विश्व के सबसे बड़े और सबसे ज़्यादा आबादी वाले डेल्टा क्षेत्रों में गिना जाने वाला भारत और बांग्लादेश में स्थित गंगा का डेल्टा भी धीरे-धीरे डूब रहा है।
स्रोत : विकी कॉमंस
आखिर क्यों डूब रहे हैं दुनिया भर की बड़ी नदियों के डेल्टा?
मानवीय सभ्यताओं के विकास में नदियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। मिस्र की मेसोपोटामिया सभ्यता से लेकर भारत में सिंधु घाटी की सभ्यता तक दुनिया की ज़्यादातर प्राचीन सभ्यताएं नदियों के किनारी ही पनपी और पली-बढ़ी हैं। नदियां, उनके मैदान और डेल्टा आज भी मानवीय जीवन के सामाजिक, आर्थिक से लेकर सांस्कृतिक पहलुओं तक को गहराई से प्रभावित कर रहे हैं। चिंता की बात यह है कि मानवीय बसावटों को सहारा देने वाले नदियों के डेल्टा आज खुद एक बड़े संकट से गुज़र रहे हैं।
इस बात का खुलासा एक अंतरराष्ट्रीय शोध दल के अध्ययन में हुआ है। यह अध्ययन हाल ही में प्रसिद्ध विज्ञान पत्रिका ‘नेचर' में प्रकाशित हुआ था। यह रिसर्च रिपोर्ट बताती है भारत सहित दुनिया के विभिन्न देशों में नदियों के डेल्टा ज़मीन में धंसते जा रहे हैं। इस अध्ययन में दुनिया भर में नदियों के डेल्टा क्षेत्रों में भूमि की ऊंचाई में एक गिरावट पाई है, जो मुख्य रूप से मानवीय गतिविधियों के कारण हुई है।
इस अध्ययन में शामिल सबसे अधिक प्रभावित 35 डेल्टा क्षेत्र नील, मिसिसिपी, राइन-मीयूज, मेकांग, नाइजर, कावेरी, पो, रेड रिवर, विस्तुला, रोन, अमेज़न, गंगा-ब्रह्मपुत्र, चाओ फ्राया, कबानी, पर्ल, रियो ग्रांडे, यांग्त्ज़ी, येलो रिवर, सेनेगल, सिंधु, सालौम, ग्रिजलवा, सेहान, रियोनी, क्रॉस, चिकुमागावा, वोल्टा, ब्रांतास, नेवा, वूरी, इरावदी, ओगौए, ज़ाम्बेज़ी, मैग्डालेना और सिलिवुंग नदी के डेल्टा हैं। समुद्र तल से नीचे स्थित डेल्टा का कुल क्षेत्रफल 38,000 वर्ग किलोमीटर है।
इस वैज्ञानिक शोध के तहत दुनिया के पांच महाद्वीपों में 40 नदियों के डेल्टा क्षेत्रों का अध्ययन किया गया ।
स्रोत : नेचर
क्या होता है डेल्टा
डेल्टा वह जगह होती है जहां कोई नदी समुद्र, सागर या बड़ी झील में जाकर मिलती है और अपने साथ लाई हुई मिट्टी, रेत और गाद को वहीं जमा कर देती है। सोचिए, नदी पहाड़ों से लेकर मैदानों तक सफर करते हुए अपने साथ बारीक कण बहाकर लाती है। जैसे ही वह शांत पानी वाले समुद्र से मिलती है, उसकी रफ्तार धीमी हो जाती है और वह सारा बोझ नीचे बैठने लगता है। धीरे-धीरे यह जमा हुई मिट्टी जमीन का नया टुकड़ा बना देती है, जो अक्सर पंखे या त्रिकोण जैसी आकृति में फैलता है। इसी बनावट को डेल्टा कहा जाता है।
डेल्टा केवल भौगोलिक आकृति नहीं, बल्कि जीवन से भरपूर क्षेत्र होता है। यहां की मिट्टी बेहद उपजाऊ होती है, इसलिए खेती के लिए अनुकूल मानी जाती है। कई बड़े शहर और सभ्यताएं डेल्टा क्षेत्रों में विकसित हुई हैं, जैसे गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा। साथ ही, डेल्टा मछलियों, पक्षियों और अन्य जीवों के लिए भी महत्वपूर्ण आवास बनाता है। यानी जहां नदी खत्म होती है, वहीं से एक नई जमीन और नया जीवन शुरू होता है। यही डेल्टा की खासियत है।
