असम में आर्सेनिक से लड़ने के लिए पारंपरिक सैंड फिल्टर को किया गया अपग्रेड

नलबाड़ी के गांवों में पानी से आयरन हटाने के लिए इस्तेमाल हो रहे पारंपरिक रेत-बजरी फिल्टर में अब लोहे की कीलें/फिलिंग्स जोड़कर आर्सेनिक हटाने की कोशिश की जा रही है। जानिए कैसे काम करता है यह सरल फिल्टर और इसकी चुनौतियां क्या हैं।
असम में आर्सेनिक से लड़ने के लिए पारंपरिक सैंड फिल्टर को किया गया अपग्रेड
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असम के नलबाड़ी जिले के के ग्रामीण इलाकों में भूजल की समस्या कोई नई बात नहीं है। यहां पानी की कमी नहीं है, लेकिन जो पानी है, उसमें मौजूद आयरन को ग्रामीण लंबे समय से उसके रंग, स्वाद और बर्तनों या कपड़ों पर पड़ने वाले दाग से पहचानते रहे हैं। इससे निपटने के लिए कई परिवारों ने स्थानीय स्तर पर रेत और बजरी से बने साधारण फिल्टर का इस्तेमाल शुरू किया। लेकिन इसी पानी में एक दूसरी समस्या ऐसी है जिसे आंखों से देख पाना मुश्किल है। वो है आर्सेनिक। और इससे लड़ने के लिए यहां के ग्रामीणों ने पारंपिरक सैंड फिल्टर को अपग्रेड किया है। 

आयरन के विपरीत आर्सेनिक पानी का रंग या स्वाद जरूरी नहीं कि बदले। इसलिए केवल पानी को देखकर यह पता नहीं लगाया जा सकता कि वह आर्सेनिक से दूषित है या नहीं। नलबाड़ी उन असमिया जिलों में शामिल है जहां भूजल में आर्सेनिक की मौजूदगी दर्ज की गई है। 2025 की केंद्रीय भूजल गुणवत्ता रिपोर्ट के आधार पर केंद्र सरकार ने असम में 154 नमूनों में से चार में आर्सेनिक की मात्रा 10 माइक्रोग्राम प्रति लीटर से अधिक पाई थी। इन नमूनों वाले जिलों में नलबाड़ी भी शामिल था।

ऐसे में सवाल था कि क्या गांवों में पहले से इस्तेमाल हो रहे सैंड फिल्टर को ही आर्सेनिक के खिलाफ अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है? यहीं से शुरू होती है पारंपरिक सैंड फिल्टर को अपग्रेड करने की कहानी।

आयरन हटाने वाला फिल्टर, अब आर्सेनिक से भी मुकाबला

नलबाड़ी के गाँवों में ग्रामीण पहले से ही sand-gravel filter (ऐसा फिल्टर जिसमें रेत व पत्थर डाल कर पानी को फिल्टर किया जाता है) का इस्तेमाल करते रहे हैं। इसका उद्देश्य मुख्य रूप से पानी में मौजूद अतिरिक्त आयरन और गंदगी को कम करना था। यहां के ग्रामीण दशकों से कम खर्च और लगभग बिना रखरखाव वाले इन फिल्टरों को अपने आ रहे हैं।  

समस्या तब सामने आई जब यह पता चला कि कुछ इलाकों के भूजल में आर्सेनिक भी मौजूद है। तमाम ग्रामीण जो आर्सेनिक के दुष्प्रभावों के बारे में जानते थे, उन्होंने दूर-दराज़ से पानी लाना शुरू कर दिया, लेकिन तमाम ग्रामीण ऐसे थे उन्हें पता ही नहीं था कि पानी में यह तत्व मौजूद है और वो उसी पानी का इस्तेमाल करते रहे। ग्रामीणों को विस्तार से तब पता चला जब करीब तीन साल पहले INREM फाउंडेशन की टीम नलबाड़ी के कुवारीकुची, कुंदरगांव में पहुंची और लोगों को आर्सेनिक के दुष्प्रभावों को बताने के साथ-साथ इसी सैंड फिल्टर को अपग्रेड करने की सलाह दी। 

उसी के बाद फिल्टर की संरचना में एक बदलाव किया गया और रेत की परत के साथ लोहे की कीलों या iron filings को शामिल किया गया। तमाम परिवारों ने पहले से मौजूद अपने सैंड-ग्रैवल फिल्टर में लौह जोड़कर आर्सेनिक हटाने का प्रयास किया। तो कईयों ने Arsenic Removal Bio-Sand Filters (ARBSF) का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। दरअसल इस फिल्टर का काम भी वही है। यह शहरों में लगे किसी आर-ओ से कम नहीं। 

नलबाड़ी की आशा कार्यकर्ता  रुपाली कलीता ने इंडिया वाटर पोर्टल से बातचीत के दौरान अपने अनुभव साझा किए और बताया कि पानी में आयरन और आर्सेनिक की मात्रा अधिक होने के कारण उनके गाँव के लोगों में त्वचा संबंधी रोग होने लगे थे। रुपाली ने बताया कि गाँव में कैंसर के मरीज भी बढ़ रहे थे। गाँव वालों को लगता है कि कैंसर का मुख्य कारण पानी हो सकता है। 

