प्रसंग कुछ इस प्रकार है-

1730 ईस्वी में राजस्थान के जोधपुर रियासत के खेजड़ली गांव में जो घटना हुई, वह अचानक नहीं थी, बल्कि राज्य सत्ता और प्रकृति-संरक्षण की टकराहट का नतीजा थी। किंवदंतियों के अनुसार उस समय जोधपुर के शासक महाराजा अभय सिंह को अपने महल और किले के निर्माण के लिए बड़ी मात्रा में लकड़ी और ईंधन की जरूरत थी। शाही आदेश पर सैनिक खेजड़ली क्षेत्र में पहुंचे और खेजड़ी के पेड़ों को काटने लगे। यह इलाका बिश्नोई समुदाय का था, जो अपने गुरु जंभेश्वर भगवान के 29 नियमों के तहत पेड़-पौधों और जीवों की रक्षा को धर्म मानता है। इसलिए उनके लिए खेजड़ी क वृक्ष सिर्फ संसाधन नहीं, बल्कि जीवन और आस्था का प्रतीक थे। लिहाज़ा विश्‍नोई समाज पेड़ों की कटाई के विरोध में खड़ा हो गया, जिसमें महिलाओं ने अग्रीण भूमिका निभाई। जब बिश्नोई महिलाओं ने सैनिकों को रोकने की कोशिश की, तो अमृता देवी बिश्नोई ने कहा-
“सिर साटे रूंख रहे, तो भी सस्तो जाण”
अर्थात् सिर देकर भी पेड़ बचें तो वह सौदा सस्ता है।

इसके बाद अमृता देवी और उनकी तीन बेटियां पेड़ों से चिपक गईं। सैनिकों ने शाही आदेश के तहत पेड़ काटने के लिए उन्हें मार डाला। यह देख गांव और आसपास के इलाकों से लोग आते गए और एक-एक कर 363 बिश्नोई पुरुष-महिलाएं और बच्चे खेजड़ी के पेड़ों से लिपटकर अपने प्राण न्योछावर करते चले गए। जब यह खबर महाराजा अभय सिंह तक पहुंची, तो वह बहुत दुखी हुए और स्वयं खेजड़ली आए। उन्होंने तुरंत खेजड़ी वृक्षों की कटाई रुकवाई और बिश्नोई क्षेत्रों को शाही संरक्षण देते हुए भविष्य में वहां पेड़ काटने व शिकार पर रोक लगाने का आदेश जारी किया।

यह घटना आगे चलकर ‘खेजड़ली बलिदान’ के नाम से जानी गई और इसे दुनिया के पहले संगठित पर्यावरण संरक्षण आंदोलनों में माना जाता है। यह बलिदान बताता है कि पर्यावरण रक्षा भारत में कोई नई सोच नहीं, बल्कि सदियों पुरानी जीवन-दृष्टि है।

<div class="paragraphs"><p>खेजड़ी के वृक्ष तपते रेगिस्‍तान में छाया और लकड़ी देने के साथ ही पक्षियों को  आश्रय भी देते हैं।&nbsp;</p></div>

खेजड़ी के वृक्ष तपते रेगिस्‍तान में छाया और लकड़ी देने के साथ ही पक्षियों को आश्रय भी देते हैं। 

स्रोत : विकी कॉमंस

क्‍या है आंदोलन का मौज़ूदा संदर्भ 

आज का ‘खेजड़ी बचाओ आंदोलन’ भी करीब तीन सौ साल पहले हुए ‘खेजड़ली बलिदान’ की ऐतिहासिक कड़ी जैसा नज़र आ रहा है, क्‍योंकि सत्‍ता पर एक बार फिर से विकास के नाम पर इन अनमोल वृक्षों की बेतहाशा कटाई के आरोप लग रहे हैं। पश्चिमी राजस्थान, खासकर बीकानेर-जैसलमेर क्षेत्र में सोलर पार्क, सड़क और अन्य विकास परियोजनाओं के नाम पर बड़ी संख्या में खेजड़ी के पेड़ों को काटे जाने के मामले सामने आए हैं। इसे स्थानीय लोग और बिश्नोई समुदाय इसे राज्य वृक्ष और रेगिस्तानी जीवन-रेखा पर सीधा हमला मान रहे हैं। आंदोलनकारियों का कहना है कि कानूनी संरक्षण कमजोर पड़ता जा रहा है और प्रशासनिक मंजूरियों के पीछे पर्यावरणीय संतुलन को नजरअंदाज किया जा रहा है। इसी विरोध ने खेजड़ी को एक बार फिर सिर्फ पेड़ नहीं, बल्कि विकास बनाम प्रकृति की बहस का केंद्र बना दिया है। इसके चलते एक बार फिर से राजस्‍थान में विश्‍नोई समाज की 300 साल पुरानी कुर्बानी को याद किया जा रहा है और ऐतिहासिक प्रसंग को आज के सरकारी फैसलों से जोड़कर देखा जा है। राज्य के लोग, खासकर विश्‍नोई समाज और पर्यावरणवादी खेजड़ी वृक्षों के के बड़े पैमाने पर कटने को लेकर बहुत चिंतित हैं। इसीलिए राजस्‍थान में ‘खेजड़ी बचाओ आंदोलन’ चल रहा है। इस पूरे प्रकरण को इन प्रमुख बिंदुओं के ज़रिये समझा जा सकता है- 

