जन भागीदारी एवं सुझाव

Submitted by Hindi on Sun, 12/24/2017 - 16:55
Source
भोजवेटलैंड : भोपाल ताल, आईसेक्ट विश्वविद्यालय द्वारा अनुसृजन परियोजना के अन्तर्गत निर्मित, 2015

झील की आयु :


गाद जमाव (Silt deposition) को प्राकृतिक क्रिया समझकर उसकी उपेक्षा करना ठीक नहीं है। गाद भराव से झीलें छिछली होती जाती हैं। यह क्रिया इतने धीरे होती है कि पता नहीं चलता। इसके फलस्वरूप झीलें एक न एक दिन दलदल का रूप ले लेती हैं। जिन्हें बाद में अनूप (Swamp) अथवा घास मुक्त दल-दल (bogs) कहा जाने लगता है।

सन 2000 से पहले केन्द्रीय जल आयोग ने बड़े तालाब की क्षमता बढ़ाने की जाँच करते समय पाया कि इसमें गाद जमाव की दर नीचे लिखे अनुसार है-

0.75 Acre Ft. Per square mile cathment per year

यदि गाद भराव की यही दर रही तो इस बात का आसानी से हिसाब लगाया जा सकता है कि हमारे बड़े तालाब की आयु कितनी है।

यद्यपि विकल्प के रूप में तालाब के बांध की ऊँचाई समय-समय पर बढ़ाई जा सकती है किन्तु ऊँचाई बढ़ाने की भी एक सीमा है।

अतः झील की आयु बढ़ाना है तो गाद एवं अपशिष्ट के जमाव को रोकने के उपाय आज से ही करने होंगे। जन सहयोग से ही यह सब संभव हो सकेगा।

जलकुम्भी (Water Hyacinth)


यद्यपि यह पौधा जल प्रदूषण को कम करता है लेकिन बहुत तेजी से फैलता है। इसका स्वयं का फैलना या तालाब को ढंग देना भी स्वयं में एक प्रदूषण बन जाता है।

बायोलॉजीकल सर्वे ऑफ इंडिया की रिपोर्ट से पता चलता है कि यह वनस्पति भारत में सन 1904 में आयी। सन 1904 में लार्ड कर्जन भारत के गवर्नर जनरल थे उनकी पत्नी स्विटजरलैंड से इस इस पौधे को अपने साथ लाईं, वे इसके फूलों पर अत्यधिक मोहित थीं। उस समय भारत के गवर्नर जनरल कलकत्ता में रहा करते थे। कलकत्ता के राजभवन के सरोवर में उन्होंने इसके कुछ पौधे डाल दिए जहाँ इनकी वृद्धि होने लगी।

एक बार लार्ड कर्जन बीमार पड़े। उनकी दवा के लिये डाक्टर, वैद्य, हकीम बुलवाये गए। उन दिनों सागर मध्यप्रदेश में मौलवी चिरामुद्दीन यूनानी चिकित्सा के श्रेष्ठ चिकित्सक माने जाते थे। उन्हें भी बुलाया गया। वहाँ उन्होंने इस पौधे को राज सरोवर में देखा, वे इसके गुणों से परिचित थे, अतः लौटते समय इस वनस्पति के कुछ पौधे वे अपने साथ ले आये और सागर के तालाब में डाल दिए। उसके बाद इस पौधे का इतना प्रसार हुआ कि भारत के प्रायः सभी तालाबों में यह पौधा समस्या बन गया।

भोपाल की झील से इसे निकलवाने में प्रतिवर्ष लाखों रुपये खर्च करने पड़ते हैं।

जलकुम्भी को विश्व में रासायनिक प्रदूषित जल को शुद्ध करने के लिये काम में लाया जा रहा है। किन्तु इसके साथ समस्या यह है कि यह बहुत तेजी से फैलता है तथा पूरे तालाब को ढंक देता है। प्रायः रुके हुये जल में जलकुम्भी होना आम बात हो गई है। जल में आने वाले पोषक तत्वों से यह और अधिक बढ़ती है। इसके फायदे और नुकसान दोनों हैं। जल मल के फास्फोरस, नाइट्रेट तथा उद्योगों के अपशिष्ट जल में उपस्थित सीसा, पारा, निकेल, कैडमियम की बड़ी मात्रा को इसके द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है। पंद्रह दिनों में यह भारी धातुओं को अवशोषित करके जल का पीएच मान 7.0 के आस-पास ले आती है।

