

धनबाद में बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक - पानी के लिए जंग के साथ होती है सबकी सुबह
मैथन डैम मानसून की बारिश से लबालब है, फिर भी झारखंड की औद्योगिक और कोयला राजधानी धनबाद के कई मोहल्लों में लोग बूंद-बूंद को मोहताज हैं। कुसुम विहार, गाँधी नगर, धैया, धनसार, तेलीपाड़ा, मनईटांड आदि कई इलाकों के सैकड़ों घरों तक पानी नहीं पहुंच रहा, तो गांधी नगर में नल सिर्फ़ 10-15 मिनट चलते हैं। जबिक पॉश कालोनियों और उद्योगों को पानी की निरंतर सप्लाई होती है। इस असमानता की जड़ आंकड़ों में दिखती है, क्योंकि मैथन से छोड़े जाने वाले पानी का मात्र एक तिहाई ही शहरवासियों के हिस्से में आता है। ऐसे में बस एक ही सवाल मुखर होकर सामने आता है – धनबाद का पानी आख़िर किसका है?
कोरंगा बस्ती में सुबह 6 बजे से पानी के इंतजार में महिलाएं
फोटो - सत्यम कुमार
धनबाद के पॉश इलाके धैया से सटी कोरंगा बस्ती में हर सुबह प्यास से जंग का ऐलान लेकर आती है। यहां नलों के पास प्लास्टिक की बाल्टियों और बर्तनों की कतारें इस उम्मीद में सज जाती हैं कि नगर निगम की कृपा से आज कुछ बूँदें नसीब होंगी।
“साल 2021 में हमारे घर में नल का कनेक्शन लगा था, लेकिन आज तक नल में ढंग से पानी नहीं आया”, बस्ती की रहने वाली सरस्वती देवी बताती हैं। निगम द्वारा सुबह सिर्फ 30 मिनट के लिए पानी खोला जाता है, जिससे एक परिवार में मुश्किल से 100 लीटर पानी ही जमा हो पाता है। सरस्वती देवी कहती हैं, “हमारे 6 सदस्यों के परिवार के लिए इतना पानी ऊँट के मुँह में जीरा समान है। यहां ज़्यादातर लोग दिहाड़ी मजदूरी करते हैं, जिनकी रोज़ की कमाई महज 300 रूपये है। अब आप ही बताइए, 300 में हम बच्चों के लिए भोजन जुटाएँ या पानी खरीदें?”
बाएं- अपने पुरे परिवार के लिए पानी जुटाती हुई सरस्वती देवी | दाएं - पानी के लिए डिब्बों की कतारें
फोटो - सत्यम कुमार
सरस्वती देवी आगे बताती हैं कि सप्लाई का पानी एकदम मटमैला और बदबूदार आता है। अगर इस पानी को लेने से चूके, तो आज दिन भर चूल्हा नहीं जलेगा, बच्चों को बिना नहाए स्कूल जाना पड़ेगा और बर्तन सिंक में पड़े-पड़े बदबू मारने लगेंगे। इसे सीधे पीना बीमारी को बुलावा देना है, इसलिए यहां के लोग मटमैले पानी को कपड़े से छानकर और घंटों उबालकर इस्तेमाल करते हैं। इसके बावजूद इस पानी को पीने से कई बार घर के बच्चों को दस्त और उल्टी जैसी गंभीर बीमारियां हो जाती हैं।
बस्ती के ही संजीव कोरंगा बताते हैं, “4 साल पहले तक स्थिति इतनी भयानक नहीं थी। जब से हमारी बस्ती के ठीक पास श्री राम वाटिका की बड़ी सोसायटी बिल्डिंग बनी है, तब से हमारी पूरी बस्ती की सप्लाई लाइन का प्रेशर गायब हो गया है। सारा पानी श्री राम वाटिका सोसाइटी की तरफ खींच लिया जाता है और हमारे नलों में मुश्किल से पानी टपकता है।”
संजीव के अनुसार धनबाद नगर निगम के अधिकारियों ने उस ऊँची इमारत के बड़े पाइपों को मुख्य लाइन से जोड़ दिया, और बस्ती के हिस्से का पानी हाई-राइज बिल्डिंग के अंडरग्राउंड टैंकों में चला जाता है।
बाएं- संजीव कोरंगा पानी लेने के लिए पुरे परिवार के साथ इंतजार करते हुए |पानी के लिए जुटी भीड़
फोटो - सत्यम कुमार
