नेपाल के रसुवा में भोटेकोशी नदी का जलस्तर सुबह  अचानक बढ़ने से सैकड़ों घर, पुल और सड़कें देखते ही देखते सैलाब में बह गए। 

नेपाल के रसुवा में भोटेकोशी नदी का जलस्तर सुबह अचानक बढ़ने से सैकड़ों घर, पुल और सड़कें देखते ही देखते सैलाब में बह गए। 

फोटो : फेसबुक

तिब्बत से आए पानी-मलबे के सैलाब ने नेपाल में कैसे मचाई तबाही, ग्लेशियर या हिमस्खलन बना विनाशकारी 'फ्लैश फ्लड' की वजह?

नेपाल के रसुवा में भोटेकोशी नदी का जलस्तर सुबह करीब 9 बजे अचानक बढ़ने से सैकड़ों घर, पुल और सड़कें देखते ही देखते सैलाब में बह गए, वैज्ञानिकों ने बाढ़ के पीछे हिमस्खलन और ग्लेशियल झील के फटने की आशंका जताई है।
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नेपाल के उत्तरी सीमावर्ती जिले रसुवा में बुधवार सुबह करीब नौ बजे फ्लैश फ्लड के रूप में कुछ ही मिनटों में ऐसी तबाही आई। जिसने लोगों को संभलने का मौका तक नहीं दिया। इस कारण लोग इसे ‘जलप्रलय' कह रहे हैं। चीन के तिब्बत क्षेत्र से लगे इलाके में अचानक आई भारी मात्रा में पानी, बर्फ, चट्टानों और मलबे की लहर नेपाल की ओर बढ़ी और भोटेकोशी नदी का जलस्तर देखते ही देखते खतरनाक स्तर तक पहुंच गया। स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार करीब सुबह 9 बजे नदी में अचानक तेज उफान आया। इसके बाद तिमुरे, रसुवागढ़ी, स्याफ्रुबेसी और आसपास के इलाकों में नदी के किनारे बने मकान, सड़कें, पुल और दूसरी आधारभूत संरचनाएं इसकी चपेट में आ गईं।

घटना की भयावहता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पानी केवल नदी की सामान्य बाढ़ की तरह नहीं बढ़ा, बल्कि अपने साथ भारी मात्रा में तलछट, बड़े पत्थर और मलबा लेकर नीचे की ओर आया। यही वजह है कि कई जगहों पर नुकसान केवल जलभराव तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इमारतें और पुल तक बह गए। नेपाल के सड़क विभाग के अनुसार बेट्रावती से रसुवागढ़ी सीमा तक करीब 42 किलोमीटर सड़क बाढ़ से बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुई है और कई कंक्रीट पुल भी बह गए हैं।

कहां से आया इतना तेज पानी?

अचानक से आए इस भयंकर सैलाब को देखकर सबसे पहला और महत्वपूर्ण सवाल यह उठ रहा है कि इतनी तेजी से इतना साराा पानी आखिर आया कहां से? शुरुआत में इसे बादल फटने या अचानक भारी बारिश से जुड़ी बाढ़ के रूप में देखा गया, लेकिन उपलब्ध वैज्ञानिक जानकारी इस संभावना को कमजोर करती है। नेपाल के प्रमुख न्‍यूज पोर्टल नेपाल न्‍यूज ने मौसम एवं जल विज्ञान विभाग के आंकड़ों और विशेषज्ञों के शुरुआती आकलन का हवाला देते हुए बताया है कि रसुवा क्षेत्र में इस घटना से पहले ऐसी असाधारण बारिश दर्ज नहीं हुई थी, जो अकेले इस स्तर की बाढ़ को समझा सके।