यह पौधा भारी मात्रा में जल सोखता है।

जलकुम्भी के उपयोग :


खाद- खाद के रूप में इसका उपयोग हो सकता है अथवा नहीं, इस बारे में अभी शोध कार्य हो रहे हैं।
बायोगैस- बायोगैस का उत्पादन भी इससे किये जाने की बलवती संभावना है।
भोजन शृंखला में स्थान- पशु, कुक्कुट, मछलियों, सूकर आदि की भोजन शृंखला में इसे स्थान दिया जा सकता है अथवा नहीं इस पर विशेषज्ञों द्वारा शोध कार्य चालू है।
स्ट्रॉ प्रोडक्ट- गत्ता आदि बनाने में इसकी उपयोगिता तलाशी जा सकती है।

जनभागीदारी शिक्षा एवं सुझाव :


पर्यावरण के क्षेत्र में स्वयं सेवीसंस्थाओं से अपेक्षाएँ-

1. समाज और सरकार के बीच तालमेल बैठायें।
2. पर्यावरण शिक्षा, चेतना तथा जन जागृति के कार्यों में योगदान दें।
3. समाज की समस्याओं को सरकार तक पहुँचाने और उनको सही कार्य करने को बाध्य करें।
4. समाज हित में कानून की सहायता लें।

बिन्दु 2 के संदर्भ में यह उल्लेखनी करना उचित होगा कि-


- स्वयंसेवी संस्थाओं का कार्यक्षेत्र औपचारिक शिक्षा (कक्षा शिक्षण) का कम और अनौपचारिक शिक्षा का अधिक है। ये अनौपचारिक शिक्षा के कार्यक्रम दृश्य-श्रव्य प्रकार के हों। ये कार्यक्रम विभिन्न वर्गों में बाँटे जा सकते हैं जैसे-

अ. विद्यार्थियों के लिये- पर्यातंत्र विकास शिविर/प्रशिक्षण शिविर, रैलियाँ, प्रदर्शनी, प्रतियोगिताएँ- (चित्रकला, वाद-विवाद, निबंध लेखन, फोटोग्राफी, नुक्कड़ नाटक, कठपुतली शो, सौन्दर्य प्रतियोगिताएँ, पत्रवाचन आदि।) वृक्षारोपण, फिल्म शो आदि।

ब. शिक्षित लोगों के लिये- रैलियाँ, पदयात्राएँ, संगोष्ठियाँ, सिम्पोजियम, कार्यशालाएँ, प्रशिक्षण शिविर, नाटक, लोकनृत्य आदि।

स. कम पढ़े लिखे लोगों के लिये- दूर दर्शन से प्रसारण, आकाशवाणी से प्रसारण, लोकनृत्य, लोकगीत, नाटक, कठपुतली शो, फिल्म शो, भजन, संगीत आदि के द्वारा पर्यावरण के प्रति जागृति करना।

पर्यावरण शिक्षा :


बेलग्रेड वर्कशाप तथा तिबिलिसी अन्तरराज्यीय कॉन्फ्रेंस (14.26 अक्टूबर 1977) के अनुसार पर्यावरण शिक्षा के वस्तुनिष्ठ उद्देश्य नीचे लिखे अनुसार होना चाहिए-

पर्यावरण शिक्षा सभी व्यक्ति तथा समाज को-



1. जागरुकता- जागरुकता तथा संवेदनशीलता देने में सहायक हो।
2. ज्ञान- ज्ञान तथा आधारभूत समझ देने में सहयक हो। मनुष्य को उसकी जिम्मेदारी निभाने में सहायक हो।
3. अभिवृत्ति- पर्यावरण की सुरक्षा करने तथा नये सुधार लाने के लिये प्रेरित किए जा रहे कार्यों में प्रेरित करने में सहाक हो।
4. कौशल- पर्यावरणीय समस्याओं के हल खोजने के कौशल प्राप्त करने में सहायक हो।
5. मूल्यांकन कुशलता- पर्यावरण उपाय तथा शैक्षिक कार्यक्रमों को पारिस्थितिक राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, सौन्दर्यपरक और शैक्षिक घटकों के परिप्रेक्ष्य में मूल्यांकन करने में सहायक हो।
6. संभागिता- पर्यावरणीय समस्याओं और उनके हल निकालने के प्रति जिम्मेदारी की भावना विकसित करने में सहायक हो।