<div class="paragraphs"><p>आशा वर्कर रुपाली&nbsp;कालिता&nbsp;</p></div>

आशा वर्कर रुपाली कालिता 

फोटो - INREM Foundation के सौजन्य से 

रुपाली ने बताया कि असम में सैंड फिल्टर का चलन सदियों से चला आ रहा है। यहां के गाँवों में सैंड फिल्टर होना आम बात है और इसके पीछे का कारण फिल्टर की वैज्ञानिक प्रणाली है। सदियों से इस्तेमाल होने वाले सैंड फिल्टर में आम मौर पर बड़े पत्थर, छोटे पत्थर और रेत होती है, जो एक के बाद एक लेवल के रूप में भरी जाती है। इसमें ऊपर से पानी डालते हैं, जो धीरे-धीरे छन कर नीचे एकत्र होता है और फिर उसे घड़े, सुराही, आदि में एकत्र कर लिया जाता है। 

रुपाली बताती हैं कि जब लोगों को पता चला कि जिस पानी को सैंड फिल्टर से वो छान कर पी रही हैं, उसमें आर्सेनिक और आयरन जैसे तत्वों की अधिकता भी है तो वे घबरा से गए, लेकिन अब आयरन फिलिंग वाले फिल्टर पर उन्हें पूरा भरोसा है। 

बतौर आशा वर्कर रुपाली जगह-जगह जाती हैं और अपने मुख्य कार्य के अलावा इस फिल्टर के बारे में भी लोगों को बताती हैं। उन्होंने बताया कि जब उन्हें INREAM द्वारा आयोजित एक कार्यशाला में यह पता चला कि इसी पारंपरिक फिल्टर में अगर लोहे कीलें डाल देंगे तो आर्सेनिक की मात्रा घट जाएगी। तो उन्होंने सबसे पहले अपने घर पर ही ट्रायल किया। वाटर टेस्टिंग किट के जरिए पानी चेक भी किया तो उसमें आर्सेनिक की मात्रा कम निकली। 

आखिर लोहे की कील आर्सेनिक को कैसे पकड़ती है?

लोहे द्वारा पानी में मौजूद आर्सेनिक को हटाये जाने की प्रक्रिया एक केमिकल रिएक्शन है। इस विज्ञान को साधारण भाषा में समझें तो लोहे की कील पानी में आर्सेनिक को सीधे absorb यानी अवशोषित नहीं कर लेती। पानी और ऑक्सीजन के संपर्क में आने पर लोहे की सतह पर iron hydroxides/iron oxides (आयरन हाईड्रॉक्साइड / आयरन ऑक्साइड) बनते हैं। इन यौगिकों की सतह पर आर्सेनिक के आयन चिपक सकते हैं। जब आर्सेनिक युक्त पानी iron nails या iron filings की परत से गुजरता है तो लोहे का ऑक्सीकरण होता है और बनने वाले आयरन हाईड्रॉक्साइड आर्सेनिक को अपनी सतह पर अवशोषित कर लेते हैं। 

सैंड फिल्टर में आगे क्या होता है 

आर्सेनिक के अवशोषण के बाद पानी अगले चरण में जाता है जहां फिल्टर में रेत की परत आयरन-आर्सेनिक के बने कणों यानी फ्लॉक्स तथा अन्य कणों को रोकने में मदद करती है। यही कारण है कि वैज्ञानिक अध्ययनों में भी iron filings और sand पर आधारित घरेलू फिल्टरों को आर्सेनिक हटाने में सक्षम माना गया है। हालांकि यह भी सच है कि ये फिल्टर आर्सेनिक को 100 प्रतिशत कम नहीं कर सकते, लेकिन पानी को पीने योग्य बनाने यानी WHO के 10 माइक्रोग्राम प्रति लीटर के दिशानिर्देश से नीचे लाने की क्षमता रखते हें। 

सिर्फ कीलें डाल देना ही पर्याप्त नहीं

हालांकि यह समाधान देखने में बहुत सरल है, लेकिन इसकी प्रभावशीलता केवल इस बात पर निर्भर नहीं करती कि फिल्टर में कितनी लोहे की कीलें डाल दी गई हैं। INREM फाउंडेशन द्वारा तैयार दस्तावेज के अनुसार पानी का pH, dissolved oxygen (घुली हुई ऑक्सीजन), आयरन का सतही क्षेत्रफल, turbidity (पानी का मटमैलापन), पानी का फिल्टर में बहाव की दर और आयरन के साथ पानी का संपर्क समय, जैसे कारक फिल्टर की परफॉर्मेंस को प्रभावित कर सकते हैं।

दस्तावेज के अनुसार पानी में मौजूद फॉसफेट और सिलिका भी आर्सेनिक के साथ प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं जिससे फिल्टर की क्षमता कम हो सकती है। यही वजह है कि किसी एक गांव में काम कर रहा फिल्टर दूसरे स्थान पर बिल्कुल उसी तरह काम करेगा, यह मान लेना उचित नहीं होगा।