इसके बजाय वैज्ञानिकों का ध्यान तिब्बत की ओर ऊंचाई वाले इलाके में हुए एक संभावित हिमस्‍खलन (ice-rock avalanche) यानी बर्फ और चट्टानों के बड़े पैमाने पर अचानक खिसकने की घटना पर है। भारत, नेपाल, चीन, भूटान, बांग्लादेश, पाकिस्तान, अफगानिस्तान और म्यांमार के पर्वतीय इलाकों का अध्‍ययन करने वाले काठमांडू स्थित अंतर-सरकारी ज्ञान एवं अनुसंधान केंद्र अंतरराष्ट्रीय एकीकृत पर्वतीय विकास केंद्र (ICIMOD) के शुरुआती विश्लेषण के अनुसार भारी मात्रा में बर्फ और चट्टानी मलबा ल्हेन्दे खोला में गिरा हो सकता है। इससे नदी में अचानक पानी और मलबे का बड़ा उफान पैदा हुआ और वह भोटेकोशी नदी में पहुंच गया। यही कारण है कि इसे सामान्य फ्लैश फ्लड से अलग एक क्रायोस्फियर-जनित आपदा (Cryosphere-induced disaster) के रूप में भी देखा जा रहा है। हालांकि अंतिम वैज्ञानिक निष्कर्ष आने तक यह कहना सही नहीं होगा कि केवल ग्लेशियर टूटना ही इस आपदा का मुख्‍य कारण था।

रसुवा में आई फ्लैश फ्लड का संभावित ट्रिगर ल्हेन्दे खोला में हुआ बर्फ-चट्टान हिमस्खलन (ice-rock avalanche) हो सकता है, हालांकि इसकी अभी पुष्टि नहीं हुई है। इससे बड़ी मात्रा में बर्फ, चट्टान और मलबा भोटेकोशी नदी में पहुंचा और बाढ़ की लहर त्रिशूली तक गई। गल्छी में त्रिशूली का जलस्तर करीब 30 मिनट में नौ मीटर तक बढ़ा। इसे देखते हुए ICIMOD ने नदी में संभावित मलबा-अवरोध के कारण नेपाल और भारत के सीमावर्ती इलाकों में दूसरी फ्लैश फ्लड आने के खतरे की चेतावनी जारी की है, जिसमें संस्था ने कहा कि क्रायोस्फियर से जुड़ी आपदाओं के बढ़ते जोखिम के बीच सीमा-पार सहयोग मजबूत करना जरूरी है।

अंतरराष्ट्रीय एकीकृत पर्वतीय विकास केंद्र (ICIMOD), काठमांडू

ग्लेशियल झील फटने की आशंका भी जांच के घेरे में

हिमालय में ग्लेशियरों के पीछे या उनके आसपास पानी जमा होकर ग्लेशियल झीलें बनती हैं। जब ऐसी झील को रोकने वाली बर्फ, मोरेन या प्राकृतिक बांध कमजोर होता है और अचानक टूट जाता है, तो बहुत कम समय में लाखों-करोड़ों घनमीटर पानी नीचे की ओर दौड़ सकता है। इसे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF कहा जाता है।

रसुवा की घटना में विशेषज्ञ इस संभावना की भी जांच कर रहे हैं कि बर्फ-चट्टान के बड़े हिमस्खलन ने किसी जलस्रोत या ग्लेशियल झील की संरचना को प्रभावित किया हो। एक अन्य संभावना यह है कि मलबे ने नदी को कुछ समय के लिए रोककर एक अस्थायी प्राकृतिक बांध बना दिया हो। इसके पीछे काफी पानी इकट्ठा होने के  बाद यह बांध अचानक से टूट गया हो। ऐसी स्थिति में एक बेहद शक्तिशाली फ्लैश फ्लड नीचे की ओर जाती है, जैसा कि इस मामले में देखने को मिला है। इसलिए अभी इस घटना को “ग्लेशियर टूटने की बाढ़” कहने के बजाय तिब्बत की ओर से आए बर्फ-चट्टान मलबे और संभावित ग्लेशियल/भूस्खलन प्रक्रिया से उत्पन्न फ्लैश फ्लड कहना अधिक वैज्ञानिक रूप से उचित होगा।

आधे घंटे में 9 मीटर तक बढ़ गया त्रिशूली नदी का जलस्तर

इस बाढ़ की असाधारण गति का अंदाजा नदी के जलस्तर में हुए बदलाव से लगाया जा सकता है। ICIMOD के प्रारंभिक आकलन के अनुसार त्रिशूली नदी पर गलछी में जलस्तर करीब 30 मिनट में 9 मीटर तक बढ़ गया। मालखु में भी इसी अवधि में जलस्तर में करीब 7 मीटर की वृद्धि दर्ज की गई। नदी के जलस्‍तर में इस तरह की तेज वृद्धि सामान्य मानसूनी बाढ़ की तुलना में कहीं अधिक खतरनाक साबित हुई। बाढ़ की लहर भोटेकोशी से आगे त्रिशूली नदी तंत्र में पहुंची। इसका अर्थ है कि खतरा केवल रसुवा तक सीमित नहीं रहा। नीचे की ओर नुवाकोट और धादिंग समेत कई इलाकों में नदी के किनारे बसे क्षेत्रों के लिए जोखिम बढ़ गया। कुछ जल निगरानी केंद्र भी बाढ़ के दौरान क्षतिग्रस्त हुए है, जिससे वास्तविक समय में नदी की निगरानी और भी कठिन हो गई।