जल संरक्षण हेतु जल शिक्षा-


यदि बच्चे को शुरू से ही घर, स्कूल, महाविद्यालय में जल के उपयोग के बारे में शिक्षा दे दी जाये तो उनमें विवेकपूर्ण ढंग से जल उपयोग करने के लिये संस्कार विकसित हो सकेंगे।

पोस्टरों, श्रव्य-दृश्य माध्यमों, समाचार पत्र-पत्रिकाओं, नाटक, चुटकुलों, नारों, संगोष्ठियों, कार्यशालाओं प्रतियोगिताओं आदि के द्वारा जल के सम्बन्ध में जानकारी देना आवश्यक है।

संस्कार-


शिक्षा से भी अधिक आज संस्कारों की आवश्यकता है। संस्कार बचपन से ही दिये जाते हैं। 10-12 वर्ष की आयु तक जो संस्कार बालक को दिये जाते हैं वे ही जीवन भर काम आते हैं। जीवन के 80 प्रतिशत संस्कार इस उम्र तक बन जाते हैं, शेष 20 प्रतिशत संस्कार युवावस्था से वृद्धवस्था में प्राप्त होते हैं जो कि मन में ठीक से जम नहीं पाते।

सुसंस्कारित नागरिक प्रदूषण और भ्रष्टाचार को कम कर सकते हैं।

मृदा का धात्विक प्रदूषण दूर करने में पौधों की भूमिका-


कैचमेंट एरिया एवं जलीय क्षेत्रों से धातुओं को दूर करन में कुछ पौधे सहायक होते हैं। बहुत से पौधे मृदा से हानिकारक धातुओं को अवशोषित कर शुद्धिकरण में मदद करते हैं। शोध परिणामों से यह साबित हो चुका है। नम और उष्ण स्थानों पर नरकुल के पौधे विषैली धातुओं का अत्यधिक मात्रा में अवशोषण करते हैं। अन्य जलीय अर्द्धजलीनय एवं संवहनीय पौधों जैसे-

- आइकार्निया
- हाइड्रोकोटिल (मंडूकपर्णी), अम्बेलाटा।
- लेमना एवं एजोला का व्यापक प्रयोग- सीसा, ताम्बा कैडमियम, लोहा एवं पारा जैसी धातुओं के निष्कर्षण में किया जाता है।
- चुकंदर के पौधे में नाइट्रोग्लिसरीन को ग्रहण करने का विशेष गुण पाया जाता है। इस कारण इसका उपयोग मृदा से सीसा निकालने में किया जाता है।
- सूरजमुखी का पौधा- क्रोमियम, मैग्नीज, कैडमियम, निकेल एवं ताम्बा धातु से युक्त जल की सान्द्रता को 24 घंटे में कम कर सकता है।

ऐसे नए तथ्य प्रकाश में आए हैं जिनसे विदेशी जीन को डालने पर ट्रांसजेनिक पौधों में धातु एकत्रीकरण की क्षमता बढ़ी पाई गई। प्रदूषण दूर करने में ऐसे पौधों का उपयोग किया जाना चाहिए।

पौधों के अलावा मृदा में धात्विक प्रदूषण का नियंत्रण कैल्शियम यौगिकों, फास्फोरस युक्त उर्वरकों, जिंक सल्फेट आदि रसायनों से भी किया जा सकता है। इसके अलावा मृदा में जीवांश/कार्बनिक पदार्थ (Organic Matter) की मात्रा में वृद्धि करके भी मृदा के धात्विक प्रदूषण में कमी की जा सकती है। गोबर की खाद का प्रयोग करना भी लाभदायक होता है।