संजीव आगे कहते हैं, “सुबह पानी आने के समय पूरा परिवार काम छोड़कर बाल्टियाँ भरने की जुगत में लगा रहता है, जिसकी वजह से कई बार बच्चे स्कूल नहीं जा पाते। गंदे पानी को पीकर अस्पताल का चक्कर लगाने और बच्चों के इलाज में पैसे गंवाने से बेहतर है कि हम खरीदकर पानी पीएँ। लेकिन बाहर से पानी खरीदने में ही हर महीने का ₹2,500 से ₹3,000 खर्च हो जाता है, जो हमारी महीने भर की मेहनत की कमाई का सबसे बड़ा हिस्सा निगल जाता है।”
दैनिक मजदूरी करने वाले सागर कुमार बताते हैं कि निगम की सप्लाई इतनी अनिश्चित है कि कभी पानी आता है तो कभी हफ्तों गायब रहता है। जब सप्लाई ठप होती है, तो बस्ती के लोग नहाने और कपड़े धोने के लिए पास के तालाबों पर जाने को मजबूर होते हैं। जो पानी बचता है, उसी को बचा-बचाकर काम चलाते हैं। बस्ती के लोगों ने नेता से लेकर प्रशासन तक सबसे जलमीनार (पानी की टंकी) बनाने की मांग की, लेकिन आज तक कोई सुनवाई नहीं हुई।
बाएं- सड़क पर पानी के लिए जद्दादोजहद | दाएं - सागर कुमार पानी को लेकर परेशानी बताते हुए
फोटो - सत्यम कुमार
धनबाद के हीरापुर की कहानी भी कुछ ऐसी ही है, लेकिन यहां पानी की किल्लत इलाके का भूगोल तय करता है। हीरापुर के पुराने इलाके विनोद नगर के निवासी भास्कर सुमन बताते हैं कि यह इलाका मुख्य रूप से दो हिस्सों में बंटा हुआ है एक थोड़ा ऊँचा हिस्सा और दूसरा निचला हिस्सा। नगर निगम की जलापूर्ति व्यवस्था की लाचारी यह है कि पानी केवल निचले इलाकों तक ही सिमट कर रह जाता है, जबकि ऊंचे हिस्से के घरों तक पहुँचने से पहले ही उसका दम टूट जाता है।
भास्कर सुमन के अनुसार, करीब 10 साल पहले तक इस ऊंचे हिस्से में निगम का सप्लाई वाटर सुचारू रूप से आता था, लेकिन धीरे-धीरे पानी का दबाव कम होता गया और अंततः वह पूरी तरह गायब हो गया।
बाएं- विनोद नगर के निवासी भास्कर सुमन | दाएं- सड़क पर नहाते लोग
फोटो - सत्यम कुमार
इस बाबत नगर निगम के अधिकारियों का कहना है कि जैसे ही मुख्य पाइपलाइन से पानी रिलीज किया जाता है, रास्ते में लोग अवैध मोटर और बूस्टर पंप लगाकर उसे अपने घरों में खींच लेते हैं, जिसके कारण आगे के इलाकों में पानी का प्रेशर बचता ही नहीं है।
हफ्तों पानी न मिलने की स्थिति से तंग आकर विनोद नगर के ऊंचे हिस्से के लगभग सभी घरों (250 घर) ने अपने पानी के कनेक्शन नगर निगम को आधिकारिक रूप से सरेंडर कर दिए। आज स्थिति यह है कि जनता ने सरकारी व्यवस्था पर भरोसा छोड़कर अपने खर्चे पर डीप बोरिंग का सहारा लेना शुरू कर दिया है। विडंबना यह है कि कुछ साल पहले जहाँ 100 फीट की गहराई पर पानी मिल जाता था, वहीं अब पानी के लिए 250 फीट या उससे भी नीचे जाना पड़ रहा है।
धनबाद की सड़कों पर पानी के लिए मशक्कत करते लोग
फोटो - सत्यम कुमार
वहीं, गांधी नगर वार्ड 30 के रहने वाले अरविंद सिंह बताते हैं कि उनके इलाके में निगम द्वारा पानी की आपूर्ति के नाम पर केवल खानापूर्ति की जाती है। दिन में महज एक बार और वह भी केवल 20 मिनट के लिए पानी छोड़ा जाता है, जिससे किसी भी परिवार की दैनिक जरूरतों की पूर्ति होना नामुमकिन है। इस नाकाफी आपूर्ति के विकल्प के रूप में यहां के लोगों को भी निजी बोरिंग करानी पड़ी है। अरविंद सिंह भूजल स्तर में आ रहे खतरनाक बदलाव को रेखांकित करते हुए बताते हैं कि उनके घर के आसपास कुछ खेतिहर जमीनें होने के कारण स्थिति कुछ हद तक संभली हुई थी, लेकिन उनके घर से महज 500 मीटर पहले का पूरा इलाका पिछले पांच सालों में पूरी तरह ड्राई (सूखा) हो चुका है।
