‘लैंटाना कैमारा’ खरपतवार के तेज़ी से फैलाव की समस्या से जूझता तमिलनाडु का दुमलाई टाइगर रिजर्व।
सस्रोत : विकी कॉमंस
तमिलनाडु के मुदुमलाई टाइगर रिजर्व में फैल रहे विनाशकारी खरपतवार से बना रहा स्वच्छ ईंधन
कहते हैं कि इंसान का नज़रिया अगर सकारात्मक हो, तो वह अपदा में भी अवसर तलाश लेता है। कुछ ऐसा ही अनूठा काम इन दिनों तमिलनाडु के मुदुमलाई टाइगर रिजर्व में देखने को मिल रहा है। इस अभ्यारण्य के हरे-भरे जंगलों में ‘लैंटाना कैमारा’ नाम के खरपतवार तेज़ी से फैलाव जंगल के बाकी पेड़-पौधों के लिए ख़तरा बनता जा रहा था। आक्रामक प्रजाति के इस अंधाधुंध विस्तार के चलते यहां की वनस्पतियां सूखती और सिमटती जा रही थीं। पर, अब यहां खरपतवार के बढ़ते प्रकोप की गंभीर समस्या को एक नवाचार यानी इनोवोशन के ज़रिये वरदान में बदलने की राह ढूंढ निकाली गई है। वन विभाग ने टाइगर रिजर्व में एक संयंत्र लगाकर इस खरपतवार से ‘ब्रिकेट’ के रूप में स्वच्छ ईंधन का निर्माण शुरू किया है। काफी कम प्रदूषण वाले इन पर्यावरण अनुकूल ब्रिकेट्स की आपूर्ति स्थानीय चाय कारखानों में की जा रही है, जो यहां बॉयलर में इस्तेमाल हो रही लकड़ी और कोयले जैसे प्रदूषण फैलाने वाले पारंपरिक ईंधन का विकल्प बन रहा है।
तमिलनाडु वन विभाग ने मुदुमलाई टाइगर रिजर्व के तहत आने वाले मासिनागुडी में एक पिछले साल (2025) लैंटाना कैमारा की झाड़ियों से काटी गई लकड़ियों (बायोमास) से ईंधन ब्रिकेट बनाने की एक पायलट परियोजना शुरू की है। खास बात यह है कि ब्रिकेट का निर्माण बाइंडर-मुक्त तकनीक से किए जाने के कारण यह ईंधन कैमिकल फ्री होता है और कोई भी रासायनिक प्रदूषण नहीं करता। इस पहल की जानकारी हाल ही में संयुक्त राष्ट्र के सबसे बड़े पर्यावरण पुरस्कार ‘चैंपियंस ऑफ द अर्थ’ अवार्ड प्राप्त करने वाली राज्य की पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन और वन विभाग की अतिरिक्त मुख्य सचिव सुप्रिया साहू ने सोशल मीडिया पर साझा की है। उन्होंने सोशल मीडिया साइट X पर एक पोस्ट डाल कर वन विभाग के इस अभिनव प्रयास की जानकारी दी है। अपनी पोस्ट में उन्होंने लेंटाना की सूखी लकड़ियों से ब्रिकेट बनाए जाने का एक वीडियो भी शेयर किया है।
यह कोई साधारण कारखाना नहीं है। नीलगिरी के जंगलों के बीच स्थित, मुदुमलाई टाइगर रिजर्व के मासिनागुडी में ब्रिकेटिंग इकाई चुपचाप एक वैश्विक पारिस्थितिक समस्या को स्थानीय जलवायु समाधान में बदल रही है। लैंटाना कैमारा, दुनिया के सबसे आक्रामक खरपतवारों में से एक, जो पूरे भारत और तमिलनाडु के जंगलों को जकड़ रहा है, को व्यवस्थित रूप से हटाया जा रहा है और स्वच्छ, पर्यावरण के अनुकूल ईंधन ब्रिकेट में परिवर्तित किया जा रहा है। एक सतत बहाली प्रयास के तहत, लगभग 125 हेक्टेयर लैंटाना को हर महीने साफ किया जाता है, जिससे वन्यजीव आवासों को बहाल किया जाता है। इस पहल को वास्तव में खास बनाती है इसकी पूर्ण