कीटनाशक रसायनों के विकल्प के रूप में जैविक तरीके ढूंढे जा रहे हैं। ‘परजीवी मित्र कीट’ यह विकल्प हो सकते हैं इस दिशा में अभी तक परजीवी मित्र कीटों का चयन नगण्य ही है। ये परजीवी मित्रकीट हानिकारक कीटों के अंडों को खाकर फसलों को नुकसान से बचाते हैं। इन मित्र कीटों के बहुलीकरण हेतु बायो कन्ट्रोल रिसर्च लेब बनाई गई है।

सूखी हुई काई का उपयोग-


सूखी हुई काई को सुअर, मुर्गियाँ, मछलियाँ खा सकती हैं। अतः काई को इस हेतु उपयोग में लिया जाना चाहिए।

बायोगैस का उत्पादन-


मोटरबोट आदि में ईंधन के लिये बायो गैस काम में लाई जाये।
बायोगैस तालाब के ही जैव कचरे से पैदा की जा सकती है। इससे ईंधन, प्रकाश और भोजन के ईंधन की व्यवस्था हो सकती है।

पर्यावरण ऑडिट-


कम से कम तीन वर्ष में एक बार प्रत्येक राज्य के विविध पर्यातंत्रों का ऑडिट किसी केन्द्रीय ऑडिट टीम या अन्य राज्य की आडिट टीम द्वारा कराना चाहिए। (इसमें नदी, तालाब, वन, वायु, भूमि तथा औद्योगिक पर्यावरण प्रदूषण शामिल हैं)

मत्स्य एवं कछुआ पालन-


बड़ी झील एवं छोटी झील में कछुओं, मछलियों, घोंघों का पालन और अधिक किया जाना चाहिए। ये ऐसे प्राणी हैं जो तालाब के साफ रखते हैं।

कृत्रिम मोती (कल्चर्ड मोती की खेती)-


मीठे पानी में रहने वाली सीपी में यदि कोई बाहरी कण, बारीक बालू हड्डी आदि प्रविष्ट करा दिया जाये तो मोती निर्माण की प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है। अथवा सीप का एक बहुत छोटा मनका कण मौलस्क में कवच में प्रविष्ट करा दिया जाये तो भी मोती निर्माण की प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है। मछली पालन वाले तालाबों में भी मोती पैदा किया जा सकता है। इसके लिये उत्तम कोटि के सीप होना चाहिए।

शल्यक्रिया द्वारा सीप के भीतर एक नाभिक रखा जाता है। इसके बाद सीप को इस प्रकार बंद किया जाता है कि उसकी जैविक क्रियायें पहले की तरह सामान्य ढंग से चलती रहें। कुछ दिनों बाद सीप को चीरकर मोती निकाल लिया जाता है। यह सीप बेकार भी हो सकती है और पुनः काम भी आ सकती है। सीपी स्वस्थ हो तो ही अच्छे मोती बनते हैं। इस काम के लिये शरद ऋतु और शीत ऋतु सबसे अच्छी होती है। हमारे यहाँ अक्टूबर से जनवरी तक का समय इसके लिये उपयुक्त हो सकता है। लेखक का विश्वास है कि भोपाल की बड़ी झील में कृत्रिम मोती की खेती की जा सकती है। लेखक को सन 2000 में भोपाल की बड़ी झील के किनारे पर अत्यधिक सुन्दर चमकीला बेडौल मोती का पदार्थ प्राप्त हुआ था।

गाद जमाव के कारण जल से रिचार्ज होने वाले भूमिगत रन्ध्रों के बंद हो जाने का खतरा-


भोपाल के तालाब से कुछ क्षेत्रों के भूजल स्रोतों में रिचार्जिंग होती है। रिचार्ज होने वाले क्षेत्र हैं- बैरागढ़, परवलिया, चांदबड़, फंदा गाँव आदि। तालाब में जमा हुई गाद एक ब्लान्केट का काम करती है तथा जल निकास के भूमिगत रन्ध्रों को बंद करती है जिसके कारण तालाब के जल से रिचार्ज होने वाले क्षेत्रों के कुओं, ट्यूबवैलों आदि में पानी पहुँचाना बंद हो सकता है।