ये गतिशील भू-आकृतियां महत्वपूर्ण सामाजिक-आर्थिक, पारिस्थितिक और ऊर्जा संबंधी कार्य करती हैं। यह कृषि उत्पादकता और मत्स्य पालन के लिए काफी महत्वपूर्ण हैं। इनमें स्थित बुनियादी ढांचे, जैसे बंदरगाह और परिवहन नेटवर्क, राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं के लिए महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार को आधार प्रदान करते हैं । साथ ही डेल्टा क्षेत्रों के पारिस्थितिकी तंत्र पृथ्वी की जैव विविधता को संरक्षित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। धरती और समुद्र के बीच अपनी खास भौगोलिक स्थिति के कारण डेल्टा बढ़ते समुद्र स्तर, तूफानी लहरों, भूमि धंसाव, तापमान और वर्षा के बदलते पैटर्न और अन्य पर्यावरणीय दबावों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होते हैं, जो जलवायु परिवर्तन से और भी बढ़ जाते हैं।
गगंगा सहित ज़्यादातर नदियों के डेल्टा के धंसने की प्रमुख वजह भूजल का असीमित दोहन और नदियों में गाद का जमना है।
स्रोत :विकी कॉमंस
कैसे हुआ अध्ययन
शोधकर्ताओं ने Global subsidence of river deltas शीर्षक से किए गए इस अध्ययन के लिए यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के सेंटिनल-1 उपग्रह से 2014-2023 के दौरान एकत्रित किए गए इंटरफेरोमेट्रिक सिंथेटिक एपर्चर रडार डेटा का उपयोग किया। टीम ने एक रैंडम फॉरेस्ट मशीन लर्निंग मॉडल का उपयोग किया जिसने तीन कारकों भूजल भंडारण, तलछट प्रवाह और शहरी विस्तार के साथ डेल्टा क्षेत्रों के धंसाव की दरों को जोड़कर देखा।
इस अध्ययन में भारत सहित दुनिया भर के 40 प्रमुख डेल्टाओं को 75 मीटर के स्थानिक रिज़ॉल्यूशन पर शामिल किया गया। इस अध्ययन में दुनिया के पांच महाद्वीपों उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका, अफ्रीका, यूरोप और एशिया के 29 देशों की कई नदियों के डेल्टा को शामिल किया गया। यह डेल्टा क्षेत्र चार वर्गों में बांटे गए, जिनमें में 30 लाख से अधिक आबादी वाले सभी प्रमुख नदी डेल्टा, ऐतिहासिक रूप से मान्यता प्राप्त डूबते हुए डेल्टा, क्षेत्रीय पारिस्थितिक और आर्थिक महत्व के कम आबादी वाले और कम अध्ययन किए गए डेल्टा शामिल थे। इस अध्ययन के आधार पर डेल्टा के धंसने (subsidence) से जुड़ी 10 मुख्य बिंदुओं के ज़रिये इस प्रकार समझा जा सकता है –
सैटेलाइट से हाई-रिज़ॉल्यूशन अंतरिक्षीय निगरानी : सेंटिनल-1 सैटेलाइट के इन्टरफेरोमेट्रिक SAR डेटा से 40 बड़े नदी डेल्टों की सतह ऊंचाई परिवर्तन की हाई-रिज़ॉल्यूशन निगरानी की गई।
डेल्टा क्षेत्रों का व्यापक स्तर पर धंसना (subsidence) : सभी 40 डेल्टों में जमीन का धंसना देखा गया; कई डेल्टों में औसत धंसने की दर 3 मिमी/साल से अधिक पाई गई।
धंसने की गति समुद्र के जल स्तर में वृद्धि से तेज़ : 18 में से 40 डेल्टों में भूमि का धंसना वैश्विक समुद्र स्तर वृद्धि (करीब 4 मिमी/साल) से भी तेज़ है, जिसका असर तटीय जोखिम को बहुत बढ़ा देता है।