चक्रीयता। स्थानीय आदिवासी समुदायों की सक्रिय भागीदारी के साथ लैंटाना को घने वन क्षेत्रों से हटाया जाता है, ब्रिकेटिंग इकाई में ले जाया जाता है, और आदिवासी श्रमिकों द्वारा केवल दबाव और गर्मी का उपयोग करके बाइंडर-मुक्त ईंधन ब्रिकेट में संसाधित किया जाता है। फिर इन ब्रिकेट की आपूर्ति पास के चाय कारखानों को की जाती है, जिससे लकड़ी जलाने की जगह वन अपशिष्ट को संसाधन में परिवर्तित किया जाता है यह एकल इकाई संरक्षण, आजीविका, स्वच्छ ऊर्जा और उद्योग को जोड़ती है और दिखाती है कि कैसे तमिलनाडु वन विभाग आक्रामक जैव-द्रव्यमान को पारिस्थितिक बहाली, सम्मानजनक रोजगार और चक्रीय अर्थव्यवस्था के एक क्रियाशील मॉडल में परिवर्तित कर रहा है।
सुप्रिया साहू, तमिलनाडु वन विभाग की अतिरिक्त मुख्य सचिव व चैंपियंस ऑफ द अर्थ अवार्ड - 2025 की विजेता
लैंटाना कैमारा की झाड़ियां बड़ी ही तेज़ी से बढ़ती और फैलती हैं। इस तरह यह अन्य सभी पेड़ पौधों को खत्म कर पूरे जंगल पर कब्ज़ा कर लेती हैं।
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क्या है लैंटाना कैमारा, क्यों है ख़तरनाक?
लैंटाना कैमारा एक विदेशी झाड़ीदार पौधा है। यह मूल रूप से मध्य और दक्षिण अमेरिका का पौधा है। इसके छोटे छोटे रंगीन फूल पहली नज़र में आकर्षक लगते हैं। इस कारण अकसर इसे सुंदर फूलों वाला एक सजावटी पौधा समझ लिया जाता है। लैंटाना कैमारा को मूल रूप से भारत में एक सजावटी पौधे के रूप में ही लाया गया था। पर अन्य वनस्पतियों को नष्ट कर अपने तेजी से विस्तार की प्रवृत्ति के चलते कुछ ही समय में यह देश की सबसे आक्रामक खरपतवार प्रजातियों में से एक बन गई। इसीलिए यह एक सजावटी पौधे से एक गंभीर पर्यावरणीय समस्या में बदल गया है। इसके खतरों कुछ प्रमुख बिंदुओं के ज़रिये इस प्रकार समझा जा सकता है-
भारत में कब और कैसे आया लैंटाना
लैंटाना कैमारा मूल रूप से मध्य और दक्षिण अमेरिका का पौधा है। इसे उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में अंग्रेजों द्वारा भारत लाया गया था। उस समय इसका उद्देश्य बगीचों और कॉलोनियल गार्डन की सुंदरता बढ़ाना था। धीरे धीरे यह पौधा बगीचों से बाहर निकलकर जंगलों, खेतों के किनारों, सड़क किनारे और खाली ज़मीनों में फैलने लगा। पक्षियों द्वारा इसके बीजों को दूर दूर तक ले जाना और इसकी तेज़ बढ़त ने इसे पूरे देश में फैला दिया।
जंगलों में इसका फैलाव इतना तेज क्यों है
लैंटाना की सबसे बड़ी ताकत उसकी अनुकूलन क्षमता है। यह तेजी से फैलता है, किसी सहारे की जरूरत नहीं होती और सूखे या खराब मिट्टी में भी आसानी से पनप जाता है। यह कम पानी में जीवित रह सकता है, आग लगने के बाद भी फिर से उग आता है और चराई से भी ज्यादा प्रभावित नहीं होता। इसके बीज लंबे समय तक मिट्टी में जीवित रहते हैं। जंगलों में जब किसी कारण से खाली जगह बनती है, जैसे पेड़ गिरने या आग लगने से, तो लैंटाना सबसे पहले वहां कब्जा जमा लेता है। एक बार फैलने के बाद इसे हटाना बेहद मुश्किल हो जाता है। इसके अलावा इस खरपतवार की झाड़ियों के उगने से मिट्टी की संरचना भी खराब होती जा रही है। क्योंकि जहां यह उगती है वहां किसी भी अन्य वनस्पति का उगना संभव नहीं रह जाता। इस तरह यह पूरे जंगल को अपनी चपेट में लेकर बाकी सारे पेड़ पौधों को धीरे-धीरे खत्म कर देती है।