इस बारे में भारतीय पौद्योगिकी संस्थान खड़गपुर के केमिकल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर डॉ. सिरशेंदु डे ने इंडिया वाटर पोर्टल से बातचीत में बताया कि इस फिल्टर को इस्तेमाल करना तभी तक सही है, जब तक इसके आयरन फिलिंग अपना काम कर रहे हैं। लगातार इस्तेमाल करने पर आयरन फिलिंग का हाईड्रॉक्सीकरण धीमा पड़ने लगता है। ऐसे में आर्सेनिक को अवशोषित करने की क्षमता धीरे-धीरे कम होने लगती है। इसलिए समय समय पर पानी की टेस्टिंग करना जरूरी होता है।  

<div class="paragraphs"><p>सैंड ग्रैवल फिल्टर</p></div>

सैंड ग्रैवल फिल्टर

फोटो - INREM Foundation के सौजन्य से 

15-20 लीटर पानी प्रतिदिन और 6-7 महीने तक उपयोग

INREM के दस्तावेज के अनुसार अगर इस फिल्टर का प्रयोग घर पर किया जा रहा है और उसमें रेत और बजरी की परतों के साथ परफोरेटेड चैंबर बनाकर उसमें आयरन फिलिंग रखें तो ज्यादा कारगर होता है। पानी को आयरन के संपर्क में रहने का पर्याप्त समय मिलता है। और यह चैंबर इस व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। लगभग 15–20 लीटर पानी प्रतिदिन फिल्टर के इस्तेमाल में फिलिंग से भरा चैंबर 6–7 महीने तक काम कर सकता है। इसके बाद नए आयरन फिलिंग को बलना पड़ता है। वहीं बालू और पत्थर वाले भाग की नियमित रूप से सफाई पर्याप्त है। इससे इस फिल्टर की परफॉर्मेंस अच्छी रहती है। 

नलबाड़ी में समस्या सिर्फ पीने के पानी तक सीमित नहीं

इस प्राकृतिक फिल्टर सिस्टम का जिक्र INREM की 2024-25 रिपोर्ट में भी किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, स्कूल और आंगनवाड़ी केंद्रों में सुरक्षित पानी की व्यवस्था के साथ, गाय-बकरी आदि के लिए और बागीचों में इस प्रणाली को लगाया गया है। लोग इसे सकारात्मक रूप से अपना भी रहे हैं। रुपाली जैसी कई अन्य आशा वर्कर जब गाँव-गाँव जाती हैं और महिलाओं को इस फिल्टर के नए स्वरूप के बारे में बताती हैं तो लोग इस प्रणाली को बढ़चढ़ कर अपनाते हैं।  

स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं जो अब शायद समाप्त हो जाएं 

महिलाओं के साथ बातचीत के आधार पर रुपाली ने बताती हैं कि यहां की महिलाएं सबसे ज्यादा लाल पानी (जिसमें आयरन अधिक होता है) से परेशान रहती हैं। इसके इस्तेमाल से बालों के झड़ने की समस्या सबसे ज्यादा होती है। कपड़े धोने पर हाथ फटने लगते हैं, ज्यादा देर तक पानी के संपर्क में रहने की वजह से पैरों की एडियां फटती हैं। यही नहीं कपड़ों का रंग भी बदल जात है। आर्सेनिक के दुष्प्रभावों के बारे में अभी उन्हें ज्यादा पता नहीं है, लेकिन वो उम्मीद जताती हैं कि आने वाले समय में महिलाओं को इन समस्याओं से छुटकारा जरूर मिलेगा। 

समाधान छोटा है, लेकिन सवाल बड़ा

इस पारंपरिक सैंड फिल्टर में डाली गईं आयरन फिलिंग यहां की समस्या का समाधान जरूर हैं, लेकिन बहुत छोटा सा। अगर इस क्षेत्र की वृहद तस्वीर देखें तो जल जीवन मिशन के तहत नलबारी के जिन गाँवों में घरों तक नल के कनेक्शन दे दिए गए हैं उनमें तमाम घरों तक अभी सरकार द्वारा दिया जाने वाला पीने का पानी नहीं पहुंचा है, इसलिए अधिकांश घरों में पीने के पानी का स्रोत ग्राउंड वाटर ही है, जो कि ट्यूबवेल से या हैंडपम्प से आता है। नल के कनेक्शन आने के पहले से यहां के लोग भूजल पर ज्यादा निर्भर हैं। और सरकारी रिपोर्ट में ही नलबाड़ी जिले में आर्सेनिक पाये जाने की पुष्टि भी हुई है। किस क्षेत्र के भूजल में आर्सेनिक की सांध्रता कितनी है, यह फिलहाल जांच का विषय है, लेकिन इस फिल्टर के इस्तेमाल से एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा होता है- कहीं सरकार इस तात्कालिक समाधान को दीर्घकालिक मान कर ढिलाई न कर दे। इस समस्या का ठोस समाधान जरूरी  है, क्योंकि यह मामला लोगों के स्वास्थ्य से जुड़ा है। 

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