जल स्तर के कम होने का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पहले जहाँ घर की ओवरहेड टंकी को भरने में मात्र 20 मिनट लगते थे, अब वही टंकी भरने में 35 मिनट का समय लग रहा है। इसका सीधा अर्थ यह है कि पाइपलाइन का डिस्चार्ज और भूजल का प्रेशर दोनों लगभग आधे रह गए हैं। हालात यह हैं कि अब जो लोग नई बोरिंग करा रहे हैं, उन्हें पुराने बोरिंग स्तर से भी 30 फीट नीचे जाने पर ही पानी नसीब हो रहा है।
रोज़ाना पानी के लिए जूझते लोग
फोटो - सत्यम कुमार
धनबाद शहर से लगभग 15 किलोमीटर दूर वार्ड नंबर 14 में स्थित खरिकाबाद में जल संकट का एक अलग ही रूप देखने को मिलता है। यहां पहुँचते ही दूर से एक विशाल जलमीनार (Overhead Water Tank) दिखाई देती है। यह टंकी 10 साल पहले बनी थी, खरिकाबाद के निवासी भोलानाथ राम उस विशाल ढाँचे की तरफ इशारा करते हुए कहते हैं। यहां की हर गली में पाइपलाइन बिछाई गई थी। हमें यह लगा था कि अब हमें गंदा पानी नहीं पीना पड़ेगा। लेकिन 10 साल बीत गए, उस टंकी में आज तक एक बूँद पानी नहीं चढ़ा। पाइप ज़मीन के नीचे सड़ चुके हैं, नल के नलके टूटकर गायब हो गए हैं।
बाएं - खरिकाबाद बस्ती का बंद पड़ा जल मीनार |दाएं - खारिकाबाद में जब फ़िल्टर प्लांट खराब या बंद हो जाता है तो इसी कुँए का पानी पीने के लिए इस्तेमाल करते हैं।
फोटो - सत्यम कुमार
जलमीनार के असफल ढाँचे के बीच खरिकाबाद के लगभग तीन हज़ार लोग पीने के पानी के लिए भारत कोकिंग कोल लिमिटेड (BCCL) के वॉश री या पिट-हेड पर लगे फिल्टर प्लांट पर पूरी तरह निर्भर हैं। जिनके पास साधन हैं, वे साइकिलों पर चार-चार गैलन बाँधकर 3 किलोमीटर दूर बीसीसीएल के रिहायशी परिसर से पानी लाते हैं।
बाएं- फ़िल्टर प्लांट का विवरण | दाएं- फ़िल्टर प्लांट से साईकिल से पानी ढ़ोते हुए निवासी
फोटो - सत्यम कुमार
लेकिन जिनकी पहुँच वहाँ तक नहीं है, उन्हें उस पानी को पीने के लिए मजबूर होना पड़ता है जिसे स्थानीय भाषा में 'खाद पानी' (माइंस में जमा पानी या Mine Pit Water) कहा जाता है।
'खाद पानी' मूल रूप से वह पानी है जो कोयला खदानों के भीतर की दरारों से रिसकर भूमिगत गड्ढों में जमा हो जाता है। खनन कार्य जारी रखने के लिए बीसीसीएल इस पानी को विशालकाय पंपों से बाहर निकालकर खुले गड्डों या पास के नालों में उड़ेल देती है। इस पानी में कोयले की धूल, ग्रिट, सल्फाइड और भारी धातुएँ भारी मात्रा में मिली होती हैं।
इस पानी का स्वाद कड़वा और कसैला होता है, भोलानाथ राम बताते हैं। जब इसे उबालते हैं, तो बर्तन के किनारे पर सफेद और पीले रंग की मोटी परत जम जाती है। इस पानी को पीने से गाँव के लगभग हर दूसरे घर में लोगों को पेट की बीमारी, आंतों में सूजन और गुर्दे (किडनी) में पथरी की शिकायत है।
बीसीसीएल के फ़िल्टर प्लांट से पानी भरती हुई महिलाएं
फोटो - सत्यम कुमार