नेपाल के प्रमुख नदी तंत्र

पुल-सड़कों के साथ बिजली आपूर्ति भी हुई ठप 

बाढ़ की सबसे तगड़ी मार झेल रहा रसुवागढ़ी और चीन सीमा के बीच का क्षेत्र केवल दूरदराज का पहाड़ी इलाका नहीं है। यह नेपाल और चीन के बीच महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्ग है। बाढ़ ने इस संपर्क व्यवस्था को भी गंभीर नुकसान पहुंचाया है। नेपाल के सड़क विभाग के अनुसार बेट्रावती से रसुवागढ़ी तक 42 किलोमीटर सड़क का बड़ा हिस्सा नष्ट हो गया है। कई पुल बह गए हैं और स्याफ्रुबेसी से सीमा तक के हिस्से की पूरी स्थिति का आकलन भी तत्काल संभव नहीं हो पा रहा था। बाढ़ का गंभीर असर नेपाल की जलविद्युत परियोजनाओं और बिजली ढांचे पर भी पड़ा है। भोटेकोशी और इससे जुड़े नदी तंत्र में कई जलविद्युत परियोजनाएं हैं। इस तरह की आपदा में बिजली उत्पादन के साथ-साथ ट्रांसमिशन लाइन, सब-स्टेशन और पहुंच मार्ग भी प्रभावित हो सकते हैं।

NDRRMA ने क्यों जारी की चेतावनी?

नेपाल की आपदा प्रबंधन एजेंसी National Disaster Risk Reduction and Management Authority (NDRRMA) और अन्य प्रशासनिक एजेंसियों ने प्रभावित तथा डाउनस्ट्रीम इलाकों के लोगों को बेहद सतर्क रहने की सलाह दी है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि बाढ़ की पहली मार के बाद भी कई बार खतरा बना रहता है।

हो सकता है कि चीन, तिब्‍बत या नेपाल के दुर्गम इलाकों में ऊपर की ओर जमा हुआ चट्टानों और बर्फ का मलबा अब भी नदी के बहाव को कहीं को रोक रहा हो और उसके पीछे पानी जमा हो रहा हो। ऐसा होने पर,वह अस्थायी बांध कभी भी टूट सकता है। इससे अचानक दूसरी बार बाढ़ आने की संभावना बनी हुई है। ICIMOD ने भी बाढ़ से जुड़ी अपनी एक रिपोर्ट में upstream blockage से दूसरी बाढ़ की आशंका का उल्लेख किया है और चीन की ओर जिलोन्ग पोर्ट के आसपास लोगों को सुरक्षित स्थानों पर जाने के आदेश दिए जाने की जानकारी दी है।

यही वजह है कि नदी के किनारे रहने वाले लोगों को अभी नदी का पानी कम दिखाई देने पर भी वापस अपने घरों या नदी तट की ओर नहीं लौटना चाहिए। ऐसी घटनाओं में दूसरी बाढ़ पहली से भी ज्यादा अचानक आ सकती है।

बाढ़ से प्रभावित बिजली परियोजनाएं

सैलाब के पीछे भूकंप की भूमिका भी जांची जा रही

इस आपदा के समय नेपाल-चीन सीमा क्षेत्र में भूकंपीय गतिविधि भी दर्ज हुई। अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण यानी USGS ने क्षेत्र में 4.4 तीव्रता का भूकंप दर्ज किया है। नेपाल के अधिकारियों ने शुरुआती तौर पर संभावना जताई कि भूकंप से हिमस्खलन या चट्टान-बर्फ का मलबा खिसका हो सकता है। हालांकि बाद में किन बाद के विश्लेषण में USGS ने स्पष्ट किया कि यह भूकंप नहीं था, बल्कि seismic signal वास्तव में ग्लेशियर के ढहने और उससे हुए बड़े पैमाने के मलबा प्रवाह से पैदा हुआ कंपन था। इसलिए वैज्ञानिकों ने अभी तक भूकंप और बाढ़ के बीच सीधा कारणात्मक संबंध स्थापित नहीं किया है।