सबसे ज्यादा खतरे वाले डेल्टों की सूची : मिसिसिपी, नील, गंगा-ब्रह्मपुत्र, मेकोंग, येलो रिवर जैसे डेल्टों में जमीन जल्दी धंस रही है, जिसका असर लाखों लोगों पर पड़ रहा है।
मानव गतिविधियों की बड़ी भूमिका : अत्यधिक भू-जल निकासी, नदी के तल को बनाये रखने वाले तलछट (sediment) का कम होना, और तेजी से शहरी विस्तार मुख्य मानव-प्रेरित कारण हैं जो धंसने को बढ़ा रहे हैं।
भू-जल दोहन सबसे बड़ा कारण : अध्ययन की मशीन-लर्निंग विश्लेषण से पता चलता है कि भू-जल का अत्यधिक खनन अधिकांश डेल्टों में धंसने का सबसे बड़ा कारक है।
डबल खतरा : डेल्टा का धंसना + समुद्र बढ़ना : जब समुद्र का स्तर बढ़ रहा है और डेल्टा जमीन खो रहा है, तो दोनों मिलकर रिलेटिव सी-लेवल राइज़ यानी तटीय क्षेत्रों में जल भराव और बाढ़ के जोखिम को बहुत बढ़ा देते हैं।
लगभग 23.6 करोड़ लोग प्रभावित : 18 डेल्टों में धंसने की दर समुद्र स्तर से तेज़ होने के कारण उन डेल्टों में रहने वाले लगभग 23.6 करोड़ लोग अधिक तटीय जोखिम का सामना कर रहे हैं।
डेल्टा क्षेत्रों की अनुकूलन क्षमता में अंतर : कुछ विकसित क्षेत्रों में धंसने से निपटने की क्षमता अधिक है, लेकिन कई कम-आय वाले और संसाधन-सीमित क्षेत्रों में तटीय समुदायों के सामने बड़े सामाजिक-आर्थिक चुनौतियाँ हैं।
प्रभावी उपायों को अपनाने की ज़रूरत : शोध यह बताता है कि सिर्फ समुद्र स्तर वृद्धि को नियंत्रित करना पर्याप्त नहीं है। डेल्टा धंसने को भी अलग और तत्काल चिह्नित करके रोकने के लिए भू-जल प्रबंधन, तलछट प्रबंधन, नियोजित शहरी विस्तार जैसे प्रभावी उपाय जरूरी हैं।
अध्ययन में डेल्टा के धंसने में बढ़ते शहरी करण की भी अहम भूमिका पाई गई।
स्रोत : नेचर
भारत के ये नदी डेल्टा सबसे ज़्यादा धंस रहे
गंगा-ब्रह्मपुत्र, ब्राह्मणी, महानदी, गोदावरी, कावेरी और काबानी डेल्टाओं के धंसने की पुष्टि हो चुकी है, जिनमें से गंगा-ब्रह्मपुत्र, ब्राह्मणी और महानदी डेल्टाओं का 90% से अधिक हिस्सा प्रभावित है। गंगा, ब्राह्मणी, महानदी, गोदावरी और काबानी डेल्टाओं में भी भूमि धंसने की औसत दर क्षेत्रीय समुद्र स्तर में वृद्धि की दर से अधिक है।
टीम ने यह भी पाया कि ब्राह्मणी डेल्टा का 77% और महानदी डेल्टा का 69% हिस्सा 5 मिमी/वर्ष से अधिक की दर से धंस रहा है। यहां तक कि भविष्य के सबसे खराब जलवायु परिदृश्य में भी, गोदावरी डेल्टा में 95वें प्रतिशत की धंसाव दर वैश्विक समुद्र स्तर में वृद्धि की अनुमानित दर से अधिक होने की उम्मीद है। कोलकाता में, भूस्खलन की दर डेल्टा के औसत के बराबर या उससे अधिक थी क्योंकि शहर का भार और संसाधनों की खपत समुद्र के सापेक्ष इसके धंसने की गति को सक्रिय रूप से बढ़ा रही थी।
क्या है इस धंसाव का कारण