खाद पानी पर IIT (ISM) धनबाद के प्रो. विश्वजीत पॉल का कहना है कि धनबाद की खदानों में जमा वह पानी है, जिसे BCCL, ECL और अन्य खदानें रोज़ाना 100 से 150 मिलियन लीटर की मात्रा में सिर्फ़ खनन कार्य में बाधा न आए, इसलिए पंप कर नालों में बहा देती हैं।
उनके मुताबिक़ इस पानी को आधुनिक तकनीक से 99 प्रतिशत तक शुद्ध किया जा सकता है, जिससे यह पीने लायक बन जाएगा और यह किसी नए बांध या सौ किलोमीटर दूर से पाइपलाइन बिछाने के मुक़ाबले एक-तिहाई से भी कम लागत में संभव है। हम जिस पानी को कचरा और 'खाद पानी' समझकर नदियों में बहा रहे हैं, वह वास्तव में शुद्ध सोने की तरह है। अगर बीसीसीएल और नगर निगम एक साझा वैज्ञानिक मॉडल तैयार करें और खदानों के मुहाने पर वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट लगा दें, तो धनबाद को कभी किसी दूसरे जल स्रोत पर निर्भर होने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी।
फ़िल्टर प्लांट से पानी भरने के लिए दूर-दूर से आती हैं महिलाएं
फोटो - सत्यम कुमार
DYNAMIC GROUND WATER RESOURCE OF JHARKHAND, 2024, रिपोर्ट के मुताबिक धनबाद में कुल 19 मिलियन गैलन पानी निकाला जा रहा है। वहीं एक अध्ययन, 2016 के अनुसार, धनबाद जिले में 70% से अधिक जल आवश्यकताएँ (पेयजल, कृषि, और औद्योगिक उपयोग) ग्राउंड वाटर से पूरी होती हैं, विशेष रूप से उथले और गहरे जलभृतों (aquifers) से। 35.18 मिलियन गैलन प्रति दिन पानी की आपूर्ति की मांग के मुकाबले केवल 16 मिलियन गैलन प्रति दिन है। प्रतिदिन 16.18 मिलियन गैलन की कमी है।
जिले से निकलने वाले कुल भूजल का 52 प्रतिशत से अधिक हिस्सा अकेले कोयला खदानों (BCCL, TATA Steel, ECL), कोयला धुलाई केंद्रों (Coal Washeries), स्पंज आयरन प्लांटों और इससे जुड़े भारी उद्योगों द्वारा सोख लिया जाता है। कोयला वॉशरी में एक टन कोयला धोने के लिए औसतन 1.5 से 2 किलोलीटर साफ पानी की आवश्यकता होती है। यह पानी सीधे गहरे ट्यूबवेलों से खींचा जाता है।
जिले की लगभग 26 लाख से अधिक आबादी (शहरी व ग्रामीण मिलाकर) के पीने, खाना बनाने, नहाने और सफाई के लिए केवल 6 MGD पानी ही नसीब होता है।
caption - बीसीसीएल के फ़िल्टर प्लांट से पानी भरती हुई महिलाएं
कभी धनबाद के ग्रामीण इलाकों में धान और सब्जियों की हरी-भरी फसलें हुआ करती थीं, लेकिन भूजल का स्तर गिरने और पानी के औद्योगिक इस्तेमाल के कारण कृषि के हिस्से में मात्र 3 MGD पानी ही बचता है, जिससे जिले की कृषि अर्थव्यवस्था पूरी तरह से बर्बाद हो चुकी है।
Dynamic Ground Water Resources of Jharkhand 2024 से प्राप्त
PHED (पेयजल एवं स्वच्छता विभाग) के कार्यपालक अभियंता मुकेश कुमार के अनुसार शहर की करीब 4.30 लाख आबादी मैथन डैम की जलापूर्ति पर निर्भर है, जबकि पूरे जिले की आबादी करीब 26 लाख है। पेयजल विभाग शहर में 60 MLD से ज़्यादा आपूर्ति का दावा करता है, पर वास्तविक आंकड़े कुछ और कहते हैं:
यानी मैथन से चले हर तीन लीटर में से एक लीटर चोरी हो जाता है, और सिर्फ़ एक लीटर शहरवासियों तक पहुंचता है। अकेला रेलवे 25 MLD लेता है, जो 4.30 लाख लोगों को मिलने वाले 30 MLD के लगभग बराबर है। कागज़ पर यह औसतन करीब 70 लीटर प्रति व्यक्ति प्रतिदिन बैठता है, जो 135 लीटर के राष्ट्रीय मानक (LPCD) का लगभग आधा है। यह सिर्फ़ औसत है कई इलाक़ों में तो पानी पहुंचता ही नहीं।