ICIMOD के अनुसार प्रभावित क्षेत्र के पास स्थित भूकंपीय निगरानी केंद्रों में असामान्य संकेत रिकॉर्ड हुए हैं। वैज्ञानिक इन संकेतों की तुलना बाढ़ और संभावित हिमस्खलन के समय से कर रहे हैं। इसलिए इस समय सबसे सुरक्षित निष्कर्ष यही है कि भूकंप संभावित ट्रिगर हो सकता है, लेकिन इसकी पुष्टि होना अभी बाकी है।

हिमालय में क्यों बढ़ रहा है आपदाओं का खतरा?

रसुवा की घटना को केवल एक स्थानीय बाढ़ के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। हिमालय दुनिया के सबसे तेजी से बदल रहे पर्वतीय पर्यावरणीय क्षेत्रों में शामिल है। तापमान बढ़ने से ग्लेशियर, बर्फ, पर्माफ्रॉस्ट और पर्वतीय ढलानों की स्थिरता प्रभावित हो रही है। इससे कुछ स्थानों पर ऐसी परिस्थितियां बन सकती हैं जिनमें बर्फ और चट्टान अचानक टूटकर नीचे की ओर आ जाएं।

ICIMOD ने हाल के वर्षों में हिंदूकुश हिमालय क्षेत्र में क्रायोस्फियर से जुड़ी कई गंभीर घटनाओं का उल्लेख किया है, जिनमें 2023 का दक्षिण ल्होनाक GLOF, 2024 का थामे GLOF और 2025 में रसुवा-केरुंग क्षेत्र की ग्लेशियर डिस्चार्ज एवं मलबा-बाढ़ शामिल हैं। लेकिन, इसका अर्थ यह नहीं है कि हर ऐसी घटना के लिए सीधे जलवायु परिवर्तन को जिम्मेदार ठहरा दिया जाए। ICIMOD के वैज्ञानिकों ने भी स्पष्ट किया है कि रसुवा की मौजूदा घटना में जलवायु परिवर्तन की भूमिका निर्धारित करने के लिए अभी और अध्ययन की जरूरत है।

सबसे बड़ी चुनौती: सीमा के आर-पार आपदा की निगरानी

रसुवा की घटना हिमालयी आपदाओं की एक महत्वपूर्ण कमजोरी सामने लाती है। जिस स्थान पर आपदा शुरू होती है, वह अक्सर दूसरे देश में होता है, जबकि उसका असर नीचे की ओर कई किलोमीटर दूर दूसरे देश में दिखाई देता है।

तिब्बत में शुरू हुई कोई ग्लेशियर, झील, हिमस्खलन या भूस्खलन की घटना कुछ ही समय में नेपाल की नदी में बाढ़ ला सकती है। आगे यही नदी भारत की ओर बढ़ती है। ऐसे में केवल नेपाल में नदी का जलस्तर मापना पर्याप्त नहीं है। ऊपर की ओर ग्लेशियर, ग्लेशियल झील, हिमस्खलन और नदी में बन रहे प्राकृतिक बांध की निगरानी भी जरूरी है।

यही कारण है कि ICIMOD ने इस घटना के बाद क्षेत्रीय सहयोग और साझा प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली को मजबूत करने की जरूरत पर जोर दिया है। वैज्ञानिकों का मानना है कि उपग्रह तस्वीरों, रियल-टाइम नदी निगरानी, भूकंपीय सेंसर और ग्लेशियल झीलों की निगरानी को एक साझा व्यवस्था में जोड़कर ऐसी आपदाओं की चेतावनी का समय बढ़ाया जा सकता है।

<div class="paragraphs"><p>बाढ़ की चपेट में आकर सैकड़ों घर तबाह हो गए और हज़ारों घरों के भीतर बाढ़ के साथ बहकर आया मलबा भर गया है।&nbsp;</p></div>

बाढ़ की चपेट में आकर सैकड़ों घर तबाह हो गए और हज़ारों घरों के भीतर बाढ़ के साथ बहकर आया मलबा भर गया है। 