अध्ययन किए गए 40 में से 10 डेल्टाओं में धंसाव का प्रमुख कारण भूजल भंडार का अधिक दोहन किया जाना पाया गया। अन्य डेल्टा के धंसने या डूबने की वजह नदियों में बाद के जमाव के कारण प्रवाह घटना और तलछट का जमाव बढ़ना और या शहरी विस्तार रहा। इसके अलावा इक्कीसवीं सदी में अधिकांश डेल्टा क्षेत्रों के आसपास के तटीय इलाकों में समुद्र के जल स्तर वृद्धि भी डेल्टा के डूबने के एक प्रमुख वजह के रूप में सामने आई है। वैश्विक स्तर पर समुद्र स्तर हुई यह वृद्धि जलवायु परिवर्तन से प्रेरित है।
भारत के संदर्भ में बात करें, तो विश्लेषण से यह भी पता चला कि गंगा-ब्रह्मपुत्र और कावेरी डेल्टा विशेष रूप से भूजल के अनियंत्रित दोहन से प्रभावित हैं, जबकि ब्राह्मणी डेल्टा तीव्र शहरीकरण का सबसे अधिक शिकार है। महानदी और काबानी डेल्टाओं का धंसना भूजल दोहन, तलछट प्रवाह में कमी और जनसंख्या दबाव के संयुक्त प्रभाव से प्रेरित है।
विभिन्न नदियों के डेल्टा के धंसाव की स्थिति और कारणों में अंतर पाया गया।
स्रोत : नेचर
डेल्टा के धंसने का क्या हो रहा असर
डेल्टा क्षेत्रों में इस प्रकार के धंसाव या भूस्खलन के प्रभावों में तटीय और नदी में बाढ़ की स्थिति का और भी बदतर होना, भूमि का स्थायी नुकसान, खारे पानी का प्रवेश जो मीठे पानी के स्रोतों को दूषित करता है और कृषि भूमि को खराब करता है (जो घटते संसाधनों के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ा सकता है और प्रवासन को बढ़ावा दे सकता है), और बंदरगाहों और परिवहन नेटवर्क को नुकसान शामिल है।
अध्ययन में यह भी पाया गया कि जोखिम में काफी वृद्धि हुई है, जबकि इसे नियंत्रित करने की क्षमता कम हुई है। डेल्टा में धंसाव से मीठे पानी की उपलब्धता घटती हैॅ। साथ ही इससे समुद्र तटीय इलाकों और नदी के आसपास के इलाकों में बाढ़ का जोखिम भी बढ़ जाता है। इससे आर्द्रभूमि के इलाके में कमी आती है और उसके इको सिस्टम में असंतुलन भी पैदा होता है, क्योंकि डेल्टा का स्तर नीचे जाने पर तटरेखा पीछे हटती जाती है और तटीय इलाकों में समुद्र के खारे पानी की घुसपैठ बढ़ जाती है। ऐसे में डेल्टाओं क्षेत्रों में में स्थित गोदी और बंदरगाह जैसे बुनियादी ढांचे को भी खतरा पैदा हो जाता है।
डेल्टा को बचाने के लिए मानवीय गतिविधियों पर लगाम ज़रूरी
टीम ने अपने शोध पत्र में कहा है कि सभी डेल्टा, अपनी स्थितियों और प्रकृति के अनुसार समय के साथ धंसते जाते हैं क्योंकि हाल ही में जमा हुए तलछट और उसमें मौजूद कार्बनिक पदार्थ अपने वजन के कारण नीचे बैठते जाते हैं।
यह प्रक्रिया मूल रूप से स्थानीय भौगोलिगक, भूगर्भीय और मौसम की स्थितियों और गतिविधियों पर निर्भर करती है और उससे प्रभावित होती है। हालांकि, भूजल दोहन, शहरीकरण, बांधों के निर्माण, वनों के कटाव जैसी मानवीय गतिविधियों ने दुनिया के कई प्रमुख डेल्टाओं में भूस्खलन की दर को तेज कर दिया है।
इसके चलते धीमी गति से होने वाली एक क्रमिक भूवैज्ञानिक प्रक्रिया एक तेजी से बढ़ते पर्यावरणीय संकट में बदल गई है। हालांकि अपने अध्ययन के बारे में टीम ने यह भी कहा कि अन्य मुद्दों के अलावा, जीआरएसई डेटा में सीमाओं के कारण छोटे डेल्टाओं के लिए भूजल भंडारण के रुझान गलत हो सकते हैं, तलछट प्रवाह डेटा अद्यतन (अप टू डेट) नहीं हैं।