सरकारी सप्लाई की इस कमी की भरपाई भूजल से हो रही है। केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) की Dynamic Ground Water Resource of Jharkhand, 2024 रिपोर्ट के मुताबिक़ धनबाद में सालाना 0.19 अरब घन मीटर (BCM) भूजल निकाला जाता है, यानी रोज़ करीब 52 करोड़ लीटर (लगभग 520 MLD) जो मैथन से आने वाले 90 MLD का करीब छह गुना है।
सीएसआईआर-केंद्रीय खनन एवं ईंधन अनुसंधान संस्थान (CSIR-CIMFR), धनबाद के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. अभय कुमार सिंह धनबाद के जल संकट, भूजल संरचना, खनन गतिविधियों के प्रभाव और इसके वैज्ञानिक समाधानों पर विस्तार से रोशनी डालते हैं।
डॉ. अभय कुमार सिंह बताते हैं कि कोरंगा बस्ती और विनोद नगर की पाइपलाइन से जल न मिलने का सीधा दबाव यहां के भूजल (Groundwater) पर पड़ता है, लेकिन धनबाद का भूवैज्ञानिक ढाँचा खुद में एक बहुत बड़ी चुनौती है। धनबाद या इस क्षेत्र का अधिकांश बिल्ट-अप एरिया यानी बस्तियों वाला हिस्सा 'हार्ड रॉक' (कठोर चट्टानों) पर बसा है। धनबाद छोटानागपुर पठार का हिस्सा है। यहां की ज़मीन मुख्य रूप से कठोर ग्रेनाइट, गनीस और गोंडवाना काल की भारी कोयला युक्त चट्टानों से बनी है।
वहीं IIT (ISM) धनबाद के पर्यावरण विज्ञान एवं इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर विश्वजीत पॉल का साहसिक दावा धनबाद के परंपरागत जल-विमर्श को पलट देता है। "धनबाद में पानी की कोई कमी नहीं है," वे कहते हैं। उनका कहना कि धनबाद पानी की कमी से जूझ रहा है, एक वैज्ञानिक भ्रम है। वास्तव में धनबाद के पास इतना जल संसाधन मौजूद है कि वह न केवल अपनी पूरी आबादी और उद्योगों की प्यास बुझा सकता है, बल्कि पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल के पुरुलिया ज़िले की प्यास बुझाने में भी सक्षम है। कमी पानी की नहीं, कमी सही प्रबंधन और वैज्ञानिक दृष्टिकोण की है।
केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) और Dynamic Ground Water Resource of Jharkhand, 2024 की रिपोर्ट धनबाद के भूजल-विज्ञान के इस भयानक सच को उजागर करती है। जहां पूरे झारखंड राज्य में भूजल निष्कर्षण की औसत दर 31.42 प्रतिशत है (जो सुरक्षित मानी जाती है), वहीं धनबाद ज़िले में यह दर 73.24 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है पूरे राज्य में सबसे अधिक।
ज़िले के भीतर भी यह संकट एक समान नहीं है। बलियापुर ब्लॉक में यह दर 110.03% के साथ 'अति-शोषित' (Over-Exploited) श्रेणी में है यानी यहां बारिश के ज़रिए ज़मीन में जितना पानी सालाना जाता है, उससे 10 प्रतिशत अधिक हर साल मोटर पंपों से बाहर खींचा जा रहा है।
धनबाद शहरी क्षेत्र (95.65%) और तोपचांची (93.46%) 'क्रिटिकल' श्रेणी में आते हैं, जबकि धनबाद (81.80%), गोबिंदपुर (77.30%) और बाघमारा (70.54%) 'अर्ध-संवेदनशील' (Semi-Critical) श्रेणी में हैं। पूरे झारखंड में सिर्फ़ 23 इकाइयां "सुरक्षित" श्रेणी से बाहर हैं, और इनमें से 6 अकेले धनबाद ज़िले में हैं यह दिखाता है कि राज्य के भूजल-संकट का सबसे बड़ा हिस्सा इसी एक ज़िले में केंद्रित है।