भोपाल के तालाब से रिचार्जिंग होने वाला क्षेत्र बहुत छोटा है और इससे दूर-दूर तक सिंचाई का लाभ नहीं मिलता तथापि जो थोड़े बहुत क्षेत्र इस जल से रिचार्ज होते हैं, तालाब की गाद से भूमिगत रिचार्जिंग रुक जाने का उन्हें खतरा अवश्य हो गया है। शासन को इस ओर ध्यान देना चाहिए जिससे कि इन क्षेत्रों में जल का अभाव होने से पहले ही कोई अन्य विकल्प उपलब्ध हो सके।

एक उपाय के रूप में इन क्षेत्रों में होने वाली वर्षा के जल को वाटर हारवेस्टिंग और रिचार्जिंग करके भू-गत जलस्तर को समृद्ध किया जा सकता है। इस विषय में भूजल सर्वेक्षण इकाई भोपाल से और अधिक जानकारी प्राप्त की जा सकती है तथा इस विभाग की सहायता से व्यापक सर्वेक्षण किया जा सकता है।

भूजल में उपस्थित नाइट्रेट की अत्यधिक मात्रा से खतरा :


भारतीय मानक के अनुसार जल में नाइट्रेट की मात्रा 45 मि.ग्रा. प्रति लीटर से अधिक नहीं होना चाहिए। इससे अधिक होने पर गर्भस्थ शिशुओं एवं छः माह तक के शिशुओं में ब्लू बेबी (Methemoglobinemia) रोग हो सकता है। नाइट्रोजन के कारण इन शिशुओं के हृदय में छेद होने की संभावना हो सकती है।

ये नाइट्रेट (NO3-) भूजल में, उर्वरकों, जैविक कारणों तथा उद्योगों से निकलने वाले रासायनिक तरल पदार्थों तथा अपशिष्टों के कारण मिल जाते हैं।

भूजल सर्वेक्षण केन्द्र भोपाल द्वारा की गई जाँच में यह पाया गया है कि भोपाल के पास के कुछ गाँवों के भूजल (Under ground water) में नाइट्रेट की उपस्थिति इसके स्वीकार्य मानक से अधिक है। इन गाँवों में कुछ के नाम इस प्रकार हैं-

रामगढ़, कुल्हार, हिनोती, हर्राखेड़ी, बरखेड़ी (बैरसिया), गोलखेड़ी, नवीबाग, परवलिया, सूखी सेवनिया, फंदा ब्लॉक के कुछ गाँव, निपानिया आदि।

इन ग्रामों में से कुछ ग्राम भोपाल तालाब के कैचमेंट एरिया के भी हो सकते हैं।

उपर्युक्त तथ्यों को दृष्टिगत रखते हुए मध्य प्रदेश शासन तथा स्वयंसेवी संगठनों से यह अपील की जाती है कि-

1. उपर्युक्त तथा अन्य ग्रामों के भूजल में नाइट्रेट की उपस्थिति की जाँच परीक्षण करें।
2. भूजल में उपस्थित नाइट्रेट के कारण नवजात शिशुओं और जन्म के बाद छः माह तक के बच्चों में ब्लू बेबी और हृदय में छिद्र होने की घटनाओं की ठीक-ठीक संख्या प्राप्त करें तथा प्रभावित शिशुओं के उपचार की संभावना तलाशें।
3. नाइट्रेट से होने वाली समस्या से ग्रामीणों को अवगत करायें।
4. नाइट्रेट युक्त उर्वरकों के स्थान पर कृषि में जैविक खादों के उपयोग को बढ़ावा देने के लिये किसानों को प्रेरित और शिक्षित करें।
5. इस बात की भी जाँच की जाये कि अत्यधिक नाइट्रेट युक्त भूजल वाले क्षेत्रों से भोपाल के तालाब में तो रिचार्जिंग नहीं हो रही?