1. बड़े पैमाने पर खेजड़ी कटाई का विरोध

खेजड़ी के पेड़ों को विशेष रूप से सौर ऊर्जा और अन्य विकास परियोजनाओं के लिए कटने का आरोप लगाया जा रहा है। खासकर पश्चिमी राजस्थान में जैसे बीकानेर क्षेत्र में। स्थानीय लोग कह रहे हैं कि सोलर प्लांट और अन्य निर्माण के नाम पर हजारों खेजड़ी पेड़ों को हटाया जा रहा है, जिससे पर्यावरण, मिट्टी व स्थानीय पारिस्थितिकी को नुकसान हो रहा है। इस तरह मौजूदा ‘खेजड़ी बचाओ आंदोलन’ की पृष्ठभूमि में मुख्य रूप से पश्चिमी राजस्थान में चल रही बड़ी सौर ऊर्जा और आधारभूत ढांचा (इन्‍फ्रास्‍ट्रक्‍चर) परियोजनाएं हैं। बीकानेर, जैसलमेर, बाड़मेर और जोधपुर जिलों में सोलर पार्क, सोलर पावर प्लांट, ट्रांसमिशन लाइन, सड़क और औद्योगिक भूमि विकास के लिए जमीन समतल करने के दौरान बड़ी संख्या में खेजड़ी के पेड़ों को हटाए जाने के आरोप लगे हैं। खास तौर पर बीकानेर के पूगल क्षेत्र और भाड़ला सोलर पार्क क्षेत्र के आसपास ग्रामीणों और पर्यावरण समूहों का कहना है कि परियोजनाओं के लिए दी गई मंजूरियों में राज्य वृक्ष खेजड़ी के पारिस्थितिक महत्व को नजरअंदाज किया गया। इसी कारण खेजड़ी आज सिर्फ एक पेड़ नहीं, बल्कि हरित ऊर्जा बनाम स्थानीय पारिस्थितिकी और परंपरागत अधिकारों के टकराव का प्रतीक बन गई है।

आरोप है कि कई जगहों पर कागजों पर पेड़ों को “स्थानांतरित” दिखाकर वास्तव में उनकी कटाई कर दी गई। इसके अलावा नियमों के मुताबिक काटे गए पेड़ों की क्षतिपूर्ति के लिए नए पौधों का रोपण भी नहीं किया गया।
<div class="paragraphs"><p>खेजड़ी वृक्ष की यह छोटी-छोटी पत्तियां हवा को ठंडा कर शीतल छाया देने के साथ ही तापमान को नियंत्रित करने का काम भी करती हैं।&nbsp;</p></div>

खेजड़ी वृक्ष की यह छोटी-छोटी पत्तियां हवा को ठंडा कर शीतल छाया देने के साथ ही तापमान को नियंत्रित करने का काम भी करती हैं। 

स्रोत : विकी कॉमंस

2. सामाजिक-आर्थिक और पारंपरिक महत्व
खेजड़ी राजस्थान के रेगिस्तानी समाज के लिए सिर्फ एक पेड़ नहीं, बल्कि जीवन-आधारित व्यवस्था का हिस्सा है। इसकी पत्तियां और टहनियाँ पशुओं के लिए सालभर भरोसेमंद चारा देती हैं, खासकर सूखे के समय जब घास पूरी तरह खत्म हो जाती है। इसकी फलियां सांगरी स्थानीय भोजन का हिस्‍सा होने के साथही लोगों की कमाई का साधन भी बनती हैं। इन्‍हें बेचकर यहां कि हजारों ग्रामीण परिवारों की रोज़ीरोटी चलती है। यही वजह है कि पारंपरिक कृषि में इसे काटने के बजाय बचाकर रखा जाता रहा है। सांस्कृतिक और धार्मिक स्तर पर भी खेजड़ी बिश्नोई समुदाय की आस्था का केंद्र है, जहां प्रकृति संरक्षण धर्म का हिस्सा है। लोगों को डर है कि यदि खेजड़ी का बड़े पैमाने पर सफाया हुआ, तो थार का नाज़ुक पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ जाएगा, मरुस्थलीकरण और तेज़ होगा और ग्रामीण जीवन की आर्थिक रीढ़ टूट जाएगी।