देसी पेड़ पौधों के लिए क्यों है खतरा
लैंटाना घने झुरमुट बना लेता है, जिससे जमीन तक धूप नहीं पहुंच पाती। इससे स्थानीय घास, झाड़ियां और नए पौधे उग ही नहीं पाते। यह मिट्टी से पोषक तत्व और नमी तेजी से खींच लेता है, जिससे आसपास के पेड़ कमजोर होने लगते हैं। जंगलों में प्राकृतिक पुनर्जनन की प्रक्रिया बाधित हो जाती है और धीरे धीरे जैव विविधता घटने लगती है। इसके अनियंत्रित फैलाव के चलते देशी घास, झाड़ियां और पेड़ नष्ट हो रहे हैं। यह आक्रामक खरपतवार अबतक भारत के विभिनन बाघ अभ्यारण्यों (टाइगर रिजर्व) के करीब 40 प्रतिशत से अधिक इलाकों को ढक चुकी है। अकेले मुदुमलाई टाइगर रिजर्व में ही इसने लगभग 44 प्रतिशत क्षेत्र पर कब्जा कर लिया है।
वन्यजीवों पर पड़ता असर
इस खरपतवार के तेजी से फैलने से जैव विविधता को खतरा है और सीमावर्ती क्षेत्रों में मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ रहा है। इसके कारण शाकाहारी जानवरों के लिए भोजन के स्रोत बाधित हो गए हैं, क्योंकि जानवर इसे खा नहीं सकते। लैंटाना के तने छोटे-छोटे कांटों से युक्त होते हैं। इसके पत्तों में चिपचिपा और बदबूदार रस होता है और इनका स्वाद भी काफ़ी खराब होता है। इस कारण इसके पत्ते जानवरों के लिए खाने योग्य नहीं होते। इसीलिए हाथी, हिरण और मवेशी इसे नहीं खाते, जिससे उनके लिए चारे की उपलब्धता कम हो जाती है। कई इलाकों में लैंटाना के फैलाव से घास के मैदान खत्म हो गए हैं, जो शाकाहारी जीवों के लिए बेहद जरूरी थे। इसके घने झाड़ झंखाड़ शिकारी और शिकार दोनों के व्यवहार को भी बदल देते हैं।
आग और जंगलों का बढ़ता जोखिम
सूखे मौसम में लैंटाना बहुत जल्दी सूख जाता है और आग पकड़ने वाला ईंधन बन जाता है। जंगलों में आग लगने की घटनाओं को यह और खतरनाक बना देता है, क्योंकि इसकी घनी झाड़ियां आग को ज़मीन से पेड़ों की ऊंचाई तक तेजी से पहुंचा देती हैं। आग के बाद जब बाकी वनस्पतियां नष्ट हो जाती हैं, तब भी लैंटाना फिर से उग आता है और पहले से ज्यादा फैल जाता है। इससे जंगल की प्राकृतिक पुनर्प्राप्ति बाधित होती है और आग की आवृत्ति बढ़ने लगती है। इस तरह यह आग और फैलाव का एक दुष्चक्र बना देता है, जो हर साल जंगलों को और कमजोर करता जाता है।
क्यों बन चुका है यह राष्ट्रीय स्तर की चुनौती