CSIR-CIMFR के वैज्ञानिक डॉ. अभय सिंह के अनुसार, यहां मैदानी इलाकों की तरह ज़मीन के नीचे पानी के विशाल एक्विफर नहीं हैं। यहां पानी केवल चट्टानों की दरारों और ऊपरी मिट्टी की पतली परतों में ही संचित होता है। जब इन दरारों से अत्यधिक पानी खींच लिया जाता है, तो एक्विफर पूरी तरह सूख जाते हैं और उन्हें दोबारा भरने में प्राकृतिक रूप से दशकों का समय लगता है। हार्ड रॉक टेरेन में पानी का स्टोरेज या 'वाटर एक्विफर' काफी सीमित होता है, जबकि इसके विपरीत सेडिमेंट्री डिपॉजिट वाले इलाके पानी को रोकने के मामले में ज्यादा वाटर-बेरिंग (समृद्ध) होते हैं। यही कारण है कि यहां भूजल का स्तर तेजी से नीचे जाता है।
आगे वह बतातें हैं, “खनन क्षेत्रों में पानी की किल्लत का एक बड़ा कारण डी-माइनिंग एक्टिविटी है। चाहे भूमिगत खनन (अंडरग्राउंड माइनिंग) हो या ओपनकास्ट माइनिंग, खदानों को सूखा रखने के लिए भारी मात्रा में पानी निकालना पड़ता है। एक-एक खदान में 8, 10 से 15 तक बड़े पंप लगातार चलते रहते हैं, जो रोजाना मिलियन गैलन पानी खींचकर बाहर नालों या खुले में डिस्चार्ज कर देते हैं।”
खदान से पानी बाहर निकालते हुए
फोटो - सत्यम कुमार
बीसीसीएल द्वारा कुछ जगहों पर प्रयास किए गए हैं, जैसे रानीगंज या पुटकी क्षेत्र में आरओ वाटर प्लांट लगाना और छोटे 200 मिली से 500 मिली तक की पानी की बोतलें तैयार करना, जिसे 'बीसीसीएल नीर' नाम दिया गया है। लेकिन डॉ. सिंह स्पष्ट करते हैं कि इस तरह के छोटे प्लांट या बॉटलिंग यूनिट्स से कुछ ही लोगों की जरूरतें पूरी हो पाती हैं। जब तक खदानों से निकलने वाले मिलियन गैलन पानी को बड़े पैमाने पर ट्रीट करने का प्लांट नहीं लगेगा, तब तक यह विशाल आबादी के किसी काम नहीं आ सकता।
डॉ. अभय सिंह ने खुद पुटकी और बलियारी के जीएम ऑफिस के पास 50,000 लीटर क्षमता के ओवरहेड टैंक और ट्रीटमेंट प्लांट का प्रोजेक्ट चलाया था, लेकिन बाद में उचित रखरखाव (Proper Care) के अभाव में वे प्रोजेक्ट्स ठप पड़ गए।
शहरीकरण और अंधाधुंध निर्माण के कारण प्राकृतिक भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge) बुरी तरह प्रभावित हुआ है। अंतरराष्ट्रीय वाटर बजट सिद्धांतों को समझाते हुए वे बताते हैं कि बारिश के पानी का लगभग 60% हिस्सा इवैपो-ट्रांस्पिरेशन (वाष्पोत्सर्जन) के जरिए वापस आकाश में चला जाता है।
कुल पानी का करीब 22% हिस्सा सतह से बहकर नदी-नालों के रास्ते समुद्र में चला जाता है। यदि इलाका कृषि क्षेत्र (Agricultural Field) है, तो बारिश का 20% से 25% पानी जमीन के भीतर (Groundwater) जाता है। इसके विपरीत, धनबाद जैसे हार्ड रॉक वाले क्षेत्रों में बमुश्किल 10% से 12% पानी ही जमीन के नीचे रिस पाता है। यदि पूरा इलाका सीमेंटेड और पक्का हो जाए, सड़कें और बिल्डिंगें बन जाएँ, तो यह इन्फिल्ट्रेशन दर और भी कम हो जाती है। यही कारण है कि जब पानी निकालने (विड्रॉल) की दर रिचार्ज होने की दर से बहुत अधिक हो जाती है, तो वाटर टेबल नेगेटिव जोन में चली जाती है। गर्मियों में हैंडपंप और पारंपरिक कुएँ सूख जाते हैं।