3. कानूनी संरक्षण और ‘हेरिटेज ट्री’ का दर्जा देने की मांग
आंदोलन का एक बड़ा केंद्र बिंदु यह है कि खेजड़ी को राज्य वृक्ष होने के बावज़ूद कानूनी तौर पर प्रभावी संरक्षण नहीं मिला हुआ है। वर्तमान में पेड़ कटाई पर लगने वाला जुर्माना बेहद मामूली है, जिसे आंदोलनकारी नाकाफी और प्रतीकात्मक मानते हैं। उनका कहना है कि जब तक कड़ी सजा, भारी आर्थिक दंड और स्पष्ट कानूनी प्रतिबंध नहीं होंगे, तब तक विकास परियोजनाओं के नाम पर खेजड़ी की कटाई रुक नहीं पाएगी। इसी वजह से प्रदर्शनकारी राज्य स्तर पर विशेष वृक्ष संरक्षण अधिनियम या खेजड़ी को हेरिटेज ट्री का दर्जा देने की मांग कर रहे हैं। वे चाहते हैं कि किसी भी परियोजना में खेजड़ी को “हटाने” या “स्थानांतरित करने” से पहले स्वतंत्र पर्यावरणीय आकलन हो और क्षतिपूरक वृक्षारोपण सिर्फ कागज़ों में नहीं, बल्कि जमीन पर सुनिश्चित किया जाए। यह मांग दरअसल विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन को कानूनी रूप देने की कोशिश है।

4. जन समर्थन और संघर्ष
खेजड़ी बचाओ आंदोलन धीरे-धीरे सिर्फ विरोध नहीं, बल्कि जनआंदोलन का रूप ले चुका है। इसमें ग्रामीण किसान, पशुपालक, बिश्नोई समाज के लोग, व्यापारी संगठन और सामाजिक कार्यकर्ता बड़ी संख्या में शामिल हो रहे हैं। कई इलाकों में बाजार बंद, प्रदर्शन, धरना और सामूहिक विरोध दर्ज कराए गए हैं, वहीं आंदोलनकारियों ने अनशन जैसे कड़े कदम उठाने की चेतावनी भी दी है। धार्मिक संतों और समुदाय के नेताओं की भागीदारी ने इसे भावनात्मक और सांस्कृतिक ताकत दी है। राजनीतिक समर्थन मिलने से आंदोलन का दायरा और प्रभाव बढ़ा है—पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे जैसे नेताओं के समर्थन ने इसे राज्यव्यापी बहस का मुद्दा बना दिया है। इस संघर्ष ने खेजड़ी को एक बार फिर याद दिलाया है कि राजस्थान में पर्यावरण सिर्फ नीति का विषय नहीं, बल्कि जनभावना और पहचान से जुड़ा सवाल है।

<div class="paragraphs"><p>राजस्‍थान के थार रेगिस्‍तान में&nbsp;<strong>‘मरुस्थल का जीवनवृक्ष’ </strong>माना जाने वाला<strong>&nbsp;</strong>खेजड़ी का पेड़, पशु-पक्षियों को भोजन और आश्रय भी देता है।</p></div>

राजस्‍थान के थार रेगिस्‍तान में ‘मरुस्थल का जीवनवृक्ष’ माना जाने वाला खेजड़ी का पेड़, पशु-पक्षियों को भोजन और आश्रय भी देता है।

स्रोत : विकी कॉमंस

अहम सवाल : विकास के नाम पर न हो विनाश

यह पूरा घटनाक्रम बताता है कि खेजड़ी को लेकर राजस्‍थान में उठ रही आवाज किसी एक पेड़ या एक इलाके तक सीमित नहीं है। यह संघर्ष उस सोच के खिलाफ है जिसमें विकास को प्रकृति से अलग करके देखा जाता है। 1730 के खेजड़ली बलिदान से लेकर आज के खेजड़ी बचाओ आंदोलन तक संदेश साफ है कि राजस्थान का समाज बार बार यह याद दिला रहा है कि रेगिस्तान में जीवन का संतुलन पेड़ों से ही टिका है। अगर खेजड़ी खत्म होगी तो केवल हरियाली नहीं, बल्कि पशुपालन, खेती, स्थानीय भोजन, संस्कृति और भविष्य की पीढ़ियों की सुरक्षा भी खतरे में पड़ेगी। आज का सवाल यह नहीं है कि विकास हो या न हो, बल्कि यह है कि क्या विकास ऐसा हो सकता है जो खेजड़ी जैसी जीवन रेखा को बचाते हुए आगे बढ़े। खेजड़ी के साथ खड़ा यह आंदोलन दरअसल आने वाले समय के लिए एक चेतावनी भी है और एक रास्ता भी।

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