आज लैंटाना कैमारा भारत के लगभग सभी राज्यों में पाया जाता है और अलग अलग जलवायु क्षेत्रों में खुद को ढाल चुका है। वन विभाग और शोध संस्थान इसे नियंत्रित करने के कई प्रयास कर रहे हैं, लेकिन पूरी तरह खत्म करना आसान नहीं है, क्योंकि इसकी पुनर्जनन क्षमता बहुत अधिक है। इसकी मौजूदगी जंगलों की संरचना, जल चक्र, वन्यजीव आवास और आजीविका सभी पर असर डाल रही है, खासकर उन समुदायों पर जो वनों पर निर्भर हैं। कई इलाकों में यह वन बहाली परियोजनाओं की सफलता को भी सीमित कर रहा है। यही वजह है कि लैंटाना अब सिर्फ एक पौधा नहीं, बल्कि भारत के जंगलों के लिए एक गंभीर पर्यावरणीय चेतावनी बन चुका है।
लैंटाना कैमारा मूल रूप से मध्य और दक्षिण अमेरिका का पौधा है, जिसके रंग-बिरंगे फूल आकर्षक दिखते हैं। इसलिए अकसर इस खरपतवार को एक सजावटी पौधा समझ लिया जाता है।
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वन विभाग ने समस्या को बनाया समाधान
लैंटाना कैमारा के इस खतरे को देखते हुए वन विभाग ने बीते वर्ष इसे खत्म कर मुदुमलाई टाइगर रिजर्व के वनों को बचाने की दिशा में कदम बढ़ाया है। इसके तहत हर महीने आदिवासी मजदूर 125 हेक्टेयर वन भूमि से लैंटाना की झाड़ियों को काटते और हाथों से हटाते हैं। एकत्रित बायोमास को पास के एक संयंत्र में ले जाया जाता है, जहां इसे छोटे-छोटे टुकड़ों में काटा जाता है। इसे कुछ दिनों तक कड़ी धूप में अच्छी तरह से सुखाया जाता है।
इसके बाद इन सूखी हुई लकड़ियों को बिना किसी रसायन या बाइंडर के गर्मी और दबाव में संपीड़ित (कंप्रेस) करके उच्च-कैलोरी मान वाले ईंधन ब्रिकेट में परिवर्तित किया जाता है। तकरीबन न के बराबर धुआं पैदा करने वाले इन ब्रिकेट्स का उपयोग स्वच्छ ईंधन के रूप में किया जा सकता है। इसलिए इन पर्यावरण के अनुकूल ब्रिकेट की आपूर्ति स्थानीय चाय कारखानों को की जाती है, जहां यह जलाऊ लकड़ी और कोयले के एक स्वच्छ विकल्प के रूप में इस्तेमाल किए जाते हैं। इस प्रकार, झाड़ियों की कटाई से लेकर उनसे ब्रिकेट के निर्माण व पैकेजिंग तक की पूरी प्रक्रिया दर्शाती है कि किस प्रकार एक अपशिष्ट को मूल्यवान संसाधन बनाया जा सकता है।
आदिवासियों को मिल रहा रोज़गार
सुप्रिया साहू ने अपनी पोस्ट में बताया है कि किस तरह वन विभाग का यह पर्यावरण हितैषी कदम किस तरह टाइगर रिजर्व में लैंटाना कैमारा खरपतवार के बेहलगाम फैलाव को रोकने के साथ ही स्थानीय आदिवासी समुदाय को एक स्थायी रोज़गार उपलब्ध कराने में में सहायक साबित हो रहा है। इन झाड़ियों की कटाई से जहां एक ओर वन्यजीवों के प्राकृतिक आवासों पर मंडराते ख़तरे से निपटने में मदद मिल रही है, वहीं यह काम स्थानीय आदिवासी समुदायों लोगों को रोज़गार के अवसर भी प्रदान कर रहा है। इसके अलावा यह परियोजना इस लिहाज़ से भी महत्वपूर्ण है क यह आदिवासी समुदायों के सदस्यों को सीधे रोजगार व नियमित आय का साधन उपलब्ध कराकर जीवन-यापन के लिए वन संसाधनों पर उनकी निर्भरता को कम कर रही है, जो वनों के संरक्षण में मददगार साबित हो रहा है। कर्नाटक के बांदीपुर टाइगर रिजर्व में पहले से ही इसी तरह के सफल मॉडल का उदाहरण मौजूद है, जो यह दर्शाता है कि आदिवासी समुदाय के नेतृत्व वाले प्रयासों के माध्यम से बड़े पैमाने पर लैंटाना प्रबंधन सामाजिक व आर्थिक रूप से व्यावहारिक और लाभदायक है।