फोटो : फेसबुक

भारत के लिए भी सतर्क रहने की चेतावनी

नेपाल में आई यह बाढ़ भारत के लिए भी खासकर, नेपाल से सटे सीमावर्ती इलाकों के लिए सतर्क रहने की एक महत्वपूर्ण है, क्योंकि नेपाल की अधिकतर बड़ी हिमालयी नदियां आगे चलकर भारत में प्रवेश करती हैं। भोटेकोशी-त्रिशूली नदी तंत्र आगे नारायणी-गंडक प्रणाली से जुड़ता है। इसलिए नेपाल में अचानक आई बड़ी बाढ़ की लहर का असर नीचे की ओर भारत के सीमावर्ती क्षेत्रों में भी हो सकता है। नेपाल और उसके सीमावर्ती बिहार के इलाकों में बाढ़ की त्रासदी अकसर कोसी नदी का जलस्‍तर बढ़ने के कारण होती है, पर इस बाढ़ का मामला थोड़ा अलग है। भोटेकोशी-त्रिशूली नदी तंत्र नारायणी-गंडक नदी बेसिन का हिस्सा है। यह नदी तंत्र कोसी से अलग है। नेपाल में त्रिशूली आगे नारायणी में मिलती है और भारत में प्रवेश करने के बाद यही नदी गंडक कहलाती है। इसलिए रसुवा में आई बाढ़ का डाउनस्ट्रीम असर मुख्य रूप से नारायणी-गंडक नदी तंत्र से जुड़े नेपाल और भारत के इलाकों में देखा जाएगा, कोसी नदी तंत्र में नहीं।

भारत-नेपाल सीमा के मैदानी इलाकों में ऐसी घटनाओं के दौरान नदी के जलस्तर, बैराजों और निचले इलाकों की निगरानी बढ़ाना जरूरी होता है। उत्तर प्रदेश और बिहार के लिए खास तौर पर नारायणी-गंडक प्रणाली पर नजर रखना महत्वपूर्ण है। नेपाल से आने वाली बाढ़ की लहर का असर कितनी दूर और कितनी तेजी से पहुंचेगा, यह ऊपर से आने वाले पानी की मात्रा, नदी की स्थिति और रास्ते में होने वाली वर्षा पर निर्भर करेगा। इस घटना ने यह भी दिखाया है कि हिमालय में आपदा की शुरुआत मौसम से न होकर पहाड़ की आंतरिक अस्थिरता से भी हो सकती है। इसलिए केवल बारिश का पूर्वानुमान बाढ़ जोखिम का पूरा अनुमान नहीं दे सकता।

रसुवा की बाढ़ का सबसे बड़ा सबक

रसुवा में आई तबाही एक ऐसी आपदा की तस्वीर पेश करती है जिसमें मौसम, नदी, ग्लेशियर, बर्फ, चट्टान, भूकंपीय गतिविधि और मानव बस्तियां एक साथ जोखिम में आ जाती हैं। सुबह करीब 9 बजे शुरू हुई अचानक बाढ़ ने दिखाया कि पहाड़ी नदी के किनारे रहने वाले लोगों के पास चेतावनी और सुरक्षित स्थान तक पहुंचने के लिए कितनी कम समय-सीमा हो सकती है।

अब प्राथमिकता राहत और बचाव के साथ-साथ ऊपर की ओर संभावित मलबा-बांध और जलस्रोतों की निगरानी है। इसके बाद इस पूरी घटना का वैज्ञानिक पुनर्निर्माण करना होगा कि पानी कहां से आया, कितना मलबा नदी में पहुंचा, क्या किसी ग्लेशियल झील या प्राकृतिक बांध की भूमिका रही, भूकंप का इसमें कितना योगदान था और इतनी तेज बाढ़ की लहर कितनी दूर तक गई।

रसुवा की यह घटना हिमालय के लिए एक और चेतावनी है: पहाड़ों में खतरा हमेशा बादलों से नहीं आता। कभी-कभी खतरा उस बर्फ और चट्टान में छिपा होता है, जो कई किलोमीटर ऊपर जमा है और जिसके टूटने की आवाज नीचे बसे लोगों तक पहुंचने से पहले ही पानी की दीवार पहुंच जाती है।

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