इस पर डॉ. अभय कहते हैं कि शहर में पानी की कमी का एक और पहलू संपन्न लोगों द्वारा की जाने वाली बर्बादी है। बलियापुर रोड से लेकर विभिन्न इलाकों में धड़ल्ले से बड़ी-बड़ी इमारतें और अपार्टमेंट्स बन रहे हैं, जहाँ डीप वेल्स और हैवी पंप लगाकर भूजल का अत्यधिक दोहन किया जाता है। एक बार फ्लश चलाने या शावर में नहाने में बिना हिसाब के पानी बर्बाद होता है।
डॉ. सिंह सुझाव देते हैं कि यदि दिल्ली या नोएडा की तर्ज पर 'कंट्रोल्ड वाटर सप्लाई सिस्टम' लागू किया जाए (यानी सुबह-शाम तय घंटों के लिए नल से नियंत्रित पानी देना), तो लोग निजी बोरिंग पर निर्भर नहीं होंगे और पानी की बर्बादी रुकेगी। साथ ही, रूफटॉप रेनवाटर हार्वेस्टिंग पिट्स की हर 2-4 साल में नियमित सफाई (बालू और ग्रेवल बदलना) अनिवार्य होनी चाहिए।
धनबाद नगर निगम के अधिकारी (नाम जाहिर नहीं करने पर) मुताबिक़ शहरी क्षेत्र में क़रीब 55,000 जल-कनेक्शन हैं, जिनके लिए रोज़ाना लगभग 208 MLD पानी की आपूर्ति का दावा किया जाता है। PHED (पेयजल एवं स्वच्छता विभाग) के कार्यपालक अभियंता मुकेश कुमार बताते हैं कि बहुत से लोग घरों में मोटर लगाकर ज़रूरत से ज़्यादा पानी स्टोर कर लेते हैं। इससे आगे जिन्हें सप्लाई होनी थी, उसमें बाधा आ जाती है। धनबाद के कई इलाकें 'ड्राई ज़ोन' है वहां आबादी तो काफ़ी बढ़ गई है, लेकिन जलमीनार अब भी पुरानी आबादी के हिसाब से ही बनी है। फ़िलहाल धनबाद में 6 और जलमीनारें बनाने का प्रस्ताव है।
बाएं - बोरिंग वाहनों की सूची | दाएं - पम्प के द्वारा पानी स्टोर करते हुए लोग
फोटो - सत्यम कुमार
वहीँ पेयजल विभाग के SDO दीपक कुमार ने बताया, फ़िलहाल 19 जलमीनारों से जलापूर्ति हो रही है। छह नई जलमीनारें जल्द बनेंगी, जिनसे कुसुम विहार व पांडरपाला में उपलब्धता बढ़ेगी। फेज़-2 की जलापूर्ति चालू होने से स्थिति बेहतर होगी।
धनबाद नगर निगम के एक अधिकारी ने इस पूरे मसले पर विस्तार से अपना पक्ष रखा। निजी बोरिंग पर लगी रोक हटाए जाने के सवाल पर उन्होंने बताया, पिछले तीन साल से निगम क्षेत्र में नई बोरिंग कराने पर रोक लगी हुई थी, ताकि भूजल पर दबाव कम किया जा सके। लेकिन इस साल हमने इसे फिर से चालू करने का फ़ैसला लिया है, ताकि आम जनता को पानी की किसी भी तरह की कमी न झेलनी पड़े।
भूजल स्तर सुधारने के लिए उठाए जा रहे क़दमों पर अधिकारी ने बताया कि निगम शहर के कई पुराने तालाबों और कुओं का पुनरुद्धार करा रहा है, जिससे बारिश का पानी ज़मीन के भीतर बेहतर तरीक़े से रिचार्ज हो सके। उनके मुताबिक़, जितने भी नए मकान अब बन रहे हैं, उन सभी में रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाना अनिवार्य कर दिया गया है, और इसके सख़्ती से पालन के आदेश दिए गए हैं।
कोरंगा बस्ती और खारिकाबाद जैसी बस्तियों तक अब भी निगम का पानी न पहुंचने के सवाल पर अधिकारी का जवाब था, इस दिशा में काम चल रहा है। हम सीवेज लाइनों के ज़रिए भी इन इलाक़ों में पानी पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं, और जल्द ही यह समस्या हल हो जाएगी।
धनबाद में ऐसे घर-घर पहुंचाया जाता है पानी
फोटो - सत्यम कुमार