पशु-पक्षियों को भी मिल रहा फ़ायदा
लैंटाना कैमारा के घने झुरमुटों को साफ करके, यह पहल खुले घास के मैदानों और देशी वनस्पतियों को बहाल करने में मदद करती है, जिससे बाघों, हाथियों, हिरणों और अनगिनत पक्षी प्रजातियों को लाभ होता है। इस तरह तमिलनाडु के वन विभाग का दृष्टिकोण पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली और हरित ऊर्जा उत्पादन के लिए एक व्यावहारिक और कम लागत वाला समाधान प्रस्तुत करता है। यदि इसे बड़े पैमाने पर लागू किया जाए, तो इसमें हजारों हेक्टेयर वन भूमि को पुनः प्राप्त करने और लुप्तप्राय वन्यजीवों की रक्षा करने में कारगर हो सकता है। साथ ही यह स्थानीय आदिवासी समुदायों केा एक टिकाऊ ग्रामीण आजीविका उपलब्ध कराने की भी क्षमता रखता है।
लैंटाना कैमारा को उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में अंग्रेजों द्वारा बगीचों और कॉलोनियल गार्डन की सुंदरता बढ़ाने के लिए भारत लाया गया था। धीरे- धीरे यह पौधा जंगलों और खाली ज़मीनों में फैलने लगा।
स्रोत : विकी कॉमंस
लैंटाना कैमारा से जुड़ी कुछ अनूठी जानकारियां
रंग बदलते फूल, धोखा देने वाली खूबसूरती : लैंटाना के फूल खिलने के साथ साथ रंग बदलते हैं। पीले फूल लाल या गुलाबी हो जाते हैं, जिससे परागण करने वाले कीट आकर्षित होते हैं। यही वजह है कि यह देखने में सुंदर होते हुए भी जंगलों के लिए खामोश खतरा बन जाता है।
आग के बाद और भी ताकतवर होकर लौटता है लैंटाना : जहां जंगल की आग अधिकतर पौधों को नष्ट कर देती है, वहीं लैंटाना की जड़ें ज़मीन के भीतर सुरक्षित रहती हैं। आग के बाद यह पहले से ज्यादा तेजी से फैलता है और खाली जगह पर सबसे पहले कब्जा करता है।
पक्षी बनते हैं इसके सबसे बड़े ‘प्रसारक’ : लैंटाना के फल पक्षियों को पसंद आते हैं। बीज पचते नहीं, बल्कि मल के साथ दूर दूर तक फैल जाते हैं। इस तरह पक्षी अनजाने में लैंटाना के सबसे प्रभावी वाहक बन जाते हैं।
जंगल को बना देता है ‘ग्रीन डेज़र्ट’ : ज्यादातर शाकाहारी वन्यजीव लैंटाना को नहीं खाते। नतीजा यह होता है कि जंगल में हरियाली दिखती है, लेकिन जानवरों के लिए भोजन कम होता चला जाता है। इसे ‘ग्रीन डेज़र्ट’ की स्थिति कहा जाता है।
औपनिवेशिक विरासत की एक जीवित गलती : भारत में लैंटाना का फैलाव ब्रिटिश काल की नीतियों की एक स्थायी याद है। जिसे कभी गार्डन की शान समझा गया, वही आज जंगलों के संतुलन को बिगाड़ने वाला सबसे बड़ा कारक बन चुका है।
पूरी तरह खत्म करना लगभग नामुमकिन : लैंटाना को काटना, जलाना या उखाड़ना जैसा कोई तरीका अकेले कारगर नहीं है। इसकी जड़ का छोटा सा हिस्सा भी बच जाए तो यह दोबारा उग आता है। इसलिए इसे खत्म नहीं, बल्कि नियंत्रित करना ही फिलहाल सबसे व्यावहारिक रणनीति मानी जाती है।