सन्दर्भ
1. गजेटियर भोपाल स्टेट प्रथम संस्करण 1908 एवं रिप्रिंट 1995-गजेटियर यूनिट, डायरेक्टरेट ऑफ राजभाषा एवं संस्कृति मध्य प्रदेश शासन।
2. भारतीय गजेटियर-सीहोर एवं भोपाल-गजेटियर यूनिट, राजभाषा एवं संस्कृति विभाग, मध्य प्रदेश शासन
3. भारतीय गजेटियर-होशंगाबाद जिला- गजेटियर यूनिट, राजभाषा एवं संस्कृति विभाग मध्य प्रदेश शासन।
4. वाटर, सर सीरिल, एस. फाक्स-टेक्निकल प्रेस लि. किंगस्टन हिल, सर्रे।
5. बेतवा, हरगोविन्द गुप्त- म.प्र. हिन्दी ग्रंथ अकादमी, भोपाल।
6. एकॉलॉजी एण्ड एनवायरनमेंट, प्रो. पी.डी. शर्मा, रस्तोगी पब्लिकेशन, मेरठ।
7. जल संरक्षण, डॉ. डी.डी. ओझा, आइसेक्ट, भोपाल-26।
8. पर्यावरण विधि, एच.एन. तिवारी, इलाहाबाद लॉ एजेन्सी, इलाहाबाद।
9. खनिज और मानव, डॉ. विजय कुमार उपाध्याय, आइसेक्ट, भोपाल-26।
10. चौमासा, सं. कपिल तिवारी, आदिवासी लोक कला एवं तुलसी साहित्य अकादमी, म.प्र. संस्कृति परिषद, भोपाल
11. पर्यावरण दशा एवं दिशा, अरुण कुमार पाठक, आइसेक्ट, भोपाल।
12. वातावरण नियोजन एवं संविकास, प्रो. डॉ. जगदीश सिंह, ज्ञानोदय प्रकाशन, गोरखपुर।
13. पर्यावरण भूगोल, नरेन्द्र मोहन अवस्थी, डॉ. आर.पी. तिवारी, म.प्र. हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, भोपाल।
14. भूमि संरक्षण, डॉ. दिनेश मणि, आइसेक्ट, भोपाल।
15. वाटर पॉल्यूशन, डॉ. बी.के. शर्मा, डॉ. एच. कौर. कृष्णा प्रकाशन, मेरठ।
16. पर्यावरण और परिस्थितिकी, डॉ. बी.के. श्रीवास्तव, डॉ. बी.पी. राव, वसुन्धरा प्रकाशन, गोरखपुर।
17. विज्ञान एवं पर्यावरण संचार, माधुरी श्रीधर, माधवराव सप्रे संग्रहालय एवं शोध संस्थान, भोपाल।
18. इंटरनेट, गूगल।
19. विकीपीडिया ओआरजी/विकी/भोजवेटलैंड।
20. एनवायरनमेंट पॉल्यूशन एनालिसिस, एस.एम खोपकर, न्यू ऐज, इन्टरनेशनल (प्रा.) लि., नई दिल्ली।
21. भौतिक भू विज्ञान, डॉ. मुकुल घोष, म.प्र. हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, भोपाल
22. शोध लेख- श्रीपर्णा सक्सेना (डिपार्टमेंट ऑफ एनवायरनमेंट साइंस एण्ड लिमनालॉजी, बरकतुल्ला ययूनिवर्सिटी, भोपाल), श्री ए.एच. भट्ट (डिपार्टमेंट ऑफ एनवायरनमेंट साइंस, सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ राजस्थान एवं श्री के.सी. शर्मा।

 

भोजवेटलैंड : भोपाल ताल, 2015


(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें।)

1

जल और जल-संकट (Water and Water Crisis)

2

वेटलैंड (आर्द्रभूमि) (Wetland)

3

भोजवेटलैंड : इतिहास एवं निर्माण

4

भोजवेटलैंड (भोपाल ताल) की विशेषताएँ

5

भोजवेटलैंड : प्रदूषण एवं समस्याएँ

6

भोजवेटलैंड : संरक्षण, प्रबंधन एवं सेंटर फॉर एनवायरनमेंटल प्लानिंग एण्ड टेक्नोलॉजी (CEPT) का मास्टर प्लान

7    

जल संरक्षण एवं पर्यावरण विधि

8

जन भागीदारी एवं सुझाव

 


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