मेघ पाइन अभियान के मैनेजिंग ट्रस्टी एकलव्य प्रसाद इसे बिल्कुल अलग नज़रिए से देखते हैं। उनका कहना है कि यह संकट पानी की कमी का नहीं, बल्कि हमारे पानी के प्रति नज़रिए और आदतों के बिगड़ने का नतीजा है। वे एक आसान मिसाल देते हैं हमने भूजल को ऐसा बैंक खाता समझ लिया है, जिसमें हम पैसे जमा किए बिना बस पैसे निकालते ही जा रहे हैं। नगर निगम भले दावा करे कि शहर के आधे घरों तक रोज़ पानी पहुंचता है लेकिन बाकी लोग भूजल पर ही निर्भर हैं।
एकलव्य प्रसाद अपने निजी अनुभवों और आंकड़ों को साझा करते हैं। वे बताते हैं कि यदि उनके अपने घर पर दर्ज वर्षा के आंकड़ों को देखें, तो 2018 के बाद से मात्र 2 साल ही बमुश्किल 1200 मिलीमीटर (औसत वर्षा) वर्षा ही देखने को मिलती है। दिक्कत यह है कि इतनी बारिश होने के बावजूद हम इस पानी को सहेज नहीं पा रहे। ज़्यादातर पानी बहकर बर्बाद हो जाता है, ज़मीन के अंदर जाने की जगह।
ज़मीन के बहुत गहरे हिस्से का पानी वापस भरना मुश्किल है, लेकिन ज़मीन के ऊपरी हिस्से में मौजूद पानी (जिसे "शैलो एक्विफर" कहते हैं) को कम ख़र्च में आसानी से फिर से ज़िंदा किया जा सकता है। यही सोचकर एकलव्य प्रसाद की टीम केंद्र सरकार की AMRUT 2.0 योजना के तहत नगर निगम के साथ मिलकर एक पायलट प्रोजेक्ट चला रही है।
एकलव्य प्रसाद ने आगे बताया कि 69 कुंए से हमने पायलट के लिए 5 कुएं को चिन्हित किया, साथ ही पिछले 2 साल के अथक प्रयास से यह पुर्नजीवित हुआ और वहां का वाटर लेवल भी बढ़ा है। टीम ने उन 5 कुओं को चुना जिसपर लोगों की निर्भरता अधिक रही है।
जीवन ज्योति कुआं - 5 चयनित कुओं में से एक
फोटो - सत्यम कुमार
इस पहल का उद्देश्य लोगों में भूजल के प्रति जागरूकता लाना है। इसके लिए रेनवॉटर हार्वेस्टिंग, रिचार्ज वेल, पिट और तालाबों के पुनर्जीवन जैसी तकनीकों का उपयोग किया गया। कुओं की जिम्मेदारी स्थानीय लोगों ने खुद उठाई और सतत जल उपयोग की परंपरा विकसित की, वह आगे कहते हैं।
एकलव्य प्रसाद का सुझाव है कि धनबाद के सभी 55 वार्डों में अलग-अलग निगरानी और अलग-अलग जल-योजना होनी चाहिए, क्योंकि हर वार्ड की ज़मीन और ज़रूरत अलग है। साथ में यह कहते है कि झारखंड में 2017 से एक क़ानून है जो कहता है कि नई इमारतों में बारिश का पानी बचाने की व्यवस्था होनी चाहिए। लेकिन इसे सिर्फ़ निर्माण के वक़्त पूरी करने वाली एक औपचारिकता समझना ग़लत है। असल में इस क़ानून को शहर की पानी-सुरक्षा की नींव माना जाना चाहिए। इस क़ानून की सबसे बड़ी ताक़त यही है कि अगर इसे सही तरीक़े से लागू किया जाए।
धनबाद की यह पड़ताल दिखाती है कि यहां का संकट केवल पानी की भौतिक कमी का नहीं है। यह जल संसाधन के अलोकतांत्रिक वितरण, अनियोजित शहरीकरण व औद्योगीकरण की सम्मिलित विफलता और कुल मिलाकर जल न्याय (Water Justice) की अनुपस्थिति का जीवंत उदाहरण है। आंकड़े साफ़ बताते हैं कि झारखंड राज्य के पास समग्र रूप से भूजल की कमी नहीं है भूजल निकासी राज्य-औसत सिर्फ़ 31.42 प्रतिशत है। समस्या बंटवारे की है। धनबाद जैसे औद्योगिक केंद्र में दोहन इतना बढ़ गया कि वह "अति-शोषित" श्रेणी में पहुंच गया, जबकि उसी दोहन का एक बड़ा हिस्सा उन बस्तियों तक कभी नहीं पहुंचता, जो सबसे ज़्यादा दोहित ज़मीन पर बसी हैं।
लेटेस्ट अपडेट्स के लिए हमारे व्हाट्सऐप चैनल को फॉलो करें